ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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052. आचार्य श्री शिवसागर जी के पुनः दर्शन हेतु विहार

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आचार्य श्री शिवसागर जी के पुनः दर्शन हेतु विहार।

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मैं इंदौर से अपने संघ सहित सनावद आ गई। चातुर्मास स्थापना का मंगल दिवस आ गया। सभा में लोग श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना कर रहे थे, तभी मैंने सेठ अमोलकचंद जी सर्राफ को लक्ष्य करके कहा- ‘‘अमोलक चंद जी! आप अपना बेटा मुझे गोद दे दीजिये।’’ अमोलकचंद जी ने भी सहज भाव से कह दिया- ‘‘माताजी! आपका ही बेटा है......।’’

मैंने कहा-‘यों तो सभी कह देते हैं, आपका ही बेटा है लेकिन देते कितने लोग हैं...?’’ खैर! इन्हें तो मालूम ही था कि जब मोतीचन्द ने आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ले रखा है, तब भला वह कितने दिन घर में रहेगा? मोतीचन्द की मां रूपांबाई मेरे पास बहुत कम बैठती थीं। प्रायः दर्शन करके या उपदेश सुनकर चली जाया करती थीं किन्तु अमोलकचन्द जी प्रायः आते थे और कुछ देर बैठते भी थे। उस समय हँसी के माहौल में बात समाप्त हो गई। मैंने भी विधिवत् स्वीकृति देकर वहाँ चातुर्मास स्थापना की। यह वर्षायोग स्थापना क्रिया मैंने आषाढ़ शुक्ला चौदस की पूर्वरात्रि में की थी।

यहाँ श्रावकों ने मंदिर से जिनप्रतिमाजी लाकर धर्मशाला में विराजमान की हुई थीं। मेरे संघ के चैत्यालय की प्रतिमाजी भी यहीं विराजमान थीं। प्रातः अभिषेक होता था, अनन्तर मेरा उपदेश होता था। चातुर्मास में शिक्षण शिविर की व्यवस्था बनाई गई थी। रात्रि में बालक-बालिकाएं छहढाला आदि पढ़ते थे। श्यामाबाई एक महिला थीं, वे पढ़ाती थीं। दिन में मैं कुछ विद्यार्थियों को तत्त्वार्थ सूत्र, किन्हीं को पुरुषार्थ सिद्ध्युपाय आदि पढ़ाती थी।

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आलाप पद्धति-भक्तिपल्लवी-

अध्यात्म ग्रन्थों को समझने के लिए नयों का समझना आवश्यक है और आलाप पद्धति ग्रन्थ में नयों का अच्छा विवेचन है। मैंने प्रथम गुच्छक पुस्तक से इस आलाप पद्धति का हिन्दी अनुवाद कर दिया था, उसको यहाँ मोतीचन्द ने छपवा लिया। उसी प्रकार मैंने पात्रकेसरी स्तोत्र का हिन्दी पद्यानुवाद किया हुआ था। उसे भी ‘भक्तिपल्लवी’ पुस्तक रूप में छपवा दिया। इसमें मेरे द्वारा रचित त्रिलोक वन्दना, सम्मेदशिखर वन्दना, उषावन्दना और जोड़ दिये गये थे। शिक्षण शिविर में इन-इन पुस्तकों का भी अध्ययन चलाया गया था। यहाँ चातुर्मास में कुछ न कुछ विधान आदि भी होते रहते थे।

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मध्यलोक चैत्यालय निर्माण में विघ्न-

आचार्यश्री शिवसागर जी महाराज की प्रेरणा से एक ब्रह्मचारी द्वारा लिखा हुआ पत्र प्राप्त हुआ कि- ‘‘आर्यिका ज्ञानमती माताजी! आप संघ सहित यहाँ आचार्यसंघ में आ जावें, यहां महावीर जी अतिशय क्षेत्र में यह रचना बनवानी है।......।’’ इधर इंदौर के श्रीमान भइयासाहब, सेठ हीरालाल जी कासलीवाल आदि ने कहा कि-‘‘माताजी पहले एक लाख रुपये जम्बूद्वीप रचना के लिए बैंक में जमा करवा दें, फिर सुमेरुपर्वत का कार्य हम लोग प्रारंभ करने देंगे।’’

