ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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05. भयंकर चक्रवात

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भयंकर चक्रवात

(काव्य सात से सम्बन्धित कथा)
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धूलिया एक ऐसा कु-तापसी था जिसने कि अपने मिथ्या पाखण्ड तथा ढोंग का जाल बिछाकर भोली जनता को उसमें पँâसाने को उपक्रम रच रखा था वैताली विद्या उसे सिद्ध हो गई थी... यह एक ऐसी विद्या है, जिसे कि चरित्र भ्रष्ट मनुष्य भी बिना आत्मज्ञान के प्राप्त कर लेते हैं और कुछ काल के लिये अपना आतंक जमाकर मनुष्यों की आँखों में धूल झोंक सकते हैं! पर कब तक?... जब तक कि उनका साक्षात्कार किसी सम्यग्दृष्टि गुरु से नहीं हो जाता। पाटलिपुत्र में ‘धूलिया’ और उसके शिष्यों ने कुछ ऐसा आंतक जमाया कि वहाँ कि प्रजा तो ठीक, राजा धर्मपाल भी उसकी चरण-रज लेने आने लगे। लौकिक चमत्कारों ने मानों उनके विवेक की आँखों में पट्टी बांध दी थी। जिन शासन के कट्टर भक्त ही बहुरूपिया मायाचारियों की नस पकड़ना जानते हैं। इनके सामने आते ही सत्य-सूर्य पर छाई हुई काली घटाएँ तत्काल छिन्न-भिन्न हो जाती हैं।

एक किशोर पाखण्डी धूलिया के यह सब प्रपंच पूर्ण कृत्य देखता और उनके भण्डाफोड़ करने के अवसर की ताक में रहता।किशोर का नाम था-‘‘रतिशेखर!’’वह कोई तपस्वी नहीं था; पर आत्मज्ञान अवश्य ही उसे कुछ अंशों में प्राप्त था!साथ ही मंत्र-तंत्र आदि में भी उसकी पहुँच थी। एक दिन रतिशेखर विद्या मन्दिर में बैठा हुआ अध्ययन में लीन था। धूर्त धूलिया का एक प्रमुख शिष्य उसके समीप जानबूझ कर इस उद्देश्य से आकर बैठा कि रतिशेखर उसे विनयावनत होकर नमस्कार करें; परन्तु क्या कभी सम्यक्त्वी भी मायाचारी मिथ्यात्वी के चरणों में झुक सकता है?... नमस्कार की तो कौन कहे उसने उसे देखा तक नहीं कि पास में कौन बैठा है? बैठे-बैठे चेले राम जब उकता गये तो चलते बने-अपना सा मुँह लिए; और आकर अपने गुरु धूलिया को एक-एक की दो दो भिड़ा कर भड़काया! बस फिर क्या था? बुद्धिशून्य गुरु जी का पारा १०३ डिग्री पर चढ़ गया। आँखे चढ़ी हुर्इं देखीं तो बैताली विद्या की अनुगामिनी देवी हाथ बाँधे आकर आगे खड़ी हो गई।

‘‘क्या कार्य है, तापस!...देवी बोली। ‘‘रतिशेखर के प्राण हरण’’-अट्टहास करते हुए धूलिया ने कहा। पर वह तो दृढ़ निश्चयी सम्यक्त्वी है, उसका सर्वनाश असंभव है, हाँ उसके तेज-उसके बढ़ते हुए प्रभाव पर धूल अवश्य बरसाई जा सकती है; और इस प्रकार आपके प्रभाव को अक्षुण्ण रखा जा सकता है।’’ ‘‘ तो जाओ,तत्काल यही करो देवी!’’ आँधी उठी-इतने जोरों की कि मकान के मकान उड़ने लगे।धूलि वर्षा से आसमान भी नहीं दिखाई देता था। रतिशेखर की विशाल सुदृढ़ अट्टलिका तो मानो धूल के समुद्र में डूबी जा रही थी!... रतिशेखर उस समय घर पर नहीं था; उसने जो यह हाल सुना तो महाप्रभावक श्री भक्तामर के सातवें श्लोक का स्मरण ऋद्धि-मंत्र जाप्य सहित कई बार किया। ध्यानस्थ होते ही वह किशोर क्या देखता है कि जिन शासन की अधिष्ठात्री देवी ‘जृम्भा’ बैताली विद्या की अनुचरी देवी के वक्षस्थल पर सवार है और उत्तप्त धूल का भयंकर चक्रवात धूर्त धूलिया की कुटी पर मंडरा रहा है।...इतनी धूल कि श्वांस लेना भी कठिन। निदान धूर्त धूलिया और उसके चेले चपाटे गिरते-पड़ते भागते रतिशेखर की शरण में आये और क्षमा याचना करते हुए सनातन जैन धर्म पर अपनी श्रद्धा व्यक्त की।और जैन धर्म की जय जयकार की।