ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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05.वेदमार्गणाधिकार

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वेदमार्गणाधिकार

अथ वेदमार्गणाधिकार:

अथ स्थलचतुष्टयेन त्रयोदशसूत्रैः वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकारः प्रारभ्यते। अत्र तावत् प्रथमस्थले स्त्रीवेदानामन्तरकथनमुख्यत्वेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले पुरुषवेदानामंतर-निरूपणत्वेन ‘‘पुरिस-’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणि। ततः परं तृतीयस्थले भावनपुंसकवेदानामंतरप्ररूपणत्वेन ‘‘णवुंसय-’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनंतरं चतुर्थस्थले अपगतवेदानामंतरप्रतिपादनत्वेन ‘‘अवगद-’’ इत्यादिना सूत्र चतुष्टयमिति समुदायपातनिका ।
इदानीं स्त्रीवेदानामंतरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
वेदाणुवादेण इत्थिवेदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।८०।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।८१।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।८२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति । स्त्रीवेदात् निर्गतस्य पुरुष-नपुंसकवेदेषु चैव भ्रमतः आवलिकायाः असंख्यातभागमात्र पुद्गलपरिवर्तनानामंतरस्वरूपेणोपलंभात् उत्कृष्टान्तरमेतत्।
एवं प्रथमस्थले स्त्रीवेदान्तरप्रतिपादनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अधुना पुरुषवेदानामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
पुरिसवेदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।८३।।
जहण्णेण एगसमओ।।८४।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।८५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-जघन्येन कश्चिन्महामुनिः पुरुषवेदेनोपशमश्रेणिमारुह्यापगतवेदो भूत्वा एकसम-यस्यान्तरं कृत्वा द्वितीयसमये कालं कृत्वा पुरुषवेदेषूत्पन्नस्य एकसमयमात्रान्तरोपलंभात्। उत्कर्षेण सुगममेव।
एवं द्वितीयस्थले पुरुषवेदानामंतरप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
नपुंसकवेदानामंतरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
णवुंसयवेदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।८६।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ।।८७।।
उक्कस्सेण सागरोवमसदपुधत्तं।।८८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अपर्याप्तकेषु क्षुद्रभवग्रहणमात्रायुःस्थितिकेषु नपुंसकवेदं मुक्त्वा स्त्री-पुरुष- वेदानामनुपलंभात् , पर्याप्तकेष्वपि अंतर्मुहूर्तमात्रकालव्यतिरिक्तं क्षुद्रभवग्रहणानुपलंभात्, अत्र नपुंसकवेदेषु क्षुद्रभवग्रहणमात्रान्तरं न लभ्यते।
उत्कर्षेण-नपुंसकवेदान्निर्गतस्य स्त्रीपुरुषवेदेषु एव परिभ्रमतः सागरोपमशतपृथक्त्वादुपरि तत्राव-स्थानाभावात्।
एवं तृतीयस्थले नपुंसकवेदान्तरनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अधुना वेदविरहितानां महासाधूनामंतरप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
अवगदवेदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।८९।।
उवसमं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।९०।।
उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणं।।९१।।
खवगं पडुच्च णत्थि अंतरं णिरंतरं।।९२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चित् साधुः उपशमश्रेणितोऽवतीर्य सर्वजघन्यमन्तर्मुहूर्तं सवेदी भूत्वान्तरं कृत्वा पुनः उपशमश्रेणिं चटित्वा अवेदत्वं गतस्तस्य जघन्यकालमुपलभ्यते।
उत्कर्षेण-कश्चिदनादिमिथ्यादृष्टिर्जीवः त्रीण्यपि करणानि कृत्वाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्यादिसमये सम्यक्त्वं संयमं च युगपत् संप्राप्यान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा उपशमश्रेणिमारुह्यापगतवेदी भूत्वाधोऽवतीर्य सवेदो भूत्वांतरं कृत्वा उपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनकालं भ्रमित्वा पुनोऽन्तर्मुहूर्तावशेषे संसारे उपशमश्रेणिं चटित्वापगतवेदो भूत्वान्तरं समाप्तं कृतः, पुनश्च ततोऽवतीर्य क्षपकश्रेणिं चटित्वा अबंधकत्वं गतस्तस्य तदुपलभ्यते।
क्षपकश्रेण्यारोहकाणामपगतवेदानां पुनः वेदपरिणामानुत्पत्तेर्नास्ति तेषामन्तरं इति ज्ञातव्यं।
यः कश्चित् भव्यपुंगवः परवस्तुभ्यो रतिमपहृत्य स्वशुद्धात्मनि प्रीतिं विधत्ते स एव स्वसंवेदनज्ञानबलेन कर्मणां निर्जरां कृत्वापगतवेदो भूत्वा स्वशुद्धात्मोत्थं परमानंदसुखं अनुभवति स एव ज्ञानी भवति।
उक्तं च श्रीपद्मनंदिदेवैः ज्ञानस्य माहात्म्यं-
अज्ञो यद्भवकोटिभिः क्षपयति स्वं कर्म तस्माद् बहुः।
स्वीकुर्वन् कृतसंवरः स्थिरमना ज्ञानी तु तत्तत्क्षणात्।।
तीक्ष्णक्लेशहयाश्रितोऽपि हि पदं नेष्टं तपः स्यन्दनो।
नेयं तन्नयति प्रभुं स्फुटतरज्ञानैकसूतोज्झितः१।।
अज्ञानी मुनिः यावन्ति कर्माणि कोटिभवैः क्षपयति, तदपेक्षयापि बहूनि कर्माणि ज्ञानी संवरसहितः त्रिगुप्तिगुप्तः सन् एकाग्रमनाः भूत्वा नाशयति, किच-ज्ञानसारथिरहितः तपःस्यन्दनः आत्मानं मोक्षस्थानं नेतुं न क्षमो भवतीति ज्ञात्वा ब्रह्मचर्यबलेन सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राण्याराध्य अपगतवेदो भूत्वा क्षपकश्रेणिमारुह्य स्वशुद्धात्मपदं प्राप्तव्यं भवद्भिरिति।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षयान्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां वेदमार्गणानाम
पंचमोऽधिकारः समाप्तः।


