ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं शक्तितस्तपो भावनायै नमः"

049. सोलापुर में चातुर्मास

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सोलापुर में चातुर्मास

यहाँ सोलापुर के प्रमुख श्रेष्ठीवर्ग एवं ब्र. सुमतिबाई जी आदि सामने लेने के लिए आये। सबसे पहले सोलापुर के श्राविका आश्रम में मंदिर के दर्शन किये और ब्र. सुमतिबाई जी के विशेष आग्रह से मैं संघ सहित यहीं ठहर गई। वैसे कुछ दिन विश्राम कर यहाँ से विहार करने का विचार था किंतु ब्र. सुमतिबाई जी के विशेष आग्रह से यहाँ से विहार की व्यवस्था समाप्त कर दी गई अब मैं यहीं रुक गई। यहाँ पर आश्रम में प्रातः अध्यात्म ग्रंथ-समयसार का स्वाध्याय चलता था। मध्यान्ह में उपदेश होता था। इधर आचार्यश्री विमलसागर जी का संघ सहित आगमन था। शहर के लोग एवं आश्रम की महिलाओं ने आचार्य संघ का स्वागत किया पुनः कुछ दिन रहकर संघ कुंथलगिरि की ओर विहार कर गया। विहार के समय आचार्यश्री से मैंने कहा- ‘‘महाराज जी! आप यह चातुर्मास यहाँ सोलापुर में कर लीजिये।’’ महाराज ने कहा-‘‘देखा जायेगा, यहाँ के लोगों की भाव-भक्ति पर निर्भर है।’’ तब मैंने यहाँ सोलापुर के प्रतिष्ठित लोगों को आग्रहपूर्वक कुंथलगिरि भेजा। ये लोग जा-जाकर प्रार्थना करते रहे पुनः आचार्यश्री ने स्वीकृति दे दी, जिससे यहाँ शहर में हर्ष का वातावरण हो गया।

इसके पहले मैंने औरंगाबाद की तरफ विहार करने का विचार किया था। स्वप्न में भी मैंने नहीं सोचा था कि अभी वैशाख से ही मैं सात-आठ महीने यहाँ रहूँ किन्तु ब्रह्मचारिणी सुमतिबाई आदि के अत्यधिक आग्रह से हमारे संघ की आर्यिकाओं के भाव भी यहाँ रहने के बन गये। आखिर में मेरे भी भाव हो गये और मैंने यहाँ रहना स्वीकार कर लिया। अब मुझे यहाँ सोलापुर रहने के लिए स्वीकृति देनी पड़ी। यहाँ के लोगों को एक साथ दो संघ के चातुर्मास का योग मिलने से बहुत खुशी आई। आचार्य संघ का पुनः यहाँ पदार्पण हुआ। आचार्य संघ शहर में ठहरा और मैं अपने आर्यिका संघ सहित आश्रम में ठहरी।

स्वाध्याय विशेष-

यहाँ प्रातः मैं लब्धिसार का स्वाध्याय चलाती, जिसमें ब्र. सुमतिबाई, ब्र. विद्युल्लता आदि बैठती थीं। बहुत ही आनन्द आता था। सूक्ष्म चर्चायें होती रहती थीं। ब्र. सुमतिबाई जी खूब रुचि से चर्चा में भाग लेती थीं पुनः ८ बजे से समयसार या परमात्मप्रकाश पर प्रवचन चलता था। इसमें भी ये दोनों ब्रह्मचारिणी बैठती थीं। बाद में दिन भर ब्र. सुमतिबाई इसे ही रटा करती थीं और कहा करती थीं- ‘‘माताजी! आपने आर्यिका जिनमती आदि को खूब पढ़ाकर बुद्धिमती बनाया है, आपने बहुत अच्छा अभ्यास कराया है.......।’’ उनकी गुणग्राहकता देखकर हृदय वात्सल्य से भर जाता था। आज भी जब मैं उनके धर्म-प्रेम का स्मरण करती हूँ तो मन में यही विचार आता है कि-‘‘इतने बड़े आश्रम की संचालिका होकर इतनी, गुरुभक्ति और गुणग्राहकता जो उनमें है, वह उनके बड़प्पन का सूचक है।’’ मध्यान्ह में त्रिलोकसार श्लोकवार्तिक का स्वाध्याय चलता था पुनः उपदेश होता था। चर्चाएँ तो दिन में कई बार अच्छी तरह चलती रहती थीं।

चातुर्मास स्थापना-

शहर के लोगों के आग्रह से वह मंगल घड़ी आ गई। आषाढ़ शुक्ला चौदश की रात्रि में शहर में आचार्य संघ ने और आश्रम में मैंने, अनेक भक्तों के मध्य चातुर्मास स्थापना की। इसके पूर्व यहाँ सोलापुर में खूब वर्षा हो रही थी। अब चातुर्मास में भी स्वाध्याय, उपदेश और अध्ययन-अध्यापन चल रहा था।

प्रशिक्षण शिविर-

यहाँ आश्रम की अध्यापिकाएँ लगभग साठ थीं, उसमें जैन महिलाएँ लगभग चालीस थीं। इन सबके लिए जब मैंने धर्म पढ़ने की प्रेरणा दी, तब उन सभी ने कहा कि- आप कुछ अध्ययन करा दीजिये। तब मैंने इन अध्यापिकाओं को द्रव्यसंग्रह के अध्ययन कराने का निर्णय लिया और आर्यिका जिनमती जी से अध्यापन कराया। मध्यान्ह में शहर की महिलाओं को भी द्रव्यसंग्रह का शिक्षण दिया गया। इसके बाद मैंने संस्कृत की सामायिक विधिवत् मध्यान्ह में महिलाओं को सिखायी। इस शिक्षण कक्षा में महिलायें धूप में, वर्षा में, शहर से दौड़ी चली आती थीं। इनके नन्हें-नन्हें बालक यहाँ मांटेसरी में पढ़ते थे, वे अपनी-अपनी माताओं को देखते ही जोर-जोर से बोलते-वे मराठी में बोलते थे- ‘‘माझी मम्मी शिकायला आली-मेरी मम्मी पढ़ने आई।’’ उस समय बच्चे खूब खुश होते, तब बड़ा आनन्द आता था। यहाँ की महिलाएँ विद्याध्ययन करने में संकोच नहीं करती थीं।

