ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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05.योग मार्गणा अधिकार

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योग मार्गणा अधिकार

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अथ योगमार्गणाधिकार:

अथ त्रिभिरन्तरस्थलैः अष्टादशसूत्रैः योगमार्गणाधिकारः नामचतुर्थोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले मनोयोगिवचनयोगिनां कालनिरूपणत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले सामान्यकाययोगिनां कालप्रतिपादनत्वेन ‘‘कायजोगी’’ इत्यादिना सूत्रत्रयं। तत्पश्चात् तृतीयस्थले औदारिकादिकाययोगिनां कालकथनत्वेन ‘‘ओरालिय’’ इत्यादिना द्वादशसूत्राणि इति समुदायपातनिका कथ्यते।
संप्रति मनोयोगिवचनयोगिनां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
जोगाणुवादेण पंचमणजोगी पंचवचिजोगी केवचिरं कालादो होंति ?।।९६।।
जहण्णेण एयसमओ।।९७।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।९८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-मनोयोगस्य तावत् एकसमयप्ररूपणा क्रियते। तद्यथा-एको जीवः काययोगेन स्थित्वा काययोगकालस्य क्षयेण मनोयोगे आगत:, तेनैकसमयं स्थित्वा द्वितीयसमये मृत्वा काययोगी जातः। लब्धो मनोयोगस्य एकसमयः। अथवा काययोगकालक्षयेण मनोयोगे आगते द्वितीयसमये व्याघातितस्य पुनरपि काययोगश्चैवागतः। लब्धो द्वितीयप्रकारेणैकसमयः। एवं शेषाणां चतुर्णां मनोयोगानां पंचानां वचनयोगानां च एकसमयप्ररूपणा द्वाभ्यां प्रकाराभ्यां ज्ञातव्या।
अविवक्षितयोगाद् विवक्षितयोगं गत्वा उत्कर्षेण तत्रान्तर्मुहूर्तं अवस्थानं प्रति विरोधाभावात्।
एवं प्रथमस्थले मनोवचनयोगिनां कालकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतम् ।
इदानीं सामान्येन काययोगिनां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
कायजोगी केवचिरं कालादो होंति ?।।९९।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१००।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।१०१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र एकजीवापेक्षयैव कालः प्ररूप्यते। अविवक्षितयोगात् काययोगं गतस्य जघन्यकालस्यापि अंतर्मुहूर्तप्रमाणं मुक्त्वा एकसमयादिप्रमाणानुपलंभात्। उत्कर्षेण-अनर्पितयोगात् काययोगं गत्वा तत्र सुष्ठु दीर्घकालं स्थित्वा कालं कृत्वा एकेन्द्रियेषूत्पन्नस्य आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गल-परिवर्तनानि परिवर्तितस्य काययोगोत्कृष्टकालोपलंभात्।
एवं द्वितीयस्थले सामान्यकाययोगिनां स्थितिनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
संप्रति औदारिककाययोगिनां स्थितिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
ओरालियकायजोगी केवचिरं कालादो होदि ?।।१०२।।
जहण्णेण एगसमओ।।१०३।।
उक्कस्सेण बावीसं वाससहस्साणि देसूणाणि।।१०४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-मनोयोगेन वचनयोगेन व स्थित्वा तयोःकालक्षयेण औदारिककाययोगप्राप्तस्य द्वितीयसमये कालं कृत्वा योगान्तरं गतस्य एकसमयदर्शनात्। लब्धो जघन्यकालः। उत्कर्षेण-द्वाविंशतिवर्ष-सहस्रायुष्केषु पृथिवीकायिकेषु उत्पद्य सर्वजघन्येन कालेन औदारिकमिश्रकालं गमयित्वा पर्याप्तकस्य प्रथमसमयप्रभृति यावत् अंतर्मुहूर्तोनद्वाविंशतिसहस्रवर्षाणि तस्य तावत् औदारिककाययोगः उपलभ्यते।

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अथ योगमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब तीन अन्तरस्थलों में अठारह सूत्रों के द्वारा योगमार्गणा अधिकार नाम से चतुर्थ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में मनोयोगी और वचनयोगी जीवों का कालनिरूपण करने वाले ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीयस्थल में सामान्यकाययोगी जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु कायजोगी’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में औदारिक आदि काययोगी जीवों का काल कथन करने वाले ‘‘ओरालिय’’ इत्यादि बारह सूत्र हैं। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब मनोयोगी और वचनयोगी जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणानुसार पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।९६।।

पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीव जघन्य से एक समय तक रहते हैं।।९७।।

पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीव उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक रहते हैं।।९८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन योगों में प्रथमत: मनोयोग के एक समय की प्ररूपणा की जाती है। वह इस प्रकार है-एक जीव काययोग से स्थित होकर काययोग काल के क्षय से मनोयोग में आया, उसके साथ एक समय रहकर व द्वितीय समय में मरकर काययोगी हो गया। इस प्रकार मनोयोग का जघन्य काल एक समय प्राप्त हो जाता है। अथवा काययोग काल के क्षय से मनोयोग के प्राप्त होने पर द्वितीय समय में व्याघात को प्राप्त हुए उसके फिर भी काययोग ही प्राप्त हो गया। इस तरह द्वितीय प्रकार से एक समय प्राप्त होता है। इसी प्रकार शेष चार मनोयोग और पाँच वचनयोगों के भी एक समय की प्ररूपणा दोनों प्रकारों से जानना चाहिए।

