ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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05.विवाह-एक आनन्द जोत

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विवाह-एक आनन्द जोत

जीवन में पूर्णता और सामंजस्य का प्रेरक सूत्रधार बन, विवाह उस अद्भुत भावसत्ता को आविर्भूत करता है, जो स्त्री—पुरुष के स्नेह—बंधों को परस्पर गुंफित करती है—आत्मीयता के साथ और विकसित करती है उस चिर वर्धमान जीवन वृक्ष को, जिसके मूल में हैं व्याप्त; अगाध प्रेम, धैर्य और गाम्भीर्यत्व, जटाओं को स्फूर्त करती है क्षमा, पुष्पों की सुरभि बनता है प्रामाणिक चरित्र और शाखाओं में होता है चिरंतन गरिमामय वास—सामाजिक मंगल का। इस नेह—बंधन का अभीष्ट है मोक्ष, जो भाव प्रतिबद्धता रखता है कि हों इस चैतन्य सामाजिक संस्था से पुष्पित, पल्लवित एवं उद्भूत निष्ठावान, श्रद्धावान और ज्ञानवान, श्रावक—श्राविका, जो अभिप्रवृत्त हों, अपनी संकल्पनिष्ठ और पुरुषार्थशील रत्नत्रयी साधना में ; अहर्निश, प्रतिपल। नर—नारी के प्रारब्ध निमित्तों से स्फूर्त संकल्पित योग का नाम है विवाह, जो दो अजनबियों को जन्म—जन्मांतरों के बंधन में करता है आबद्ध; प्रेममय हो, स्फूर्तिमय हो, धर्ममय हो और हो, संस्कारमय भी। भारतीच चितंन, विवाह को मात्र एक सामाजिक रिवाज नहीं, प्रत्युत नर—नारी को एक ही सांवत्सरिक आत्मा का तेजोमय अंश मानते हुए, उसे संपूर्ण संवत्सर के जीवंत अंग के रूप में आख्यायित करता है ; ताकि हो सके आविर्भूत, दो आत्माओं का मिलन एवं भूतात्मा के रूप में सहज समन्वयन, जहाँ बन सकें , दोनों एक दूसरे के पूरक।

व्यक्ति विराट प्रकृति का अंग बन, सृष्टि के सृजन को स्पंदित करता है, जिसका मूल आधार है विवाह संस्था, जो मानव मन की चंचलता और व्यवहार की स्वच्छंदता को मर्यादित करते हुए मोक्ष के लक्ष्य को रेखांकित करने वाली प्रति—सृष्टि की आधारशिला भी रखती है। सृष्टि युगल तत्व के सिद्धान्त पर आगे बढ़ती है और विवाह के माध्यम से यह तत्व विशेष करता है अलोकित, कामना से आप्तकाम होने के मार्ग को भी, जिससे विवाह संस्था प्रतिष्ठापित हो जाती है भारतीय संस्कृति में; भोग से योग की ओर सहज प्रस्थान के पवित्र संकल्प के रूप में। नर और नारी का यह संकल्पन, स्पद्र्धा के निमित्त नहीं; प्रत्युत् है, पूरक बनने के लिए, आत्मीय बनने के लिए और एकत्व बोध प्राप्त करने के लिए भी।