ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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046.पुरलिया के अनुभव

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पुरलिया के अनुभव-

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सम्मेदशिखर से चैत्र में गुरुवार को पुष्यनक्षत्र में अभिञि योग के समय आहार के बाद साढ़े ग्यारह बजे विहार कर दिया। गुरुजी चांदमलजी ने मुहूर्त निकाला था। मुझे तो यह मुहूर्त विद्या नहीं आती है। वहाँ से विहार कर पुरलिया आ गई। इधर हिन्दू-मुस्लिम दंगे से मेरा विहार रुक गया। मुझे यहां २५ दिन करीब रहना पड़ा। फिर बहुत साहस करके श्रावकों की न मानकर, मैंने चैत्र शु. ११ को यहाँ से विहार कर मार्ग में बलरामपुर में आ गई। वहाँ पर पुरलिया के लोग आये और संघस्थ जिनप्रतिमा को छोटी सी पालकी में विराजमान कर जुलूस निकाल कर महावीर जयंती का अच्छा प्रोग्राम मनाया, जिससे जैनेतर लोगों में अच्छी प्रभावना हुई, उन्हें मेरा उपदेश सुनने का मौका मिला। वहाँ पुरलिया में आने पर ब्र. महावीर प्रसाद ने सायं ४ बजे दूध के लिए एक श्रावक को कहा। उसने कहा-‘‘मेरी गाय एक टाइम सुबह ही दूध देती है।’’ ब्र. जी ने कहा-‘‘चलो, आज देखें।’’

वहाँ आते ही गाय के पास दुहने बैठे, उसने दूध दे दिया। श्रावकों को बहुत खुशी हुई। ऐसे ही प्रतिदिन वह श्रावक, जिनका नाम उम्मेदमल था, वे सायंकाल ४-५ बजे अपनी गाय का दूध दुहकर, लाकर संघ में कु. मनोवती को दे जाया करते थे। वह दही जमा दिया करती थी और सुबह मठ्ठा बनाकर आहार में देती थीं। जिस दिन मेरा विहार हो गया, उस दिन भी वह श्रावक अपनी गाय शाम को दुहने गया, तब उसने पूर्व की भांति दूध नहीं दिया। श्रावकों को बहुत ही आश्चर्य हुआ और उसने बार-बार यही कहा कि- ‘‘यह गाय केवल माताजी के स्वास्थ्य हेतु मट्ठा के लिए ही दूध देती थी, अब नहीं दे रही है।’’ ये श्रावक बलरामपुर में आकर कई लोगों के सामने यह घटना सुनाने लगे। लोगों ने कहा- ‘‘माताजी में बहुत बड़ा चमत्कार है।’’ मैं सोचने लगी-‘‘भला मुझ जैसी सामान्य आर्यिका में क्या चमत्कार होगा? फिर भी यदि कुछ होवे, तो वह त्याग और संयम का ही चमत्कार है न कि मेरा।’’

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सराक बस्ती में विहार-

सम्मेदशिखर में साहू शांतिप्रसाद जी ने कई बार कहा था कि-‘‘सराकजाति के स्थानों में साधुओं को विहार करके उनका उद्धार करना चाहिए।’’ मैं कुछ सोचकर संघ की आर्यिकाओं को यहीं छोड़कर कु. मनोवती और ब्र. महावीर प्रसाद को साथ लेकर, अपने साथ आर्यिका पद्मावती को लेकर, यहाँ से सराकवस्ती में निकल गई। वहाँ छोटे-छोटे गांवों में रास्ते खेत और जंगल के ही थे। साथ में रास्ते का जानकार एक आदमी लिया था। ५-७ दिन में मैं १०-१२ गांवों में घूमी, उपदेश दिया। उन लोगों की बातें सुनी, चर्चायें कीं और उनकी जीवनचर्या भी देखी। वहाँ अनपढ़ लोग अधिक हैं, महिलाएं भीरु हैं, घूंघट में रहती हैं, बाहर आने से बहुत शरमाती हैं। आजकल कुछ पाठशालायें वहाँ खुल जाने से और जैन मंदिर बन जाने से कुछ लोग प्रबुद्ध बन रहे हैं। वहाँ कई एक वृद्धों ने मुझे बताया कि- ‘‘हम लोग सुधारवाद से बहुत डरते हैं।’’ ‘‘क्यों?’’ तो बताया कि-

‘‘इधर पचासों वर्ष पूर्व एक ब्र. शीतलप्रसाद जी आये थे। उन्होंने बाल विधवाओं को देखकर पुनर्विवाह की प्रथा चला दी। जिससे हमारी सराक जाति में दो पार्टियाँ हो गर्इं। एक सादा पार्टी, दूसरी काला पार्टी। हम दोनों पार्टियों में एक साथ जीमन-भोजन नहीं करते हैं। अभी-अभी कतरास में सराक लोगों को बुलाया गया। वहाँ श्रीमंत लोगों ने जबरदस्ती हम दोनों पार्टियों के लोगों को एक साथ बिठाकर भोजन करा दिया और एक-दूसरे में शादी करने के लिए भी प्रोत्साहित कर दिया। कुछ नयी-नयी बुद्धि के लोग आजकल इस नीति से प्रभावित हैं किन्तु हम लोग अच्छे शुद्ध घरानों में जातिच्युत- अशुद्ध घराने की बेटियाँ नहीं लेना चाहते हैं और न ही उनके साथ बैठकर खाना चाहते हैं।

इधर के लोग जब सुनते थे कि आर्यिका माता जी आ रही हैं तब साथ में कुछ लोग पुराने शहनाई आदि वाद्य बजाने वालों को लेकर, स्वागत के लिए मीलों पहले आ जाते थे पुनः खेत के रास्ते में हम दो साध्वियाँ, मात्र १०-२० श्रावक-सराकजन तथा बाजे वालों का दृश्य बड़ा अच्छा लगता था। आज भी वह संस्मरण याद आते ही वह खुले खेतों में पपीरी आदि बाजों का दृश्य दृष्टिपथ में आ जाता है। कु. मनोवती उन पुराने बाजों को देखकर खूब हंसती और कहती-

‘‘माताजी! यहां जंंगल में बाजे बज रहे हैं, भला कौन देख रहा है?’’ तब वे लोग बोलते-‘‘बहनजी! हमारी भक्ति है, हम जंगल में ऐसे महान् साधु का स्वागत करके आज पहली बार कितने हर्ष का अनुभव कर रहे हैं सो हम लोग मुख से नहीं कह सकते हैं।’’ इस प्रकार मैंने सराकबस्ती में एक सप्ताह विहार कर लोगों के अनुभव लिए पुनः वहाँ से वापस आकर ‘कटक’ की ओर विहार कर दिया।

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उड़ीसा में विहार-

इधर लगभग २०० मील तक जैन के घर कहीं भी नहीं थे। एक दिन मार्ग में एक महात्मा के मठ में ठहर गई, यह मठ बहुत बड़ा था, उसमें बरामदे में आहार हुआ। वहाँ के महात्मा-बाबाजी बहुत ही भक्तिमान थे। उन्होंने एक-दो दिन वहाँ रहने के लिए निवेदन किया किन्तु हमें भला कहाँ रुकना था? वैसे प्रतिदिन मैं आहार के बाद विहार कर देती थी और दो-ढाई मील चलकर सामायिक करती थी। उस दिन सहसा मेरे मुख से निकल गया- ‘‘आज सामायिक के बाद ही विहार करना है।’’ सामायिक करके उस दिन चतुर्दशी होने से मैंने कहा- ‘‘लाओ, पुस्तके अब यहीं पर ले आओ। पाक्षिक प्रतिक्रमण करके ही विहार करूँगी।’’ प्रतिक्रमण शुरू कर दिया, आधे से अधिक हो चुका था पुनः इतनी जोर की आँधी आई कि मानो महातूफान ही आ गया हो और यह बहुत देर तक चलती रही। रुकने के बाद ब्र. महावीर प्रसाद ने आकर कहा-

