ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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044.कलकत्ता शहर में मंदिर में उपदेश

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कलकत्ता शहर में मंदिर में उपदेश

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शहर के बड़े मंदिर में उपदेश एवं आहार चर्या- आश्विन में विशेषआग्रह से मैं कुछ दिन के लिए शहर में जाकर बड़े मंदिर में ठहर गई। यहाँ बहुत से श्रावकों को अपने-अपने घर में चौका लगाकर आहार देने को मिला, तब उन्होंने अपने घर को पवित्र माना। यहाँ दिन प्रतिदिन २०-२५ चौके लगते थे। हम पाँच ही साध्वी थीं अतः प्रायः मैं वृत्तपरिसंख्यान लेकर आहार कोे निकलती थी। सभी चौकों की तरफ २-३ चक्कर भी लग जाते थे। साथ में आगे पीछे सौ-पचास श्रावक लोग हो जाते थे। उस समय प्रत्येक दरवाजे पर दस-दस, बीस-बीस लोग पड़गाहन करते थे। चारों ओर से-‘‘हे माताजी! नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु अत्र तिष्ठ तिष्ठ।’’ की उच्च ध्वनि से आकाश गूँजने लगता था। उस समय जैनेत्तर लोग हजारों की संख्या में वह दृश्य देखने के लिए उमड़ पड़ते थे। कई लोग आहार चर्या देखकर, आहार भी देखने आ जाते और हाथ में ऐसा आहार लेते देखकर आश्चर्य के साथ बहुत ही भक्ति व्यक्त करते और जैन साधुओं की प्रशंसा करते थे। ‘‘देखो! ये हैं साधु, सच्चे साधु, जो कि चौबीस घंटे में एक बार ऐसा कठोर नियम धारण करके मिलने के बाद, अपने हाथ में भोजन करके साधना कर रहे हैं। धन्य हैं ऐसे साधु.....!’’

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ऐलक का दुराग्रह-

यहाँ शहर के मंदिर में प्रातः और मध्यान्ह दोनों समय मेरा उपदेश होता था, उसमें बहुत भीड़ हो जाती थी। इस प्रवचन में यहाँ ठहरे हुए ऐलक सिद्धसागरजी आकर बैठ जाते थे, उन्हें मेरे बराबर ही उँचा आसन दिया जाता था। वे सुधारक लोगों की संगति से एक दिन उन लोगों के कहे अनुसार अष्टपाहुड़ ग्रंथ को लाकर एक श्लोक दिखाते हुए बोले- ‘‘माताजी! इस आधार से आपको ऐलक को नमस्कार करना चाहिए।’’ मैंने सोचा-‘‘यह अच्छा रहा, मेरी गुरु परम्परा में ऐलक व क्षुल्लक दोनों ही आर्यिकाओं से छोटे माने गये हैं और वे आर्यिकाओं को नमस्कार करते हैं किन्तु ये उल्टा ही बोल रहे हैं। अरे! ये मुझे नमस्कार न करें तो न सही किन्तु कराने का दुराग्रह क्यों कर रहे हैं?’’ खैर! उनकी यह दुराग्रह वृत्ति बढ़ती ही गई और उनके साथ ४-५ महानुभाव जोर-जोर से बोलने लग गये, तब मैंने उपदेश के बाद शास्त्र दिखाकर बड़े ही प्रेम से समाधान दिया- ‘‘देखो! आर्यिकाओं की चर्या मुनि के समान है, मूलाचार में कहा है-

एसो अज्जाणं पि य सामाचारो जहाक्खिओ पुव्वं।

सव्वह्मि अहोरत्ते विभासिदव्वो जहाजोग्गं।।६७।।

जैसी यहाँ मुनियों के लिए मूलगुण और समाचार विधि बताई गई है, वही सब यथा योग्य अहोरात्रि में आर्यिकाओं के लिए भी है, अतः ये उपचार से महाव्रती मानी गई हैं। सर्वत्र प्रथमानुयोग में इन्हें महाव्रती और संयतिका कहा है। आचारसार में भी कहा है-

