ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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050. कुंथलगिरि क्षेत्र के दर्शन

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कुंथलगिरि दर्शन-

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यहाँ से विहार कर हम लोग कुंथलगिरि पहुँच गये। वहाँ के दर्शन करके एक बार पुनः आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की सल्लेखना समय के अनेक संस्मरण स्मृतिपटल पर आ गये। गुरुदेव के चरणों की वंदना की। वास्तव में निषद्या की वंदना, साधु जीवन में बहुत ही महत्व रखती है।

सिद्ध क्षेत्र-वंसत्थलवरणयरे पच्छिमभायम्मि कुंथुगिरिसिहरे।

कुलदेसभूसणमुणी णिव्वाणगया णमो तेसिं।।

वंशस्थलनगर में पश्चिम दिशा की ओर कुंथलगिरि शिखर से श्री कुलभूषण और देशभूषण मुनि निर्वाण को प्राप्त हुए हैं, उन्हें मेरा नमस्कार होवे। आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की इन युगल मुनियों के प्रति अगाध भक्ति थी अतः उन्हीं की प्रेरणा से पर्वत के मंदिर में इन देशभूषण और कुलभूषण महामुनियों की ४ फुट की खड्गासन प्रतिमायें विराजमान की गई थीं। मैंने स्वयं देखा था कि आचार्यश्री प्रतिदिन इन मूर्तियों का पंचामृत अभिषेक बड़े प्रेम से देखते थे।

इस क्षेत्र पर ध्यानस्थ खड़े हुए इन दोनों मुनियों के उपसर्ग को श्री रामचन्द्र जी ने वनवास के समय दूर किया था। उसी के बाद इन दोनों मुनियों को केवलज्ञान प्रगट हो गया था।

यहाँ पर्वत पर सात मंदिर है-

१. कुलभूषण-देशभूषण मंदिर

२. शांतिनाथ मंदिर

३. बाहुबलि मंदिर

४. आदिनाथ मंदिर

५. अजितनाथ मंदिर

६. चैत्यमंदिर

७. नंदीश्वर जिनालय।

इसी पर्वत पर आचार्यश्री शांतिसागर जी के निषद्या स्थान में छतरी में चरण विराजमान हैं। यहाँ तलहटी में चार मंदिर हैं- १. श्री नेमिनाथ मंदिर

२. महावीर मंदिर

३. रत्नत्रय मंदिर

४. समवसरण मंदिर।

यहाँ क्षेत्र पर देशभूषण-कुलभूषण ब्रह्मचर्याश्रम नाम से एक गुरुकुल चल रहा है। क्षेत्र पर दो धर्मशालाएँ हैं।

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क्षुल्लिका अजितमती अम्मा-

सन् १९५५ में यहाँ पर आचार्यश्री की सल्लेखना के समय मैं (क्षुल्लिका वीरमती) थी। उस समय म्हसवड़ चातुर्मास में मैं क्षुल्लिका विशालमती अम्मा के साथ यहाँ आई थीं और करीब एक महीने रही थी। उस समय एक छोटे से कमरे में क्षुल्लिका अजितमती अम्मा आदि हम सभी पास-पास ही सोते थे। उन क्षुल्लिका जी से मैं बहुत ही प्रभावित भी। वे भी मेरी छोटी उम्र देखकर, मेरे से बहुत वात्सल्य रखती थीं और कभी-कभी मुझसे गोम्मटसार जीवकांड की चर्चायें करती थीं। कभी-कभी मुझे आचार्यश्री शांतिसागर जी के अच्छे-अच्छे संस्करण सुनाया करती थींं। उनके प्रति मेरा इस समय वात्सल्य भाव उमड़ रहा था अतः मैंने उन्हें यहां बुलाया था, चूँकि वे कार में बैठती थीं अतः श्रावक उन्हें यहां ले आये थे। वे भी यहां आकर मुझसे मिलीं। मुझे अपने से बड़े आर्यिका पद में देखकर विधिवत् ‘वंदामि’ की । हम दोनों ने एकांत में बैठकर अनेक चर्चायें कीं और उनसे अनेक अनुभव की बातें पूछीं। गतवर्ष भी मैंने यहां से (हस्तिनापुर से) उन्हें पत्र लिखाया था कि ‘‘आप आकर एक बार जम्बूद्वीप के दर्शन कर जावें।’’ किंतु अब वे काफी वृद्ध हो चुकी हैं अतः कार से भी लंबी यात्रा उनके लिए कठिन है, ऐसा उन्होंने लिखवाया और बहुत सद्भावनाएँ व्यक्त कीं।

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ब्र. सुमतीबाई-

यहाँ ब्र.सुमतीबाई जी आई थीं। उनके आश्रम की दो बाइयां मेरे साथ आ गई थीं। वे इन्हें वापस ले जाना चाहती थीं और ये बाइयां जाना नहीं चाहती थीं। तब ब्र. जी ने कहा-‘‘माताजी! आचार्य विमलसागर जी गिरनार यात्रा जा रहे हैं। मार्ग में उन्हें बाइयों की आवश्यकता है अतः आप इन दोनों को वहां भेज दें। मैंने भी उनकी इच्छानुसार इन मालती और सुमन को आचार्यश्री के संघ में भेज दिया।