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अथ वेदमार्गणा अधिकार

अब चार स्थलों में तेरह सूत्रों के द्वारा वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में स्त्रीवेदियों का अन्तर कथन करने हेतु ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में पुरुषवेदी जीवों का अन्तर निरूपण करने हेतु ‘‘पुरिस-’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके पश्चात् तृतीय स्थल में भाव नपुंसकवेदी जीवों का अन्तर प्ररूपण करने वाले ‘‘णवुंसय-’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में अपगतवेदियोें का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु ‘‘अवगद’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब स्त्रीवेदी जीवों का अन्तर बताने के लिए तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणानुसार स्त्रीवेदी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।८०।।

स्त्रीवेदी जीवों का जघन्य अन्तर क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक होता है।।८१।।

स्त्रीवेदी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर अनन्त कालप्रमाण है, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन-प्रमाण काल के बराबर है।।८२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। स्त्रीवेद से निकलकर पुरुषवेद और नपुंसकवेद में ही भ्रमण करने वाले जीव के आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण पुद्गलपरिवर्तनरूप स्त्रीवेद का उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में स्त्रीवेदियों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब पुरुषवेदी जीवों का अन्तर कथन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पुरुषवेदियों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।८३।।

पुरुषवेदियों का जघन्य अन्तर एक समय होता है।।८४।।

पुरुषवेदियों का उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकाल है, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण के बराबर होता है।।८५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जघन्य से कोई महामुनि पुरुषवेद सहित उपशमश्रेणी में चढ़कर अपगतवेदी हो एक समयप्रमाण पुरुषवेद का अन्तर करके दूसरे समय में मरणकर पुरुषवेदी जीवों में उत्पन्न होने वाले जीव के पुरुषवेद का एक समय प्रमाण अन्तर पाया है। उत्कृष्ट से कथन सुगम है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में पुरुषवेदियों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब नपुंसकवेदी जीवों का अन्तर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेदियों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।८६।।

नपुंसकवेदियों का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त होता है।।८७।।