देशव्रतान्वितैस्तासामारोप्यंते बुधैस्ततः।

महाव्रतानि सज्जातिज्ञप्त्यर्थमुपचारतः।।८९।।

इनके उपचार से महाव्रत हैं किन्तु ऐलक के उपचार से भी महाव्रत नहीं है। सागारधर्मामृत में कहा है-

कौपीनेऽपि समूर्छत्वात् नार्हत्यार्यो महाव्रतं।

अपि भाक्तममूर्छत्वात् साटिकेऽप्यार्यिकार्हति।।३६।।

अहो! आश्चर्य की बात है कि ऐलक लंगोटी में ममत्व परिणाम होने से उपचार से महाव्रती नहीं हो सकता है किन्तु आर्यिका साड़ी धारण करने पर भी ममत्व परिणाम रहित होने से उपचार से महाव्रतिनी कहलाती हैं अर्थात् ऐलक लंगोटी त्याग कर सकता है, मुनि बन सकता है फिर भी ममत्व परिणाम आदि से उसे धारण किये है अतः उत्कृष्ट श्रावक ही है किन्तु आर्यिका तो साड़ी का त्याग करने में समर्थ नहीं है।

दूसरी बात हमने यह बताई कि-‘‘आज भी जो आचार्य शिवसागर जी, आचार्य महावीरकीर्ति जी, आचार्य देशभूषण जी आदि हैं उनसे इस विषय में समाधान मंगा लीजिये।’’ लेकिन वे लोग सुनने को ही तैयार नहीं थे, ‘‘बस आप इन ऐलक को नमस्कार करें। ’’ ऐसा दुराग्रह पकड़े हुए थे। मैंने पाहुड़ गंथ के उस श्लोक का भी अर्थ बताया कि-

एक्कं जिणस्स रूवं वीयं उक्किस्ससावयाणं तु।

अवरट्ठियाण तइयं चउत्थं पुण लिंगदंसणं णत्थि।।१८।।

एक जिनमुद्रा का नग्न दिगंबर रूप, दूसरा उत्कृष्ट श्रावकों का और तीसरा आर्यिकाओं का, इस प्रकार जिन शासन में तीन लिंग कहे गये हैं। चौथा लिंग जिनशासन में नहीं है। इसमें पूज्यता का क्रम नहीं है प्रत्युत् जैन आम्नाय में तीन ही लिंग पूज्य हैं, चौथा नहीं है यह बतलाया गया है। दूसरी बात यह है कि-‘‘सामान्यशास़्त्रतो नूनं विशेषो बलवान् भवेत् ’’ यह नीति है कि सामान्य शास्त्र की अपेक्षा विशेष शास्त्र का कथन बलवान होता है। यहाँ यह पाहुड़ की गाथा सामान्य है और सागारधर्मामृत का श्लोक विशेष है। इत्यादि। खैर! जब यही चर्चा बार-बार ये लोग लाने करने और सभा में हल्ला मचाना चाहते थे तभी झूमरमल बगड़ा आदि महानुभावों ने एक दिन इन्हें नीचे ही रोक कर कहा- ‘‘आप लोग माताजी द्वारा दिखाये गये प्रमाण मानने को तैयार हैं या नहीं? यदि नहीं, तो अब इसी प्रश्न को बार-बार यहाँ लाने की जरूरत नहीं है और यदि उनकी बात प्रमाण मानते हैं तो उन्होंने अनेक प्रमाण दिखा दिये हैंं अतः अब रोज-रोज व्यर्थ बकवास की जरूरत नहीं है।’’ इस प्रकार सख्ती करने पर वे लोग शांत हुए।

