ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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05.योगमार्गणा अधिकार

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योगमार्गणा अधिकार

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अथ योगमार्गणाधिकार:

अधुना योगमार्गणायां त्रिविधयोगिनां स्वामित्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते—
जोगाणुवादेण मणजोगी वचिजोगी कायजोगी णाम कधं भवदि ?।।३२।।
खओवसमियाए लद्धीए।।३३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका—योगः नाम जीवप्रदेशानां परिस्पंदः संकोचविकोचलक्षणः। स च क्षायोपशमिकः इति।
कश्चिदाह-अयं योगः किमौदयिकः किं क्षायोपशमिकः किं पारिणामिकः किं क्षायिकः किमौपशमिकः इति ? न तावत् क्षायिकः संसारिजीवेषु सर्वकर्मणामुदयेन वर्तमानेषु योगाभावप्रसंगात्, सिद्धेषु सर्वकर्मोदय-विरहितेषु योगस्यास्तित्वप्रसंंगाच्च। न पारिणामिकः, क्षायिके उक्ताशेषदोषप्रसंगात्। नौपशमिकः औपशमिक- भावेन मुक्तमिथ्यादृष्टिगुणस्थाने योगाभावप्रसंगात्। न घातिकर्मोदयसमुद्भूतः, केवलिनि भगवति क्षीणघातिकर्मोदये योगाभावप्रसंगात्। नाघातिकर्मोदयसमुद्भूतः, अयोगिनि अपि योगस्य सत्त्वप्रसंगात्। न घातिकर्मणां क्षायोपशमजनितः, केवलिनि योगाभावप्रसंगात्। नाघातिकर्मक्षयोपशमजनितः, तत्र सर्व-देशघातिस्पर्धकाभावात् क्षयोपशमाभावोऽस्ति। इदं सर्वं बुद्धौ कृत्वा ‘मनोवचनकाययोगिनः कथं भवन्तीति’ पृच्छासूत्रं आगतम् ।
अस्य समाधानं क्रियते-शरीरनामकर्मोदयेन शरीरप्रायोग्यपुद्गलेषु बहुषु संचयं गच्छत्सु वीर्यान्तरायस्य सर्वघातिस्पर्धकानामुदयाभावेन तेषां सत्त्वोपशमेन देशघातिस्पर्धकानामुदयेन समुद्भवात् लब्धक्षयोपश-मव्यपदेशं वीर्यं वर्धते तद्वीर्यं प्राप्य येन जीवप्रदेशानां संकोचः विकोचः वर्धते तेन योगः क्षायोपशमिकः उक्तो भवति।
यदि योगः वीर्यान्तरायक्षयोपशमजनितः तर्हि सयोगिकेवलिनि योगाभावः प्रसज्यते ?
नैतत्, उपचारेण क्षायोपशमिकं भावं प्राप्तस्य औदयिकस्य योगस्य तत्राभावविरोधात्।
स च योगस्त्रिविधः-मनोयोगः वचनयोगः काययोगश्चेति। मनोवर्गणायाः निष्पन्नद्रव्यमनोऽवलम्ब्य यो जीवस्य संकोच-विकोचः सः मनोयोगः। भाषावर्गणापुद्गलस्कंधान् अवलम्ब्य जीवप्रदेशानां संकोच-विकोचः सः वचनयोगः। यः चतुर्विधशरीराणि अवलम्ब्य जीवप्रदेशानां संकोच-विकोचः सः काययोगो नाम।
द्वौ वा त्रयो वा योगाः किन्न भवन्ति ?
न, तेषां योगानां युगपत् वृत्तिनिषिद्धत्वात्।
तेषां युगपत् वृत्तिरुपलभ्यते इति चेत् ?
न, इन्द्रियविषयमतिक्रान्तजीवप्रदेशपरिस्पन्दस्य इंद्रियैः उपलब्धिविरोधात्। न जीवे चलति जीवप्रदेशानां संकोच विकोचनियमः, सिद्ध्यत्प्रथमसमये इतः मध्यलोकात् लोकाग्रं गच्छति, जीवप्रदेशानां संकोच-विकोचानु-पलंभात्।
कथं मनोयोगः क्षायोपशमिकः ?
उच्यते, वीर्यान्तरायस्य सर्वघातिस्पर्धकानां सत्त्वोपशमेन देशघातिस्पर्धकानामुदयेन नोइन्द्रियावरणस्य सर्वघातिस्पर्धकानामुदयक्षयेण तेषां चैव सत्त्वोपशमेन देशघातिस्पर्धकानामुदयेन मनःपर्याप्तेः पर्याप्तगतस्य येन मनोयोगः समुत्पद्यते तेनैषः क्षायोपशमिकः। वीर्यान्तरायस्य सर्वघातिस्पर्धकानां सत्त्वोपशमेन देशघातिस्पर्धकानामुदयेन रसनेन्द्रियावरणस्य सर्वघातिस्पर्धकानामुदयक्षयेण तेषां चैव सत्त्वोपशमेन देशघाति-स्पर्धकानामुदयेन भाषापर्याप्ते:पर्याप्तगतस्य स्वरनामकर्मोदयसहितस्य वचनयोगस्योपलंभात् क्षायोपशमिकः वचनयोगः। वीर्यान्तरायस्य सर्वघातिस्पर्धकानां सत्त्वोपशमेन देशघातिस्पर्धकानामुदयेन काययोगोपलंभात् क्षायोपशमिकः काययोगः इति।
संप्रति अयोगिनां व्यवस्थाप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते-
अजोगी णाम कधं भवदि ?।।३४।।
खइयाए लद्धीए।।३५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र नयनिक्षेपैः अयोगित्वस्य पूर्ववत् चालना कर्तव्या। योगकारणशरीरादि-कर्मणां निर्मूलक्षयेण उत्पन्नत्वात् क्षायिका लब्धिरयोगिकेवलिनां भगवतां भवति।
एवं योगाधिकारे औदयिकादिभावनिरूपणपरत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ योगमार्गणा अधिकार