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धाराशिव की गुफाएँ-

इधर इन गुफाओं को ‘लयण’ कहते हैं। यह स्थान उस्मानाबाद से पाँच किलोमीटर दूर है। मैं यहां गुफाएँ देखने के लिए आ गई। इन गुफा मंदिरोें का इतिहास बहुत प्राचीन है। भगवान पार्श्वनाथ के कुछ वर्षों पश्चात् करकंड नरेश ने यहां तीन लयणों अथवा गुहामंदिरों का निर्माण कराया था और उनमेें भगवान् पार्श्वनाथ की प्रतिमाएँ विराजमान करायी थीं। इन लयणों का इतिहास वृहत्कथा कोष में मिलता है। एक गुफा में विशाल मंडप है जो कि २० स्तंभों पर बना हुआ है। इसमें जगह-जगह से पानी टपकता है। आगे गर्भगृह में भगवान पार्श्वनाथ की ६ फुट ऊँची प्रतिमा विराजमान है। आगे भी गुफाएँ देखीं। यह क्षेत्र वर्तमान में पुरातत्व विभाग के अधिकार में है। क्षेत्र की दुर्दशा देखकर दुःख होता है कि हमारे जैन लोग अपने पुरातत्व की रक्षा नहीं कर पाते हैं।

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तेर-अतिशय क्षेत्र-

इधर तेर नाम से एक अतिशय है, वहाँ हम लोग पहुँचे। एक-दो दिन पूर्व वर्षा हो जाने से इधर की काली-काली चिकनी मिट्टी सूखकर कांच के समान कठोर हो गई थी, जिस पर चलने से पैरों के तलुओं में बहुत वेदना हो गई। ब्र. गुलाबचंद चंडक की गाड़ी भी तेर की धर्मशाला तक नहीं आ सकी अतः वे स्वयं, उनकी पत्नी आदि महिलाएँ, सिर पर सामान लेकर कुछ दूर से पैदल ही चल कर आये और चौका बनाकर आहार दिया। यहां एक किंवदन्ती प्रचलित है कि इस मंदिर में ऐसी र्इंटों का उपयोग किया गया था कि जो जल में तैरती हैं। मंदिर की एक तरफ की दीवार तोड़कर खिड़कियां बनायी गई थीं, तब उसमें से जो ईटें निकली थीं, वे वहां पड़ी थीं। यह दृश्य दिखाया था। इसी अतिशय के कारण इस क्षेत्र को ‘तेर’ यह नाम प्राप्त हुआ है। यहाँ मंदिर का दर्शन किया। प्राचीन प्रतिमाओं के दर्शन से मन में बड़ी शांति मिली।

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पैठण-अतिशय क्षेत्र-

ब्र. गुलाबचंद जी की प्रेरणा से मैंने पैठण क्षेत्र के दर्शन का भी निश्चय किया। मेरे संघ की आर्यिका जिनमती जी और आदिमती जी नहीं चाहती थीं, फिर भी मैंने कहा- ‘‘अभी तो १०-२० मील की बात है, फिर जीवन में इस प्रांत में हम जैसे पैदल विहार करके दर्शन करने वालों के लिए यह क्षेत्रदर्शन दुर्लभ ही हैं।’’ मैंने निर्णय बना लिया, तब ये सभी मेरे साथ ही आ गर्इं परन्तु यहाँ आकर मंदिर में प्रवेश कर भगवान मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा के दर्शन कर, इन दोनों आर्यिकाओं को इतना आनंद हुआ, स्तुतिपाठ में इतना मगन हो गर्इं कि घंटों इन्हें कुछ भान ही नहीं रहा। मैंने सोचा- ‘‘चलो, बिना इच्छा के आकर भी यहां दर्शन कर ये इतनी प्रसन्न हुई हैं तो अच्छी बात है।’’ मैं कहा करती हूँ कि- ‘‘यदि कोई मिश्री रुचि से खावे, तो भी मीठी लगती है और बिना रुचि के खाये, तब भी मीठी लगती है। वैसे ही भगवान के दर्शन कोई रुचि से करे, चाहे बिना रुचि से किन्तु उसे मिश्री की मिठास के समान मधुर फल ही मिलता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। फिर यदि पहले अरुचि भी हो और प्रतिमा जी के दर्शन के समय प्रेम-भाव-हर्षभाव उमड़ आवे तब तो पुण्य है ही है।’’

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कचनेर-अतिशय क्षेत्र-

कचनेर नाम से प्रसिद्ध अतिशय क्षेत्र के दर्शन किये। यहाँ का भी इतिहास प्रसिद्ध है। मूर्ति का धड़ से मस्तक अलग हो जाना, पुनः स्वप्न देकर घी-शक्कर में मूर्ति को रखने से मूर्ति का जुड़ जाना, यह एक चमत्कार ही है। आज भी प्रतिमा के गले में खंडित का निशान दिखता है। यहाँ आकर मुझे अपने आर्यिका दीक्षा गुरु आचार्यश्री वीरसागर जी का इतिहास स्मृति-पथ में आ गया। यहाँ पर गुरुदेव ने पाठशाला खोलकर धर्म-अध्ययन कराकर प्रारम्भ से ‘गुरुजी’ नाम पाया था जो कि अन्त तक विद्यार्थियों के ही नहीं, सारे विश्व के गुरु बने रहे हैं।

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औरंगाबाद-

औरंगाबाद शहर में प्रवेश के समय वहाँ के भक्तिमान श्रावक-श्राविकायें स्वागत में आगे आ गये। वहाँ पहुँचकर मैंने मंदिर के दर्शन किये और पांच-दस दिन वहीं रहने का विचार बना लिया। यहाँ पर सारी व्यवस्था सुव्यवस्थित करके ब्र. गुलाबचन्द जी चंडक, उनकी धर्मपत्नी, उनकी बहन आदि संघ के लोग वापस सोलापुर जाने के लिए आज्ञा लेने आये। इन लोगों के नेत्रों में गुरु-वियोग के अश्रु थे। अनेक भक्ति-भावना सहित ये लोग मेरा आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर वापस लौट गये।