नपुंसकवेदियों का उत्कृष्ट अन्तर सागरोपमशतपृथक्त्वप्रमाण होता है।।८८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण आयु वाले अपर्याप्तक जीवों में नपुंसकवेद को छोड़कर स्त्री व पुरुषवेद नहीं पाया जाता है और पर्याप्तकों में अन्तर्मुहूर्त के सिवाय क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण काल नहीं पाया जाता है। यहाँ नपुंसकवेदियों में क्षुद्रभवग्रहणमात्र अन्तर नहीं पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-नपुंसकवेद से निकले हुए जीव का स्त्री-पुरुष वेदों में ही परिभ्रमण करते हुए सागरोपमशतपृथक्त्व से ऊपर वहाँ रहने का अभाव पाया जाता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में नपुंसकवेदी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब वेदरहित महासाधुओं का अंतर बतलाने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अपगतवेदी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।८९।।

उपशम की अपेक्षा अपगतवेदी जीवों का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्तमात्र होता है।।९०।।

उपशम की अपेक्षा अपगतवेदी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन-प्रमाण होता है।।९१।।

क्षपक की अपेक्षा अपगतवेदी जीवों का अन्तर नहीं होता, वे निरन्तर हैं।।९२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई साधु उपशमश्रेणी से उतरकर सबसे कम अन्तर्मुहूर्तप्रमाण काल तक सवेदी होकर अपगतवेद का अन्तर कर पुन: उपशमश्रेणी पर चढ़कर अपगतवेद भाव को प्राप्त होने वाले जीव के अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य अन्तर पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-किसी अनादिमिथ्यादृष्टि जीव ने तीनों ही करण करके अर्धपुद्गलपरिवर्तन के प्रथम समय में सम्यक्त्व और संयम को एक साथ ग्रहण किया और अन्तर्मुहूर्त रहकर उपशमश्रेणी पर चढ़कर अपगतवेदी हो गया। वहाँ से फिर नीचे उतरकर सवेदी अपगतवेदी का अन्तर प्रारंभ किया और उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल तक भ्रमण कर पुन: संसार के अन्तर्मुहूर्तमात्र शेष रहने पर उपशमश्रेणी पर चढ़कर अपगतवेदी हो अन्तर को समाप्त किया। पश्चात् फिर नीचे उतरकर क्षपक श्रेणी पर चढ़कर अबंधकभाव प्राप्त किया। इस प्रकार अपगतवेदियों का कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अन्तरकाल प्राप्त हो जाता है।

क्षपकश्रेणी चढ़ने वालों के एक बार अपगतवेदी हो जाने पर पुन: वेद परिणाम की उत्पत्ति नहीं होती, यही उनका अन्तर जानना चाहिए। जो कोई भव्यपुंगव परवस्तु से राग को छोड़कर अपनी शुद्धात्मा में प्रीति करते हैं, वही स्वसंवेदन ज्ञान के बल से कर्मों की निर्जरा करके वेदरहित होकर अपनी शुद्ध आत्मा से उत्पन्न परमानंद सुख का अनुभव करते हैं, वही सच्चे ज्ञानी कहलाते हैं।

श्री पद्मनंदि आचार्यदेव ने भी ज्ञान का माहात्म्य बताते हुए कहा है- श्लोकार्थ-अज्ञानी जीव कठोर तप आदि के द्वारा जितने कर्मों को करोड़ वर्ष में क्षय करता है, उससे अधिक कर्मों को, स्थिर मन होकर संवर का धारी ज्ञानी (आत्मज्ञानी) जीव क्षणमात्र में क्षय कर देता है, सो ठीक ही है क्योंकि जिस तपरूपी रथ में तीक्ष्णक्लेशरूपी घोड़े लगे हुए हैं, किन्तु ज्ञानरूपी सारथी नहीं हैं, तो वह तपरूपी रथ कदापि आत्मारूपी प्रभु को मोक्षस्थान में नहीं ले जा सकता है।।

अज्ञानी मुनि जिन कर्मों को करोड़ों भवों की तपस्या द्वारा क्षय करते हैं, ज्ञानी मुनि उसकी अपेक्षा भी बहुत अधिक कर्मों को संवरसहित एवं तीन गुप्तियों से समन्वित होते हुए एकाग्रमना होकर नाश कर देते हैं, क्योंकि ज्ञानरूपी सारथी से रहित तपरूपी रथ आत्मा को मोक्षस्थान तक ले जाने में सक्षम नहीं होता है, ऐसा जानकर आप सभी को ब्रह्मचर्य के बल से सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की आराधना करके अपगतवेदी बनकर क्षपकश्रेणी में चढ़कर निज शुद्धात्म पद को प्राप्त करना चाहिए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार समाप्त हुआ।