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सिद्धचक्र विधान-

यहाँ अष्टान्हिकपर्व में अनेक श्रावकों ने ‘अहिंसाभवन’ में सिद्धचक्र विधान करने का आयोजन किया। सम्मेदशिखर जी से बीसपंथी मंदिर से एक जिनप्रतिमाजी धातु की लाये और मेरी आज्ञा से ब्र. सूरजमलजी को बुलाया गया। विधान अच्छे समारोह से हुआ। उसमें नागरमल जी प्रमुख इन्द्र बने थे। कार्तिक शुक्ला चौदस के दिन हम लोगों ने चातुर्मासिक प्रतिक्रमण करके नूतन पिच्छिका बदली। सेठ भागचंद जी सोनी भी इस अवसर पर आ गये थे। उन्होंने भी मुनि-आर्यिकाओं की चर्या पर प्रकाश डाला और विशेषरूप से मेरे ज्ञान की प्रशंसा की। मैंने सोचा कि वास्तव में यह मेरी प्रशंसा नहीं है, यह तो आगम के ज्ञान की ही प्रशंसा है.....। वहाँ इस विधान की फिल्म भी बनायी गयी थी। विधान के समापन में एक हजार आठ (१००८) छोटे-छोटे मिट्टी के कलश बनवाये थे। जिन पर नारंगी फल रखकर सजाये गये थे और उन्हीं कलशों से बेलगछिया में बनी हुई पांडुकशिला पर श्रीजी की प्रतिमा का अभिषेक किया गया। बहुत ही धर्म प्रभावना हुई, इस अभिषेक की फिल्म बहुत अच्छी लगती थी। भक्त लोगों के आग्रह से शहर मेंं मेरा लगभग एक माह तक ठहरना हो गया। इसी मध्य एक विषय और चर्चा का बन गया।

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जिनप्रतिमा के चरण स्पर्श की चर्चा-

मैं यहाँ प्रतिदिन बेलगछिया में भी और अपने संघस्थ चैत्यालय में भी जब आहार के लिए निकलते समय शुद्ध वस्त्र पहनकर दर्शन करने जाती थी, तब भगवान के चरण स्पर्श करती थी। आज तक तो कोई विरोध हुआ नहीं था। यहाँ शहर में कुछ दिनों बाद किन्हीं लोगों ने यह चर्चा उठा दी और मदनलाल जी पाडवा जो कि मंदिर कमेटी के मंत्री थे, उन्होंने एक पर्चे में लिखकर वह पर्चा मंदिर के बोर्ड पर लगा दिया। उसमें लिखा था- ‘मैं पूज्य माताजी से निवेदन करता हूँ कि आप श्रीजी की प्रतिमा के चरण न छुएँ क्योंकि यहाँ समाज में अशांति होती है।’’ ऐसे ही अभिप्राय के वाक्य थे। अब गुरुभक्त लोगों ने आकर मुझसे कहा- ‘‘माताजी! इस विषय पर आपका क्या समाधान है? अब तो यह नोटिस जब तक यहाँ बोर्ड से वे ही लोग नहीं हटायेंगे, तब तक आप विहार भी कैसे करेंगी?......’’ मैंने शांति से उत्तर दिया-‘‘बात ठीक है। उन्हें ऐसा लिखने के बजाए व्यक्तिगत मेरे पास निवेदन करना चाहिए था.....।’’ मैं यथासमय मंदिर में पहुँची। दो-चार वे ही विरोधी श्रावक आ गये थे किन्तु वे लोग खड़े-खड़े देखते रहे। मैंने जिन प्रतिमा के चरण छूकर भक्ति से माथे में लगाये और आहार को उठ गई। आश्चर्य इस बात का था कि जो इन विषयों का विरोध करते थे, वे ही आहार के बाद मेरे आगे-आगे बैंड-बाजे के जुलूस में नाचते हुए भक्ति में विभोर होते हुए चलते थे। लोगों ने मदनलाल जी से कहा- ‘‘आप यह नोटिस फाड़कर माताजी से क्षमा याचना कर लो, इसके बाद ही माताजी का विहार होगा, तब तक माताजी यहीं रहेंगी।’’ कुछ दिनों बाद कुछ लोग बेलगछिया भगत जी के पास पहुँचे और यह समस्या कह सुनायी, उन्होंने बड़े अच्छे ढंग से लोगों से प्रश्नोत्तर किया- ‘‘आप लोग आर्यिका को अपने से बड़ा और पूज्य मानते हैं क्या?’’ लोगों ने कहा-‘‘हाँ।’’ ‘‘उनके चरण धोकर गंधोदक माथे पर चढ़ाते हो या नहीं?’’ ‘‘हां, चढ़ाते हैं।’’ ‘‘पुनः यदि तुम भगवान का स्पर्श कर सकते हो, तो माताजी ने स्पर्श कर लिया तो क्या अनर्थ हो गया? अरे भाई! सामान्य महिलाओं में और आर्यिकाओं में आप अन्तर तो मानते ही हैं।’’ इस समाधान से लोगों को प्रसन्नता हुई पुनः सेठ मदनलाल जी ने वह बोर्ड पर लिखा हुआ पर्चा हटा दिया। सभी में तनाव खत्म होकर शांति का वातावरण बन गया। इसके पूर्व नवयुवक एक भजन गुनगुनाते रहते थे- ‘‘धर्मवीर तैयार रहो नित, अपना शीश कटाने को।’ आन के आगे जान नहीं कुछ, दिखला देओ जमाने को’’ खैर! वहाँ तो ऐसी कोई बात न होकर बहुत ही छोटी बात थी, समाप्त हो गई। उसके बाद मैंने बेलगछिया के लिए विहार कर दिया। इसके पहले एक दिन कुछ लोगों ने अमरचंद पहाड़िया आदि श्रावकों से कहा था कि-‘‘आप लोग माताजी को शहर से बेलगछिया विहार करा दें। तब उन लोगों ने उत्तर दिया था-‘‘भाई! हम आर्यिका संघ व्यवस्था कमेटी के लोग गुरुओं के पीछे चलने वाले हैं, न कि आगे।’’ उनके ये शब्द आज भी हमें याद आ जाते हैं। ऐसे ही दिल्ली के लाला पन्नालाल तेजप्रेस वालों ने भी कई बार कहा है कि- कभी भी ‘‘घोड़े के पीछे नहीं चलना चाहिए और गुरुओं के आगे नहीं चलना चाहिए।’’ वास्तव में जो श्रावक यह नीति अपनाते हैं, वे गुरुभक्त बने रहते हैं, गुरु द्रोही नहीं होते हैं।