‘‘माताजी! यदि आज विहार हो गया होता तो क्या होता? ओह! सारी सड़कों पर बड़े-बड़े वृक्ष धराशायी हो गये हैं। कहीं से भी मेटाडोर गाड़ी नहीं जा सकती है।....।’’ शाम को मैं दीर्घशंका के लिए बाहर निकली और स्वयं देखा कि- ‘‘सड़कों पर आधे-आधे फर्लांग से बड़े-बड़े वृक्ष गिरे पड़े हैं।’’ यह घटना देखकर सभी आर्यिकाओं के मुख से यही निकला- ‘‘ओह! यदि आज विहार किया गया होता, तो हम लोगों की क्या दशा हुई होती?.....’’ पुनः सबने यही कहा कि- ‘‘माताजी के शब्दों में महान् शक्ति है। आज उनके मुँह से अकस्मात् निकल गया कि विहार अभी नहीं करना है। बाद में सामायिक के बाद पुनः प्रतिक्रमण के लिए आदेश दे दिया।’’ मैंने कहा-

‘‘दुर्घटना टलनी थी या नहीं होनी थी अतएव ऐसी उत्तम विचार सरणि उपजी और विहार स्थगित कर दिया.....।’’ बात यह है कि जब तक पुण्य का उदय रहता है, तब तक सभी लोग अच्छे बनते हैं, अतएव सदा पुण्य का ही संचय करते रहना चाहिए। सायंकाल से ही लोग वृक्षों को वहाँ सड़कों से हटाने के प्रयास में लग गये। हम लोगों ने रात्रि विश्राम वहीं मठ में किया पुनः प्रातः वहाँ से विहार कर जैसे-तैसे वृक्षों की टहनी आदि को उलंघन कर चलते हुए आगे गंतव्य स्थान पर पहुँचे। उसी के निकट शायद एक नदी आई थी, जिसका नाम वैतरणी था। महाभारत में वैतरणी नदी को कलिंग देश की उत्तर-पूर्वी सीमा बताया गया है। वहाँ से आगे बढ़ते हुए हम लोग आपस में विचार कर रहे थे- ‘‘देखो! ये महात्मा कितने सरल स्वभावी हैं किन्तु इनके पत्नी हैं, बच्चे हैं, बड़े-बड़े खेत हैं और ईटों के भट्टे का काम है। फिर भी ये गेरुवा वस्त्र पहनकर ‘महंत’ कहलाते हैं। यह पंचमकाल की ही विडम्बना है।......मोक्ष इनसे कितनी दूर है?’’ मैं सोचती रही-

‘‘भगवन् ! मैंने कई जन्मों में बहुत ही पुण्य संचित किया होगा जो कि मैंने जैन कुल में जन्म लिया और बचपन से ही मुझे समीचीन शास्त्रों के स्वाध्याय का लाभ मिला पुनः सच्चे दिगम्बर गुरु मिल गये और मैंने रत्नत्रयस्वरूप सच्चा मार्ग पा लिया.....।’’ ऐसे चिंतवन करते हुए क्रम-क्रम से मैंने कटक का किनारा पा लिया। वहाँ से ‘पूषराज जैन’ उनके परिवार के लोग आये, बहुत ही भक्ति से ले गये। वहाँ धर्मशाला में ठहरी, मंदिर के दर्शन किये। यद्यपि कुछ विचार यहाँ कटक या खण्डगिरि-उदयगिरि में ही चातुर्मास करने का मन में था क्योंकि गर्मी पड़ने लग गई थी, फिर भी मैंने कुछ नहीं कहा। यहाँ से तीर्थवंदना के लिए गई।

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खण्डगिरि-उदयगिरि क्षेत्र वंदना-

खण्डगिरि-उदयगिरि क्षेत्र पर पहुँचकर तीर्थक्षेत्र की वंदना की। कलकत्ता में जो श्रेष्ठी छोटेलाल जी ने अनेक गुफाओं और यक्ष-यक्षिणियों के फोटो दिखाये थे, उनका स्मरण हो आया। अनेक गुफाएँ देखीं और अनेक दीवालों में बनी हुई-उत्कीर्ण हुए-चौबीस सौ वर्ष पुरानी जिन प्रतिमाओं को और शासन देव-देवियों को देखा। अनेक उत्कीर्ण लेख देखे, जो कि अपने से पढ़े नहीं जा सकते थे।

इतिहास में राजा खारवेल का बहुत ही सुन्दर वर्णन है। यहाँ हाथी गुफा में जो इस राजा के राज्याभिषेक आदि का वर्णन है, उसमें णमोकार मंत्र से अभिलेख प्रारंभ हुआ है। यह खारवेल राजा जैन थे? खारवेल राजा की पट्टरानी द्वारा निर्मित मंचपुरी गुफा में लेख है कि- ‘‘अर्हंतों की प्रसन्नता के लिए यह गुफा श्रमणों के लिए समर्पित की गई।’’ इसी प्रकार खारवेल शासन के तेरहवें वर्ष का विचरण चौदहवीं पंक्ति में बताया है जिसके अनुसार ‘कुमारी पर्वत’ पर अर्हंतों अथवा जैन साधुओं के विश्राम के लिए गुफाओं का निर्माण किया गया था।

ये सब गुफाएँ देखकर मन में यह भाव आता था कि- ‘‘भगवान् ! मेरे जीवन में इस भव में तो शायद ऐसी गुफाओं में रहने का, ध्यान करने का अवसर नहीं मिलेगा परन्तु अगले भव में पुरुष होकर, दिगम्बर मुनि बनकर ऐसी गिरि गुफाओं में, कंदराओं में और पर्वत की चोटी पर ध्यान करने का अवसर अवश्य मिले।’’

यहाँ का कुमारी पर्वत तीर्थ रूप से प्रसिद्ध रहा है। भगवान् महावीर का समवसरण यहाँ आया था, ऐसा इतिहास प्रसिद्ध है। खंडगिरि पर्वत पर छोटे-बड़े चार मंदिर हैं और लगभग १५ गुफाएँ हैं। उदयगिरि पर्वत पर कुल १८ गुफाएँ बनी हुई हैं। यहाँ दर्शन कर, गुफाओं का अवलोकन कर, प्राचीन संस्कृति को जीवंत देखा और मन प्रसन्न किया। इधर उड़ीसा प्रान्त में उड़िया भाषा थी।

अभी भीषण गर्मी पड़ने लगी थी, यहाँ क्षेत्र पर और कटक में भी जैनों के अधिक घर नहीं थे, मात्र पूषराज निहालचंद अग्रवाल जैन का परिवार ही प्रमुख था, ये लोग भी अधिकांशतः कलकत्ते में रहते थे अतः मैंने सोचा, ‘‘कुछ और चल करके ‘हैदराबाद’ पहुँचकर वहाँ चातुर्मास कर लें। वहाँ से श्रवणबेलगोल भी लगभग चार सौ, साढ़े चार सौ मील ही रह जायेगा। चातुर्मास के बाद जल्दी ही भगवान् बाहुबली के दर्शन हो जायेंगे।’’ ऐसा सोचकर यहाँ से विहार कर दिया। यहाँ से विहार की पूरी व्यवस्था पूषराज जैन, फतेहचंद जैन आदि भक्तिमान श्रावकों ने बना दी थी। संघ में ब्र. महावीर प्रसाद जैन और ब्रह्मचारिणी मनोवती प्रमुख थे।

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आन्ध्र प्रदेश में विहार-

इधर मार्ग में अनकापल्ली, विशाखापत्तणं आदि शहर आये। बड़े शहरों में कलकत्ता के किन्हीं-किन्हीं व्यापारी सेठों के यहाँ मुनीम आदि रहते थे। यहाँ वहाँ से टेलीफोन आ जाने से ये लोग सामने स्वागत के लिए आ जाते थे। एक-दो बार ही ऐसे प्रसंग आये। बाकी इस प्रांत में जैन के गाँव एवं मंदिर न होने से हमें बहुत ही असुविधा हो गई। इधर मांस-मछली आदि खाने वाले बहुत लोग हैं। ताड़ के बड़े-बड़े वृक्ष हैं, उनमें मटकी लटकी रहती हैं। जब आदिवासी लोग कमर में रस्सा बांधकर ताड़वृक्ष पर चढ़ते थे और ताड़ी की मटकी लेकर उतरते थे, तब मार्ग में यह दृश्य कभी-कभी डरावना सा लगता था। रास्ते चलते महिलाएँ और पुरुष सामने आकर मुट्ठी बाँधकर हम लोगों से पूछते- ‘‘या ऊरु रंडे! या ऊरु रंडे!!’’