लोगों ने मुझे यह सूचना दी। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, चूँकि मेरी यह नीति है कि-‘‘रुपये बैंक में न रखकर निर्माण कार्य कराते जावो, तभी तो दातारों को रुपया देने में उत्साह रहेगा।’’ दूसरी बात यह कि मैंने पहले ही कह दिया था कि-‘‘रुपये एकत्रित करना मेरा काम नहीं है, मैं तो केवल नक्शा-रूपरेखा बता दूँगी।’’

इधर इंदौर वालों की ऐसी सूचना, उधर आचार्यश्री का आदेश। इन दोनों कारणों से वहाँ सिद्धवरकूट में निर्माण कार्य प्रारंभ ही नहीं किया गया। इसी मध्य में निवाई के सेठ हीरालाल जी पाटनी, जो कि आचार्य संघ के प्रमुख भक्त थे, गिरनार यात्रा कराने के बाद से संघपति कहलाते थे। ये महानुभाव और ब्र. सूरजमल जी, दोनों लोग सनावद आये। इस रचना की रूपरेखा सुनी, विचार-विमर्श किया और बार-बार यही कहने लगे- ‘‘माताजी! चातुर्मास के बाद आप विहार करें, संघ में पहुँचें। आचार्यश्री की इच्छानुसार यह रचना श्रीमहावीरजी क्षेत्र पर ही बनवानी है।’’ इधर प्रभावनापूर्वक यहाँ का चातुर्मास संपन्न हुआ।

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मुक्तागिरि तीर्थ के लिए विहार-

यहाँ सेठानी-मंदिरमाय, रामकुंवर बाई कमलाबाई पांड्या आदि सभी का आग्रह था कि- ‘‘माताजी! यहां से मुक्तागिरि तीर्थ क्षेत्र लगभग ढाई सौ मील है। आप यहीं से यात्रा के लिए विहार करके दर्शन कर लीजिये पुनः राजस्थान प्रान्त में जाने के बाद आपका आना कहाँ संभव है?’’

आर्यिका जिनमती जी को चातुर्मास में बहुत दिनों तक मलेरिया ज्वर चलता रहा था, वे कमजोर हो गई थीं अतः इन्होंने यात्रा के लिए मना कर दिया। क्षुल्लिका अभयमती ने भी पहले दर्शन किये हुए थे अतः मैंने इन दोनोें को यहीं सनावद रहने का आदेश दिया और संघस्थ आर्यिका पद्मावती जी, आर्यिका आदिमती जी, तथा क्षुल्लिका श्रेयांसमती जी, इन तीनों को साथ में लेकर यात्रा के लिए विहार कर दिया।

संघ की व्यवस्था में मंदिरमाय-सेठानी प्रमुख थीं और पुरुषों में सारी जिम्मेदारी मोतीचंद ने संभाली। कई श्रावक-श्राविका साथ में थे। मगसिर माह की बढ़ती हुई ठंड में हम लोग दोनों टाइम चलते थे। आश्चर्य इस बात का था कि आदिमती जी, जो दक्षिण में बराबर दो वर्ष तक बीमार रही थीं और जिनको बड़ी मुश्किल से डोली में बिठा कर विहार कराकर यहाँ तक लाये थे, वे इस मध्यप्रदेश में जलवायु के बदलने से स्वस्थ हो गर्इं और मेरे साथ बराबर पैदल चल रही थीं। इस प्रत्यक्ष उदाहरण को देखकर ‘जलवायु का शरीर पर प्रभाव पड़ता है’ यह लोगों की बात आखिर माननी ही पड़ी।

रास्ते में मंदिरमाय एक चौका करती थीं, दूसरा कु. शीला करती थीं। मुझे आश्चर्य यह होता था कि इन मंदिरमाय सेठानी का भारी शरीर था, फिर भी उन्हें आलस नहीं था। उठने में किंचित् समय भले ही लगता था, फिर भी उनमें स्फूर्ति थी। दिन भर काम करके भी प्रायः रात्रि में जब मैं सामायिक और पाठ आदि करके लेट जाती, तब कभी नव-दस बजे तक वे बैठी रहतीं, मेरे लेटने के बाद ऊपर से थोड़ी घास ढककर जातीं। उन्हें ऐसा लगता-

