ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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05. रामचंद्र का वनवास

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रामचंद्र का वनवास

Ram ka vanvas.jpg
(२४)

हे वत्स ! तुम्हारे संग मैंने, देखो कैसा अन्याय किया।
तुम सा अग्रज सुत पाकर भी, छोटे सुत को यह राज्य दिया।।
झुक करके पितु के चरणों में, श्री राम निवेदन करते हैं।

है पुत्र वही जो कुलरक्षा के, लिए प्राण भी तजते हैं।।
(२५)

इसलिए शोक को तज करके, हे तात ! मुझे आज्ञा दीजे।
अब भ्रात भरत को समझाकर, उसको ही राज्य् पाट दीजे ।।
जाऊँगा ऐसी जगह जहां, कोई न मुझे पहचान सके।

इस तरह पिता को समझाकर, श्रीराम भ्रात के पास चले।।
(२६)

रो उठे भरत कहकर भाई!, कैसे मैं तुम बिन राज्य करूँ।
तुम जंगल—जंगल घूमोगे, और मैं सुखपूर्वक यहाँ रहूँ।।
यह न्याय नही अन्याय भ्रात!, बोलो मै कैसे सहन करूँ।

जिस पर अधिकार आपका है, उसको मैं कैसे ग्रहण करूँ।।
(२७)

श्रीराम भरत को गले लगा, बोले भ्राता मत शोक करो।
पितुवचन और माँ की खातिर, जो हित में है अब वही करो।।
इस तरह मात—पितु—भ्रात सभी को, यथायोग्य वे समझाकर।

भ्राता लक्ष्मण भी साथ चले, अपनी भार्याओं को तजकर।।
(२८)

सीता को बहुत मनाया पर, अपने निश्चय पर अडिग रही।
सुख—दुख में साथ निभाँऊगी, है मेरा स्त्रीधर्म यही।।
उस समय बहुत ही करुण दृश्य, सारे पुरवासी रोये थे।

श्रीराम—लखन के चरणों को, अपने अंसुओं से धोये थे।।
(२९)

चल पड़े सभी पीछे—पीछे, हे नाथ! जहाँ तुम जाओगे।
हे प्रभू! हमारी सेवा को, ना ऐसे तुम ठुकराओगे।।
मातायें भी रोती आयीं, बोली हे पुत्र! चलो वापस।

सबको समझाकर लौटाया, श्रीराम—लखन ने कर साहस।।


(३०)

वापस घर आकर मातायें, दशरथ के पास पहुँचती हैं।
हे नाथ! बुलालो तुम वापस, उन बिन यह सूनी धरती है।।
तब दशरथ उनसे कहते हैं, यह जग मेरे आधीन नहीं।

लौटा लो तुम सब मिलकर ही, अब यह अधिकार तुम्हारा ही।।
(३१)

दुख है ममता और माया में, यह सब कुछ छोड़ चुका हूँ मैं ।
अब मुनिव्रत धारण कर लूंगा, दुख से भयभीत हुआ हूं मैं ।।
इसलिए देवियों दुख छोड़ो, यह सब कर्मो का बंधन है।

ना तृप्ति कभी भी हो सकती, यह ही संसारी जीवन है।।
(३२)

था अद्र्धनिशा का सन्नाटा, दीपक लेकर निज हाथों में।
वे दोनों भाई निकल पड़े, सुनसान अंधेरी राहों में।।
सबको निद्रा में सुप्त देख, सीता को लेकर निकल गये।

प्रात: उठकर सबने देखा, प्रभु धोखा देकर चले गये।।
(३३)

वे दौड़ पड़े पीछे—पीछे, इस तरह अनाथ बनाओ ना।
जैसे भी कहोगे रह लेंगे, इस तरह छोड़कर जाओ ना।।
इन सबके करुण विलापों का, पर उन पर नहीं प्रभाव पड़ा।

बस इतना साथ हमारा था, यह नदी हमारी है सीमा।।
(३४)

अब भरत तुम्हारे राजा हैं, जाकर उनका सम्मान करो।
दशरथ राजा के वचनों का, इस तरह नहीं अपमान करो।।
इतना कहकर श्रीरामचन्द्र, वह नदी पार कर जाते हैं।

तब सभी प्रजागण दुखी हृदय से, घर वापस आ जाते हैं।।