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ब्र. गुलाबचन्द जी की भक्ति-

सोलापुर आश्रम में मेरे रहने तक प्रतिदिन ये ब्रह्मचारी जी यहाँ आते थे। प्रायः दिनभर भी यहीं रहते थे। ये मेरे उपदेश में, मेरे स्वाध्याय में, अध्यापन में और धर्म-चर्चाओं में तो रुचि लेते ही थे। उनमें एक विशेष आदत थी कि मैं मंदिर में या बाहर प्रांगण में या बरामदे में कहीं भी बैठूं, तो वे झट से एक पाटा लेकर मेरे पीछे सहारे के लिए लगा देते थे। कभी-कभी मैं हंस देती थी, लेकिन उन्होंने अपना यह काम नहीं छोड़ा था। मैं जब शहर में आचार्यश्री के दर्शनार्थ जाती थीं तब भी ये मेरे साथ कमण्डलु लेकर पैदल चलते थे। इनकी जैसी भक्ति वास्तव में हर किसी में होना मुश्किल है। ये वृद्ध थे, फिर भी थकान नहीं महसूस करते थे। कभी-कभी आचार्यश्री शान्तिसागर जी के कुछ संस्मरण सुना देते थे, वैसे कम बोलते थे। ये सोलापुर से औरंगाबाद तक मेरे साथ पैदल चले थे। एक हाथ में मेरा कमण्डलु लेते थे और दूसरे हाथ में एक छोटी सी ढक्कन बंद बाल्टी लेते थे। मेरे से लगभग आधा फर्लांग पीछे चलते थे। मैंने कभी भी नहीं पूछा कि-‘‘आप पीछे क्यों चलते हैं?’’ मैंने यह भी कभी नहीं पूछा कि- ‘‘आपके हाथ में जो यह बाल्टी है, इसमें क्या है?’’ यद्यपि मेरे मन में विकल्प कई बार आया था कि ये पीछे क्यों चलते हैं? फिर भी ‘इनका ऐसा ही स्वभाव होगा’ ऐसा सोचकर लक्ष्य नहीं दिया था। यहाँ औरंगाबाद में संघस्थ आर्यिका से मुझे मालूम हुआ कि-‘‘ये ब्रह्मचारी जी साथ में दही का पात्र लेकर चलते थे और इसलिए ये कुछ पीछे रहते थे कि यदि माताजी को पता चल जायेगा तो ये मट्ठा नहीं लेंगी......।’’ मैंने विचार किया- ‘‘देखो! इनकी भक्ति और पैदल चलने की शक्ति।’’ इतने वृद्ध होकर भी पैदल चले और हाथ में दही का पात्र लेकर, आकर आहार में रास्ते के प्रसंग में भी मट्ठा पहुँचाया। उन्होेंने सोलापुर में देख लिया था कि- ‘‘माताजी के स्वास्थ्य के लिए दवाई से अधिक मट्ठा लाभकारी है ’’ अतः इन्होंने अपना कर्तव्य पालन करके अपूर्व भक्ति का परिचय दिया था। इन्होंने एक बार बतलाया कि आचार्यश्री को हर एक कुएँ का पानी अनुकूल नहीं आता था, अतः हम लोग कई बार ४-४, ५-५ मील से पानी भरकर पैदल लेकर आते थे और चौके में लेकर जाते थे। उनकी गुरु-भक्ति विशेष थी। हो भी क्यों न, क्योंकि जिन्होंने चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शान्तिसागर जी की भक्ति और सेवा का पुण्य अवसर साठ से अधिक वर्ष की उम्र तक प्राप्त किया हो।

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महिलाओं की भक्ति-

औरंगाबाद में प्रातः से ही महिलाएँ आकर भगवान का अभिषेक पूजन करतीं, पुनः मेरे पास आकर मेरी पूजन करने लगतीं। इस तरह कई समूहों में महिलायें आकर प्रातः १० बजे तक पूजन करती रहती थीं। उस समय तक मेरी पूजन करने की संघ में परम्परा नहीं थी, अतः छपी भी नहीं थी। इससे पूर्व अजमेर में सन् १९५९ में प्रकाशचंद (टिकैतनगर वालों) ने मेरी पूजन बनाई थी, तब मैंने उसे करने भी नहीं दिया था और छपने भी नहीं दिया था। यहाँ ये महिलाएँ किसी भी चालू पूजन में अष्टक के ऊपर की दो लाइनें लेतीं और नीचे की दो लाइनों में मेरा नाम जोड़कर पूजन कर लेतीं। अनन्तर जयमाला न पढ़कर अघ्र्य चढ़ा देती थीं। जैसे कि चौबीसी पूजा में-

मुनिमन सम उज्ज्वल नीर, प्रासुक गंध भरा।

भरि कनक कटोरी नीर दीनी धार करा।।
श्री ज्ञानमती जी अम्ब, आनंद कंद सही।
पद जजत हरत भवफद, पावत मोक्ष मही।।

ऐसे ही किसी भी पूजा में गुरु का नाम जोड़कर पूजा करने की यह पद्धति और ऐसी गुरुभक्ति मैंने और कहीं नहीं देखी है।

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आचार्य महावीरकीर्ति जी के दर्शन-

यहाँ आचार्य महावीरकीर्ति जी महाराज का संघ आने वाला था। लोगों ने आग्रह से मुझे रोक लिया और मुझे भी इन आचार्यश्री के दर्शन की विशेष उत्कंठा थी। आचार्य श्री संघ सहित पधारे। मैंने दर्शन करके अपने नेत्रों को सफल किया। सन् १९५७ के बाद आज सन् १९६६ में आचार्य महाराज के दर्शनों का सौभाग्य मिला था। दो-चार दिन उनके सान्निध्य में रही। यहां महाराज जी के प्रवचन बाहर पांडाल में हुए। मैंने भी प्रवचन सुना और श्रावकों को अपना प्रवचन सुनाया। अच्छी धर्म प्रभावना रही। इसके बाद आचार्यश्री ससंघ कुंथलगिरि की ओर विहार कर गये। मैंने भी वहाँ से कसाबखेड़ा के लिए विहार कर दिया।