‘‘इतनी भयंकर दिसंबर की ठंड में माताजी एक साड़ी में ही कैसे सोती हैं?’’ वे ऊपर से घास ढककर जातीं किन्तु जरा सी देर में करवट बदलते ही वह घास गिर जाती। मैं सोचने लगती- ‘‘देखो! ऐसी वृद्धा महिला को वैयावृत्य करने की कितनी भावना है? गुरुओं के प्रति कितनी भक्ति है? वास्तव में ऐसे जीव ही भव्य हैं, संसार से पार होने का ही पुरुषार्थ कर रहे हैं।’’

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मार्ग में एक वैराग्य घटना-

इस यात्रा में दो बैलगाड़ियाँ थीं। एक आगे चौके के स्थान पर चली जाती थी और दूसरी पीछे रहती थी, जिस पर हम लोगों की घास रहती थी। यह प्रातः मेरे विहार के बाद वहाँ से घास लेकर रवाना होती थी। एक दिन मध्यान्ह में किसी ने पिछली गाड़ी वाले से और उसकी पत्नी से सहज ही कह दिया कि- आज तुम्हारी पत्नी आगे गाड़ी में जायेंगी, तुम पीछे रहना। एक स्थान पर हम लोग पहुँचे। गाड़ी वाला सायंकाल में सामायिक के समय बाहर खूब खांसी आने से परेशान हो रहा था। मैंने सामायिक पूरी करके मोेतीचन्द से कहा-

‘‘इसे अंदर बुला लो और इसके गले में कुछ तेल आदि की मालिश कर दो।’’ मोतीचन्द ने उसी समय संकोच छोड़कर उसकी वैयावृत्ति की किन्तु उसे आराम न दिखने से मैंने कहा- ‘‘मोतीचन्द! जल्दी जावो, डाक्टर को बुला लावो।’’ वे उधर जल्दी से डाक्टर को लेकर आये, इधर मैंने देखा, वह सांस जोर-जोर से ले रहा है। डाक्टर तो आकर इंजेक्शन लगाने की तैयारी में था। मैंने दूर से देखा कि उसके मुँह से फैन सा आ गया। तत्क्षण ही मैंने णमोकार मंत्र सुनाना शुरू कर दिया, कुछ संबोधा भी। उसी समय उसके प्राण निकल गये। मोतीचन्द डाक्टर से कहते रहे- ‘‘अरे! इसे इंजेक्शन लगावो..........कुछ दवाई देवो।’’ डाक्टर ने कहा-

‘‘अब सब कुछ बेकार है, यह बुड्ढा मर गया।’’ मोतीचन्द एकदम हक्के-बक्के रह गये। डाक्टर तो चले गये। पास में एक-दो मुसलमान थे। उन्होंने राय दी- ‘‘भाई! आप लोग यात्री हैं, दिन उगते ही इस बुड्ढे का पुलिस केस बन जायेगा अतः आप यहाँ के सरपंच को बुलाकर यह सूचना दे दो।........’’ इधर रात्रि के करीब ग्यारह बज रहे थे। मोतीचन्द इन लोगों के बताये अनुसार जंगल में ही काफी दूर तक पास के गांव में गये। सरपंच आदि को बुलाकर लाये पुनः सारी बातें बताई। किसी ट्रक से, आगे गई बैलगाड़ी से गई हुई उसकी पत्नी को बुलाया गया। इन कार्यों में दौड़-धूप में मोतीचन्द रात्रि के दो बजे तक इधर-उधर घूमते ही रहे। संघस्थ आर्यिका पद्मावती ने कहा-

‘‘अम्मा! यह नवयुवक लड़का मोतीचन्द, उसे आप रात्रि में श्मशान जैसे जंगलों में कहाँ भेज रही हैं? रोक दो इसे, अर्धरात्रि में बार-बार कहीं मत भेजो....... वे काफी घबरा रही थीं।’’ फिर भी मैं मौन रही, रात्रि में वहाँ निर्जन स्थान में बैठी रही। चूँकि पास में मृतक शव पड़ा हुआ था, अतः बाहर के बरामदे में भयंकर सर्दी में हम सभी आर्यिकायें बैठी हुई णमोकार मंत्र जपती रहीं। प्रातः सामायिक करके हम लोगों ने विहार कर दिया। इधर मोतीचन्द ने वहाँ के सरपंच के साथ मिलकर उस महिला के साथ में वहीं शमशान में उसकी दहन क्रिया करवाई।

