ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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05. उत्तम शौच धर्म

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उत्तम शौच धर्म

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[सम्पादन] श्री रइधू कवि ने अपभृंश भाषा में शौच धर्म के विषय में कहा है

सउच जि धम्मंगउ तं जि अभंगउ भिण्णंगउ उवओगमउ।

जर—मरण—वणासणु तिजगपयासणु झाइज्जइ अह—णिसि जिधुउ।।
धम्म सउच्चु होइ—मण सुद्धिएँ, धम्म सउच्चु वयण—धण—गिद्धिएँ।
धम्म सउच्चु कसाय अहावें, धम्म सउच्चु ण लिप्पइ पावें।।
धम्म सउच्चु लोहु वज्जंतउ, धम्म सउच्चु सुतव—पहि जंतउ।
धम्म सउच्चु बंभ—वय धारणि, धम्म सउच्चु मयट्ठ णिवारणि।।
धम्म सउच्चु जिणायम—भणणे, धम्म सउच्चु सगुण—अणुमणणे।
धम्म सउच्चु सल्ल—कय—चाए, धम्म सउच्चु जि णिम्मलभाए।।
अहवा जिणवर—पुज्ज विहाणें, णिम्मल—फासुय—जल—कय—ण्हाणे।
तं पि सउच्चु गिहत्थहं भासिउ, ण वि मुणिवरहं कहिउ लोयासिउ।।
घत्ता— भव मुणिवि अणिच्चउ धम्म सउच्चउ पालिज्जइ एयग्गमणि।

सुह—मग्ग—सहायउ सव—पय—दायउ अण्णु म चितह किं पि खिंण।।

अर्थ — शौच धर्म का अंग है, वह अभंग है, शरीर से भिन्न है और उपयोगमयी है। जरा, बुढ़ापा और मरण का विनाश करने वाला है, तीनों जगत् को प्रकाशित करने वाला है और ध्रुव है, उसका दिन—रात सतत ध्यान करना चाहिए।

यह शौच धर्म मन की शुद्धि से होता है, शौच धर्म वचनरूपी धन की गृद्धि पकड़ से होता है, शौच धर्म कषायों के अभाव से होता है और यह शौच धर्म जीवों को पापों से लिप्त नहीं करता है।

शौच धर्म लोभ का वर्जन करता है, शौच धर्म उत्तम तप के मार्ग में लगाता है, उत्तम शौच धर्म ब्रह्मचर्य के धारण करने से होता है और यह शौच धर्म आठ प्रकार के मदों के निवारण से होता है।

शौच धर्म जिनागम का कथन करने से होता है, शौच धर्म आत्मा के गुणों को सतत मनन करने से होता है, शौच धर्म शल्यों के त्याग करने से होता है और यह शौच धर्म निर्मल भावों को करने से होता है।

अथवा यह शौच धर्म जिनवर के पूजा—विधान करने से होता है और निर्मल प्रासुक जल से स्नान करने से होता है। किन्तु यह (पूजन—स्नान आदि) शौच धर्म गृहस्थों के लिए कहा गया है, मुनिवरों के लिये नहीं है क्योंकि यह लोकाश्रित है।

संसार को अनित्य समझकर एकाग्र मन से इस शौच धर्म का पालन करना चाहिए। यह सुख के मार्ग का सहायक है और शिवपद का दायक है। इसके सिवाय अन्य किसी का क्षण मात्र के लिए भी चितवन मत करो।

[सम्पादन] संस्कृत की पंक्तियों में देखें शौच धर्म की व्याख्या

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शुचेर्भावो भवेत् शौचमन्तर्लोभो निवार्यताम्।

या निर्लोभवती देवी त्वया नित्यमुपास्यताम्।।१।।
कामधेनुं ऋषिं हत्वा कृतवीरोऽहरत् तत:।
जघानैकविंशतिश: क्षत्रियान् जमदग्निज:।।२।।
देहीति वाक्यतो नूनं, नाऽप्यणुवल्लघुर्भवेत्।
दाता गगनवल्लोके, विशाल: स्याच्च र्कीितमान्।।३।।
जलाद्यैर्बाह्यशुद्धिं च, कुर्वंति श्रावका: सदा।
स्वात्मशुद्धिं च कुर्वंति साधवो ब्रह्मचारिण:।।४।।
ज्ञानामृतैरहं शश्वदात्मकर्ममलं नुदन्।