सम्मेदशिखर मॉडल जुलूस-

श्वेताम्बर और दिगम्बर जैन, दोनों समाज का सम्मेदशिखर पर्वत के लिए झगड़ा चलता ही रहा था। उधर कुछ दिनों से एकपक्षीय कुछ निर्णय हो गये थे, जिससे दिगम्बर जैन लोग न्यायालय से न्याय की मांग कर रहे थे। उस समय दिगम्बरों को भी कुछ अधिकार मिले थे अतः लोगों में खूब हर्षोल्लास था। यहाँ सोलापुर में मोतीचंद, रेवचंद, गाँधी ने सम्मेदशिखर का एक मॉडल बनवाकर घर में रखा था। मेरी प्रेरणा से श्रावण शुक्ला सप्तमी-भगवान पार्श्वनाथ के मोेक्ष कल्याणक के दिन उस मॉडल को खुली जीप में रखकर जुलूस निकाला गया। उसमें एक छोटी सी जिनप्रतिमा जी भी विराजमान कर दी गई थीं। आचार्य संघ एवं हम सब को भी जुलूस में साथ ले गये। तीर्थराज सम्मेदशिखर और भगवान पार्श्वनाथ की जयकार से आकाश मंडल गूँज रहा था। धर्म के प्रति लोगों का प्रेम और उत्साह देखकर, मन प्रसन्नता से भर गया था।

जन्मजयन्ती समारोह-

आश्विन कृष्णा सप्तमी को आचार्यश्री विमलसागर जी महाराज का जन्म जयंती समारोह मनाया जाने वाला था। मेरी प्रेरणा से श्रावकों ने रथयात्रा का भी आयोजन कर लिया, जिसमें दोनों संघ के साधु-साध्वी भी चल रहे थे और आचार्यश्री भी सम्मिलित थे। उस दिन अच्छे समारोह से आचार्यश्री का जन्मजयंती समारोह सम्पन्न हुआ। यहाँ महिलाओं ने तखत पर रंगोली से आचार्यश्री का चित्र बनाया था। कई महिलाओं ने थाल में शक्कर की चासनी जमाकर, उसमें सम्मेदशिखर आदि चित्र उकेर कर रंग भर दिये थे, जो मनोरम दिख रहे थे। आचार्यश्री के शतायु की कामना भी की गई थी।

शरद पूर्णिमा-

शरद पूर्णिमा आने वाली थी। ब्र. सुमतिबाई जी मेरी जन्मजयंती मनाना चाहती थीं। इससे पूर्व अभी तक नहींं मनायी गई थी। मैंने सख्ती से मना कर दिया। उन्होंने जाकर आचार्यश्री के पास चर्चा की। महाराज जी ने कहा- ‘‘अच्छे समारोह से जयंती मनाओ, माताजी को मना करने दो, मैं आऊँगा।’’ ब्र. सुमतिबाई जी का उत्साह बढ़ गया अतः उन्होंने विशेष रूप में प्रचार करके कार्यक्रम बना लिया। आचार्यश्री संघ सहित आकर सभा में विराज गये। मुझे भी जाकर सभा में बैठना पड़ा। सभी ने अच्छे उद्गार व्यक्त किये। जिनमती जी तो अपने अनुभव कहते हुए रो पड़ीं, बोलीं- ‘‘अम्मा ने हमें ज्ञानरूपी अमृत से पाला है.......।’’ ब्र. सुमतिबाई ने मेरे ज्ञान और चारित्र की प्रशंसा की, अंत में मैंने अपनी लघुता प्रगट करते हुए बतलाया कि-‘‘यह शरद पूर्णिमा मेरा त्याग दिवस भी है। इसी दिन मैंने १८ वर्ष की आयु को पूर्ण कर आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत लिया था और आचार्य श्री देशभूूषण जी के सानिध्य में गृहत्याग किया था, इसलिए यह दिवस मेरे लिए महान् है......।’’ पुनः मैंने आचार्यश्री के चरणों में वंदन करते हुए उपस्थित जनसमूह को आशीर्वाद दिया। इस प्रकार अच्छे उत्साह में श्राविकाश्रम के प्रांगण में यह समारोह संपन्न हुआ था पुनः उसके बाद कई वर्षों तक मैंने अपनी जन्म जयंती नहीं मनाने दी थी। यहाँ दिल्ली में सन् १९८० में मेरे निषेध करने पर भी पुनः जन्म जयंती मनायी गई।

उभय संघ में आहारदान-

ब्र. सुमतिबाई प्रातः ९ बजे शहर में जाकर आचार्यश्री विमलसागर जी को, उनके पास में पड़गाये गये अन्य साधुओं को आहार देकर आ जाती थीं पुनः गाड़ी से शीघ्र ही आकर, वस्त्र बदलकर मुझे भी आहार दे लेती थीं। उधर महाराज जी ९ बजे आहार को उठते थे और इधर मैं १० बजे के बाद आहार को उठती थी अतः ये प्रायः दोनों तरफ आहारदान का लाभ ले लेती थीं।

इनकी भक्ति बहुत विशेष थी। प्रायः रात्रि में ये मेरे पास बैठकर पैर दबाना, मालिश करना, आदि वैयावृत्य करने लगती थीं। तब आश्रम की बालिकाएँ आकर बैठ जातीं और कहने लगतीं-‘‘भून! आप छोड़िये, मैं वैयावृत्ति करुँगी।’’ किन्तु ये स्वयं अपने हाथ से वैयावृत्ति करके बहुत खुश होती थीं। तब बालिकाओं को बहुत आश्चर्य होता था और वैयावृत्ति की प्रेरणा भी मिलती थी। वे आपस में चर्चा करतीं- ‘‘देखो! गुरुओं की वैयावृत्ति करना बड़ा गुण है, तभी तो भून (बुआजी) स्वयं अपने हाथों से माताजी की वैयावृत्ति करती हैं।’’ यहां अभयमती को दौरे का प्रकोप बढ़ा हुआ था। उस समय ब्र. सुमतिबाई उनकी भी हर एक परिचर्या करती-कराती रहती थीं। उनका साधु-साध्वियों के प्रति वात्सल्य बहुत अच्छा था।

दिव्य अकृत्रिम चैत्यालयों के दर्शन-

चातुर्मास के पूर्व गर्मी के दिनों में ही ब्र. सुमतिबाई की प्रेरणा से मैंने एक दिन मध्यान्ह के उपदेश में सभी को अकृत्रिम चैत्यालय के दर्शन कराये। मैंने कहा- ‘‘आप लोग पद्मासन या सुखासन से बैठ जाइये, आँख बंद कर लीजिये। मैं आप लोगों को जंबूद्वीप के सुमेरु पर्वत से लेकर ४५८ चैत्यालयों के दर्शन कराऊँगी।’’