तब मेरे संघ की जिनमती जी आदि आर्यिकाएँ बहुत ही डर जातीं थीं। हम लोग उनके शब्दों को न समझकर एक-दो मिनट रुक जाते पुनः हाथ के संकेत से उन्हें हटाकर आगे बढ़ जाते। कभी-कभी जिनमती जी आदि आपस में खूब हँसतीं, कहतीं- ‘‘अम्मा! लगता है कि ये लोग गालियाँ दे रहे हैं। भला क्या पूछते हैं?’’ कुछ दिनों में वहाँ के स्कूलों में ठहरकर प्रबुद्ध लोगों से मैंने पूछा-‘‘या ऊरु रंडे, का क्या अर्थ है?’’ तब दो भाषा वालों ने बताया-ये लोग पूछते हैं-‘‘हे महानुभाव! आपका कौन सा गांव है?’’ ये बहुमान से ही आपसे पूछते हैं। वहाँ ‘रंडे’ का अर्थ महानुभाव है। अपने इधर गाली के समान है। ऐसे ही दक्षिण में गुण्डा छोटे बालक को बोलते हैं। इधर ‘गुण्डा’ का अर्थ ‘बदमाश’ होता है। देश-देश की भाषा में बड़ा ही आनन्द आता था। जहाँ पर हम लोग ठहरते थे, ऐसे स्कूल आदि के पास बच्चे हम लोगों का एक अजनबी वेष देखकर आपस में बोलते- ‘‘रा रा रा,’’ जिसका अर्थ था, आवो आवो आवो।’’ ऐसा बोलकर तमाम बच्चों को इकट्ठा कर लेते। जब हम लोग गर्मी से परेशान हो जाते, तब ब्रह्मचारी लोग इन्हें हटाते। तब ये बोलते- ‘‘पो पो पो अर्थात् जावो जावो जावो।’’

ऐसा तेलगु भाषा में ये लोग बोलते थे- विजयवाड़ा बहुत बड़ा शहर है, वहाँ पहुँची। जैन लोग न होने से बहुत ही असुविधा थी। संघस्थ ब्रह्मचारी लोग एक धर्मशाला में ठहर गये। वहाँ बरामदे में चौका लगाया। हम लोग प्रातः करीब ९-१० मील चलकर पहुँचे थे, आहार को उठे, चौके में आकर बैठे, नवधाभक्ति के बाद आहार शुरू किया ही था कि जोर से हवा चलने से ऊपर में लगा हुआ चंदोवा गिर गया, मुझे लग गया, मेरा तो अंतराय हो गया, कुल्ला करके वापस आ गई। अब ब्रह्मचारी लोग घबराये- ‘‘क्या होगा? ऐसी भयंकर गर्मी में इतनी चलाई और ऊपर से अंतराय! पेट में पानी नहीं है, माताजी के चौबीस घंटे कैसे निकलेंगे?’’ मध्यान्ह सामायिक के बाद यहाँ धर्मशाला में विवाह के बारातियों की भीड़ का हल्ला-गुल्ला देखकर मैंने वहाँ से विहार कर दिया। शरीर, स्वास्थ्य की किंचित् भी परवाह नहीं की। यद्यपि उस समय शरीर से होकर मैं विहार कर देती थी किन्तु आगे उसका परिणाम दुःखद ही हुआ है। अस्तु। कहीं-कहीं श्वेताम्बर लोग आ जाते थे, वे लोग बहुत ही भक्ति प्रदर्शित करते थे किन्तु मुझे हैदराबाद तक पहुँचना था। इसके बीच में कहीं चातुर्मास के लिए उपयुक्त स्थान नहीं था इसलिए चलना ही चलना दीखता था।

इधर आन्ध्रप्रदेश में माँसाहारी लोग बहुत थे। जहाँ कहींस्कूल में ठहरने पर भी वहाँ के मास्टर या चपरासी मुर्गी पाले रहते थे और अण्डे-माँस खाते थे अतः कहीं में भी ठहरने की इच्छा नहीं होती थी। प्रायः शिवमंदिर-हनुमान मंदिर आदि मिल जाते, तो मैं वहाँ ठहरना ज्यादा पसंद करती थी क्योंकि वहाँ शुद्धता और स्वच्छता रहती थी। अनकापल्ली में पहुँचे। वहाँ एक जैन परिवार था जो कि कलकत्ते के व्यापारी सेठ का मुनीम था। यहाँ कुछ शांति मिली। यहाँ के श्रावक ने अपना दुभाषिया- ‘तेलगू और हिन्दी जानने वाला नौकर दे दिया। यह दो भाषा का जानकार नौकर, अच्छा भक्तिमान निकला और संघ में मनोरंजन का साधन बन गया। एक जगह रात्रि में हम लोग बाहर खुले मैदान में विश्राम कर रहे थे, पास में ही कुत्ते खूब भौंक रहे थे, तभी इस नौकर ने जाकर चपरासी से कहा- ‘‘अरे! तुम इन कुत्तों को कमरे में भरकर रख दो। हमारे गुरुओं को नींद नहीं लेने देते हैं।’’ उसका अभिप्राय था कि कमरे में बंद कर दो, उसकी इस भाषा से संघ के लोग खूब हँसते और उसके साथ विनोद करते रहते। एक दिन कोई महानुभाव, गुरु समझकर आकर अपनी तेलगू भाषा में कुछ निवेदन करने लगे- मैंने इसी नौकर से पूछा कि-‘‘ये महानुभाव क्या कह रहे हैं?’’ उसने कहा-

‘‘माताजी! ये अपनी लड़की में रख देना चाहते हैं सो स्वीकृति नहीं मिल रही है, आपका आशीर्वाद लेने आये हैं।’’ मैंने अभिप्राय समझ लिया कि- ‘‘ये अपनी पुत्री का स्कूल में प्रवेश चाह रहे हैं।’’ मैंने उन्हें कहा-‘‘आप ॐ नमः मंत्र जपो पुनः लड़की को स्कूल में ले जाना, उसे प्रवेश मिल जायेगा।’’ वैसा ही हुआ, तो वे महानुभाव अगले गाँव में आकर भक्ति से नमस्कार कर, खुशी से समाचार सुनाकर, चले गये। जगह-जगह मैं हिन्दी में अहिंसा का उपदेश देती और कभी मृगसेन धीवर की, कभी खदिरसार भील की, कभी आटे के मुर्गे की आदि की कथायें सुना देती। यह दुभाषिया नौकर उन्हें तेलगू में समझा देता, जिससे कितने ही लोग मांसाहार का त्याग कर देते थे, तब मुझे बहुत ही खुशी होती थी। इस नौकर ने स्वयं एक दिन बताया कि मेरे यहाँ रोज एक मुर्गी का मांस बनता था। अनकापल्ली में मैंने आपका उपदेश सुना और मांसाहार का त्याग कर दिया। घर जाकर बर्तन में पक रही मुर्गी के मांस समेत बर्तन को ही बाहर ले जाकर फैक दिया और अपनी माता तथा पत्नी को भी मांसाहार का त्याग करा दिया है अतः यह औरों से भी मांसाहार त्याग कराने में बहुत मेहनत करता था।

इस मार्ग में कितने ही लोग पूछते-‘‘आपका व्यवसाय क्या है?’’ तब मैं उन्हें उत्तर देती-‘‘मेरा व्यवसाय अहिंसा धर्म का प्रचार करने का है।’’ लोग खुश होते और कौतुक से उपदेश सुनना चाहते। हम लोगोेंं के हाथ में मयूर पिच्छिका देखकर जगह-जगह लोग पूछते- ‘‘यह क्या है? और क्यों आपने ले रखी है? बहुत अच्छी लगती है, क्या हमें दे सकती हैं?’’ तब मैं पिच्छी के गुणों को बतलाती कि यह हम दिगम्बर जैन साधु-साध्वियों का चिन्ह है। संयम का, जीव दया का उपकरण है, ऐसा समझा देती। कभी-कभी एक पंख निकाल कर आशीर्वाद और स्मृति के रूप में दे देती थी।