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अस्वस्थता-कसाबखेड़ा में-

मैं यहाँ कसाबखेड़ा में बीमार हो गई। यहाँ श्रावकों की भक्ति बहुत अच्छी थी। ८-१० मकान एक साथ पंक्तिबद्ध थे। श्रावकों ने पूछा- ‘‘माताजी! सात घर का आहार लेती हैं या नहीं?’’ ब्र. भंवरीबाई ने कह दिया- ‘‘लेती हैं।’’ यहाँ लोग चन्द्रसागर जी मुनिराज के परमभक्तों में थे। शास्त्र में सात घर का आहार लेना कहा है। हाँ! यदि घर पंक्तिबद्ध नहीं हैं तो ‘अभिघट’ दोष आता है। यहाँ पंक्तिबद्ध होने से मैंने भी आचार्य परम्परा के अनुसार जहाँ पर पड़गाहन हुआ, उसके आजू-बाजू के तीन-तीन घरों से श्रावक-श्राविकाओं द्वारा लाये गये रोटी, भात आदि आहार में ले लिया था। यहाँ मेरा स्वास्थ्य गड़बड़ हो जाने से आहार बिल्कुल जरा सा ले पाती थी। लोग वैयावृत्ति में कुशल थे, वैद्यों को दिखाया लेकिन उनकी दवाइयों से फायदा नहीं हुआ। हैदराबाद सूचना जाते ही जयचन्द जी लुहाड़िया दर्शनार्थ आ गये। उन्होेंने यहाँ ‘एलोरा’, जो कि बिल्कुल पास था, वहाँ पर मध्यलोक चैत्यालय की रचना की बात कही।

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मध्यलोक रचना चर्चा-

जयचन्द जी ने सोलापुर में सुन लिया था कि माताजी के मस्तिष्क में कोई रचना विशेष आई है, वे अतिआग्रह कर रहे थे कि- ‘‘माताजी! मैं कोई एक ‘अहिंसा प्रचार केन्द्र’ खोलना चाहता हूँ। मै अपने जीवन में कोई बड़ा कार्य करना चाहता हूूँ अतः आप यहीं विराजें, मैं बम्बई से बढ़िया मॉडल बनाने वाला कारीगर लेकर आता हूँ। आपके मस्तिष्क में जो मध्यलोक के चैत्यालयों की रचना आई है, उसे यहाँ एलोरा में बनवाना है, यहाँ जगह भी लगभग पचहत्तर बीघे है।’’ इतनी सब कुछ अनुनय-विनय के बाद भी मैंने स्वीकृति नहीं दी और संघ में मुझे जल्दी पहुँचना है, ऐसा कहकर टाल दिया।’’ पुनः जयचन्द जी ने मुनिश्री आर्यनंदीजी की प्रेरणा का एक टेप- कैसेट भेजा। और बतलाया कि- महाराज श्री भी कोई विशेष कार्य करने के इच्छुक हैं। उनका कहना है कि -‘‘पैसा ‘रुपया माँगने की, किसी को भी प्रेरणा देने की, आपको जरूरत नहीं है, मैं सब व्यवस्था करा लूँगा। एलोरा का क्षेत्र रम्य है, शांत है, अनुकूल है और गुफाओं की प्रसिद्धि से विदेशियों के भी पर्यटन का स्थल है......।’’ मैंने मुनिश्री का टेप भी सुना, उनकी प्रेरणा और अभिरुचि समझी किन्तु-‘‘यह रचना आचार्यश्री शिवसागर जी महाराज की आज्ञा से जहाँ कहीं भी बनेगी।’’ ऐसा कहती रही। १०-१५ दिन बाद स्वास्थ्य कुछ चलने-फिरने लायक हुआ, तब मैंने सबके मना करने पर भी साहस करके ‘एलोरा’ की तरफ विहार कर दिया। एक-एक फर्लांग पर बैठकर, विश्राम करके जैसे-तैसे पहुँच गई। सायंकाल में वहाँ पहुंचते ही वमन हो गया। संघस्थ आर्यिकाएँ घबड़ा गर्इं कि कहीं प्रकृति एकदम न बिगड़ जाये। अगले दिन मनोबल बढ़ाकर मैं छोटे से पर्वत पर चढ़ गई और भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा के दर्शन किये, मन में बड़ी शांति मिली। वास्तव में दर्शन-स्तोत्र में पढ़ती ही हूँ कि-

दर्शनं देवदेवस्य दर्शनं पापनाशनं।

दर्शनं स्वर्गसोपानं दर्शनं मोक्षसाधनं।।
पुनश्च- अनंतानंतसंसारसंततिच्छेदकारणम् ।
जिनराजपदाम्भोजस्मरणं शरणं मम।।

इन्हीं श्लोकों को पढ़ते हुए श्रद्धा के साथ बार-बार वन्दना की, पुनः नीचे आ गई। नीचे आते ही बहुत बड़ा अतिसार हो गया। घबराहट हो जाने से कुछ देर विश्राम करना पड़ा। बाद में स्वास्थ्य में कुछ हल्कान मालूम पड़ी। धीरे-धीरे ऐसा लगा कि- ‘‘मैं स्वस्थ हो रही हूँ।’’ मैंने सोचा- ‘‘जिनेन्द्र देव की भक्ति से असाता कर्म साता में संक्रमित हो जाते हैं, ऐसा सिद्धान्त ग्रन्थों में कहा है, सो सच ही है, उस पर विश्वास करना ही सम्यग्दर्शन है।’’ यह प्रकरण मैंने बाहुबली स्तोत्र में भी रखा है-