पुनः मैंने दर्शन कराना प्रारंभ किया-

आप सबसे पहले सुदर्शन मेरु पर्वत देखिये। इसमें तीन कटनी हैं, उनमें नंदनवन, सौमनसवन, पांडुकवन हैं। पृथ्वी पर भद्रसाल वन है। इन चारों वनों में, चारों दिशाओं में एक-एक अकृत्रिम जिनमंदिर हैं, उन सबमें १०८-१०८ अकृत्रिम जिन प्रतिमायें हैं। ये प्रतिमाएँ ५०० धनुष ऊँची हैं, पद्मासन विराजमान हैं, नासाग्र दृष्टि और प्रहसितायमान (मन्द-मन्द मुस्कान सहित) मुख हैं। प्रत्येक मंदिर में क्रम से ले जाकर मैंने वंदना कराई, पुनः क्रम-क्रम से गजदंत आदि के मंदिरों के दर्शन कराये। पूर्व में जैसे मैंने मूड़विद्री में रत्नों की प्रतिमा के दर्शन के समय लोगों को दर्शन कराये थे, वैसे ही लगभग डेढ़ घंंटे तक धाराप्रवाह बोल-बोलकर दर्शन कराती गई। ब्र. सुमतिबाई, ब्र. विद्युल्लताबाई आदि ने सभा में नेत्र बंदकर बैठे-बैठे भावों से दर्शन किये। आँख खोेलने के बाद इन लोगों की आँखों में आनन्द के आँसू आ गये। सभी ने गद्गद होकर एक स्वर से जयकारा किया। अनंतर ब्र. सुमतिबाई ने कहा-‘‘माताजी! यह रचना पृथ्वी पर बननी ही चाहिए। आज जैसे कहीं-कहीं समवसरण की रचनाएँ हैं, कहीं-कहीं नन्दीश्वर द्वीप की रचनाएँ बनी हैं, वैसे ही यह मध्यलोक (तेरह द्वीप) की रचना बनवानी ही चाहिए।’’

अब ब्र. सुमतिबाई जी को यह धुन चढ़ गई कि इस रचना को यहीं बनवाना है। उन्होंने कहा- ‘‘माताजी! यहीं आश्रम से लगी हुई बाहर मैंने एक जगह खरीदी है। वह एक खुला स्थान है, (जो कि वहीं आश्रम के मंदिर में बैठे हुए दिखता था) इसी में यह रचना बनवाना है। बस आप यहीं रहिये, नक्शा बताते जाइये, मैं यह काम कराऊँगी। आपको किसी से द्रव्य की-पैसे की याचना नहीं करनी पड़ेगी। मात्र आपको नक्शा बताना रहेगा। बस, अब आप यहीं विराजिए.....।’’ मैं उनके इन शब्दों को सुनकर मुस्करा देती थी। लेकिन स्वीकृति नहीं देती थी। वे उपर्युक्त शब्दों को दोहराया ही करती थीं। एक बार उन्होंने कोई एक अच्छे इंजीनियर बुलाये और मेरे पास चर्चा करने के लिए बिठा दिया। मैंने मध्यलोक के जंबूद्वीप से लेकर रुचकवर द्वीप तक, जहाँ तक की अकृत्रिम चैत्यालय है, वहाँ तक का वर्णन सुना दिया। तब उसने कहा-

‘‘माताजी! आप आर्चीटेक्ट को अपना अभिप्राय बताकर नक्शा बनवा दीजिये।’’ आर्चीटेक्ट आया, उसको भी मैंने अपना शास्त्र के आधार से विस्तार से सब कुछ सुना दिया। वह भी सुनकर चक्कर खाने लगा......पुनः बोला-‘‘माताजी! आप इस रचना को कितनेफुट जमीन में बनवाना चाहती हैं? और कौन-कौन सा द्वीप कितनेफुट हो?.....इत्यादि विस्तार से बताइये......।’’ मैंने कहा-

‘‘ठीक है, अब मैंने कम से कम १०००²१०००फुट में रचना को लेना चाहा और उसमें इस मध्यलोक के तेरह द्वीप को विभाजित कर दिया। वह ऐसा था- पहले गोल थाली के आकार वाले जम्बूद्वीप को सौ (१००) फुट में लेना है पुनः उसे घेरकर लवण समुद्र को पचीस (२५)फुट में लेना है, उसके बाद उसे चारों ओर से घेरकर धातकी खंड को सौ (१००)फुट में लेना है। उसे घेरकर कालोदधि समुद्र को भी पचीसफुट लेना है। इसके बाद पुष्करार्ध द्वीप को सौ (१००)फुट में लेना है पश्चात् चूड़ी के समान मानुषोत्तर पर्वत को पाँच (५)फुट में लेना है। अनंतर के पुष्करार्ध के लिए दस (१०)फुट देना है। अनंतर पुष्कर समुद्र से लेकर सातवें द्वीप समुद्र के लिए दो-दो (२-२)फुट की जगह देनी है। इसके मध्य जो पाँचवा क्षीर समुद्र है उसे दसफुट में लेना है।

नंदीश्वर द्वीप को सौ (१००)फुट में लेना है पुनः एक-एकफुट का अन्तर देकर ग्यारहवाँ कुंडलवर द्वीप पन्द्रहफुट का लेकर, उसके ठीक बीच में चूड़ी के समान पाँचफुट का कुंडल पर्वत लेना है। ऐसे ही एक-एकफुट के ग्यारहवां समुद्र, बारहवां द्वीप, बारहवां समुद्र लेकर पन्द्रह (१५)फुट का रुचकवर द्वीप लेना है। इसके ठीक बीच में चूड़ी के समान आकार वाला पाँचफुट का रुचकवर पर्वत देना है पुनः कुछ एक-दो द्वीप समुद्रों के लिए एक-एकफुट की जगह देकर अंतिम स्वयंभूरमण समुद्र को पचीसफुट का रखना है। इस प्रकार जंबूद्वीप के बाहर प्रत्येक द्वीप समुद्र एक-दूसरे को घेरे हुए हैं।

पुनः जम्बूद्वीप का प्रमाण, उसमें बीचों-बीच में स्थित सुदर्शन मेरु का प्रमाण, हिमवान आदि पर्वतों के प्रमाण और भरत क्षेत्र आदि क्षेत्रों के प्रमाण निश्चित किये। इसी प्रकार इस जंबूद्वीप के अंतर्गत चौदह नदियों का प्रमाण, विदेह क्षेत्र में स्थित सोलह वक्षार के प्रमाण, बारह विभंगा नदियाँ और बत्तीस विदेह देशों के प्रमाण, उनमें बहने वाली गंगा-सिन्धु तथा रक्ता-रक्तोदा ऐसी चौंसठ नदियों के प्रमाण भीफुट और इंच में निर्धारित किये तथा चौंतीस विजयार्ध पर्वत, उनकी कटनी आदि का भी प्रमाण निश्चित किया। दो वृषभाचल और चार नाभिगिरि का भी प्रमाण निश्चित किया। इस प्रकार मैंने जम्बूद्वीप के क्षेत्र, पर्वतादि, धातकीखंड, पुष्करार्ध के, नंदीश्वर द्वीप के पर्वत आदि के माप निर्धारित कर-करके कापी में लिख लिए थे। उसी प्रकार से मैं अपने चिंतवन में इस तेरह द्वीप की रचना को बनाकर, उनमें चार सौ अट्ठावन चैत्यालय बनाकर, चिंतवन में ही दर्शन किया करती थी।