उस महिला ने भी यह लावो, वह लाओ, कह-कहकर मोतीचन्द को खूब दौड़ाया। उसकी अंत्येष्टि कराकर ये लोग मध्यान्ह में यहाँ हमारे पास आ गये। मैंने चिन्तवन किया- ‘‘अहो! संसार में किसी के जीवन-मरण का कुछ भी भरोसा नहीं है।’’ यद्यपि वह बुड्ढा दमा की बीमारी से परेशान था, उसकी मृत्यु कोई आश्चर्यजनक नहीं थी, फिर भी यह मेरे सामने मृत्यु का पहला दृश्य था।

उस रात्रि में वह स्थान निर्जन था। कुछ दूर पर एक गाँव था। मोतीचन्द का रात्रि में दस बजे से २-३ बजे तक घूमते रहना, सभी आर्यिकाओं को अखरा। मैंने कहा- ‘‘मोतीचन्द ने यह उक्ति चरितार्थ कर दी कि आधी रात मेें इन्हें यदि शमशान भूमि में खड़ा कर दिया जाये, तो खड़े होने को तैयार हैं।’’ मोतीचन्द की यह आज्ञा पालन प्रवृत्ति और निर्भीकता सभी शिष्यों के लिए अनुकरणीय है। वैसे इन्होंने एक बार बताया था कि-बचपन में मैं घर में ऊपर से नीचे अकेले आने में डरता था। उस समय जिम्मेदारी, गुरुभक्ति और महामंत्र के स्मरण से मैं निर्भीक बना रहा था।

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परतवाड़ा-

चलते-चलते क्रम से क्षेत्र के निकट एक गाँव परतवाड़ा में पहुँचे, वहाँ श्रावकों में खूब अच्छी भक्ति है। एक-दो दिन विश्राम किया, श्रावकों ने आहार दान दिया, उपदेश सुना, अच्छे प्रभावित हुए पुनः यहाँ से मैंने क्षेत्र दर्शन के लिए विहार कर दिया।

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मुक्तागिरि क्षेत्र-दर्शन-

तीर्थक्षेत्र पर पहुँचकर मन्दिर के दर्शन किये और धर्मशाला में ठहर गई। आहार के बाद मध्यान्ह में तीर्थ वन्दना के लिए ऊपर पहाड़ पर चढ़ी। ऊपर मैंने मंदिरों के दर्शन किये, सिद्धगति को प्राप्त मुनियों की वन्दना की और झरने का मनोरम दृश्य देखा। मन प्राकृतिक सुषमा से प्रसन्न हुआ और मैं सोचने लगी-

‘‘भगवन् ! ऐसे-ऐसे पर्वतों पर, गिरि-कंदर की गुफाओं में, निर्जन वनों में और नदी के किनारे एकाकी विचरण करते हुए, शुद्धात्मा के ध्यान का अवसर मुझे भी प्राप्त हो। हे नाथ! इस भव में न सही, अगले भव में प्राप्त हो। आत्मा को शुद्ध परमात्मा बनाने का पुरुषार्थ तभी सफल हो सकता है।

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क्षेत्र-परिचय-

यहाँ से साढ़े तीन करोड़ मुनि मोक्ष गये हैं, ऐसा निर्वाण कांड में लिखा है-

अच्चलपुरवरणयरे ईसाणभाए मेढगिरिसिहरे।

आहुट्ठयकोडीओ णिव्वाणगया णमो तेसिं।।१६।।

अचलापुर नगर की ईशान दिशा में स्थित मेढ़ागिरि के शिखर से जो साढ़े तीन करोड़ मुनि मुक्ति को प्राप्त हुए हैं, उनको मेरा नमस्कार होवे। इसे वर्तमान में मुक्तागिरि या मेढ़ागिरि कहते हैं।