स्वयं शौचगुणै: लप्स्ये स्वात्मसौख्यामृतं शुचि।।५।।

‘प्रकर्षप्राप्तलोभान्निवृत्ति: शौचम्’१। प्रकर्षता को प्राप्त ऐसे लोभ का अभाव करना शौच धर्म है।

शुचि—पवित्रता का भाव शौच है अर्थात् अंतरंग के लोभ को दूर कीजिये और जो निर्लोभवती देवी है उसकी नित्य ही उपासना कीजिये। राजा कृतवीर ने जमदग्नि ऋषि को मारकर उसकी कामधेनु का अपहरण कर लिया तब ऋषि पुत्र परशुराम ने भी व्रुद्ध होकर इक्कीस बार राजवंश को समूल नष्ट कर दिया। ‘देहि’ अर्थात् देओ! इस वाक्य से निश्चित ही यह मनुष्य अणु के समान लघु हो जाता है और देने वाला दाता लोक में आकाश के समान विशाल और र्कीितमान हो जाता है। श्रावक हमेशा जल आदि से बाह्य शुद्धि करते हैं और साधुगण तथा ब्रह्मचारी जन आत्म शुद्धि करते हैं। मैं ज्ञानरूपी अमृत से हमेशा आत्मा के कर्म मल को दूर करते हुये स्वयं शौच गुणों से पवित्र अपनी आत्मा के सुखरूपी अमृत को प्राप्त करूँगा।।१ से ५।। प्रत्येक व्यक्ति को हमेशा ऐसी भावना करते रहना चाहिये।

शुद्धि के मुख्य रूप से दो भेद हैं—बाह्य और आभ्यंतर। जल आदि से बाह्य शरीर आदि के मल का नाश होता है और लोभ कषाय आदि के त्याग से अंतरंग की पवित्रता होती है। गंगा आदि तीर्थों में स्नान करने से यदि पापमल धुलते होते तो सारे मगरमच्छ मोक्ष चले जाते। पापमल को धोने के लिए धर्म तीर्थ में ही स्नान करना पड़ेगा। निर्धन धन को प्राप्त न करके दु:खी होते हैं और धनी लोग भी तृप्त न होकर दु:खी रहते हैं। बड़े कष्ट की बात है कि संसार में सभी दु:खी हैं बस एक मुनि ही सुखी हैं।१ आशारूपी गड्ढा इतना विशाल है कि उसमें सारा विश्व अणु के समान प्रतीत होता है फिर बताओ यदि सब को इस विश्व का बँटवारा करके दिया जाये तो किसके पल्ले कितना पड़ेगा ?

धन की आशा का उदाहरण देखिये—

चम्पापुर के राजा अभयवाहन की रानी पुण्डरीका बहुत ही दयालु थी। उसी शहर में लुब्धक नाम का एक सेठ रहता था। इसकी स्त्री का नाम नागवसु था। इनके दो पुत्र थे—गुरुड़दत्त और नागदत्त।

लुब्धक के पास बहुत धन था किन्तु वह महावंजूस था। उसने बहुत कुछ खर्च करके पक्षी मोर, कबूतर, तोता आदि तथा पशुओं में हिरण, हाथी, घोड़ा, सिंह, ऊँट, बकरा आदि अनेक पशु—पक्षियों की सोने की जोड़ियाँ बनवाई थीं। इनके सींग, पूँछ, खुर आदि में अच्छे—अच्छे बहुमूल्य हीरा, मोती, माणिक रत्नों को जड़वाया था। जो इन जोड़ियों को देखता वह बहुत ही खुश होता और लुब्धक सेठ की तारीफ किये बगैर नहीं रहता। स्वयं लुब्धक भी अपनी इस जगमगाती प्रदर्शनी को देखकर पूâला नहीं समाता था। इतना सब कुछ करने के बावजूद भी उसे एक दु:ख खटकता रहता था। वह यह कि उसने बैल की जोड़ी बनवाना शुरू की थी, उसमें एक ही बैल बन पाया था किन्तु सोना न रह जाने के कारण उसकी जोड़ी नहीं बन पाई थी। बस वह उस जोड़ी को पूरी करने की चिंता में ही लगा रहता था।