जम्बूद्वीप-

मैं जब ब्र. सुमतिबाई जी को तथा आर्कीटेक्ट आदि को यह उपर्र्युक्त विस्तार बताती तब इन सभी को यह बहुत बड़ा मालूम पड़ता था अतः ब्र. सुमतिबाई ने यह कहना शुरू किया कि- ‘‘माताजी! आप तो मात्र जम्बूद्वीप की ही रूपेरखा बनाइये, यही शक्य होगा किन्तु मैं उस समय यही सोचती थी कि- ‘‘रचना बने तो पूरी ही बने, न कि मात्र जम्बूद्वीप....।’’ वहाँ पर ब्र. सुमतिबाई के साथ ही अनेक महानुभावों ने भी आग्रह किया कि- ‘‘माताजी! आप स्वीकृति दीजिये, हम लोग कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र पर यह जम्बूद्वीप रचना बनवाएँ......।’’ लेकिर मैंने स्वीकृति नहीं दी और न उस समय वहाँ रहना ही मंजूर किया। यद्यपि मुझे वह प्रांत अच्छा लगा था और जैसा कि मैंने कभी सोचा था कि- हर एक प्रांत में घूमकर-विहार कर, अपने अनुकूल, अपनी सल्लेखना के अनुकूल, प्रांत चयन कर लेना चाहिए। उस दृष्टि से भी हमें यह प्रांत बहुत ही जंचा था। धर्मध्यान की अनुकूलता, भक्तों की अनुकूलता, पंथ की अनुकूलता, साथ ही जलवायु की भी अनुकूलता थी। फिर भी मेरी शिष्या आर्यिका जिनमती ने श्रवण बेलगोल में अलग विहार करने की बात कही थी। उस समय मुझे मानसिक अशांति बहुत हुई थी। इसमें शायद उनके प्रति होने वाला मेरा शिष्यमोह ही मूल कारण था। इसके साथ मेरी यह भी प्रबल भावना रही है कि- इस पंचम काल में कोई साधु एकाकी विचरण न करे, चूंकि श्री कुन्दकुन्द देव की आज्ञा नहीं है। वे कहते हैं-‘मा भूद मे सत्तु एगागी।’ मेरा शत्रु भी एकाकी न रहे।’’ अतः मैं इन्हें संघ में लाकर छोड़ना ही चाहती थी। इसके साथ आचार्य संघ के प्रति भी मेरा इतना अनुराग और अपनत्व था कि मैं आचार्य संघ में ही रहना चाहती थी। इन्हीं अनेक कारणों से मैंने ब्र. सुमतीबाई की बात नहीं मानी, सुनी-अनसुनी करती गई और अंत में वहां से विहार का निर्णय बना लिया। अथवा अब यह भी कहना पड़ता है कि- ‘‘इस जंबूद्वीप रचना का योग यहाँ हस्तिनापुर में ही बनने का था, तो भला वहाँ मेरे रहने के भाव कैसे होते?’’

जगह-जगह उपदेश-

ब्र. सुमतिबाई जी और ब्र. विद्युल्लताजी को जगह-जगह मेरे उपदेश कराने की बहुत रुचि थी। कभी आश्रम में हाईस्कूल की छात्राओं के मध्य उपदेश करातीं, कभी जैनबोर्डिंग में नवयुवक छात्रों के लिए मेरा उपदेश होता, कभी आश्रम में छात्राओं के लिए उपदेश होता, कभी गुरुकुल के छोटे-छोटे बालकों के लिए उपदेश देती और कभी सार्वजनिक सभा में उपदेश कराया जाता। मेरे उपदेश के प्रारंभ में या अनन्तर ब्र. विद्युल्लता भी गुरुभक्ति में बहुत अच्छा बोलती थीं चूंकि आचार्य शिवसागर जी के संघ में आकर ये मेरे पास धर्म ग्रंथों का अध्ययन भी कर चुकी थीं। इनकी मां ब्र. माणिकबाई, जो कि आर्यिका चन्द्रमती थीं, वे संघ में मेरे सानिध्य में ही रहती थीं अतः इनका मेरे प्रति विशेष प्रेम था। पं. वर्धमान जी शास्त्री भी मेरे उपदेश के प्रारंभ में मंगलाचरण रूप में बोलते थे। तब वे मेरी प्रशंसा में बोलते-बोलते उछलने लगते थे। वे कहते थे कि-‘‘हम लोग यद्यपि शास़्त्री हैं विद्यावाचस्पति हैं फिर भी राजवार्तिक, श्लोकवार्तिक आदि ग्रंथों में कहाँ क्या लिखा है? यह समझने के लिए मैं भी माताजी के पास पहुँचता हूँ। कोई भी कैसी शंका क्यों न हो, माताजी शास्त्र का प्रमाण दिखाकर समाधान दे देती हैं.....।’’ इत्यादि रूप से बहुत ही गुणगान किया करते थे और कई बार कहते थे कि-‘‘मैं जब माताजी के पास पहुँचता हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं अपनी मां के पास ही आ गया हूँ।’’ उनके द्वारा की गई प्रशंसा सुनकर मैं सोचा करती थी कि-‘‘मेरे में जो कुछ भी शास्त्रज्ञान है, वह केवल संयम-साधना का ही फल है। पं. वर्धमान शास्त्री, जो मेरा गुणगान विशेष करते हैं वह केवल उनकी गुरुभक्ति का ही सूचक है।’’ मैंने कई प्रसंगों में अनुभव किया था कि- इन पंडित जी की आर्ष परम्परा में अच्छी श्रद्धा थी, यही कारण था कि सन् १९७५ में हस्तिनापुर की प्रतिष्ठा में मेरी विशेष प्रेरणा से सेठ सुकुमार चंद मेरठ वालों ने इन्हें ही प्रतिष्ठाचार्य बनाया था, तब यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर विराजमान भगवान महावीर की सवा नौफुट उँची प्रतिमा की प्रतिष्ठा का श्रेय इन्हें ही मिला था। इनकी धर्मपत्नी मदनमंजरी प्रायः रोज घर से एक मील करीब पैदल चलकर आतीं और आश्रम में मुझे आहार देती थीं। इनकी मेरे प्रति बहुत भक्ति थी। पंडित जी ने भी मेरी प्रेरणा से आचार्यश्री से दो प्रतिमा के व्रत ले लिये थे। ब्र. सुमतिबाई की विशेष इच्छा से एक बार मैंने संस्कृत में भी प्रवचन किया था। ये मेरे संस्कृत, न्याय, व्याकरण, छंद, सिद्धांत, भूगोल आदि के ज्ञान से बहुत ही खुश रहती थीं। इनमें ईष्र्या, मत्सरता नहीं थी। ये बहुत ही गुरुभक्त महिलारत्न हैं।