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विहार स्थगित-

यहाँ आकर मैंने एक तिथि विहार के लिए घोषित कर दी। अब कुछ महानुभाव आकर अनुनय-विनय करने लगे कि- ‘‘माताजी! १०-१५ दिन बाद ही विहार का रखिये’’ किन्तु मैंने निर्णय नहीं बदला, तब कुछ लोगों ने और ही उपाय किया। जिस दिन शायद मगसिर सुदी पंचमी को विहार करना था, तब चौथ की रात्रि में ५-७ नवयुवक आये, जिसमें पारसमल बड़जात्या प्रमुख थे। इन लोगों ने रात्रि में संघस्थ चैत्यालय में एक मंडल मांडना शुरू कर दिया और भजन गाने लगे- ‘‘केशरिया चावल रंगवा दो ज्ञानमती माताजी का विहार रुकवा दो।’’ इन लोगों का मतलब यह था कि जब हम लोग संघस्थ प्रतिमा जी को प्रातः मंडल पर विराजमान कर पूजा करने लगेंगे, तब माताजी भला कैसे विहार करेंगी? किंतु पता नहीं क्यों? मेरे मन में रंचमात्र भी ढिलाई नहीं आई और मैंने यही निर्णय रखा कि प्रातः आहार के बाद मध्यान्ह में विहार करना ही है। इधर रात्रि भर जागरण कर भजन गाते और मंडल पूरते हुए इन लोगों की भक्ति भावना मैं सुनती रही थी। अकस्मात् रात्रि में १-२ बजे के बाद मन में ऐसा विचार आया कि- ‘‘कई बार आचार्यश्री शिवसागर जी महाराज भी विहार की घोषणा करने के बाद रुक जाते हैं। हाँ! इतना अवश्य है कि आचार्य श्री विहारघोषणा के बाद १-२ मील विहार करके वापस आ जाते हैं’’ ऐेसे कुछ उदाहरण मैंने देखे हुए थे अतः प्रातः सामायिक से निवृत्त होकर मैंने संघस्थ आर्यिकाओं से परामर्श किया, उन सबने यही कहा- ‘‘अम्मा! जैसा आप निर्णय करो ठीक, हमें क्या?’’ पुनः मैंने ब्र. चमेलाबाई को बुलाकर उनसे एकांत में राय ली। उन्होंने भी यही कहा कि- ‘‘माताजी! चूँकि आप महाव्रती हैं, आपको अपने वचन का बहुत लक्ष्य है अतः आप भी यथासमय विहार कर दीजिये पुनः ये लोग आपको कुछ दूर से वापस ले आयेंगे।’’ मैंने भी मध्यान्ह में तीन बजे के लगभग विहार कर दिया पुनः बहुत लोग साथ में चल रहे थे। एक मील करीब जाने के बाद पुनः श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना करने लगे- ‘‘माताजी! अभी हमें १०-१५ दिन का समय और दीजिये। एक बार पुनः बेलगछिया विहार कीजिये।’’ तब हम लोग भी सरल भाव से वापस आ गये। अब पारसमल आदि नवयुवकों की खुशी का भला क्या ठिकाना?’’ इसके पूर्व शहर में बहुत से नवयुवकों ने एक दिन आकर प्रार्थना की थी कि- ‘‘माताजी! प्रातः ८ बजे से आपका उपदेश होता है। उससे पूर्व ७ से ८ बजे तक हम नवयुवकों को कुछ प्रश्नोत्तर करने के लिए समय देवें, हम लोग कुछ चर्चायें करना चाहते हैं।’’ चूँकि उस समय कोई प्रौढ़ स्त्री-पुरुष नहीं आ पाते थे, वे भगवान की पूजन में रहते थे अतः मैंने इन नवयुवकों को मौका नहीं दिया था। अब इस समय वे भक्ति से मेरा विहार स्थगित कर प्रसन्न हुए और आगे आकर कुछ न कुछ धर्मलाभ लेने लगे, जिससे उनके माता-पिता को बहुत ही हर्ष हुआ।