इस क्षेत्र पर धर्मशाला में सीढ़ियाँ चढ़कर दो मंदिर हैं। आदिनाथ मंदिर और महावीर मंदिर। पर्वत पर पाश्र्वनाथ मंदिर आदि से लेकर ५२ जिनमंदिर हैं। ९ नं. का आदिनाथ मंदिर है। इसके पीछे जलप्रपात है, जहाँ १०० फुट ऊपर से जल गिरता है। प्रपात के बायीं ओर गुहामंदिर है, यही मेढ़ागिरि मंदिर कहलाता है। कहते हैं कि इस जलप्रपात के निकट इस गुफा के सम्मुख एक मेढ़ा गिरा था, जिसे एक मुनिराज ने णमोकार मंत्र सुनाया था। उसके प्रभाव से वह मरकर देव बना था, पुनः उसने उस स्थल पर मोतियों की वर्षा की थी। इसी हेतु से इस क्षेत्र के मुक्तागिरि और मेढ़ागिरि ये दो नाम प्रसिद्ध हैं।

कहते हैं कि वर्षा ऋतु आदि में यहाँ का झरना देखने लायक बहुत ही सुन्दर रहता है। यहाँ क्षेत्र पर ४-५ दिन रहकर वन्दना करके, हम लोग विहार कर वापस परतवाड़ा आ गये। यहाँ से भी विहार कर जिस मार्ग से गये थे, उसी मार्ग से वापस खंडवा होते हुए सनावद आ गये। पूरी सर्दी में यह यात्रा सम्पन्न हुई। हम सभी का स्वास्थ्य ठीक रहा। अब सनावद आने के बाद आचार्य शिवसागर जी के संघ में पहुँचने के लिए विहार का कार्यक्रम बनाया गया।

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आचार्य संघ की ओर विहार-

साथ में मंदिरमाय, विमलचन्द की माँ, आदि कई महिलाएँ थीं। मोतीचंद के मामा के सुपुत्र नवीनचन्द जैन नवयुवक व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी लेकर साथ में थे। यहाँ के यशवंत कुमार, जिनके पिताजी उनके व्यवहार से दुखी रहते थे और मेरे पास अनेक बार शिकायत लाते रहते थे, उन्हें (यशवंत कुमार को) मैंने वैराग्य का उपदेश देकर संघ में चलने के लिए मोड़ दिया था, वे भी साथ में थे। मैं बड़वाह, इंदौर होते हुए रतलाम आई। यहां से बांसवाड़ा आ गई।

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शिष्य लाभ-

बांसवाड़ा में मैंने एक दिन उपदेश में कहा- ‘‘यदि प्रत्येक गाँव में एक-एक श्रावक अपनी एक-एक पुत्री मुझे दे दें, तो मैं उन्हें पढ़ाकर विदुषी बना दूँ, जिससे घर-घर में सीता, मनोरमा जैसी नारीरत्न दिखने लगें.....।’’ इस उपदेश से प्रभावित होकर पन्नालाल नाम के एक श्रावक ने वहीं सभा में ही अपनी ९-१० वर्षीया पुत्री कनकलता और ११-१२ वर्षीया पुत्री कला को (दोनों को) मेरे पास बिठा दिया और बोले-

‘‘माताजी! पाँच वर्ष के लिए इन दोनों कन्याओं को मैं आपको देता हूँ।’’ सभा में करतल ध्वनि से सभी ने उनका सम्मान किया। मैंने उन पुत्रियों से पूछा- ‘‘बेटी! तुम माता-पिता को छोड़कर मेरे पास रहोगी?’’ वे दोनों बोलीं-

‘‘हाँ, माताजी! रहेंगे।’’ उस समय इन दोनों को उसी रूप में मैंने अपने संघ में ले लिया। यहाँ आम सभा में एक दिन मेरा प्रवचन हो रहा था। लोहारिया का एक बालक उपदेश सुनकर मेरे पास आया और बोला-

‘‘माताजी! मैं आपके संग में रहूँगा। शादी नहीं करूँगा।’’ किंतु उसके माता-पिता जबरदस्ती उस बालक को ले गये। कई दिन बाद इधर आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज ससंघ विहार कर रहे थे। वह बालक उनके संघ में पहुँच गया। वहीं रहकर उसने क्षुल्लक दीक्षा ले ली। श्री महावीर जी में सन् १९६९ में आचार्य श्री विमलसागर जी का संघ आया था, वहीं आचार्य धर्मसागर जी के संघ में मैं थी। इन क्षुल्लक जी ने आकर मुझसे निवेदन किया- ‘‘माताजी! मैं आपके पास कुछ दिन रहकर व्याकरण, न्याय और सिद्धान्त ग्रंथ पढ़ना चाहता हूँ।’’ मैंने कहा-