यदि पंख सभी को देने लग जाती, तो पिच्छी के सारे पंख ही समाप्त हो जाते अतः सावधानी से कभी किन्हीं प्रबुद्ध महानुभावों को ही देती थी। इस प्रकार विशाखापत्तनं आदि होते हुए मैं हैदराबाद के निकट पहुँच गई। कलकत्ता से सूचना मिल जाने से यहाँ के लोग कई दिनों पहले ही आते रहे थे और हैदराबाद में किस दिन प्रवेश करना है? यह दिन निश्चित कराना चाहते थे। यद्यपि मैं जरूरत से ज्यादा थक चुकी थी, गर्मी का मौसम, अंतरायों का होना और लम्बी चलाई से शरीर जवाब देता जा रहा था, फिर भी मैंने उससे खींचतान करने में कमी नहीं रखी और हैदराबाद वालों को अषाढ़ की आष्टान्हिका में पहुँचना निश्चित कर दिया । वहाँ के लोगों में खूब उत्साह था क्योंकि दिगम्बर जैन आर्यिकाओं का तो क्या, साधुओं के प्रवेश का ही इनके लिए पहला मौका था। इससे पूर्व निजाम स्टेट में बहुत वर्षों पूर्व आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज का विहार हुआ था परन्तु आज तक किसी के चातुर्मास का इन्हें लाभ नहीं मिला था अतः ये लोग बहुत ही उत्कंठित थे।

शहर के प्रवेश में मीलों दूर से बैंड बाजे के साथ जुलूस बना लिया। मैं जुलूस में चल तो रही थी किन्तु शरीर में इतनी कमजोरी आ चुकी थी कि ‘‘लगता था अभी गिर जाऊँगी।’’ बहुत ही मनोबल से चल रही थी। इससे ४-५ दिन पूर्व से मुझे खून के अतिसार (दस्त) शुरू हो गये थे। पहले तो मैंने किसी शिष्या को बताया ही नहीं था पुनः एक दिन पूर्व कह दिया था। दैवयोग से या मेरे कर्मोदय से मेरी शिष्यायें भी उन दिनों कुछ सोच नहीं पाई थीं, जैसे-तैसे मैं हैदराबाद में केशरबाग दिगम्बर जैन मंदिर के प्रांगण में पहुँची। बस, जुलूस के समाप्त होते ही मैं पड़ गई। उसके बाद शायद २०-२५ दिन बाद ही उठ कर बैठ पायी थी।

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मेरी अस्वस्थता-

इधर आषाढ़ माह में मैंने लगभग १ माह में साढ़े तीन सौ मील की चलाई की थीं। गर्मी की भीषणता से तथा पुरानी संग्रहणी के निमित्त से अब शरीर ने जवाब दे दिया। आहार में कुछ जल व फल-रस लेते ही वमन हो गया। इधर दिन भर खून के दस्त होने से इतनी नाजुक स्थिति देखकर संघ के क्या, वहाँ के श्रावक लोग भी एकदम घबड़ा गये। डाक्टर-वैद्यों को बुलाया गया। जब उन्होंने मेरी चर्या सुनी कि-‘‘चौबीस घण्टे में दिन में १०-११ बजे मात्र एक बार करपात्र में आहार, उसी समय जल और औषधि, उसमें भी औषधि आयुर्वेदिक, शुद्ध काढ़ा या चूर्ण आदि......।’’ तब डाक्टरों ने तो कह दिया- ‘‘इन्हें जीवित रख पाना बहुत कठिन है.....।’’ वैद्यों ने भी जवाब दे दिया। उस समय आर्यिका जिनमती ने साहस बटोरकर बुद्धिमत्ता से कलकत्ते टेलीफोन कराया। वहाँ के लोग जब सारी स्थिति समझ गये, तब वैद्यराज केशव देव को भेजा। इसके पूर्व यहाँ मैंने अस्वस्थ अवस्था में ही संस्तर पर (पाटे पर) पड़े-पड़े वर्षा-योग स्थापना क्रिया कर ली थी। मेरी सीरियस स्थिति में लोगों का उत्साह समाप्त सा हो गया था। एक दिन रात्रि में कुछ लोग एकत्रित होकर मंदिर के बाहर ही बैठकर, चर्चाएँ कर रहे थे जो कि कुछ-कुछ मेरे कान तक भी आ रही थीं। एक ने कहा-‘‘यह क्या हुआ?’’ दूसरे ने कहा-‘‘बताओ, समाधि हो जायेगी तो क्या होगा?’’ तीसरे ने कहा-‘‘भाई! माताजी की बहुत छोटी उम्र है। सुना है, इनके उपदेश से कलकत्ते में हजारों-हजारों लोगों ने लाभ लिया है। इस समय इनके समान उपदेश देने वाला आचार्य देशभूषणजी के सिवाय कोई दूसरा साधु नहीं है, बल्कि ये आर्यिकाओं में पहली आर्यिका हैं जो इतना अच्छा उपदेश करती हैं।’’ एक ने कहा-‘‘इनके पास जितनी भी साध्वियाँ हैं, सब इन्हीं की शिष्यायें हैं, उनका क्या होगा? इनके बाद भला ये लोग क्या करेंगी?’’.......। कुछ लोग बोले-

‘‘अरे भाई! यहाँ समाधि हो जाने से हम लोगों का नाम और हैदराबाद शहर का नाम बदनाम हो जायेगा?’’ इस प्रकार बेचारे श्रावक किंकर्तव्यविमूढ़ हो अनेक चर्चायें कर रहे थे। इसी बीच कलकत्ते से वैद्यराज आ गये। उन्होंने आहार के समय शुद्ध औषधि, काढ़ा, चूर्ण आदि दिलाया। वैसे मेरी परिचर्या में आर्यिका जिनमती जी आदि सभी कुशल थीं। वे स्वयं चौके में आकर आहार दिलाती थीं लेकिन वमन और दस्तों में नियंत्रण नहीं हो पा रहा था। लगभग पाँच दिन तक वैद्यराज अपना इलाज चलाते रहे। मुझे प्रतिक्षण णमोकार मंत्र सुनने की ही इच्छा रहती थी। इधर उपचार से सफलता नजर नहीं आ रही थी। वैद्य जी ने कहा- ‘‘माताजी ने इस संग्रहणी रोग से ग्रसित शरीर से इतनी अधिक पदयात्रा कर ली है कि अब इनकी आंतें बेकार हो गई हैं, पेट में पानी सूख गया है। अब इनको कैसे बचाया जावे.....?’’

वे भी चिंतित होकर किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो रहे थे पुनः मेरे पास आकर बैठे और धीरे से बोले- ‘‘माताजी! मेरी बुद्धि तो अब कुछ काम नहीं कर रही है अतः आप ही कुछ उपाय बतलाइये।’’ मैंने कुछ सोचा पुनः धीरे-धीरे से कहा- ‘‘वैद्य जी! मट्ठा बंद करके एक-दो दिन जरा सा दूध का प्रयोग कराकर देखो.....।’’ वैद्य जी ने अगले दिन आहार में मट्ठा बंद करा दिया और जरा सा दूध दिलाया। उसमें भी इलायची आदि कुछ चीजें डलवाई थीं। दैवयोग से उस दिन वमन रुक गया। वैद्य जी प्रसन्न हुए। बाद में धीरे-धीरे औषधि ने अपना काम शुरू कर दिया। उस समय मुझे पानी न देकर ‘डाभ’ के जल में भी कुछ वस्तु डालकर, उसे भोभल में गरम कर भिन्न प्रक्रिया से उस ‘डाभ’ के जल को आहार में दिया जाता था। दूध में भी कुछ न कुछ इलायची आदि डालकर गर्म कर दिया जाता था। औषधि की पुड़िया, काढ़ा और चूर्ण दिया जाता था। अनार को भी मिट्टी या आटे में लपेटकर गर्म कर उसके रस को निकाल करके दिया जाता था। कुल मिलाकर औषधिरूप से ही कुछ रस, दूध या जल पहुँचाया जाता था। धीरे-धीरे स्वास्थ्य में सुधार होना शुरू हुआ, तब सभी के जी में जी आया और वैद्यराज जी मेरा आशीर्वाद लेकर कलकत्ते के लिए रवाना हो गये। यहाँ संघस्थ ब्रह्मचारिणी का एक चौका था और श्रावकों का भी चौका था। धीरे-धीरे कई श्राविकाओं ने शुद्ध जल का नियम लेकर आहार देना शुरू कर दिया।