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कु. सुशीला पर संस्कार-

मैं जब कलकत्ता पहुँची, मुनिश्री श्रुतसागर जी की गृहस्थाश्रम की धर्मपत्नी बसंतीबाई, उनके सुपुत्र माणिकचंद, पुत्रवधू सूरजबाई आदि आते ही थे। पुत्री सुशीला के बारे में एक बार खानिया में श्रुतसागरजी ने श्रीमती बसंतीबाई से कहा था कि- ‘‘आप अपनी पुत्री सुशीला को ज्ञानमती माताजी को गोद दे देवो।’’ वह बात मैं इन्हें याद दिलाती ही रहती थी किन्तु वह लड़की एक-दो बार मेरे पास आई थी पुनः आती ही नहीं थी। जब मैं एक माह शहर के मंदिर में रही, तब मेरी संघस्थ ब्रह्मचारिणी कु. मनोवती तीर्थयात्रा गई हुई थी। इधर ये बसंतीबाई और कु. सुशीला दोनों ही रात्रि में मेरे पास ही सोती थीं। अब मुझे सुशीला को समझाने, शिक्षा देने और धर्मघूँटी पिलाने में सुविधा मिल गई। मैं प्रायः उसे अनेक वैराग्यप्रद शिक्षायें दिया करती थी। मैं कहा करती थी- ‘‘देखो सुशीला! अनादिकालीन संसार में यह मनुष्य पर्याय बड़ी मुश्किल से मिली है, इसे विषयों में फसा देना मतलब, चिंतामणि रत्न को फेंक देने के समान है।

इतश्चिन्तामणिर्दिव्यः इतः पिण्याकखंडकं।

ध्यानेन चेदुभे लभ्ये क्वान्द्रियन्तां विवेकिनः।।’’