एक बार वर्षाऋतु में सात दिन तक लगातार पानी की झड़ी लगी रही। नदी—नाले सब में पूर आ गया। तब भी वह कर्मवीर लुब्धक ऐसे समय में भी दूसरे बैल के लिये धन कमाने हेतु लकड़ी इकट्ठा करने के लिये स्वयं नदी पर गया और बहती नदी में से उसने बहुत सी लकड़ियाँ निकाल कर उनकी एक गठरी बनाई और उसे आप ही अपने सिर पर लादकर चलने लगा। देखो तो सही लोभियों की तृष्णा कितनी विशाल होती है।

इधर रानी पुण्डरीका अपने महल में बैठी हुई झरोखे से सारा दृश्य देख रही थी। महाराज अभयवाहन भी राजमहल में ही थे तब रानी ने राजा से कहा—

‘‘हे महाराज! यह देखिये आप के शहर में इतना दरिद्री प्राणी रह रहा है। देखो तो सही, उसने नदी के बहते पूर से कितनी मेहनत से यह लकड़ियाँ इकट्ठी की हैं। यदि यह बेचारा इस पूर के प्रवाह में बह जाता तो अपने प्राणों से और जाता। ओह ! इस बेचारे गरीब पर दया कीजिए और उसे उचित धन देकर इसकी दरिद्रता दूर कीजिए।’’

इतना सुनते ही राजा ने फौरन नौकर भेजकर उसे बुलाया। उसके आने पर राजा ने कहा—

‘‘मालूम पड़ता है तुम्हारे घर की हालत अच्छी नहीं है। इसका मुझे खेद है कि इतने दिनों तक मेरा तुम्हारी ओर ध्यान नहीं गया। खैर ! अभी तुम्हें जितने रुपये—पैसों की जरूरत हो, तुम मेरे खजाने से ले जावो, लो मैं तुम्हें एक पत्र लिखे देता हूँ।’’

इतना कहकर राजा पत्र लिखने लगे कि वह कहता है—

‘‘महाराज ! मुझे और कुछ नहीं चाहिए, बस एक बैल की जरूरत है। कारण मेरे पास एक बैल तो है पर उसकी जोड़ी मिलाना है।’’

राजा ने कहा—

‘‘अच्छी बात है, तो जावो हमारे यहाँ बाड़े में बहुत से बैल हैं उनमें से तुम्हें जो पसन्द आये उसे ले जाओ।’’

वह राजा के नौकरों के साथ गया और सारे बैलों को देखकर बोला—

‘‘मेरा बैल सरीखा इनमें एक भी नहीं है।’’

तब नौकर उसे राजा के पास वापस ले आये। राजा ने पूछा—

‘‘भाई ! तुम्हारा बैल कैसा है, मेरी समझ में नहीं आया, क्या तुम मुझे उसे दिखाओगे ?’’

लुब्धक बड़ी खुशी के साथ महाराज को अपना बैल दिखाना स्वीकार कर उन्हें अपने साथ घर लिवा लाया और उसने बड़े से हाल में रखे हुये सारे पशु—पक्षियों के जोड़े दिखाने लगा पुन: एक अकेले बैल को भी दिखाया। राजा लुब्धक के इतने सारे वैभव को देखकर दंग रह गये और सोचने लगे— ‘‘अरे! जिसे हमने इतना बड़ा दरिद्री समझा था वह इतना बड़ा सेठ?’’