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मनोवती की मनोभावना सफल हुई-

इधर हैदराबाद से किसी श्रावक का लिखा हुआ एक पत्र टिकैतनगर पहुँचा- ‘‘आर्यिका ज्ञानमती माताजी अत्यधिक बीमार हैं।’’ माता-पिता बहुत दुःखी हुए। कैलाशचंद जी को भेजा, ‘‘जाओ समाचार लेकर आओ, कैसी तबियत है? कैलाशचंद आये-देखा, मैं पाटे पर लेटी हुई हूँ और बोलने अथवा करवट बदलने की भी मेरी हिम्मत नहीं है पुनः दो-चार दिन बाद कुछ सुधार होने पर एक दिन मध्यान्ह में कु. मनोवती भाई कैलाशचंद के पास बैठी-बैठी रोने लगी, बोली- ‘‘भाई साहब! मुझे दीक्षा दिला दो, अभी ८ दिन पूर्व भी माताजी के बारे में सभी डाक्टर-वैद्यों ने जवाब दे दिया था, बोले थे, कि अब ये बचेंगी नहीं.....यदि माताजी को कुछ हो गया, तो मैं क्या करूँगी? कैलाशचंद जी ने बहुत कुछ सान्त्वना दी किन्तु उसे शान्ति नहीं मिली पुनः वह आकर मेरे पास रोने लगी और बोली- ‘‘मेरे भाग्य में दीक्षा है या नहीं? मैं कितने वर्षों से तड़प रही हूँ।’’ इतना कहकर उसने दीक्षा न मिलने तक छहों रस त्याग कर दिये। दो दिनों तक वह नीरस भोजन करती रही, तब कैलाशचंद मेरे पास बैठे और बोले- ‘‘माताजी! इसे कैसे समझाना?......’’ मैं धीरे-धीरे बोली- ‘‘कैलाश! मैंने देखा है कि संघ में जिसके भाव दीक्षा के नहीं होते हैं, उसे कैसी-कैसी प्रेरणा देकर दीक्षा दी जाती है? किन्तु.....पता नहीं इसके किस कर्म का उदय है।......जो भी हो, यह बेचारी दीक्षा के लिए रो-रोकर आँखें सुजा लेती है। अब मुझे भी इसके ऊपर करुणा आ रही है।.... जब मेरे दीक्षा के भाव थे, तब मैंने भी तो पुरुषार्थ करके छह महीने के अंदर ही दीक्षा प्राप्त कर ली थी किन्तु इसे आज ६-७ वर्ष हो गये हैंं। न इसके ज्ञान में कमी है न वैराग्य में, मात्र इसका शरीर अवश्य कमजोर है, फिर भी यह चारित्र में बहुत ही दृढ़ है, यह मैंने अनुभव कर लिया है अतः मेरी इच्छा है कि तुम अब इसके सच्चे भ्राता बनो.....।’ इतना सुनकर कैलाशचंद का भी हृदय पिघल गया। वे बोले- ‘‘माताजी! आप जो भी आज्ञा दें मैं करने को तैयार हूँ।.....मैं इसका रस परित्याग पूर्ण कराकर ही घर जाऊँगा।’’ मैंने कहा- ‘‘तुम आज ही पपौराजी (टीकमगढ़) चले जावो और इसकी दीक्षा हेतु आचार्य श्री शिवसागर जी से आज्ञा ले आवो। यह मेरे से ही दीक्षा लेना चाहती है।’’ कैलाशचंद ने मेरी आज्ञा शिरोधार्य की। वहाँ से रवाना होकर टीकमगढ़ पहुँचे। आचार्यश्री को नमोऽस्तु करके यहाँ की सारी स्थिति सुना दी। सन् १९६४ का आचार्य संघ का यह चातुर्मास पपौरा तीर्थ पर हुआ था। आचार्य श्री ने कहा- ‘‘मेरी आज्ञा है कि आर्यिका ज्ञानमती माताजी उसे क्षुल्लिका दीक्षा दे दें। आज्ञा लेकर कैलाशचंद वापस हैदराबाद आ गये। कु. मनोवती की खुशी का भला अब क्या ठिकाना? मैंने श्रावण शुक्ला सप्तमी को भगवान् पाश्र्वनाथ का मोक्ष कल्याणक होने से उसी दिन दीक्षा देने के लिए सूचना कर दी। फिर क्या था, हैदराबाद के श्रावकों के लिए यहाँ दीक्षा देखने का पहला अवसर था। भक्तों ने बड़े उत्साह से प्रोग्राम बनाया, तीन दिन ही शेष थे। कैलाशचंद ने खुली जीप में मनोवती की शोभायात्रा निकाली पुनः वहाँ के श्रावकों ने हाथी पर बिंदोरी निकाली थी। कु. मनोवती को रात्रि के १-२ बजे तक सारे शहर में घुमाया गया। श्रावक-श्राविकाएँ चन्दन के हार, नोटों की मालाएँ और पुष्पमालाओं से मनोवती को सम्मानित करते गये।

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जाप्य का प्रभाव-

श्रावण शुक्ला सप्तमी के प्रातः से ही मूसलाधार बारिश चालू हो गई। ऐसा लगा- ‘‘खुले मैदान में दीक्षा का मंच बना है, दीक्षा वहाँ कैसे होगी? जनता कैसे देखेगी?....।’’ कैलाश ने मेरे सामने समस्या रखी। मैंने एक छोटा सा मंत्र कैलाश को दिया और बोली- ‘‘एक घंटा जाप्य कर लो और निश्चिंत हो जाओ, दीक्षा प्रभावना के साथ होगी।’’ ऐसा ही हुआ, दीक्षा के समय दिगम्बर जैन, श्वेताम्बर जैन और जैनेतर समाज की भीड़ बहुत ही अधिक थी। इधर दीक्षा के एक घंटे पहले ही बादल साफ हो गये और आश्चर्य तो इस बात का रहा कि मुझमें बैठने की भी शक्ति नहीं थी। सो पता नहीं उस समय स्फूर्ति कहाँ से आ गई कि मैंने विधिवत् दीक्षा की क्रियायें एक घंटे तक स्वयं अपने हाथ से कीं और नवदीक्षिता क्षुल्लिका का नाम ‘‘अभयमती’’ घोषित किया, अनन्तर ५ मिनट तक जनता को आशीर्वाद भी दिया। दीक्षा विधि सम्पन्न होने के एक घंटे पश्चात् पुनः मूसलाधार वर्षा चालू हो गयी। तब सभी लोगों ने एक स्वर से यही कहा- ‘‘माताजी में बहुत ही अतिशय है। तब मैंने कहा-‘‘मेरे में कुछ भी अतिशय नहीं है। अतिशय तो धर्म में है। वास्तव में, धर्म के प्रसाद से ही सर्व अमंगल दूर होते हैं और तो क्या? धर्म से ही मोक्ष भी प्राप्त किया जा सकता है अतः धर्म पर ही श्रद्धा रखो।’’ अगले दिन कैलाशचंद ने सजल नेत्रों से क्षुल्लिका अभयमती माताजी को आहार दिया, उन्हें दूध, घी आदि रस देकर अपना मन संतुष्ट किया। अब उन्हें यह समाचार माता-पिता को सुनाने की आकुलता थी अतः मेरी आज्ञा लेकर उधर से भगवान बाहुबलि की (श्रवणबेलगोल) की वन्दना करके वापस अपने घर पहुँच गये। इधर मुझे भी स्वास्थ्य लाभ होता गया। उधर कैलाशचंद के मुख से माता-पिता ने मेरी स्वस्थता सुनी तो खुश हुए किन्तु जब मनोवती की दीक्षा के समाचार सुने, तब माँ मोहिनी रो पड़ीं। वे बोलीं- ‘‘मैंने कौन-से पापकर्म संचित किये थे कि जो अपनी दोनों पुत्रियों की दीक्षा देखने का अवसर नहीं मिल सका.....।’’ पिता जी को भी बहुत खेद हुआ किन्तु उस समय जाने-आने की इतनी परम्परा नहीं थी कि जो झट ही रेल से यात्रा करके आकर दर्शन कर जाते......अस्तु।

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ब्र. सुरेश को व्रत और दीक्षा-