एक हाथ में चिन्तामणि रत्न है और एक हाथ में खली का टुकड़ा, ध्यान से ये दोनों मिल सकते हैं, तो भला समझदार लोग किस में आदर करेंगे? इत्यादि शिक्षाओं का प्रभाव सुशीला पर पड़ने लगा, मुझे खुशी हुई। अब वह सुशीला शहर से बेलगछिया आने पर मेरे साथ आ गई थी और वह अब मुझे छोड़कर रहना नहीं चाहती थी। मैंने यह सब संस्कार उसकी माँ के सामने ही डाले थे अतः उसकी माँ तो पूर्णतया पक्ष में थीं किन्तु उसके भाई माणिकचंद, हीरालाल और पदमचंद विरोधी बन गये। फिर भी वहाँ से विहार कर ‘चिनसुरा’ नामक गाँव में, जो कि कलकत्ते से लगभग २० मील दूर था, यहाँ आकर मैंने उसे उसकी मां से सहमति लेकर ब्रह्मचर्य व्रत दे दिया था। उसके चार वर्ष पश्चात् वह मेरे पास आ गई थी। लगभग नव वर्ष मेरे पास रही है। आचार्यश्री धर्मसागर जी से यहाँ दिल्ली में मैंने उसे आर्यिका दीक्षा दिलाकर ‘श्रुतमती’ नाम रखा था। आजकल वह अपने पिता आचार्य कल्पश्रुतसागर जी के संघ में है। मां बसंतीबाई भी सप्तमप्रतिमाधारिणी ब्रह्मचारिणी हैं। ये भी पहले मेरे पास रहती थीं, अब महाराजजी के संघ में ही हैं।

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ब्र. प्यारेलाल की भक्ति और चर्चाएँ-

यहां बेलगछिया में ब्र. प्यारेलाल जी आकर बैठ जाते थे, तब गोम्मटसार कर्मकांड, पंचसंग्रह और धवला ग्रंथ की भी चर्चाएँ चलती रहती थीं। एक बार चर्चा यह चली कि श्रावकों को सामायिक में आत्मा का ध्यान करना चाहिए। मैंने कहा-श्रीगौतमस्वामी ने नवदेवताओें की वंदना भक्ति को प्रधान किया है। श्रावक-प्रतिक्रमण और यतिप्रतिक्रमणश्री गौतम स्वामी के बनाये हुए प्रसिद्ध हैं। श्रावक प्रतिक्रमण में सामायिक का लक्षण देखिये-

जिणवयणधम्मचेदियपरमेट्ठिजिणालयाण णिच्चं पि।

ज वंदणं तियालं कीरइ सामायियं तं खु।।

जिनवचन, जिनधर्म, जिनप्रतिमा, अर्हंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये पाँच परमेष्ठी और जिनालय ये नव देवता हैं। त्रिकाल में इनकी वंदना करना वही सामायिक है। यह प्रसंग उन्हें बहुत अच्छा लगा। एक बार यह चर्चा चल रही थी कि- ‘‘वीतराग चारित्र साक्षात् मोक्ष का कारण है।’’ मैंने कहा-‘‘ऐसा एकांत नहीं है, वीतराग चारित्र अर्थात् यथाख्यातचारित्र को प्राप्त करके भी जीव अर्ध पुद्गलपरावर्तन तक संसार में घूम लेता है।’’ भगतजी मेरी तरफ देखने लगे-‘‘ऐसा कैसे?’’ मैंने ‘कसायपाहुड़’ ग्रंथ की पंक्तियाँ दिखायीं। वे ये हैं- ‘‘५३. अट्टण्ह....५४...तसेसु आगदो संजमासंजमं संजमं च बहुसो गदो। चत्तारिवारे कसाए उपसामित्ता तदो एइंदिएसु गदो। असंखेज्जाणि वस्साणि अच्छिदो.....।’’ शंका-आठ मध्यम कषायों का जघन्य प्रदेश संक्रमण किसके होता है? समाधान-जो जीव एवेंद्रियों के योग्य जघन्य सत्कर्म के साथ त्रसों से आया, वहाँ पर संयमासंयम और संयम को बहुत बार प्राप्त किया, चार बार कषायों का उपशमन करके (ग्यारहवें गुणस्थान में पहुँचकर पुनः नीचे उतरकर) तदनंतर एवेंद्रियों में गया। वहां पर जितने काल में उपशामक काल में बंधे हुए समयप्रबद्ध गलते हैं, उतने असंख्यात वर्षों तक एकेन्द्रियों में रहा, तदनंतर त्रसों में आया और सर्वलघु काल से संयम को प्राप्त हुआ पुनः कषायों की क्षपणा के लिए उद्यत हुआ। ऐसे जीव के अधःप्रवृत्तकरण से चरम समय में आठों मध्यम कषायों का जघन्य प्रदेश संक्रमण होता है।’’ इस उद्धरण से यह समझ में आता है कि सम्यक्त्व सहित संयमासंयम और संयम को बहुत बार प्राप्त कर सकते हैं तथा उपशम श्रेणी पर चार बार चढ़कर वहां पर वीतरागी-शुद्धोपयोगी-यथाख्यातचारित्र वाले हो सकते है फिर गिरकर कदाचित् एकेन्द्रियों में जाकर असंख्यात वर्षों तक पुनः भ्रमण कर सकते हैं।

