ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

05.शुद्धात्मा की परिणति रूप धर्म प्रश्नोत्तरी

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
शुद्धात्मा की परिणति रूप धर्म

ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg
ROSE-BORDER-11668791 l-72.jpg

प्रश्न १०१—अनन्तचतुष्टय कौन—कौन से हैं ?
उत्तर—अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख और अनन्तवीर्य ये अनन्त चतुष्टय हैं।

प्रश्न १०२—सिद्ध भगवान का स्वरूप कैसा है ?
उत्तरजहां न जन्म है, न मरण है, न जरा है, न कर्मों तथा शरीर का सम्बन्ध है, न वाणी है और न रोग है तथा जहाँ निर्मल ज्ञान का धारण करने वाला और प्रभु आत्मा सदा प्रकाशमान है ऐसे वे सिद्ध भगवान अविनाशी पद में स्थित हैं।

प्रश्न १०३—आकाश द्रव्य मूर्तिक है अथवा अमूर्तिक ?
उत्तर—आकाश द्रव्य अर्मूितक है।

प्रश्न १०४—समस्त कर्मों का राजा कौन है ?
उत्तर—मोहनीय कर्म।

प्रश्न १०५—आचार्यों ने संसार, मोह तथा स्त्री, क्रोध, मान, माया आदि को किसकी उपमा दी है ?

उत्तर—आचार्यों ने संसार को वन, मोह को ठग और स्त्री, क्रोध, मान, मायादि को प्राणी को ठगने की सामग्री की उपमा दी है।

प्रश्न १०६—दुर्लभ मनुष्य जन्म को प्राप्त कर क्या करना श्रेयस्कर है ?
उत्तर—जिस प्रकार चौराहे पर चिन्तामणि रत्न की प्राप्ति दुर्लभ है उसी प्रकार मनुष्य जन्म तथा जिनधर्म की शरण आदि मिलना दुर्लभ है इसलिए ऐसी अवस्था प्राप्त कर स्त्री, धन, पुत्रादि पदार्थों से मोह छोड़कर कुछ ऐसा काम करना चाहिए जिससे इस पंच परावर्तन रूप संसार में परिभ्रमण न करना पड़े।

प्रश्न १०७—श्रुत के कितने भेद हैं ?
उत्तर—श्रुत के दो भेद हैं—१. अंगश्रुत, २. बाह्यश्रुत।

प्रश्न १०८—अंगश्रुत के कितने भेद हैं ?
उत्तर—अंगश्रुत के १२ भेद हैं।

प्रश्न १०९—बाह्यश्रुत के कितने भेद हैं ?
उत्तर—बाह्यश्रुत के अनन्त भेद हैं।

प्रश्न ११०—दोनों श्रुतों में ज्ञान दर्शनशाली क्या है ?
उत्तर—दोनों श्रुतों में ज्ञानदर्शनशाली आत्मा ही ग्राह्य है किन्तु उससे जुदे समस्त पदार्थ हेय हैं।

प्रश्न १११—संसार में सारभूत पदार्थ क्या है, उससे हमें क्या प्राप्त होता है ?
उत्तर—संसार में रत्नत्रय स्वरूप तीनों रत्न ही सारभूत पदार्थ हैं और इन्हीं में प्रयत्न करने से उत्तम सुख की प्राप्ति हो सकती है।


प्रश्न ११२—ज्ञानी जीव और अज्ञानी जीव द्वारा किए गए तप में क्या अन्तर है ?
उत्तर—अज्ञानी जीव कठोर तप आदि के द्वारा जितने कर्मों को करोड़ वर्ष में क्षय करता है उससे अधिक कर्मों को स्थिरमना होकर संवर का धारी ज्ञानी जीव क्षण मात्र में क्षय कर देता है।

प्रश्न ११३—जीव को सुख—दुख कौन प्रदान करता है ?
उत्तर—जीव को दुख और सुख उसके अपने कर्म प्रदान करते हैं, प्राणी जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है।

प्रश्न ११४—सच्चा सुख कौन सी गति में मिलता है ?
उत्तर—सच्चा सुख मोक्ष नामक पंचम गति में मिलता है, शेष चारों नरक, तिर्यंच, देव और मनुष्य गति में दुख ही दुख हैं।

प्रश्न ११५—किस प्रकार के मनुष्य को संसार का भय नहीं रहता है ?
उत्तरशरीर और आत्मा को भिन्न समझते हुए चैतन्यमयी आत्मा के चिन्तनस्वरूप मजबूत श्रद्धान को करने वाले, समस्त आरम्भ का त्यागकर समता धारण करने वाले मनुष्य को किसी प्रकार भी संसार से भय नहीं रहता है।

प्रश्न ११६—तत्त्व का ज्ञाता कौन सा पुरुष है ?
उत्तर—जिस मनुष्य के चित्त में ऐसा विचार उत्पन्न हो गया है कि निरन्तर भोगे हुए भोगों से पैदा हुआ सुख अशुभ है और केवल आत्मा से उत्पन्न हुआ सुख अपूर्व तथा शुभ है, वही पुरुष भले प्रकार से तत्त्व का ज्ञाता है।

प्रश्न ११७—कौन से योगीश्वर भव्य जनों द्वारा पूज्य हैं ?
उत्तर—जिस प्रकार भ्रमर सम्पूर्ण पुष्पों को छोड़कर कमल के रस का आस्वादन करता है उसी प्रकार जो मुनि समस्त विकल्पों को छोड़कर शुद्धात्मा का आस्वादन करते हैं वही योगीश्वर पूजने योग्य हैं।