अविवक्षित योग से विवक्षित योग को प्राप्त होकर उत्कृष्ट से वहाँ अन्तर्मुहूर्त तक अवस्थान होने में कोई विरोध नहीं है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में मनोयोगी और वचनयोगी जीवों का काल कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सामान्यरूप से काययोगी जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

काययोगी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।९९।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव काययोगी रहते हैं।।१००।।

उत्कृष्ट से असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अनन्त काल तक जीव काययोगी रहते हैं।।१०१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ एक जीव की अपेक्षा ही काल का प्ररूपण किया जा रहा है। अविवक्षित योग से काययोग को प्राप्त हुए जीव के जघन्य काल का प्रमाण अन्तर्मुहूर्त को छोड़कर एक समयादिरूप नहीं पाया जाता है। उत्कृष्ट से-अविवक्षित योग से काययोग को प्राप्त होकर और वहाँ अतिशय दीर्घ काल तक रहकर काल को पूर्ण करके एकेन्द्रियों में उत्पन्न हुए जीव के आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण पुद्गल परिवर्तन भ्रमण करते हुए जीव के काययोग का उत्कृष्ट काल पाया जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में सामान्यकाययोगी जीवों की स्थिति का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब औदारिककाययोगी जीवों की स्थिति का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

औदारिककाययोगी जीव कितने काल तक रहते है ?।।१०२।।

जघन्य से एक समय तक जीव औदारिककाययोगी रहते हैं।।१०३।।

उत्कृष्ट से कुछ कम बाईस हजार वर्षों तक जीव औदारिककाययोगी रहते हैं।।१०४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनोयोग अथवा वचनयोग के साथ रहकर उनके कालक्षय से औदारिककाययोग को प्राप्त होने के द्वितीय समय में मरकर योगान्तर को प्राप्त हुए जीव के एक समय काल देखा जाता है। उत्कृष्ट से-बाईस हजार वर्ष की आयु वाले पृथिवीकायिकों में उत्पन्न होकर सर्वजघन्य काल से औदारिकमिश्रकाल को बिताकर पर्याप्ति को प्राप्त होने के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त कम बाईस हजार वर्ष तक औदारिककाययोग पाया जाता है।

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औदारिकमिश्र-वैक्रियिक-आहारक-तन्मिश्र-कार्मणकाययोेगिनां कालप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-

ओरालियमिस्सकायजोगी वेउव्वियकायजोगी आहारकायजोगी केवचिरं कालादो होदि ?।।१०५।।

जहण्णेण एगसमओ।।१०६।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१०७।।
वेउव्वियमिस्सकायजोगी आहारमिस्सकायजोगी केवचिरं कालादो होदि ?।।१०८।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१०९।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।११०।।
कम्मकायजोगी केवचिरं कालादो होदि ?।।१११।।
जहण्णेण एगसमओ।।११२।।
उक्कस्सेण तिण्णि समया।।११३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-औदारिककाययोगस्याविनाभाविदण्डसमुद्घातात् कपाटसमुद्घातगतजिनभगवति सयोगिनि औदारिकमिश्रस्य एकसमयः उपलभ्यते, तत्र औदारिकमिश्रेण विना अन्ययोगाभावात्। मनोवचनयोगेभ्यः वैक्रियिकयोगप्राप्तस्य द्वितीयसमये मृतस्य एकसमयः वैक्रियिककाययोगस्योपलभ्यते, मृतप्रथमसमये कार्मण-औदारिक-वैक्रियिकमिश्रकाययोगान् मुक्त्वा वैक्रियिककाययोगानुपलंभात्। मनोवचनयोगेभ्यः आहारककाययोगं गतस्य द्वितीयसमये मृतस्य मूलशरीरं प्रविष्टस्य वा आहारकाययोगस्यैक-समयो लभ्यते, मृतानां मूलशरीरप्रविष्टानां च प्रथमसमये आहारकाययोगानुपलंभात्। औदारिकमिश्रयोगिनः वैक्रियिककाययोगिनः आहारकाययोगिनः जीवस्य जघन्येन एतत्कालः कथितः।
उत्कर्षेण-एतेषां कालः कथ्यते-मनोयोगात् वचनयोगाद्वा वैक्रियिक-आहारकाययोगं गत्वा सर्वोत्कृष्टं अंतर्मुहूर्तंं स्थित्वा अन्ययोगस्यान्तर्मुहूर्तमात्रकालोपलंभात्। अनर्पितयोगादौदारिकमिश्रयोगं गत्वा सर्वोत्कृष्टकालं स्थित्वान्ययोगं गतस्य औदारिकमिश्रस्यान्तर्मुहूर्तमात्रोत्कृष्टकालोपलंभात्।
सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्तेषु बादरैकेन्द्रियापर्याप्तेषु च सप्ताष्टभवग्रहणानि निरतंरमुत्पन्नस्य बहुशः कालः किन्नोपलभ्यते ?
न,ताः सर्वाः स्थितयः एकत्र कृतेऽपि अन्तर्मुहूर्तलाभात्।
कश्चिदाह-वैक्रियिकमिश्रयोगिनः आहारमिश्रयोगिनश्च जघन्येनान्तर्मुहूर्तं कथितं, अत्र एकसमयः किन्न लभ्यते ?
न लभ्यते, अत्र मरण-योगपरावृत्योरसंभवात्। शेषं सुगमं वर्तते।
एवं तृतीयस्थले काययोगिनां भेदप्रभेदानां जघन्योत्कृष्टकालनिरूपणत्वेन द्वादशसूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धांतचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकारः समाप्तः।