ब्र. सुरेशचंद को मैंने उसकी प्रबल इच्छा और प्रार्थना के अनुसार सप्तम प्रतिमा के व्रत दे दिये पुनः आगे उसको आचार्य शिवसागर जी के संघ में भेजकर क्षुल्लक दीक्षा दिला दी। आज ये सुरेश ‘मुनि संभवसागर जी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। मुनि होने के बाद भी इन्होंने मेरे पास बहुत दिनों तक अध्ययन किया है। मैंने भी अपने इन ब्रह्मचारी शिष्य को मुनिपद पर पहुँचाकर उन्हें श्रद्धा से सदा ‘नमोऽस्तु’ किया। अब मैं स्वस्थ होने लगी थी। यहाँ भक्तों में सौ. जीऊबाई, राजुबाई आदि तथा मांगीलाल पहाड़े, नन्दलाल, ताराचंद, अखयचंद आदि प्रसिद्ध थे। इन सभी में भी सेठ जयचंद लुहाड़िया अच्छे भक्तिमान थे। उनकी माता सप्तमप्रतिमाधारिणी थीं और उनके बड़े भाई पूनमचंद भी आचार्यकल्प चन्द्रसागर जी के भक्तों में थे। ये तो नांदगाँव रहते थे, फिर भी यहाँ आते रहते थे। ऐसे ही वरंगल के सेठ सुवालाल जी सपत्नीक यहाँ बहुत दिन तक रहे थे और उन्होंने अभयमती की दीक्षा के समय माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त किया था। इन्होंने मुझसे दूसरी प्रतिमा के व्रत धारण कर व्रती जीवन बना लिया था। माताजी पूर्ण स्वस्थ हो जावें-

श्रीमान जयचंद लुहाड़िया हंसमुख प्रकृति के व्यक्ति हैं। वे मुझे स्वस्थ होते देखकर बोले- ‘‘यदि नित्य ही दीक्षाएँ होेने लगें, तो आप पूर्ण स्वस्थ हो जावेंगी।’’ वहाँ के लोगों ने उनके ये शब्द पकड़ लिये और प्रायः हँसकर सुनाते रहते थे। सन् १९६७ में मैं औरंगाबाद में अस्वस्थ हो गई, तब भी जयचंद लुहाड़िया आये और ‘‘किसी को दीक्षा दिला दो तो माताजी स्वस्थ हो जायेंगी’’ ऐसा कहने लगे थे। अभी यहाँ सन् १९८५ में मैं हस्तिनापुर में अस्वस्थ थी, तब भी ये दर्शन करने आये थे।’’ आजकल ये कानजी पंथ विचारधारा से सहमत हैं, अतः इधर के मुनिभक्त लोगों से इनके वैचारिक संघर्ष-टकराव चलते रहते हैं। व्यक्तिगत वात्सल्य से मैंने इन्हें हस्तिनापुर में सन् १९७९ और सन् १९८५ की प्रतिष्ठा में बुलाया भी किन्तु यहाँ मंच पर वैचारिक टकराव हो जाने से इन्हें सम्मान नहीं मिल पाया, जिसका मुझे खेद रहा है।

शांतिविधान में श्रद्धा- मेरी श्रद्धा शांति विधान में प्रारम्भ से ही रही है। इधर श्रावण शुक्ल पक्ष सोलह दिन का था। मैंने कु. मनोवती से यह विधान शुरू कराया। प्रतिदिन नया मंडल बनाकर विधान होता था। यहाँ एक नवयुवक झूमरमल था। वह रंगोली से बहुत ही सुन्दर मंडल बना देता था। मनोवती ने तो मध्य में सप्तमी को ही दीक्षा ले ली। अन्य भक्तों ने यह विधान सोलह दिन किया और मैं स्वस्थ हो गई, तब लोगों का भी यह विश्वास रहा कि यह विधान विधिवत् करने से बहुत ही लाभदायक है।

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भाद्रपदपर्व में धर्मप्रभावना-

दशलक्षण पर्व में मैंने पं. श्री वर्धमान शास्त्री-सोलापुर वालों को बुलाने की प्रेरणा दी थी। इनसे दोनों समय लोग प्रवचन सुनते थे। यहाँ लोगों के घर एक मुहल्ले में न होकर एक-एक, दो-दो मील के अंतराल से प्रायः बिखरे हुए होने से लोग एक साथ हमारे यहाँ नहीं आ पाते थे। दशलक्षण में तो सभी ने अच्छा लाभ लिया।

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विधान की बहुलता-

जीऊबाई ने एक दिन कहा कि- ‘‘मुझे रविव्रत का उद्यापन करना है। माताजी! आप विधिवत-उद्यापन करा दीजिये।’’ मैंने आर्यिका जिनमती से बतलाकर जो ‘रविव्रत व्रतोद्यापन’ विधान संस्कृत में था, उसे करा दिया। इसके बाद एक-एक महिलाओं ने और पुरुषों ने कहीं, उद्यापन के लिए, कही पुण्य संचय के लिए अथवा शांति के लिए एक-एक विधान कराने शुरू कर दिये। दो बार तो यहाँ तीन लोक मंडलविधान हुआ। एक बार अच्छी प्रभावना से बड़े रूप में श्री मांगीलाल पहाड़िया ने किया था। आश्विन शुक्ला में सोलह दिन का पक्ष होने से पुनः एक श्रावक ने सोलह दिन का शांति विधान किया। इस विधान में उसने सोलह दिन तक प्रत्येक दिन पृथक-पृथक जाति के फल मंडल पर चढ़ाये थे, उनमें से एक दिन कच्ची सुपाड़ी चढ़ायी जो कि बहुत अच्छी लगी थीं क्योंकि वह हमारे लिए नई वस्तु थी। कार्तिक की अष्टान्हिका में यहाँ नांदगांव के पूनमचंद लुहाड़िया ने बड़ी अच्छी विधि से सिद्धचक्र विधान कराया था। कुल मिलाकर यहाँ पर छप्पन विधान हुए थे। इतने विधान किसी भी चातुर्मास में नहीं हुए हैं।

इन विधानों को होते देखकर एक-दो श्रावक बहुत चिंतित हो रहे थे और आपस में कहते थे-‘न जाने कितना खर्चा हो रहा है.....’’ जबकि इन विधानों में हमारी तरफ से कोई प्रेरणा नहीं रहती थी। मात्र अपनी-अपनी रुचि से प्रायः महिलाएँ ही करा रही थीं। कई एक विधान पुरुषों ने, प्रेम से सपरिवार मिल कर किये हैं। इनमें वे लोग मात्र विधान की सामग्री ले आते थे और मंडल तो झूमरमल आदि लड़के बना देते थे। विधान आर्यिका जिनमती, आदिमती आदि करा देती थीं। कोई खास खर्चा लोगों को नहीं दिखता था। उन एक-दो वंकंजूस प्रकृति के लोगों की भावनाओं को सुनकर कुछ महिलाएँ हँसा करती थींं और कहती थीं कि- ‘‘जिन्होंने विधान नहीं किया है, उनके कौन से स्वर्ण के कंगूरों के महल बन रहे हैं? हम लोग अपनी-अपनी सुख, शांति और समृद्धि के लिए विधान करा रहे हैं, इन्हें क्यों ‘हाय’ लगी है? खैर! मेरे सामने तो कोई विधान के रोक-टोक की चर्चा आई नहीं थी, फिर भी एक प्रबुद्ध महिला ने कहा- ‘‘माताजी! आप उन कंजूस महानुभाव को भी प्रेरणा देकर एक छोटा सा विधान अवश्य करा दो।’’ मैंने एक दिन उन श्रावक से कहा-

‘‘आप भी एक नवग्रह विधान कर लो, घर में शांति रहेगी, मंगल होगा.....।’’ तब उन्होंने भी खुशी-खुशी सामग्री और नव श्रीफल चढ़ाकर छोटे से छोटा नवग्रह विधान कर ही लिया। तब महिलाएँ बहुत प्रसन्न हो गयीं। इस प्रकार वहाँ सन् १९६४ के चातुर्मास में ५६ विधान सम्पन्न हुए थे। फिर भी ‘इन्द्रध्वजविधान’ की संस्कृत हस्तलिखित प्रति हमें उपलब्ध नहीं हो पायी थी, अतः यही विधान नहीं हो पाया था। जब इसे मैंने सन् १९७६ में हिन्दी में बना दिया है, तब से सारे भारतवर्ष में शायद आज तक यह हजारों की संख्या में हो चुका है।