अब योगमार्गणा में तीनों प्रकार के योग वाले जीवों का स्वामित्व प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणा के अनुवाद से जीव मनोयोगी वचनयोगी और काययोगी किस कारण से होता है ?।।३२।।

क्षायोपशमिक लब्धि से जीव मनोयोगी वचनयोगी और काययोगी होता है।।३३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जीव प्रदेशों के संकोच-विसर्पण लक्षणरूप परिस्पंदन का नाम योग है और वह योग क्षायोपशमिक होता है।

यहाँ कोई शंका करता है-यह योग क्या औदयिक भाव है, क्या क्षायोपशमिक है क्या पारिणामिक है, क्या क्षायिक है अथवा क्या औपशमिक है ? योग क्षायिक तो हो नहीं सकता ,क्योंकि संसारी जीवों के सर्व कर्मों के उदय सहित वर्तमान रहते हुए योग के अभाव का प्रसंग आता है तथा सर्व कर्मोदय से रहित सिद्धों में योग के अस्तित्व का प्रसंग आता है। योग पारिणामिक भी नहीं हो सकता है, क्योंकि ऐसा मानने पर क्षायिक मानने से उत्पन्न होने वाले समस्त दोषों का प्रसंग आता है। योग औपशमिक भी नहीं है, क्योंकि औपशमिक भाव से रहित मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में योग के अभाव का प्रसंग आता है। योग घातिकर्मों के उदय से उत्पन्न भी नहीं है, क्योंकि सयोगिकेवली में घातिकर्मों का उदय क्षीण होने पर योग के अभाव का प्रसंग आता है। अघातिकर्मों के उदय से उत्पन्न भी नहीं है, क्योंकि वैसा मानने से अयोगिकेवली में भी योग के सत्व का प्रसंग आता है। योग घातिकर्मों के क्षयोपशम से उत्पन्न भी नहीं होता है, क्योंकि इससे भी सयोगिकेवली में तथा अयोगि में क्षायोपशमिकी योग के अभाव का प्रसंग आता है। योग अघातिकर्मों के क्षयोपशम से भी उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि अघातिकर्मों के सर्वघाती और देशघाती स्पर्धकों का अभाव होने से वहाँ क्षयोपशम भाव का अभाव पाया जाता है। यह सब मन में विकल्प विचार करके ‘जीव मनोयोगी वचनयोगी और काययोगी किस कारण से होते है’, ऐसा पृच्छा सूत्र आया है।

इसका समाधान करते हैं-

शरीर नामकर्म के उदय से शरीर बनने के योग्य बहुत से पुद्गलों के संचय को प्राप्त होने पर वीर्यान्तराय कर्म के सर्वघाती स्पर्धकों के उदयाभाव से व उन्हीं स्पर्धकों के सत्त्वोपशम से तथा देशघाती स्पर्धकों के उदय से उत्पन्न होने के कारण क्षायोपशमिक कहलाने वाला जो वीर्य (बल) बढ़ता है, उस वीर्य को पाकर जीव प्रदेशों का संकोच-विकोच बढ़ता है। इसलिए योग क्षायोपशमिक कहा गया है।

शंका-यदि योग वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न होता है, तो सयोगिकेवली में योग के अभाव का प्रसंग आता है ?