‘‘त्वामाश्रितस्य जिन! मे कटुकर्मबंधाः। क्रूरत्वमत्र जहतु त्वरमद्भुतं किं।।

स्वामिन्नसातविविधप्रकृतीः सुभक्तिः। संक्रामयत्यापि शुभे कथितं त्वयैव।।११४।।’’

‘‘हे जिनेन्द्रदेव! आपका आश्रय लेने वाले के कटुकर्मबन्ध व्रूरता को छोड़ देवें, उसमें आश्चर्य ही क्या है? हे स्वामिन्! आपकी भक्ति अनेक विध असाता प्रकृतियों को शुभ-साता प्रकृति में संक्रमण करा देती है, ऐसा आपने ही तो कहा है।’’

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एलोरा क्षेत्र परिचय-

यहाँ कुल ३४ गुफाएँ हैं। गुफा नं. १ से १२ तक गुफाएँ बौद्ध धर्म की हैं। १३ से २९ तक की गुफाएँ शैवधर्मावलम्बियों की हैं। शेष ३० से ३४ तक की गुफाएँ जैनधर्म से संबंधित हैं। यह एलोरा अपने शिल्प वैभव और स्थापत्य कला की दृष्टि से सारे संसार में प्रसिद्ध है। कठिन पाषाणों में लावण्य, मनोज्ञता और वीतरागता जैसी कोमल भावनाओं को उभारने में शिल्पी ने कला को उसके उच्चतम शिखर पर पहुँचा दिया है। गुफा नं. ३० से उत्तर की ओर एक मार्ग पहाड़ के ऊपर गया है। उस पर भगवान पार्श्वनाथ का मंदिर है। यहाँ भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति १६ फुट उत्तुुंग श्याम-वर्ण की विराजमान है, यह अर्धपद्मासन है। आजू-बाजू धरणेन्द्र और पद्मावती यक्ष-यक्षिणी बने हुए हैं। मूर्ति के मस्तक पर नौफणा सुशोभित हैं। यहाँ की गुफाओं को देखने से सबसे बड़ा उदाहरण इस युग के लिए यही मिलता है कि- ‘‘धर्मसहिष्णुता।’’ पास-पास ही जैनों के कलात्मक मंदिर है। उन्हीं के पास बौद्धों के हैं और पास-पास में ही शिवमंदिर हैं। यहाँ जैन मंदिर अथवा गुफाओं में भगवान पार्श्वनाथ के उपसर्ग समय की मूर्तियाँ और श्रीबाहुबली की बेलचढ़ी मूर्तियाँ बहुत हैं। ये पाषाणों में ही उत्कीर्ण हैं। श्री बाहुबली मूर्ति की बेलें गंधर्व बालायें अथवा ब्राह्मी-सुन्दरी दूर कर रही, हैं ऐसा चित्रण किया है।

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नांदगांव-

यहाँ कसाबखेड़ा से विहार कर क्रम से मैं नांदगांव आ गई। यह गांव आचार्यकल्प श्रीचन्द्रसागर जी महाराज की जन्मभूमि है। यहाँ श्रावकों की गुरु-भक्ति बहुत ही अच्छी है। इनकी देवपूजा आवश्यक क्रिया भी अनुकरणीय है। प्रातः एक-एक परिवार के स्त्री-पुरुष अथवा अपने-अपने समूह की महिलाएँ पृथक्-पृथ॒क् चौकी पर जिन-प्रतिमा विराजमान कर विधिवत् पंचामृत अभिषेक और शांतिधारा करके पूजन करते हैं।

आचार्यकल्प श्रीचन्द्रसागर जी के उपदेश को मानों यहाँ पूर्णरूप से ही साकार मूर्तरूप ही दिया गया है। ऐसा सोचकर मन में श्रीचन्द्रसागर जी के प्रति अगाध श्रद्धा उमड़ आई। मैंने उन गुरुदेव के दर्शन नहीं किये हैं, फिर भी परोक्ष में उनके चरणों में बारम्बार नमोऽस्तु किया और उनके गुणों का स्मरण करने लगी। इस तरफ मैंने गजपंथा और मांगीतुुंगी क्षेत्रों के दर्शन किये, इन सिद्धक्षेत्रों की वन्दना से महान हर्ष का अनुभव किया।

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गजपंथा क्षेत्र दर्शन-

नासिक होते हुए मैं गजपंथा पहुँची। वहाँ माघ शु. १४ का मेरा उपवास था, रत्नत्रय व्रत था। उपवास के अगले दिन आहार लेकर मैं पहाड़ पर चढ़ने लगी। संघस्थ आर्यिकाएं मेरे साथ थीं, कुछ श्रावक वर्ग भी साथ थे। कुछ सीढ़ी चढ़ने के बाद मेरी साँस जोर-जोर से चलने लगी, मैं आगे नहीं चढ़ सकी, तब वहीं बैठ गई, ऐसा लगा कि शायद अब ऊपर चढ़कर दर्शन होना मुश्किल है। कुछ देर तक साँस का वेग बड़ा, पुनः ठीक हो गया, किन्तु कमजोरी इतनी महसूस हुई कि सारी सीढ़ियाँ चढ़ना कठिन हो गया। मैं णमोकार मंत्र जपती रही। सभी शिष्याएँ पास में बैठकर मंत्र सुनाती रहीं। कुछ देर बाद सभी ने कहा- ‘‘माताजी! अब नीचे चलो, आज वापस चलो, कल आहार के बाद पुनः आकर चढ़ना और वन्दना करना।’’ किन्तु मैं किसी की भी न सुनकर, मनोबल बढ़ाकर, हिम्मत करके चढ़ने लगी। धीरे-धीरे ऊपर पहुँच गई, तब इतनी खुशी हुई कि क्या कहना? मैंने सोचा- ‘‘इस वन्दना का फल मुझे अधिक ही मिलेगा।’’ निर्वाण क्षेत्र की वन्दना करने में सिद्धभक्ति, चारित्रभक्ति, योगिभक्ति, श्रुतभक्ति, निर्वाणभक्ति, शान्तिभक्ति और समाधिभक्ति पढ़कर, निर्वाण को प्राप्त हुए सिद्धों की बार-बार वंदना की।