‘‘मेरा नियम है कि मैं किसी के शिष्यों को, बिना उनके गुरु की आज्ञा के, अपने संघ में नहीं रखती हूँ।’’ वे आचार्य श्री विमलसागर जी की आज्ञा लेने गये, तब महाराज जी ने कहा- ‘‘माताजी! आप इन्हें छोड़कर और किसी को ले जाकर पढ़ा दो।’’ बात खत्म हो गई थी। आज उस संघ में वे मुनि बनकर आचार्य भरत सागर जी के नाम से प्रसिद्ध हैं। कु. सुशीला-

कलकत्ता के सन् १९६३ के चातुर्मास में मैंने मुनिश्री श्रुतसागर जी की गृहस्थावस्था की पुत्री सुशीला को संस्कारित करके उसे ब्रह्मचर्य व्रत दिया था किन्तु उसके भाइयों के विरोध से वह मेरे पास अभी तक नहीं आ सकी थी। वहाँ आचार्य संघ में कुछ माह से आई थी। वहाँ आर्यिका विशुद्धमती से कुछ अध्ययन कर रही थी। यहाँ निकट आ जाने से वह सुशीला भी संघ से यहाँ मेरे पास आ गई। उसने ऐसा माना कि- ‘‘आज मेरी सच्ची माता मुझे मिल गई है।’’

तब से दीक्षा लेने तक वह मेरे पास ही रही। सन् १९७४ में दिल्ली में आर्यिका श्रुतमती बनी थीं। पुनः ये अपने पिता आचार्य कल्प श्री श्रुतसागर जी महाराज के संघ में रही थीं, अब आर्यिका आदिमती जी के पास हैं।

मेरे संघ की व्यवस्था नवीन चन्द संभाल रहे थे अतः हम लोग वात्सल्य से इन्हें संघपति कह देते थे। मंदिरमाय जैसी सेठानी की गुरुभक्ति की जितनी प्रशंसा की जाये, थोड़ी है। इन्होंने सनावद में मेरे रहने तक बराबर चौका लगाया। घर में अकेले होकर भी सारा काम कर लेती थीं। उनकी उम्र उस समय ६५-७० के लगभग थी। फिर भी मुक्तागिरि की यात्रा में चौका लगाया, पुनः इधर संघ में पहुँचाने तक के लिए मेरे साथ आई थीं। विमलचन्द की मां भी वृद्धा थीं, फिर भी प्रतिदिन वे मेरे साथ पैदल ही चलती थीं।

यहाँ बांसवाड़ा से मैं सलुंबर पहुँची। सलुंबर में सेठ बदामी लाल जी गांधी ने अपने चैत्यालय के निकट एक कमरे में मुझे ठहराया था। सनावद से मोतीचन्द आदि कई एक महानुभाव यहाँ आ गये थे।

यहाँ बदामीलाल जी ने एक दिन मुझसे से कहा- ‘‘माताजी! यहाँ एक सरोवर है, उसके मध्य में मैं भगवान् महावीर का मंदिर बनवाना चाहता हूँ। आप आशीर्वाद दें, जिससे मुझे सफलता मिले। उनकी सारी रूपरेखा समझकर मुझे भी प्रसन्नता हुई और मैंने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा- ‘‘धर्म-कार्य में आपको सफलता अवश्य मिलेगी। इस तालाब में मंदिर बनवाकर आप इसे एक तीर्थ रूप बनायेंगे.......।’’