समाधान-ऐसा प्रसंग नहीं आता है, क्योंकि योग क्षायोपशमिक भाव तो उपचार से माना गया है। वास्तव में तो योग औदयिक भाव ही है और औदयिक योग का सयोगिकेवली के अभाव मानने में विरोध आता है।

वह योग तीन प्रकार का है-मनोयोग, वचनयोग और काययोग। मनोवर्गणा से निष्पन्न हुए द्रव्यमन को अवलम्बन करके जो जीव का संकोच-विस्तार होता है, वह मनोयोग है। भाषावर्गणासंबंधी पुद्गलस्कंधों को अवलम्बन करके जो जीवप्रदेशों का संकोच-विस्तार होता है, वह वचनयोग है और जो चतुर्विध शरीर को अवलम्बन करके जीवप्रदेशों का संकोच-विस्तार होता है, वह काययोग है।

शंका-दो या तीन योग एक साथ क्यों नहीं होते ?

समाधान-नहीं, क्योंकि उनकी एक साथ वृत्ति का निषेध है।

शंका-अनेक योगों की एक साथ वृत्ति पाई जाती है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि इन्द्रियों के विषय से परे जो जीव प्रदेशों का परिस्पन्दन होता है, उसका इन्द्रियोें द्वारा उपलब्धि होने में विरोध आता है। जीवों के चलते समय जीव प्रदेशों के संकोच-विस्तार का नियम नहीं है, क्योंकि सिद्ध होने के प्रथम समय में जब जीव यहाँ से अर्थात् मध्यलोक से लोक के अग्रभाग को जाता है, तब जीव प्रदेशों में संकोच-विस्तार नहीं पाया जाता है।

शंका-मनोयोग क्षायोपशमिक कैसे है ?

समाधान-बतलाते हैं-वीर्यान्तरायकर्म के सर्वघाती स्पर्धकों के सत्वोपशम से व देशघाती स्पर्धकों के उदय से नोइन्द्रियावरण कर्म के सर्वघाती स्पर्धकों के उदयक्षय से उन्हीं स्पर्धकों के सत्वोपशम से तथा देशघाती स्पर्धकों के उदय से मनपर्याप्ति से पर्याप्त हुए जीव के मनोयोग उत्पन्न होता है, इसलिए उसे क्षायोपशमिक भाव कहते हैं। वीर्यान्तराय कर्म के सर्वघाती स्पर्धकों के सत्वोपशम से व देशघाती स्पर्धकों के उदय से, जिव्हेन्द्रियावरण कर्म के सर्वघाती स्पर्धकों के उदयक्षय से व उन्हीं के सत्वोपशम से तथा देशघाती स्पर्धकों के उदय से भाषापर्याप्ति से पर्याप्त हुए स्वर नामकर्मोदय सहित जीव के वचनयोग पाया जाता है, इसलिए वचनयोग भी क्षायोपशमिक है। वीर्यान्तरायकर्म के सर्वघाती स्पर्धकों के सत्वोपशम से देशघाती स्पर्धकों के उदय से काययोग पाया जाता है, इसलिए काययोग भी क्षायोपशमिक है, ऐसा जानना चाहिए।

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अब अयोगिकेवलियों की व्यवस्था को बतलाने हेतु प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव अयोगी किस कारण से होता है ?।।३४।।

क्षायिक लब्धि से जीव अयोगी होता है।।३५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ पर नयों और निक्षेपों के द्वारा अयोगिपने का पूर्ववत् कथन करना चाहिए। योग के कारणभूत शरीरादिक कर्मों के निर्मूल क्षय से उत्पन्न होने के कारण अयोगी भगवन्तों के क्षायिक लब्धि होती है।

इस प्रकार योगमार्गणा के अधिकार में औदयिक आदि भावों का निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्तचिंतामणिटीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।