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क्षेत्र-परिचय-

सत्तेव य बलभद्दा जदुवणरिंदाण अट्ठकोडीओ।

गजपंथे गिरिसिहरे णिव्वाणगया णमो तेसिं।।६।।

सात बलभद्र और आठ करोड़ यदुवंशी राजा इस गजपंथा गिरि के शिखर से निर्वाण को प्राप्त हुए हैं, उन्हें मेरा नमस्कार होवे। सात बलभद्रों के नाम इस प्रकार हैं- १. विजय

२. अचल

३. सुधर्म

४. सुप्रभ

५. नंदी

६. नंदमित्र और

७. सुदर्शन।

इन सातों बलभद्रों ने यहाँ से मुक्तिधाम को प्राप्त किया है। यह क्षेत्र नासिक से ६ किलोमीटर दूर है। इस क्षेत्र पर नीचे धर्मशाला में मंदिर है। यहाँ पर्वत की ऊँचाई मात्र ४०० फुट है, सीढ़ियाँ प्रायः १ फुट ऊँची और खड़ी हैं। पर्वत पर बलभद्र मुनियों के चरण हैं। यहाँ पर्वत पर जिनालय में भगवान पार्श्वनाथ की १० फुट ४ इंच की श्यामवर्ण पद्मासन प्रतिमा विराजमान है। यहाँ दीवारों में सिद्धमूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। एक फलक में खड्गासन साधुमूर्ति हैं तथा दोनों में आचार्य और उपाध्याय की पद्मासन मूर्तियाँ हैं। साधु परमेष्ठी के हाथों में माला और पिच्छी है। आचार्य परमेष्ठी की साधुगण वन्दना कर रहे हैं और उपाध्याय परमेष्ठी के सामने शास्त्र है तथा श्रोतागण बैठे हुए हैं। अनेक तीर्थंकरों की मूर्तियाँ हैं। सप्त-ऋषियों के चरण-चिन्ह बने हुए हैं तथा सात बलभद्रों के भी चरण-चिन्ह बने हुए हैं। इस क्षेत्र पर सन् १९३६ और सन् १९५० में दो बार चारित्र-चक्रवर्ती आचार्यश्री शान्तिसागरजी ने चातुर्मास किये हैं। इसी प्रकार आचार्यश्री महावीर कीर्तिजी ने भी यहाँ दो चातुर्मास किये हैं। यहाँ पर नासिक के कतिपय श्रावकों ने और क्षेत्र के मुनीम ने मुझसे बहुत प्रार्थना की कि- ‘‘माताजी! यह क्षेत्र रम्य है, यहाँ बहुत जगह पड़ी है, आप यहीं ठहरिये और मध्यलोक के चैत्यालयों की रचना यहीं कराइये।’’ मैं सभी की प्रार्थना सुनती थी। इधर की जलवायु, वातावरण और श्रावकों की भक्ति सब कुछ मुझे अच्छी लगती थी। खासकर एक बात विशेष प्रिय थी कि इधर आगमपंथ-बीसपंथ के सिवाय तेरापंथ या सोनगढ़पंथ आदि नहीं है। लोग गुरुओं के प्रति क्षोदक्षेम चर्चा कर-करके उन्हें संक्लेशित करने के बजाए गुणग्राही और भक्तिमान हैं। सब कुछ अनुकूलता होते हुए भी मुझे आचार्य शिवसागर जी के संघ में पहुँचना है, कहीं भी रुकना नहीं है’ ऐसा कहकर वहाँ से भी विहार कर दिया।