लुब्धक की स्त्री नागवसु अपने यहाँ राजा को पधारे देखकर खुशी से उनके भेंट के लिये सोने के थाल में बहुमूल्य सुन्दर—सुन्दर रत्नों को सजाकर ले आई और पति के हाथ में देती हुई बोली—

‘‘लीजिए, यह राजा को भेंट कीजिए।’’

रत्नों के थाल को देना सुनते ही बेचारे महावंजूस लुब्धक की तो ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई। क्या करता, महाराज साहब उसके साथ ही थे। अत: उसने काँपते हुये वह थाल हाथ में ले लिया और तो और ज्यों ही उसने थाल देने को महाराज के पास हाथ बढ़ाया तो लोभ के मारे उसकी अँगुलियाँ सर्प के फण के सदृश दीखने लगीं। तब राजा ने उसके लोभ की सारी स्थिति जान ली और उससे नफरत करते हुए बोले— ‘‘अहो ! तू कितना कंजूस और कितना मूर्ख है। देख, तेरे हाथों से दान कैसे दिया जा सकता है ? तू तो ‘फणहस्त’ है।’’

ग्लानि से मुख बिगाड़ कर ऐसा कहते हुये महाराज अभयवाहन अपने सामंतों के साथ उसके घर से तत्क्षण ही निकल पड़े और रास्ते में उसके लोभकषाय की चर्चा करते हुये अपने राजमहल वापस आ गये।

इधर लुब्धक की दूसरा बैल बनाने की आकांक्षा अभी पूरी नहीं हुई थी। अत: वह धन कमाने के लिए सिहलद्वीप गया। वहाँ से चार करोड़ का धन कमा कर सारा माल—असबाब जहाज में लाद कर वापस आ रहा था कि तूफान ने जहाज समुद्र में उलट दिया। लुब्धक सेठ सारे धन को लेकर गहरे समुद्र में डूब गया। और धन के अतीव लोभ से मरकर अपने ही घर में साँप हो गया। वह सर्प सदा अपने घर की रक्षा किया करता था, यहाँ तक कि अपने पुत्रों को भी धन लेने नहीं देता था।

तब लुब्धक सेठ के बड़े लड़के ने क्रोध में आकर उसे मार डाला। उस समय वह बहुत ही खोटे रौद्र परिणामों से मरकर चौथे नरक में चला गया। देखो! लोभ के वश हुआ बेचारा सेठ न ठीक से खा सका, न खिला सका और न किसी को पूâटी कौड़ी दे सका, केवल संग्रह—संग्रह में ही लगा रहा और मरकर तिर्यंच तथा नरकों के दु:खों का भाजन बन गया। इसलिये लोभ से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। इस परिग्रह में आसक्त हुये मनुष्य पता नहीं कौन—कौन से पाप कर बैठते हैं।

अयोध्या का राजा सहस्रबाहु अपने पुत्र कृतवीर के साथ किसी तपोवन में पहुँच गया। ऋषि पत्नी रेणुकी ने उन्हें खीर का भोजन कराया तब राजा ने पूछा कि ऐसा भोजन तो हम लोगों के यहाँ भी नहीं है। रेणुकी ने बताया कि मेरे यहाँ गुरु प्रसाद से यह कामधेनु है। राजा के पुत्र कृतवीर ने उसकी याचना की, न देने पर ऋषि जमदग्नि को मारकर उसने उसकी गाय छीन ली। ऋषि पुत्र इंद्र और श्वेतराम जब समिधा लेकर आये उन्हें यह घटना विदित होते ही सीधे अयोध्या पहुँचे और अपने देवोपनीत फरसा के बल से सहस्रबाहु को मार डाला। उन ऋषि पुत्रों ने क्रोधित होकर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दिया। अंत में सुभौम चक्रवर्ती के द्वारा मारे गये हैं१।