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मंदिर पर शिखर निर्माण-

एक बार मैंने श्रावकों से पूछा- ‘‘यहाँ पांच मंदिर हैं, किसी पर शिखर क्यों नहीं है?’’ किसी ने बताया-‘‘यहाँ मुसलमानी रियासत होने से उनका विरोध था कि मस्जिद के सिवाय कोई ऊँचे शिखर के मंदिर नहीं बना सकते, अतः बिना शिखर के ही मंदिर हैं।’’ मैंने कहा-‘‘अब तो स्वतंत्र भारत में ऐसा कोई बंधन नहीं है।’’ बोले-‘‘हाँ माताजी! अब आप प्रेरणा दीजिये।’’ मैं भी जब-तब लोगों के सामने ‘‘मंदिर पर शिखर होना चाहिए’’ ऐसा बोल देती थी और जयचंद जी लुहाड़िया को लोग प्रेरणा देते, तो वे कह देते थे कि- ‘‘जिस दिन माताजी की आज्ञा हो जावेगी, उसी दिन मैं शिखर का काम शुरू करा दॅूंगा.....।’’ अब तो लोग मेरे सामने बार-बार अनुनय विनय से कहने लगे- ‘‘माताजी! आप जयचंद से कह दीजिये।’’ मैं भी लक्ष्य नहीं देती थी। मैं सोचती कि- ‘‘मैं आज्ञा क्या देऊं? कह तो दिया ही है कि मंदिर पर शिखर बनना चाहिए। आखिरकार लोगों ने मेरे पास अधिक रूप से आग्रह करना शुरू किया। एक बार जब जयचंद जी दर्शनार्थ आये, तो मैंने कहा- ‘‘जयचंद जी! इस मंदिर पर शिखर बनवाना है।’’ उन्होंने कहा-‘‘हाँ माताजी! जब आप आज्ञा दें, काम शुरू करा दूँ। मैंने मुहूर्त निकलवा दिया और जयचंद जी ने इस केशरबाग के मंदिर के ऊपर शिखर का काम शुरू करा दिया। इधर के लोगों ने भी आग्रह करके कलकत्ते के समान ही रात्रि जागरण कर, सत्याग्रह करके, मुझे चातुर्मास के बाद रोक लिया तथा शिखर में वेदी प्रतिष्ठा कराने और जिन प्रतिमा विराजमान कराने का निर्णय कर लिया। मगसिर में इसका मुहूर्त रहा। मेरी प्रेरणा से इन लोगों ने ब्रह्मचारी सूरजमल जी को बुलाया और उनके द्वारा यहाँ शिखर में वेदी शुद्धि और भगवान् विराजमान कराने का काम सम्पन्न हुआ।

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गृह चैत्यालय-

प्रायः सभी श्रावकों के घरों से यहाँ के मंदिर दूर-दूर पड़ते थे अतः बहुत से श्रावक बिना देवदर्शन के रहते थे। उन्हें नित्य देवदर्शन दुर्लभ हो रहा था। तब मेरी प्रेरणा से नंदलाल ने अपने घर में छोटा सा चैत्यालय बनवाया, जिसकी वेदी शुद्धि और जिनप्रतिमा विराजमान के कार्य श्री ब्र. जी ने सम्पन्न कराए।

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केशलोंच और धर्म प्रभावना-

यहाँ के श्रावक हम सभी के केशलोंच कार्यक्रम यत्र-तत्र पांडाल बनाकर, खुले में कराते थे जिसे हजारों जैनेतर लोग देखकर बहुत ही प्रभावित होते थे। वहाँ मेरे प्रवचन का भी लाभ आबाल-गोपाल सभी लोग ले लेते थे। यहाँ मेरे सानिध्य में श्वेतांबर संप्रदाय के साधु-साध्वी और यति लोग भी आते रहते थे। एक बार ‘आनन्दजी कल्याणजी पेड़ी’ के प्रमुख ‘कस्तूरभाई’ स्वयं दर्शनार्थ आये थे। काफी चर्चाएँ हुर्इं, उन्होंने बताया कि- ‘‘मेरे यहाँ एक नियम है कि किसी को पुत्र न होने से वे दंपत्ति दत्तक पुत्र नहीं लेते हैं प्रत्युत्त् अपनी सारी संपत्ति अपने बाद इस संस्था के लिए लिखा देते हैं। इसलिए हमारी पेड़ी सशक्त है और इसके धन से हम लोग अनेक तीर्थों का विकास और अनेक कार्य किया करते हैं।’’ हमें उनकी यह बात बहुत अच्छी लगी।

आज मैंने स्वयं देखा है कि-अपनी दिगम्बर जैन समाज में बड़े-बड़े लखपति निःसंतान होने से दत्तक पुत्र ले लेते हैं और वह माता-पिता को बहुत कम सुख देकर प्रायः सम्पत्ति को दुव्र्यसनों में लगा देते हैं। चूँकि स्वतः की कमाई को बरबाद करने में थोड़ा सोचना भी पड़ता है अतः माता-पिता का कर्तव्य है कि- ‘‘अपनी कमाई को जितना हो सके, धर्म व दान में लगा दें।’’ वह अगले भव में असंख्य गुणा होकर फलेगी। पुत्रों के लिए क्यों संग्रह करके रखें? देखो! एक नीति है- यदि पुत्रः सुपुत्रः स्यात् संपदा किं प्रयोजनम् । यदि पुत्रः कुपुत्रः स्यात् संपदा कि प्रयोजनम् ।। यदि पुत्र सुपुत्र है तो स्वयं कमाकर खायेगा और यदि पुत्र कुपुत्र हैं तो वह दुव्र्यसनों में ही लगाकर, आप स्वयं भी दुर्गति का भाजन बनेगा और सारे कुल को डुबो देगा। अपने समाज में दत्तक पुत्र की परम्परा यदि हम लोग नहीं रोक सकते हैं तो भी मेरा कहना रहता है कि- ‘‘अपने परिवार के बालक को ही गोद लेना चाहिए। यदि यह नहीं शक्य हो तो पत्नी के परिवार से बालक गोद लेना चाहिए। यदि ऐसा भी संभव न हो सके तो अपनी जाति का ही बालक गोद लेना चाहिए, जैसे कि खंडेलवाल, अग्रवाल, पोरवाड़, जायसवाल आदि जातियाँ हैं। इनमें से अपनी-अपनी जाति के ही पुत्र दत्तक लेकर अपने कुल-जाति को संकर-अंतर्जातीय में मिश्रण नहीं करना चाहिए।’’ आजकल तो कुछ लोग पड़े हुए, छोड़े हुए, बालकों को गोद ले लेते हैंं। यह तो अपने कुल को नष्ट करने वाला परोपकार है क्योंकि ऐसे बालक व्यभिचारिणी स्त्री के ही होते हैं। भला पतिव्रता, सच्चरित्रवान कौन सी महिला अपने जन्म लिये हुए बालक को ऐसे फैकेगी? अरे! जिसके माता-पिता का पता नहीं, ऐसे बालक को गोद लेने से आगे अपनी कुल परम्परा और धर्म परम्परा कैसे चल सकेगी? दिल्ली में एक प्रबुद्ध जैन महिला, ऐसे ही बालकों को पाल कर उन्हें अपने अच्छे-अच्छे जैन घरानों में गोद दिलाती है। यह देखकर मुझे बहुत ही दुःख होता है कि-भगवन्! सज्जातीयत्व की रक्षा कैसे होगी?’’