उषावंदना आदि-

यहाँ मैंने ‘त्रैलोक्य वंदना’ ‘सम्मेदशिखर वंदना’ स्तुतियाँ संस्कृत में बनायी थीं पुनः अनेक भक्तों की प्रेरणा से उन्हें हिन्दी पद्य में भी कर दिया था। यहाँ मराठी भाषा में प्रातः बालिकाएँ प्रभाती स्तोत्र बोला करती थीं। कन्नड़ भाषा में भी एक प्रभाती थी जिसे कि मैं क्षुल्लिका अवस्था से ही बोला करती थी- ‘एलु भव्य! वेलगायतु’ उठो भव्य प्रभात हो गया। बचपन में मेरी माँ भी एक प्रभाती हिन्दी में बोला करती थीं- ‘उठ भोर भयो भज जिनवर को, तुम काहे सयाने सोवत हो।’ अतः मेरे मन में एक सुन्दर प्रभाती वंदना बनाने की इच्छा जाग्रत हुई, चूँकि उत्तर प्रांत में प्रातः प्रभाती वंदना की परंपरा प्रायः न के बराबर है। इसलिए मैंने निर्वाण-कांड को लेकर प्रभाती बनायी, जिसका नाम ‘उषावंदना’ रखा, दिन उगने के पूर्व उषा काल में करने वाली वंदना उषावंदना है। वह बहुत ही सुन्दर बन गई-

‘उठो भव्य! खिल रही है उषा, तीर्थवंदना स्तवन करो।

आर्त रौद्र दुर्ध्यान छोड़कर, श्रीजिनवर का ध्यान करो।।
अष्टापद से वृषभदेव जिन, वासुपूज्य चंपापुरि से।
ऊर्जयंत से श्री नेमीश्वर, मुक्ति गये वंदो रुचि से।।

आज भी सोलापुर आश्रम में यह वंदना प्रातः काल में बोली जाती है। सन् १९७२ में दिल्ली में ब्र. मोतीचंद ने इस वंदना की रेकार्डिंग करायी थी। तब वह घर-घर में बजती थी। अभी भी कहीं-कहीं उसकी मधुर ध्वनि सुनने में आती रहती है। कई एक दिल्ली के महानुभाव बहुत बार कहा करते हैं कि- ‘‘माताजी! मैं अपने घर में यह उषा वंदना का रिकार्ड अवश्य बजाता हूँ। मुझे यह वंदना बहुत ही प्रिय है।’’ वहीं सोलापुर में मैं ‘चन्द्रप्रभु’ स्तुति संस्कृत में बना रही थी। ब्र. सुमतीबाई बोलीं- ‘‘माताजी! श्री समंतभद्रस्वामी ने तो न्याय में ही स्तुति रचना कर दी है। आपका ज्ञान न्याय के विषय में विशेष है अतः आपको भी अपनी रचनाओं में न्याय के अंश लाना चाहिए।’’ बस फिर क्या था, मैंने भी चन्द्रप्रभ स्तुति में सृष्टिकर्तृत्व खण्डन, सांख्य मत खण्डन आदि विषय में ले लिये। जैसे कि-

शिखरिणी छन्द-शरीरी प्रत्येकं भवति भुवि वेधा स्वकृतितः।

विधत्ते नानाभूपवनजलवन्हिद्रुमतनुम् ।।
त्रसो भूत्वा भूत्वा कथमपि विधायात्र कुशलं।
स्वयं स्वस्मिन्नास्ते भवति कृतकृत्यः शिवमयः।।१८।।
पृथ्वीछन्द- विचित्रभुवनत्रयं यदि कदाचिदीशः सृजेत् ।
जगद्धि सकलं शुभं निखिलदोषशून्यं न किं।।
निगोदनरकादिदुर्गतिकृतिश्च दुष्टाय चेत् ।
कथं पुनरधर्मिणां विहितसृष्टिरन्यायिनी।।१९।।

इन स्तुति रचना के समय में मेरा उपयोग हर समय प्रायः चिंतन में लगा रहता था। एक बार मैं नीचे उतरी। पीछे बाजू में दीर्घशंका के लिए जाना था। चिंतन के उपयोग में कुछ भान ही नहीं रहा और मैं आश्रम के बाहर निकल गई। सामने धर्मशाला की ओर उधर जाते हुए अकस्मात् बाइयाँ दौड़ीं और बोलीं- ‘‘माताजी! आप कहाँ जा रही हैं?’’ मैं झेंपकर वापस आ गर्इं। कमंडलु हाथ में था, पीछे चली गई। ऐसे ही एक बार आहार करके शहर से आश्रम की ओर जा रही थी। आश्रम के गेट को छोड़कर आगे बढ़ती गई। साथ में कमंडलु लेकर आता हुआ श्रावक कुछ दूर तो साथ चला आया, फिर बोला- ‘‘माताजी! आपको कहाँ जाना है?......’ मैं झेंपकर वापस मुड़कर आश्रम में आ गर्इ। ऐसी स्थिति में कभी-कभी विद्युल्लता जी मेरी मजाक बनाती थीं। इसमें उनकी भक्ति ही प्रमुख रहती थी। मैं सोचती- ‘‘देखो! स्तुति रचना आदि करने में चौबीस घंटे उपयोग में वही विषय चलता रहता है। यहां तक कि स्वप्न में भी वही-वही विषय आता रहता है......। मैंने सन् १९८७ में सर्वतोभद्र विधान की रचना में भी अनुभव किया था कि कई बार स्वप्न में कई एक श्लोक बना लिये।’’ ‘‘इसी प्रकार से वचन और काय से क्रिया करते हुए भी यदि हम लोग अपना उपयोग अपनी आत्मा की तरफ रखें तो भला मोक्ष प्राप्ति में कितनी देर लगेगी?’’