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मांगीतुंगी क्षेत्र दर्शन-

नांदगांव में आर्यिका जिनमती जी ने कह दिया कि- ‘‘मैं मांँगीतुगी नहीं जाऊँगी, सुना है कि पर्वत बहुत ऊँचा है, मुझे तीर्थों के दर्शनों की कोई उत्कंठा नहीं है.....।’’ मैं कई दिनों तक ऊहापोह करती रही कि- ‘‘इन्हें कैसे समझाऊँ? या इन्हें यहीं छोड़कर दर्शन करने चली आऊँ? या मैं भी तीर्थदर्शन छोड़ दूँ........?’’ कसाबखेड़ा में एक श्रावक धर्मचन्द आये हुए थे। ये अति निकट के भक्त बन गये थे। मेरी उन्मनस्कता देखकर बोले- ‘‘माताजी! कुछ भी हो, आप मांगीतुंगी के दर्शन नहीं छोड़ना। यह भी महातीर्थ है। यहाँ से निन्यानवे करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं.......।’’ पुनः वे बोले- ‘माताजी! आप पुनः इधर महाराष्ट्र में आयेंगी, यह संभव नहीं है अतः शिष्यों के कहने से तीर्थ मत छोड़ो......।’’ मैंने भी विचार किया- ‘‘अहो! यह मांगीतुंगी क्षेत्र यहाँ से तो मात्र कुछ ही मील दूर है। यह मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र की भी निर्वाण भूमि है। वास्तव में शिष्यों के मोह में पड़कर, इतने महान तीर्थराज की वन्दना छोड़ देना बुद्धिमत्ता तो नहीं है.....।’’ अतः मन मजबूत करके मैंने यात्रा का निर्णय ले लिया। नांदगांव की सेठानी ने, अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने यात्रा कराने के लिए व्यवस्था बना ली। मेरे निकट ब्र. भंवरीबाई थीं। वे एक दिन रात्रि में गिर पड़ी थीं सो चोट आ जाने से बोलीं- ‘‘मुझे घर भिजवा दो, यहाँ यात्रा में मुझे कौन संभालेगा?’’ मैंने पहले यात्राएँ कर ली हैंं अतः घर जाऊँगी। इस निमित्त से उन्हें घर भेज दिया गया था। मात्र एक ब्रह्मचारिणी कु. शीला मेरे साथ थीं। जब मैंने निर्णय ले ही लिया तब आर्यिका जिनमती भी इच्छा न होते हुए भी साथ ही साथ विहार में चल पड़ीं। मुझे खुशी हुई। मार्ग में कुछ असुविधाओं को भी झेलते हुए मैं मांगीतुुंगी आ गई। यहाँ पर मुनीम गणेशीलाल अच्छे भक्तिमान थे और संघ की व्यवस्था में कुशल थे।

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पर्वत की वंदना-

यहाँ हम सभी एक साथ पर्वत पर चढ़े, चढ़ते-चढ़ते महामंत्र जपते रहे। ऊपर पहुँचकर निर्वाणभूमि के दर्शन करके, वन्दना करके बहुत ही आनंद आया। आर्यिका जिनमती भी बोलीं- ‘‘अम्मा! आपके प्रसाद से मुझे दर्शन हो गये, नहीं तो मेरे भाव गिर गये थे, मैं तो सीधे यहाँ से कुसुम्बा जाने के लिए सोच रही थी। आपके साथ आ गई तो क्षेत्र वन्दना करके पता नहीं मैंने कितना पुण्यबंध कर लिया होगा.......।’’ तब मैंने मन में सोचा कि- ‘‘शिष्यों के मोह में पड़कर कभी भी शिष्यों के अनुकूल नहीं चलना चाहिए, उन्हें अपने अनुकूल चलाना चाहिए। ऐसे-ऐसे प्रसंगों में उनके शब्दों की अथवा उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिए।’’

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क्षेत्र-परिचय-

निर्वाणकांड में पड़ते हैं-

रामहणूसुग्गीवो गवयगवक्खो य नीलमहनीलो।

णवणवदी कोडीओ तुंगीगिरि णिव्वुदे वंदे।।८।।

राम, हनुमान, सुग्रीव, गवय, गवाक्ष, नील और महानील आदि निन्यानवे करोड़ मुनियों ने तुंगीगिरी से निर्वाण प्राप्त किया है, मैं उन सबकी वंदना करता हूँ। यद्यपि ग्रंथों में तुंगीगिरि नाम आता है, फिर भी मांंगीतुंगी एक ही पर्वत है, ऐसा समझना। यहाँ से एक घटना और संबंध रखती है, जो कि विशेष है- जब कौशाम्बी के वन में जरत्कुमार के बाण से श्रीकृष्ण की मृत्यु हो गई, तब बलभद्र मोह और शोक में पागल से होकर, उनके शव को लिये हुए छह माह तक इधर-उधर घूमते रहे थे। एक दिन एक देव के समझाने पर इन्हें बोध हुआ तब इन्होंने इसी तुंगीगिरि पर्वत के ऊपर श्रीकृष्ण का दाह-संस्कार किया था। वह जगह आज भी ‘दहनकुंड’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके बाद संसार से विरक्त होकर उन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा ले ली थी। वे इसी पर्वत पर ध्यान किया करते थे। यहाँ एक उलट मुँह करके खड़े हुए बलभद्र की मूर्ति भी बनी हुई है जो कि इस बात की सूचक है कि जब ये आहार को गाँव में जाते थे तो इनके रूप-सौंदर्य को देखने के लिए महिलायें तो क्या, पुरुष भी बेभान हो जाते थे अतः इन्होंने गांव न जाने का नियम लेकर कुछ काल तक यहीं ध्यान किया था। ये महामना बलदेव यहीं से सल्लेखना की सिद्धि करके, नश्वर शरीर को छोड़कर, पाँचवे स्वर्ग में महद्र्धिक देव हुए हैं। यहां धर्मशाला है, मंदिर है और मानस्तंभ बना हुआ है। यहीं पर ठहर कर पर्वत के लिए चढ़ते हैं, यहाँ २९६० सीढ़ियां है। अभी और भी सीढ़ियों का निर्माण बाकी है। कुछ सीढ़ियां चढ़ने पर बायीं ओर दो गुफाएँ हैं। इन्हें सुध-बुध की गुफा कहते हंै। यहाँ जिनप्रतिमाएँ विराजमान हैं। भित्तिओं पर भी प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं। गुफाओं के निकट निर्मल जल के प्राकृतिक कुंड बने हुए हैं। यहां पर्वत पर मंदिरों में अनेक तीर्थंकर प्रतिमाएँ हैं और अनेक साधुओं की-श्रीरामचन्द्र जी, हनुमानजी आदि की प्रतिमाएँ विराजमान हैं। बहुत से मुनियों की प्रतिमाओं में, एक हाथ में पिच्छी और एक हाथ में मालायें हैं। साधुओं की ऐसी प्रतिमाएँ भित्ति पर भी उत्कीर्ण हैं।