प्रश्न ११८—संसाररूपी महारोग को दूर करने की औषधि क्या है ?
उत्तर—संसाररूपी महारोग को दूर करने की औषधि धर्मरूपी रसायन है जो मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद तथा क्रोधादि कषाय के त्याग से मिलती है।

प्रश्न ११९—संसार में दुर्लभ क्या है ?
उत्तर—जिस प्रकार अथाह समुद्र में रत्न का मिलना कठिन है, अंधे को निधि मिलना दुर्लभ है उसी प्रकार इस संसार में मनुष्य जन्म का पाना कठिन है। यदि दैवयोग से मनुष्य जन्म भी मिल जावे तो उत्तम कुल का मिलना दुर्लभ है और उत्तम कुल की भी प्राप्ति हो जावे तो फिर धर्म में श्रद्धा होना अत्यन्त दु:साध्य है।

प्रश्न १२०—मनुष्य जन्म की सफलता किसमें है ?
उत्तर—कुगुरु कुदेवादि की सेवा के त्याग और जिनधर्म की आराधना करने से ही मनुष्य जन्म की सफलता है।

प्रश्न १२१—संसार में नाशवान वस्तु क्या है और अविनाशी वस्तु क्या है ?
उत्तर—संसार में धन, शरीर, जीवन, स्त्री, मित्र, पुत्रादि आदि समस्त वस्तु विनाशीक हैं, मात्र धर्म ही अविनाशीक तथा सुख का देने वाला है।

प्रश्न १२२—कालबली को रोकने में कौन सक्षम है ?
उत्तर—कालबली को रोकने वाला मात्र एक जिनेन्द्र भगवान का धर्म ही है क्योंकि धर्मात्माओं का काल कुछ नहीं कर सकता है।

प्रश्न १२३—मृत्यु को किसके द्वारा जीता जा सकता है ?
उत्तर—इस संसार में समस्त रोगादि की शान्ति के उपाय मौजूद हैं परन्तु मृत्यु की शान्ति का उपाय धर्म के सिवाय दूसरा नहीं है इसलिए मृत्यु को जीतने के लिए धर्म की आराधना करनी चाहिए।

प्रश्न १२४—धर्म की महिमा से कौन—कौन सी विभूतियाँ प्राप्त होती हैं ?
उत्तर—धर्म के बल से समस्त लोक में कीर्ति फैल जाती है, साथ ही आगामी भव में देवपद, तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र, धरणेन्द्र, नारायण, प्रतिनारायण आदि पदवी के धारक हो जाते हैं।

प्रश्न १२५—चक्रवर्ती के पास क्या—क्या वैभव होता है ?
उत्तर—चक्रवर्ती छ: खण्ड का स्वामी होता है, उसके पास ९ निधियाँ, चौदह रत्न, चौरासी लाख हाथी, चौरासी लाभ रथ, अठारह करोड़ घोड़े तथा ९६ हजार रानियाँ होती हैं।

प्रश्न १२६—सच्चे धर्म पर श्रद्धान करने से हमें और क्या—क्या प्राप्त होता है ?
उत्तर—सच्चा धर्म सर्व संपदा व सुख का देने वाला और समस्त आपदा व दुखों को दूर करने वाला है। धर्म के प्रसाद से जीव को कठिन से कठिन वस्तु की प्राप्ति क्षणमात्र में हो जाती है।

प्रश्न १२७—पुण्य के प्रताप से क्या—क्या प्राप्त होता है ?
उत्तर—पुण्य के उदय से अंधा सुलोचन, रोगी रूपवान, निर्बल िंसह के समान पराक्रमी, बदसूरत कामदेव के समान सुन्दर कहा जाता है, आलसी को भी लक्ष्मी अपने आप आकर वर लेती है अर्थात् पुण्य के उदय से उत्तम से उत्तम वस्तु जो संसार में दुर्लभ कही जाती है सब सुलभ हो जाती है।

प्रश्न १२८—पाप के उदय से क्या—क्या दु:ख भोगने पड़ते हैं ?
उत्तर—पाप के उदय से उत्तम पुरुषों पर नीच पुरुष भी अपना प्रभाव डालते हैं, पाप के उदय से उन्हें नाना प्रकार के दुख सहन करने पड़ते हैं।

प्रश्न १२९—धर्मात्मा पुरुष को धर्म के प्रभाव से क्या विशेष प्रतीति होती है ?
उत्तर—जो मनुष्य धर्मात्मा हैं उनके धर्म के प्रभाव से भयंकर सर्प भी मनोहर हार बन जाते हैं, पैनी तलवार भी उत्तम फूलों की माला बन जाती है, प्राणघातक विष भी उत्तम रसायन बन जाता है, वैरी भी प्रीति करने लग जाता है, प्रसन्नचित्त होकर देव धर्मात्मा पुरुष के आधीन हो जाते हैं अर्थात् जो मनुष्य धर्मात्मा है उनके धर्म के प्रभाव से आकाश से भी उत्तम रत्नों की वर्षा होती है।

प्रश्न १३०—धर्मात्मा जनों को कौन—कौन नमस्कार करते हैं ?
उत्तर—धर्मात्मा जनों को इन्द्र भी मस्तक पर धारण करते हैं, बड़े—बड़े देव उनकी स्तुति करते हैं, उनके गुणों को किन्नर जाति की देवियां गाती हैं।

प्रश्न १३१—आचार्यों ने धर्म को किसकी उपमा दी है ?
उत्तर आचार्यों ने धर्म को कल्पवृक्ष, कामधेनु और चिंतामणि रत्न की उपमा दी है।