भक्तिसुमनावली प्रकाशन-

यहां चातुर्मास में कटक से फतेहचंद जी और उनकी धर्मपत्नी, दोनों आहारदान, भक्ति हेतु आये थे। लगभग एक माह रहे थे। एक दिन वे बोले- ‘‘माताजी! मुझे कुछ खर्च करना है, कोई कार्य बताइये।’’ मैंने कहा- ‘‘ये स्तुतियाँ छपा दो।’’ उसी समय ब्र. सुमतीबाई ने उन स्तुतियों का संकलन कराया और उसका नाम ‘भक्तिसुमनावली’ रखा। पुस्तक ब्र. फूलचन्द शाह ने अपनी प्रेस में छपायी। यह पुस्तक सेठ फतेहचंद जी की ओर से छप गई। इसके पूर्व भी श्रवणबेलगोल में जो मैंने भगवान बाहुबलि चरित हिन्दी में लिखा था, उसकी पं. वर्धमान शास्त्री ने तीन हजार प्रतियां छपाई थीं जो कि दो-तीन महिलाओं की तरफ से प्रकाशित हो चुकी थीं। पं. वर्धमान जी ने मेरी रची हुई ‘बाहुबलिस्तोत्र’ रचना का सुन्दर कन्नड़ भाषा में अनुवाद किया। उसे भी उन्होंने छपाया था। यह कन्नड़ अनुवाद सहित बाहुबलिस्तोत्र श्रवणबोलगोल में भी वेलूर के एक गंगराजय्या ने छपाया था।

आहारदान और भक्ति-

ऐसे ही चांदमल जी बड़जात्या भी कलकत्ता से सपत्नीक यहाँ आये थे और आहारदान आदि का लाभ ले रहे थे। जब कभी अस्वस्था में क्षुल्लिका अभयमती अशांत होतीं और आचार्य विमलसागर जी के संघ में जाना चाहतीं, वे समझाते और कहते- ‘‘देखो! ‘पानी में मीन पियासी’ तुम ज्ञानमती माताजी जैसे गुरु पाकर भी तृप्त नहीं हो पा रही हो। इधर-उधर जाना चाहती हो तो ऐसा लगता है जैसे मछली पानी में भी प्यासी रहे, वैसी ही तुम्हारी स्थिति हो रही है। भला माताजी के पास तुम्हें क्या कमी है?.....’’

आचार्य विमलसागर जी का वात्सल्य-

क्षुल्लिका अभयमती के वायु प्रकोप से (गैस अधिक बनने से) उन्हें बार-बार दौरे पड़ते थे, बेहोश होती रहती थीं। एक बार आचार्यश्री विमलसागर जी ने कहा- ‘‘माताजी! तुम इन्हें मेरे पास भेज दो, मैं ठीक कर दूँगा।’’ मैंने आश्रम से शहर में उन्हें आचार्यश्री के पास भेज दिया। आचार्यश्री ने उनका इलाज भी किया, उनसे जाप्य भी कराई और अनुशासन से भी रखा पुनः कुछ स्वस्थ होने पर एक माह बाद वापस उन्हें मेरे पास भेज दिया। उन जैसा धर्मवात्सल्य शायद ही किन्हीं मुनियों में मिलेगा। ८ मार्च १९८७ को यहाँ (जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर) आकर उन्होंने मोतीचंद को क्षुल्लक दीक्षा देकर मोतीसागर बनाकर जो उपकार किया है और पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में मेरे प्रति जो वात्सल्य दिखलाया है, वह शब्दों से अकथनीय है।

कुंभोज के श्री समंतभद्र का वात्सल्य-

कुंभोज में मुनिश्री समंतभद्र जी विराज रहे थे। कई बार वहाँ से कोई एक महानुभाव आये और प्रार्थना करते रहे कि- ‘‘माताजी! श्री समंतभद्र महाराज जी आपकी बहुत ही प्रशंसा करते रहते हैं। उनकी भी इच्छा है कि आप एक बार कुंभोज होकर ही जावें अतः आप कुंभोज की ओर विहार कीजिये।’’ इन मुनिश्री समंतभद्र जी का धर्म-वात्सल्य और गुण-ग्राहकता आदि गुण बहुत ही प्रशंसनीय हैं। ‘जम्बूद्वीपज्ञानज्योति के वहाँ पहुँचने पर भी उन्होंने बहुत अच्छे शब्द कहे थे कि-‘‘एक महिला होकर ज्ञानमती माताजी जी ने बहुत बड़ा कार्य किया है। यदि ये पुरुष होतीं तो पता नहीं कितने महान-महान कार्य कर डालतीं.....। वहां सोलापुर में गजाबेन भी आर्इं, वे लगभग एक माह मेरे पास रहीं। मेरा प्रवचन सुनती थीं, चर्चायें करती थीं, आहार देती थीं और बहुत ही भक्ति करती थीं। उन्होंने भी कुंभोज चलने के लिए बहुत आग्रह किया किन्तु आर्यिका आदिमती और क्षुल्लिका अभयमती इन दोनों की शारीरिक कमजोरी से मैंने विहार का भाव नहीं बनाया। चूंकि मुझे ऐसा लगता था कि- ‘‘अब जल्दी ही सीधे रास्ते आचार्य संघ में पहुंचा जाये’’ अतः मैंने इन लोगों की प्रार्थना सुनी-अनसुनी कर दी। इसी बीच अकलूज से कई एक महानुभाव, चंपाबाई आदि महिलाएं आ गर्इं। वहाँ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होने वाली थी, सभी ने निवेदन किया। चंपाबाई ने कई बार कहा कि- ‘‘माताजी! आप अकलूज चलिये। हमारे यहाँ प्रतिष्ठा में आशीर्वाद प्रदान कीजिये, उपदेश दीजिये। इसके बाद मैं आपको संघ सहित जहाँ भी कहोगी, वहाँ पहुँचाऊँगी......।’’ इतना सब कुछ निवेदन करने के बाद मैंने जब आपस में आर्यिका जिनमती से परामर्श किया, तब उनकी इच्छा बिल्कुल न होने से इन लोगों को स्वीकृति नहीं दी। उन महिला चंपाबाई ने भी ‘व्रतविधि सुमनावली’ नाम से एक पुस्तक छपायी थी।