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सोनगढ़ी चर्चाएँ-

सोनगढ़ विचारधारा वाले लोग मुनि-आर्यिकाओं को द्रव्यलिंगी कहते हैं और यह भी कहते हैं कि ‘‘आजकल पंचम काल में मुनियों की चर्या निभ ही नहीं सकती है।’’ मैंने उन्हें श्री कुन्दकुन्ददेव की गाथायें दिखायीं-

‘‘भरहे दुस्समकाले धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स।

तं अप्पसहावठिदे णहु मण्णइ सो वि अण्णाणी।।७६।।

इस भरत क्षेत्र के दुःषम काल में मुनि को आत्म-स्वभाव में स्थित होने पर धर्मध्यान होता है, जो ऐसा नहीं मानता है, वह अज्ञानी है। यहां तो मैंने नमूना मात्र दिखाया है, ऐसे प्रश्नोत्तर वहाँ खूब होते रहते थे। एक बार मैंने ब्र. श्री भगतजी से पूछा कि- ‘‘मुनिश्री श्रुतसागर जी आपके बारे में कहा करते हैं कि जयधवला के पृ. १०० पर जो दूध, दही से जिन प्रतिमा का अभिषेक, दीप, धूप से पूजा, चंदन, पुष्प चढ़ाना आदि विधान है, उसके आधार से आपने बीसपंथ को मान्यता दी है।’’ उन्होंने कहा-‘‘हाँ, माताजी! मेरी श्रद्धा उन पंक्तियों पर पूर्णरूपेण है। बस, आजकल लोग अतिरेक कर देते हैंं अतः मैंने उनका प्रचार-प्रसार नहीं किया है और यही कारण है कि मैं बीसपंथ के मुनियों को, आचार्यश्री वीरसागर जी आदि को और आपको प्रमाण मानता हूँ और सच्चे साधुओं की कोटि में गिनता हूँ....।’’

इन सभी वातावरणों से मेरा चातुर्मास तथा बाद में भी मगसिर का समय अच्छे धर्मध्यान में व्यतीत हुआ। यहाँ एक ब्र. ‘चिन्तामणिबाई’ थीं। वह विधान का मंडल बहुत अच्छा बनाती थीं। यहां बेलगछिया में कई एक विधान सम्पन्न हुए। मिश्रीलाल जी पाटनी और उनकी धर्मपत्नी सूँठीबाई अधिकतर बेलगछिया ही रहते थे। सेठ सुगनचंद लुहाड़िया की धर्मपत्नी मोहनीबाई भी अनेक दिनों तक वहीं मेरे पास रही थीं। इसके बाद मेरे विहार का अच्छा कार्यक्रम बनाया गया और सुखद वातावरण में मैंने संघ सहित विहार कर दिया। प्रस्थान के समय सभा में विनयांजलि समर्पित करते हुए अनेक लोगों ने अपने-अपने उद्गार व्यक्त किये, श्रीचांदमलजी बड़जात्या ने कहा- ‘‘मुझे माताजी की हर एक चर्चा से, चर्या से और संघ की अनुशासन व्यवस्था से आज पुनः आचार्यकल्प चंद्रसागर जी महाराज का स्मरण हो रहा है।’’ विहार के बाद मैंने सुना, कुछ लोग कह रहे थे कि- ‘‘यदि माताजी इतनी विदुषी न होतीं और आगम पर इतनी दृढ़-कठोर न होतीं तो यहाँ के लोग उन्हें घोल कर पी जाते.....। अतः माताजी अपनी चर्या से यहाँ पर विजय की ध्वजा फहराते हुए जा रही हैं।’’ किन्हीं ने कहा- ‘‘माताजी के उपदेश में कथा, कहानी व मनोरंजन न होकर ठोस सिद्धान्त, अध्यात्म, वैराग्य और भक्तिमार्ग का विषय अधिक रहता था। मैं सोचा करती थी कि- ‘‘मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना’’ यह सूक्ति तो है ही, किन्तु कोई भी साधु या साध्वी यदि अपने मार्ग पर दृढ़ हैं, आगम के अनुकूल प्रवृत्ति करते हैं तो उनकी विजय होती ही है। इसमें भला मेरी क्या विजय है?....यह तो लोगों की ही विशेषता है कि वे अपने-अपने अनुरूप गुरुओं के गुणों को ग्रहण कर लेते हैं......।’’