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अब औदारिकमिश्र, वैक्रियिक, आहारक, आहारकमिश्र एवं कार्मणकाययोगी जीवों का काल बतलाने हेतु नौ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव औदारिकमिश्रकाययोगी, वैक्रियिककाययोगी और आहारककाययोगी कितने काल तक रहते हैं ?।।१०५।।

जघन्य से एक समय तक जीव औदारिक मिश्रकाययोगी आदि रहते हैं।।१०६।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव औदारिकमिश्रकाययोगी आदि रहते हैं।।१०७।।

जीव वैक्रियिकमिश्रकाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी कितने काल तक रहते हैं ?।।१०८।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव वैक्रियिकमिश्रकाययोगी और आहारक-मिश्रकाययोगी रहते हैं।।१०९।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव वैक्रियिकमिश्रकाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी रहते हैं।।११०।।

जीव कार्मणकाययोगी कितने काल तक रहते हैं ?।।१११।।

जघन्य से एक समय तक जीव कार्मणकाययोगी रहते हैं।।११२।।

उत्कृष्ट से तीन समय तक जीव कार्मणकाययोगी रहते हैं।।११३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-औदारिककाययोग के अविनाभावी दण्डसमुद्घात से कपाटसमुद्घात को प्राप्त हुए सयोगीजिन में औदारिकमिश्र का एक समय काल पाया जाता है, क्योंकि उस अवस्था में औदारिकमिश्र के बिना अन्य योग नहीं पाया जाता। मनोयोग या वचनयोग से वैक्रियिककाययोग को प्राप्त होने के द्वितीय समय में मृत्यु को प्राप्त हुए जीव के वैक्रियिककाययोग का एक समय काल पाया जाता है, क्योंकि मर जाने के प्रथम समय में कार्मणकाययोग, औदारिकमिश्रकाययोग और वैक्रियिकमिश्रकाययोग को छोड़कर वैक्रियिककाययोग पाया नहीं जाता। मनोयोग अथवा वचनयोग से आहारककाययोग को प्राप्त होने के द्वितीय समय में मृत्यु को प्राप्त हुए या मूल शरीर में प्रविष्ट हुए जीव के आहारककाययोग का एक समय पाया जाता है, क्योंकि मृत्यु को प्राप्त और मूल शरीर में प्रविष्ट हुए जीवों के प्रथम समय में आहारककाययोग नहीं पाया जाता है। औदारिकमिश्रकाययोगी, वैक्रियिककाययोगी और आहारककाययोगी जीव का जघन्य से यह काल कहा गया है।

उत्कृष्टरूप से इनका काल कहते हैं-

मनोयोग अथवा वचनयोग से वैक्रियिक या आहारककाययोग को प्राप्त होकर सर्वोत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर अन्य योग को प्राप्त हुए जीव के अन्तर्मुहूर्त मात्र काल पाया जाता है तथा अविवक्षित योग से औदारिकमिश्रयोग को प्राप्त होकर तथा सर्वोत्कृष्ट काल तक रहकर अन्य योग को प्राप्त हुए जीव के औदारिकमिश्र का अन्तर्मुर्हूतमात्र उत्कृष्ट काल पाया जाता है।

शंका-सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्तों में और बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्तों में सात आठ भवग्रहण तक निरन्तर उत्पन्न हुए जीव के बहुत काल क्यों नहीं पाया जाता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि उन सब स्थितियों को इकट्ठा करने पर भी उनका योग अन्तर्मुहूर्तमात्र काल होता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-वैक्रियिकमिश्रकाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीवों का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है तो यहाँ एक समय जघन्य काल क्यों नहीं प्राप्त होता है ?

इसका समाधान करते हैं कि-नहीं, क्योंकि यहाँ मरण और योगपरावृत्ति का होना असंभव है।

शेष कथन सुगम है।

इस तरह से तृतीय स्थल में काययोगी जीवों के भेद-प्रभेदों का जघन्य और उत्कृष्ट काल निरूपण करने वाले बारह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम के क्षुद्रकबंध नाम के प्रकरण में द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।