बासंतीबाई-

यहां पुणे से बासंतीबाई आई थीं। कई दिनों रही थीं। ये अच्छी प्रबुद्ध महिला थीं। गर्मी के दिनों में मैं मध्यान्ह्न में शिष्याओं को त्रिलोकसार आदि का अध्ययन कराती, पश्चात् उपदेश करती। कभी-कभी अंतराय आदि के निमित्त से ओंठ सूख जाते थे, मुख म्लान हो जाता था, तब बासंती देवी कहतीं कि- ‘‘माताजी! सायंकाल में एक गिलास मोसम्मी का रस लेना चाहिए। इतना शरीर को कष्ट क्यों देना?......’’ मैं हँस देती थी और कहती थी कि- ‘‘यदि शरीर को पोषना ही होता, तो दीक्षा क्यों लेते?...... ‘‘विचित्रा जैनी दीक्षा हि स्वैराचारविरोधिनी।’’ वह कई बार कहा करतीं- ‘‘माताजी! जैन धर्म में जो यह काय-क्लेश तप है, शरीर को कष्ट देना, यही अच्छा नहीं लगता है, बाकी सारी बातें बहुत अच्छी लगती हैं। अध्यात्म भावना भानी चाहिए। इत्यादि।’’ उस पर मैंने समझाया- ‘‘देखो! सुखिया जीवन में किया गया आत्म तत्त्व का अभ्यास, दुःख आने पर पलायमान हो जाता है अतः दुखों को बुला बुलाकर आत्म तत्त्व की भावना करते रहना चाहिए। श्रीपूज्यपादस्वामी ने भी कहा है-

अदुःखभावितं ज्ञानं, क्षीयते दुःखसन्निधौ।

तस्माद् यथाबलं दुखैरात्मानं भावयेन्मुनिः।।

सुखिया जीवन में भाया गया तत्त्वज्ञान दुःख के आने पर नहीं टिक पाता है, भाग जाता है, अतः अपनी शक्ति के अनुसार दुःखों से कायक्लेश, उपवास आदि तपश्चरणों को करते हुए मुनिराज आत्मा की भावना भाएँ। ऐसे-ऐसे संबोधन को सुनकर बासंतीबाई ने कहा कि- ‘‘आपका कहना सत्य है। मुझ पर भी ऐसा ही बीता है।’’ इतना कहकर उसने सुनाया कि- एक बार मेरी नाक में दर्द हो गया। डाक्टर ने कहा कि हड्डी बढ़ गई है, आपरेशन कराना होगा। मैं रोने लग गई। पिता ने कहा- ‘‘बेटी! क्यों रोती है? इस समय चिन्तन करना कि आत्मा भिन्न है, शरीर भिन्न है।’’ मैंने कहा- ‘‘पिताजी! यह सब तत्त्वज्ञान अच्छे भले में सुहाता है। जब नाक के अन्दर डॉक्टर आपरेशन करेंगे तो मैं सांस कहां से लेऊंंगी?......’’ ऐसा कहकर मैं बहुत घबड़ा रही थी। आखिर आपरेशन कराया गया और दो-तीन दिन में ही घाव सूख गया। मैं स्वस्थ हो गई, लेकिन पहले बहुत घबरा रही थी। यह घटना सुनाकर वह हमेशा कहा करती थीं कि- ‘‘माताजी! जैन शास्त्रों के अनुसार आज भी आप लोग तपश्चर्या कर रही हैं और आत्म भावना भा रही हैं, यह महान् है।’’ उन्होंने कई बार मेरा परिचय पूछना चाहा और चरित्र लिखना चाहा किंतु मैंने मना कर दिया। कोई भी मेरे से, मेरा, मेरे घर का परिचय पूछता था तो मैं बस मात्र अपने दीक्षा गुरु आचार्यश्री वीरसागर जी का नाम बता देती थी।

ब्र. राजूबाई-

ये राजवी सखाराम दोषी की धर्मपत्नी थीं। इनके पति आचार्यश्री शांतिसागर जी के परमभक्तों में थे। ये सोने के पात्रों में भोजन परोसकर आचार्यश्री को आहार देते थे। उन दिनों इनके पति स्वर्गस्थ हो चुके थे। ये सात प्रतिमाधारिणी व्रतिक महिला थीं। साधुओं को आहारदान देने में आगे थीं, प्रवचन सुनने में भी बहुत रुचि रखती थीं। एक दिन किसी चर्चा में इन्होंने मुझसे कहा- ‘‘माताजी! लगभग एक वर्ष हुआ, ब्र. गुलाबचन्द्र चंडक से मेरी कुछ कहा-सुनी हो गई थी, तब से आज तक मैंने इनसे बात तक नहीं किया है......।’’ यह शब्द उन्होंने अपने स्वाभिमान को बताने के लिए कहे थे किन्तु मैंने उन्हें एकांत में कुछ शिक्षाएँ दीं, समझाया और कहा- ‘‘राजूबाई! सम्यग्दृष्टि की क्रोधादि कषायों का वासना काल यानि संस्कार अधिकतम छह महीने का है। इसके ऊपर चला जाये तो वह मिथ्यादृष्टि हो जायेगा, उसके अनंतानुबंधी कषाय मानी जायेगी और आप तो व्रती हैं। व्रती के कषाय का वासना काल पंद्रह दिन का है। इसलिए आपको इनके प्रति कषाय निकाल कर बातचीत करना चाहिए। मैंने बार-बार ऐसी प्रेरणा दी, तब राजूबाई जी ने मेरी बात मान ली और बोलीं- ‘‘अभी मेरा जन्मदिवस आने वाला है, उसी दिन मैें बोल दूँगी।’’ उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में उनके पुत्र गोविंदराव और पुत्रवधू कुमुदनी ने घर में जीमन आदि का आयोजन किया था। गृहचैत्यालय में बड़ा अभिषेक रखा था। उसी दिन ब्र. राजूबाई जी स्वयं ब्र. गुलाबचंद चंडक के घर पहुँचीं और हाथ जोड़कर वंदना करके बोलीं- ‘‘भाई! आज आपका मेरे घर निमंत्रण है, चलिये।’’ वे ब्रह्मचारी जी भी यहाँ पर मेरी भक्ति में अग्रसर थे। मेरा उपदेश प्रतिदिन सुनते थे, अतः कषायों में उपशम भाव से वे भी झट बोल पड़े-‘‘हाँ, बहन! मैं आ रहा हूँ।’’ चंडक जी उनके घर पहुँचे-भोजन किया, वार्तालाप किया। इसके बाद राजूबाई जी ने आकर मुझे सारी बातें बता दीं। सुनकर मुझे भी बहुत खुशी हुई। वास्तव में सम्यग्दृष्टि की यही पहचान है कि गुरूपदेश से, कैसी भी कषाय हो, कैसा भी मनमुटाव हो, उसे दूर कर वापस प्रेमभाव से पूर्व जैसा अच्छा व्यवहार बना लेवेंं, तभी वे सच्चे शिष्य कहलाते हैं। ऐसे शिष्यों पर ही गुरुओं का प्रेम बढ़ता है।’’ पुनः इन दोनों ने क्षमावणी के दिन भी आपस में प्रेम से क्षमा याचना की थी।