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रथयात्रा-

हैदराबाद में दर्शन करने और आहार देने के लिए कटक से फतेहचन्द जी और उनकी धर्मपत्नी आये हुए थे। लगभग एक माह रहकर खूब भक्ति की। ये केशरबाग में ही चौका करते थे। प्रातः भगवान् की पूजा के बाद, चौके में जाकर, सेठजी स्वयं बैठ जाते और फल छीलने, रस निकालने आदि कार्य को करा लेते। यहाँ के लोग कौतुक से इनका चौका देखने के लिए आ जाते थे। इनकी आहारदान की भक्ति देखकर यहाँ के पुरुषवर्ग आश्चर्य करते थे चूँकि किसी पुरुष ने शुद्ध जल का नियम लेकर आहार नहीं दिया था। एक दिन फतेहचंद ने मध्यान्ह में मुझसे कहा- ‘‘माताजी! हम कुछ खर्चा करना चाहते हैं सो, आप जिसमें कहिये, उसमें कर दें।’’ मैंने सोचकर कहा कि- ‘‘सुना है, मुसलमानी रियासत की वजह से यहाँ रथयात्रा नहीं निकलती थी, सो अब भी ये लोग हिम्मत नहीं करते हैं अतः तुम यहाँ रथयात्रा निकाल दो।’’ तभी उन्होंने ३-४ दिन के लिए एक विधान किया और समाज के लोगों के साथ विचार-विमर्श करके रथयात्रा का प्रोग्राम बनाया। यहाँ रथ भी नहीं था अतः खुली जीप को रथ जैसा बनाकर, उसमें गंधकुटी रखकर, श्रीजी की प्रतिमा विराजमान करके बैंडबाजे और जुलूस के साथ शहर में रथयात्रा निकाली गई। यद्यपि उस समय बिना किसी मेले- महोत्सव आदि के यह रथयात्रा छोटे रूप में निकाली गई थी फिर भी वहाँ पहली बार होने से जैन लोगों में बहुत ही उत्साह था और जैनेतर लोगों में भी अच्छी धर्म प्रभावना हुई। मैंने सोचा- ‘‘देखो! कहीं पर भी नूतन व्यवस्था चलाने में बड़ी कठिनाई पड़ती है, मुश्किल से लोग राजी होते हैं पुनः जब सफलता मिलती है तब बहुत ही खुश होते हैं, फिर ऐसा कहने लगते हैं कि यह कार्य यहाँ हमेशा ही होता रहे।’’

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जीऊबाई की भक्ति-

यहाँ एक महिला जीऊबाई ध.प. श्री नानचन्द जी थीं। ये मेरे चातुर्मास में बराबर यहाँ केशरबाग में चौका लगाकर आहार देती थीं और मध्यान्ह में मेरी अस्वस्थता में मुझे स्वाध्याय सुनाती थीं। इनकी भक्ति बहुत विशेष रही है। इनका पुत्र अरुण कुमार अमेरिका जाने वाला था। तब इन्होंने कई बार मुझसे कहा कि- ‘‘माताजी! इसे ऐसी शिक्षा दे दो कि यह वहाँ सात्विक रहे.....।’’ मैंने अरुण कुमार को बुलाकर एकांत में कई शिक्षाएँ दीं। उसने ग्रहण किया और वहाँ जाकर लिखा कि- ‘‘मैं अपने हाथ से खिचड़ी आदि बनाकर भोजन करता हूँ।’’ कालान्तर में इसने यहीं आकर सोलापुर की सजातीय कन्या से शादी की है और अपनी सात्विक प्रवृत्ति से माता-पिता को भी प्रसन्न किया है, मुझे भी प्रसन्नता रही है। वास्तव में ऐसे-ऐसे नवयुवक ही आज धर्म क्षेत्र में उदाहरण बन जाते हैं।

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यात्रा के लिए विघ्न-

यहाँ पर पहले मैं अस्वस्थ हुई पुनः बीच में एक बार आर्यिका आदिमती जी भी अस्वस्थ हो गई थीं पुनः हम दोनों स्वस्थ हो गये। फिर भी आर्यिका जिनमती जी ने कई बार कहा- ‘‘अम्मा! अब यहाँ से श्रवणबेलगोल की यात्रा नहीं करनी है। क्या बाहुबली जी के दर्शन के बगैर अपनी आर्यिका दीक्षा निष्फल हो जायेगी....?’’ मुझे उनके इन शब्दों से बहुत ही दुःख होता। मैं सोचती कि- ‘‘यात्रा में यह भी एक विघ्न आ उपस्थित हुआ है....’’ किन्तु संघ में शिष्यों को संभालकर आगे का कार्यक्रम बनाना पड़ता था। मुझे कुछ तो शिष्यों में मोह भी था कि उन्हें छोड़कर भी यात्रा करने के लिए नहीं सोच सकती थी। मैंने शांत भाव से एक जाप्य करना शुरू कर दी- ‘‘ॐ ह्रीं श्री बाहुबलिस्वामिने नमः।’’ और किसी से भी कुछ नहीं कहा। एक दिन मंदिर के शास्त्र भंडार को देखते हुए आर्यिका जिनमती को ‘बाहुबली अभिषेक’ की कोई एक स्मारिका छपी हुई मिल गई। उसी के साथ एक छोटी सी छपी हुई तथा फटी हुई पुस्तक के दो-चार पेज मिल गये। उसमें ऊपर ही लिखा था कि- ‘‘दक्षिण की यात्रा के लिए निकलते समय यदि गुरुवार हो, पुष्य नक्षत्र हो और अभिजित् योग का समय हो, तो मृत्यु योग बन जाता है......।’’ इसे पढ़कर मैंने सोचा- ‘‘मुझे तो मुहूर्तज्ञान है नहीं किन्तु ब्र. चांदमल जी ने इन्हीं तीनों को बताकर, बहुत अच्छा समझकर, मेरा विहार शिखर जी से इधर दक्षिण के लिए कराया था....। खैर! होनहार तो टलती नहीं है अतः मुहूर्त को क्या दोष देना?’’ मैंने सम्मेद शिखरजी की यात्रा के समय कोई मुहूर्त नहीं देखा था, फिर भी वह मंगलीक, शुभ रही है....।’’ पुनः जिनमती ने वह बाहुबलि स्मारिका पढ़ी। अब वे उसके महत्वपूर्ण अंश में लाल पेंसिल से निशान लगा लगाकर मुझे ला-लाकर दिखाने लगीं, सुनाने लगीं और कहने लगीं- ‘‘अम्मा! कुछ भी हो, भगवान् बाहुबली जी के दर्शन अवश्य करना है।’’ मुझे भी शांति मिली, हर्ष हुआ और यात्रा के लिए मुझे जो विघ्न दिख रहे थे वे, टल गये। अब मैंने पुनः यात्रा की रूपरेखा बनाई और श्रावकों ने भी रुचि से व्यवस्था में भाग लिया।

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राजूबाई का विवेक-

यहाँ एक राजूबाई नाम की महिला है। अकस्मात् उनके पति का स्वर्गवास हो गया , उनके दो पुत्र थे। राजूबाई की उम्र भी ३५-३६ के लगभग थी। मैंने उसे बुलाकर समझाया कि- ‘‘तुम यहाँ आवो, उपदेश सुनो, आहार दो, धर्मकार्य में रुचि लेवो, जिससे रोना-धोना नहीं करोगी। देखो! रोने-धोने से असाता कर्म ही बंधता है जिससे आगे पुनः ऐसे ही इष्टवियोग, अनिष्ट संयोग से रोना पड़ता है।’’ यह महिला मेरी आज्ञा पालन करने लगीं। आगे ये मेरी आज्ञा से मेरे साथ श्रवणबेलगोल की यात्रा में चलने के लिए भी तैयार हो गर्इं। उनकी माँ ने कहा-‘‘माताजी! यहाँ लोग क्या कहेंगे? विधवा महिलाएँ छः-छः महीने घर से बाहर नहीं निकलती हैं।’’ मैंने कहा-‘‘यह कोई अच्छी परम्परा नहीं है, इसे तोड़ देना चाहिए। विधवा होने के बाद महिलाएँ यदि दान, पूजन, गुरु के साथ तीर्थ यात्रा के अच्छे कार्यों में लगती हैं तो बुराई क्या है?......’’ उसकी माँ ने, भाई नन्दलाल ने, सभी ने मेरी आज्ञा का पालन किया और मेरे उपदेश के अनुसार राजूबाई को मेरे साथ भेज दिया। इस प्रकार यहाँ सन् १९६४ में हैदराबाद के चातुर्मास में मेरा अस्वस्थ होकर स्वस्थ होना, कु. मनोवती की दीक्षा होना, छप्पन विधान होना, मंदिर पर शिखर का निर्माण होना आदि कार्य सम्पन्न हुए हैं।