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सीताजी के चरण-

परिक्रमा समाप्त कर उतरते समय एक खुली हुई गुफा में सीताजी के चरणचिन्ह बने हुए हैं। कहते हैं कि यहाँ सीताजी ने आर्यिका अवस्था में तपश्चर्या की थी। इन आर्यिका सती सीता माताजी के चरणों की वंदना करके बड़ा आनंद आया और मन में भावना उत्पन्न हुई- ‘‘हे मातः! आप जैसी तपश्चर्या और आप जैसा धैर्य हमें भी प्राप्त हो।’’ उन शील शिरोमणि माता के चरणों में भला किसका मस्तक नहीं झुकेगा कि जिन्होंने अग्नि परीक्षा में अग्नि को जल का सरोवर बनाकर, परीक्षा में उत्तीर्ण होकर भी इतने बड़े त्रिखंडाधिपति श्रीरामचंद्रजी के पट्टरानी पद के वैभव को ठुकरा कर आर्यिका दीक्षा ली हो और घोर तपश्चर्या करके स्त्रीलिंग का छेदकर, अच्युतेंद्र पद प्राप्त किया हो।

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श्रीरामचंद्र की मूर्ति-

तुंगीगिरी पर्वत पर एक श्रीरामचंद्र की गुफा प्रसिद्ध है। उसमें मध्य में श्रीरामचंद्र की प्रतिमा है। यहाँ भी दीवारों में मुनियों की प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं। इस क्षेत्र पर तलहटी में तीन मंदिर हैं। अब वर्तमान में ८-१० वर्षों से मुनि श्री श्रेयांससागर जी महाराज की प्रेरणा से यहाँ नूतन निर्माण कार्य चल रहा है। चौबीसी प्रतिमाएँ विराजमान की जायेंगी। श्रीपद्मनाथ और श्रीशैल की भी प्रतिमाएँ विराजमान की जायेंगी। वि.सं. १९९७ में मानस्तम्भ की प्रतिष्ठा के समय मुनिश्री (आचार्यश्री) वीरसागर जी संघ सहित एक माह यहाँ ठहरे थे और प्रतिष्ठा के समय श्री चारित्रचक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर जी संघ सहित पधारे थे। मेरे संघ में क्षुल्लिका अभयमती जी अस्वस्थ थीं, फिर भी उन्होंने साहस करके एक वंदना पैदल ही की। वास्तव में इन पवित्र क्षेत्रों का ही यह महात्म्य है कि इतनी सीढ़ियां चढ़कर, पैदल वंदना कर ली जाये। देखो ना! सम्मेदशिखर जी की वंदना में अठारह मील की चलाई हो जाती है। जो व्यक्ति कभी दो मील भी पैदल नहीं चले हैं, वे भी भक्ति में लीन होकर अठारह मील की पैदल वंदना कर लेते हैं। ‘निर्वाणप्राप्त मुनियों की निर्वाणस्थली की वंदना करके निर्वाणफल की याचना करना और जब तक निर्वाण प्राप्त न हो, तब तक उनके चरणों को हृदय में स्थापित करते रहना ही निर्वाण वंदना का फल है।’’ सभी लोग पढ़ते हैं-

तव पादौ मम हृदये मम हृदयं तव पदद्वये लीनम् ।

तिष्ठतु जिनेंद्र! तावद् यावन्निर्वाणसंप्राप्तिः।।

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मध्यलोक चैत्यालय रचना की प्रेरणा-

यहाँ भी यहाँ के मुनीम ने और नाँदगाँव आदि के कतिपय महानुभावों ने मध्यलोक के चैत्यालयों की रचना कराने के लिए मुझसे प्रार्थना की, अनुनय-विनय की और आग्रह किया। ‘किन्तु जहाँ का योग होता है वहीं होता है’ यही सूक्ति, आज चरितार्थ हो रही है। तभी तो मैं ऐसे-ऐसे क्षेत्रों को भी छोड़कर यहाँ हस्तिनापुर में आ गई। यहाँ मांगीतुंगी क्षेत्र पर संघ से ब्र. सुगनचन्द जी, उनकी बहन आदि लोग आ गये थे। चूँकि आगे विहार की व्यवस्था के लिए मैंने इन्हें सूचना भेज दी थी, इसलिए ये लोग यहाँ आ गये थे। इन लोगों ने भी क्षेत्र की वंदना की पुनः यहाँ से विहार कर कुसुंबा, धूलिया आदि होते हुए मैं संघ सहित बड़वानी सिद्धक्षेत्र पर आ गई। यहाँ पहले बड़वानी ठहरी। उस समय श्रवणबेलगोल में महामस्तकाभिषेक होने वाला था अतः मैंने ब्र. सुगनचंद के साथ कु. शीला, जो कि श्रवणबेलगोल की थीं, उन्हें और संघ की भंवरीबाई आदि सभी बाइयों को यात्रा के लिए भेज दिया। यद्यपि ये लोग जाना नहीं चाहते थे, कहते थे- ‘‘आपकी व्यवस्था, आहार आदि की व्यवस्था कौन संभालेंगे?’’ चूँकि उसी दिन हम लोग यहाँ आये थे, कोई खास परिचय किसी से हो नहीं पाया था, फिर भी मैंने कहा- ‘‘साधुओं का आहार-विहार उनके भाग्य के अधीन है, तुम लोग चिंता मत करो, जाओ, श्री बाहुबली भगवान का महामस्तकाभिषेक देखकर आओ, तब तक मैं यहीं ठहरूँगी.....।’’ ऐसा कहकर इन सबको मैंने भेज दिया था।