और भी अनेकों उदाहरण लोभ की हानि से देखने को मिलते हैं।

इस अयोध्या नगरी में एक सुरेन्द्रदत्त था। वह प्रतिदिन दस दीनारों से, अष्टमी को सोलह दीनारों से, अमावस को चालीस दीनारों से और चौदस को अस्सी दीनारों से भगवान् की पूजा करता था। प्रतिदिन पात्रों को दान देता तथा शील का पालन करता था और उपवासों को भी करता रहता था। किसी समय धन कमाने के लिए जल मार्ग से बारह वर्ष के लिए जाने लगा तब वह अपने मित्र रुद्रदत्त को बहुत सा धन देकर पूर्ववत् जिन पूजा आदि करने को कहकर आप चला गया। रुद्रदत्त धन पाकर लोभ में आकर उस धन को जुआ, परस्त्री सेवन आदि व्यसनों में समाप्त कर चोरी करने लगा। किसी समय कोतवाल द्वारा मारा गया और नरक में चला गया। वहाँ से निकल कर महामच्छ हुआ, फिर नरक गया, शार्दूल हुआ, नरक गया, गरुड़ हुआ, नरक गया, सर्प हुआ, नरक गया, भील हो गया, पुन: असंख्य भवों तक त्रस—स्थावर में भटकता रहा। पुन: कुछ पाप कर्म के मंद होने पर एक दरिद्र ब्राह्मण के पुत्र हुआ, उसका नाम गौतम था। पाप से सर्व कुल के क्षय हो जाने पर भीख माँगता फिरता था, बहुत ही दु:खी था। एक दिन आहार के लिये ग्राम में जाते हुये समुद्रसेन मुनिराज को देख कौतुक से उनके पीछे लग गया। वैश्रवण सेठ के यहाँ मुनि का आहार हुआ, सेठ ने उस बालक को भी भरपेट भोजन करा दिया। पुन: वह गौतम मुनि के आश्रम में पहुँचा और बोला आप मुझे अपने जैसा बना लीजिये। मुनिराज ने उसके वचन सुनकर भव्य समझकर कुछ दिन अपने पास रखा तदनन्तर उसे संयम ग्रहण करा दिया। उसने गुरुभक्ति, संयम और तपश्चरण के बल से अनेकों ऋद्धियाँ प्राप्त कर लीं। आयु के अंत में उपरिम ग्रैवेयक में अहमिन्द्र हो गये१।

देखो! धर्म की संपत्ति के भक्षण से उसने कितने दु:ख उठाये तथा एक बार की गुरु संगति ने उसे अहमिंद्र बना दिया। इस उदाहरण को देखकर व्यसन और धर्म के धन से हमेशा दूर रहना चाहिये।

जो मुनि के पसीने और धूलि के मैल से लिप्त शरीर के होने पर भी ग्लानि नहीं करते हैं वे ही अपने कर्म मैल को धो डालते हैं।

शुचि भूमिगतं तोयं शुचिर्नारी पतिव्रता।
शुचिर्धर्मपरो राजा ब्रह्मचारी सदा शुचि:।।

भूमि से निकला हुआ जल शुद्ध है, पतिव्रता स्त्री पवित्र है, धर्म में तत्पर राजा भी पवित्र है और ब्रह्मचारी गण सदा ही पवित्र रहते हैं। यही कारण है कि दिगम्बर मुनि स्नान नहीं करते हैं, यह उनका एक मूलगुण कहा गया है।

श्रावक स्नान आदि से व्यवहार शुद्धि करते हैं और धर्म के द्वारा आत्मा की भी शुद्धि करते हैं। तृष्णारूप अग्नि को संतोषरूपी जल से ही बुझाया जा सकता है। ‘जो ग्रहण करने की इच्छा करने वाले हैं वे नीचे गिरते हैं और जो नि:स्पृह रहते हैं वे ऊँचे उठते हैं। देखो !’ तराजू के दो पलड़ों में से एक में कुछ भार होता है वह नीचे जाता है और हल्का पलड़ा ऊपर उठ जाता है। इन सब उदाहरणों को समझकर अपनी आत्मा को शौच धर्म के द्वारा पवित्र—शुद्ध बनाना चाहिये।

जाप्य—ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्माङ्गाय नम:।