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मदनलालजी पांड्या के घर में विश्राम-

विहार से पूर्व मदनलाल पांड्या, जिन्होंने शहर में एक पर्चा चिपकाकर अपना विरोध दिखाया था, वे ही आ गये और बोले-‘‘विहार के मार्ग में मेरी कोठी आती है अतः आपको प्रथम विश्राम वहीं करवे, अगले दिन मध्यान्ह में विहार करना है।’’ इस विषय पर कुछ भक्तों के साथ परामर्श में कुछ लोग बोले-‘‘इन्होंने पर्चा लगाया था, इनके यहाँ कतई नहीं ठहरना चाहिए।’’ कुछ लोगों ने कहा कि-‘‘इनके यहाँ ठहरने से यह प्रभावित होकर, गुरु भक्त बनकर विशेष लाभ ले सकते हैं।’’ मैंने सबकी बात सुनकर निर्णय किया कि-‘‘इन्हीं के यहाँ ठहरना है चूँकि हमारे लिए निदंक-वंदक समान हैं।-

अरिमित्र महल मसान कंचन, कांच निंदन थुुतिकरण।

अर्घावतारण असि प्रहारण, में सदा समता धरन।।

हमें इनसे कोई द्वेष-भाव नहीं रखना है। विहार के बाद रात्रि विश्राम उन्हीं की कोठी पर हुआ। प्रातः ठंड अधिक होने से मध्यान्ह में विहार का रहा। वहीं ८ बजे अनेक श्रावक-श्राविकाएँ आ गये थे, उपदेश हुआ। मैंने मदनलाल जी से कहा-‘‘मदनलालजी! यज्ञोपवीत लेकर जैन बन जावो,’’ उन्होंने यज्ञोपवीत ग्रहण कर लिया। सभी को खुशी हुई। इसके बाद उन्हीं के यहाँ चौके लगे एवं आहार हुआ। मदनलालजी ने भी आर्यिका चर्या की फिल्म खिंचवाई।

यहाँ से विहार करते हुए ‘चिनपुरा’ आ गई। वहाँ पर भी श्रावकों का मेला भर गया। यहाँ के लोगों ने शांति विधान किया और आगंतुक भक्तों के लिए प्रीतिभोज की व्यवस्था रखी। इसके बाद सम्मेदशिखर की ओर विहार हो गया।

विहार के समय ब्र.भगतजी और ब्र. चमेलाबाई की भी आँखों में आँसू थे, तमाम भक्त लोग रो रहे थे। खासकर महिलायें, जिन्होंने निकट से सेवा की थी, बालिकायें, जो पास में कुछ अध्ययन करती थीं, वे सब आँखों में अश्रु भरे हुए थींं परन्तु साधु जीवन में निर्ममता ही प्रधान है। जब हम लोगों ने घर छोड़ते समय माता-पिता के, भाई-बहनों के, अश्रुओं पर ध्यान नहीं दिया था, तब भला भक्तों के अश्रुओं पर क्या ध्यान जायेगा? हाँ, सबको यही आशीर्वाद दिया कि ऐसे ही गुरुभक्ति करते रहो, यही संसार समुद्र से तिरने का उपाय है।’’