जैन कॉलेज-

एक बार मैंने सुना- ‘‘कुछ मेंढ़क पेटियों के अंदर बंद किये गये हैं। वे जैन कॉलेजों में भेजे जायेंगे। वहाँ बालक बायलोजी पढ़ते हैं। इस शिक्षण में उन्हें मेंढ़क मारकर, उन्हीं में चीर-फाड़ करना सिखाया जाता है।’’ यह सुनते ही मेरा रोम-रोम काँप उठा। मैंने ब्रह्मचारिणी सुमतीबाई को बुलाकर यह सब कहा और उनने सारी बातें समझीं पुनः मैंने उपवास कर लिया और कहा कि- ‘‘जैन कॉलेजों में यह शिक्षण-यह मेंढ़कों की हिंसा बंद होनी चाहिए।’’ ब्र. सुमतिबाई ने जैन कॉलेजों से संबंधित एक-दो महानुभावों को बुलाया। उन लोगों ने मुझसे बातचीत की। मैंने उन्हें समझाया और कहा- ‘‘कुंभोज में विराज रहे मुनिश्री समंतभद्र जी दिगंबर जैन महामुनि हैं। उनकी प्रेरणा से खोले गये जैन कॉलेजोें में यह हिंसा नहीं होनी चाहिए। देखो! यह संकल्पी हिंसा है। इसे आप न आरंभी में ले जा सकते हैं, न उद्योगिनी में और न विरोधिनी में ही। चूँकि मृत कलेवर में भी चीर-फाड़ सिखाया जा सकता है अतः जैन नाम की संस्था में यह निर्दयी कार्य नहीं होना चाहिए। लोगों ने मुझे बताया था कि- जीते हुए मेंढक को पेट्रोल में भिगोकर, कैसी बेरहमी से उसे चीर-फाड़ कर जान से मार डालते हैंं। सुनकर मेरा हृदय थर्रा उठा था। उन महानुभावों से बहुत देर तक चर्चाएँ होती रहीं। उन्होंने बार-बार यही कहा- ‘‘माताजी! आपको उपवास करने की जरूरत ही नहीं है। आपके आदेश से ही बायलोजी शिक्षण बंद करा दिया जायेगा।’’ पुनरपि उन्होंने कहा- ‘‘आप आहार कीजिये। आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।’’ मैंने अगले दिन आहार ले लिया। कुछ माह बाद मालूम हुआ कि श्रीसंमतभद्र जी मुनिश्री की प्रेरणा से चलने वाले सात-आठ सभी कॉलेजों में यह शिक्षण चल रहा है, मुझे बहुत ही दुःख हुआ। वास्तव में ‘जैन’ नाम से खोली गई शिक्षण संस्थाओं में यह हिंसामय बायलोजी शिक्षण नहीं होना चाहिए। अरे! आटे का मुर्गा बनाकर बलि करने वाले यशोधर राजा ने दस भवों तक जो दुःख भोगे हैं, वह कथा पढ़कर हर किसी को सोचना चाहिए कि भले ही इन मेंढकों के मारने में डाक्टरी सीखकर, आगे हजारों रोगियों का आपरेशन कर उन्हें जीवनदान देंगे किन्तु हजारों जीवनदान के पुण्य से एक जीव का बुद्धिपूर्वक घात करना, उस पुण्य से अधिक गुणा बड़ा महापाप है।’’

आचार्य संघ का विहार-

सोलापुर चातुर्मास समापन के बाद आचार्यश्री ने अपने संघ सहित गिरनार क्षेत्र की ओर विहार कर दिया। मैं भी वात्सल्य से पूरित आचार्यश्री का दर्शन करके उन्हें कुछ दूर तक पहुँचाने गई, पुनः वापस आ गई। अब मुझे भी यहाँ से विहार करके कुंथलगिरि होते हुए औरंगाबाद पहुँचना था। ब्र. गुलाबचन्द चंडक ने मेरे विहार की समुचित व्यवस्था बना ली थी।

संघ का विहार-

मैंने भी अपने संघ सहित यहाँ से विहार का कार्यक्रम बना लिया। आश्रम में सभा का आयोजन किया । ब्र. सुमतिबाई तो चाहती थीं कि माताजी हमेशा-हमेशा के लिए यहीं रहें, भले ही आस-पास में थोड़ा विहार कर आवें अतः वे धर्मवात्सल्य के निमित्त से कुछ खिन्न अवश्य हो रही थीं। सभी ने अपने-अपने उद्गार व्यक्त किये। पं. वर्धमान जी कन्नड़ में एक कविता बनाकर तत्काल ही अपनी प्रेस में छापकर लाये थे, उसे पढ़कर सुनायी और विदाई समारोह के बाद मैंने मंदिर के दर्शन कर कुंथलगिरि की ओर विहार कर दिया। मेरा यह सन् १९६६ का सोलापुर का चातुर्मास विशेष ज्ञानाराधना से सहित रहा है। इस समय मेरे संघ में आर्यिका पद्मावती, आर्यिका जिनमती, आर्यिका आदिमती, क्षुल्लिका श्रेयांसमती और क्षुल्लिका अभयमती ये पाँच साध्वियाँ थीं। ब्र. भंवरीबाई और कु. शीला ये दो बाईयां थीं। यहाँ आश्रम से मालती और सुमन नाम की दो बाईयां और साथ में आ गई थीं।

कु. शीला-

श्रवणबेलगोल विहार में वहां के श्रीमान धरणेन्द्रय्या की धर्मपत्नी ललितम्मा ने अपनी पुत्री कु. शीला को चौके की व्यवस्था हेतु साथ में भेज दिया था। यह सोलापुर से जाना चाहती थी किन्तु मैंने वैराग्य का उपदेश दे-देकर इसे रोक लिया था, यद्यपि यह घर की याद करके कभी-कभी रोने लगती थी तथा इस प्रांत में कन्नड़ में बात करने वाले प्रायः कोई न मिलने से भी घबराने लगती थी। फिर भी चूँकि मैं और मेरे पास की एक-दो आर्यिकायें कन्नड़ भाषा बोल लेती थीं अतः मैं इसे समझा-बुझाकर, शिक्षा देकर, धर्म कार्य में लगा देती थी। इसका स्वयं का भी पुण्य योग था जो कि उस समय रुक गई थी, तो ये आर्यिका शिवमती हो गई हैं और मेरे पास २७ वर्ष तक रही हैं।