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आचार्य संघ के दर्शन-

यहाँ से विहार कर मैं संघ सहित करावली नाम के गांव में पहुँची। आचार्य श्री शिवसागर जी संघ सहित वहीं विराजमान थे। उधर संघ से आर्यिका विशुद्धमती जी आदि, क्षुल्लक संभवसागर जी आदि साधुगण तथा गाँव के श्रावक-श्राविकायें सन्मुख स्वागत के लिए आ गये थे। हम छहों साध्वियाँ अपने शिष्य परिकर के साथ आचार्यश्री के निकट पहुँचे। सर्वप्रथम मंदिर के दर्शन किये पुनः आचार्य श्री के सामने पहुँचकर पाँच वर्ष के बाद आज आचार्यश्री शिवसागर जी महाराज के दर्शन किये। हम लोगों की आँखों से अश्रु की धारा बह चली। ये आँसू आनन्द के आँसू थे। गुरु-शिष्यों का यह मिलन श्रावक लोग बड़ी उत्कंठा से देख रहे थे। संघ की महिलायें, मोतीचन्द, यशवंत, कु. शीला, सुशीला, कला और कनक सभी ने आचार्यश्री के दर्शन किये। आचार्यश्री ने सबकी ओर प्रसन्नता से देखा और बोले- ‘‘ज्ञानमती जी खूब संघ बढ़ाकर लाई हैं......।’’

पुनः आचार्य श्री ने सभी को खूब आशीर्वाद दिया। मैंने आचार्यश्री से रत्नत्रय कुशल पूछी। आचार्यश्री ने भी हम सभी से रत्नत्रय कुशल पूछा। इसके बाद हम लोगों ने मुनिश्री श्रुतसागर जी आदि मुनियों के दर्शन किये। जिन्हें पुत्रवत् वात्सल्य दिया था और जिन्हें मुनिदीक्षा लेने के लिए प्रेरणा देते हुए लाखों पुरुषार्थ किये थे, ऐसे मुनिश्री अजितसागर जी के दर्शन किये, अन्य मुनियों के भी दर्शन किये पुनः आर्यिका वीरमती माताजी के पास पहुँची, उनको वंदामि किया, अन्य बड़ी आर्यिकाओं को वंदामि किया।

आर्यिका विशुद्धमती से मिलकर मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुई। चूँकि श्रवणबेलगोल, सोलापुर और सनावद में इनके लिखे हुए पत्र मेरे पास बहुत आये थे। उन पत्रों में इन्होंने मेरे प्रति जो भक्ति भावना प्रदर्शित की थी, वह बहुत विशेष ही थी, चूूँकि ये अपने गुरु अजितसागर जी की सच्ची माता के रूप में मुझे देखती थीं।

इस समय आर्यिका पद्मावती, आर्यिका जिनमती भी बहुत प्रसन्न थीं। आर्यिका आदिमती, जो कि दो वर्ष लगभग बीमार रह चुकी थीं, अब स्वस्थ होकर आकर मिली थीं। क्षुल्लिका श्रेयांसमती और क्षुल्लिका अभयमती भी प्रसन्न थीं।

आचार्यश्री मेरे इन बाल ब्रह्मचारी मोतीचंद, यशवंत, शीला आदि छह शिष्यों को देख-देखकर बहुत ही गद्गद हो रहे थे। क्षुल्लक संभवसागर, जोे कि ब्र. सुरेशचंद थे, इन्हें मैंने हैदराबाद से आचार्य संघ में भेजा था। आज वे क्षुल्लक संभवसागर जी बने हुए थे। उनके भी हर्ष का पार नहीं था। वे बार-बार यही कहते थे कि- ‘‘मेरी माता चार वर्ष बाद आज मुझे मिली हैं।’’

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दान की प्रेरणा-

अगले दिन आचार्यश्री का सनावद के चौके में पड़गाहन हो गया। मोतीचंद आदि ने पड़गाहन किया था। नवधाभक्ति करके खूब हर्षोल्लास से आचार्यश्री को आहार दिया। निरंतराय आहार होने के बाद आचार्यश्री को आंगन में तख्त पर बिठाकर आरती की। इसके बाद आचार्यश्री बोले- ‘‘हाँ, भाई! हमें दक्षिणा चाहिए, बोलो क्या दक्षिणा देना है?’’ तभी मंदिरमाय ने ५००) रुपये दान में बोले पुनः आचार्यश्री ने मोतीचंद से प्रेरणा की। मोतीचंद ने भी २००) रुपये बोल दिये पुनः आचार्यश्री ने हंसते हुए कहा-

‘‘देखो, तुम लोग नियम लेवो, यह त्याग की दक्षिणा मुझे चाहिए।’’ तब इन लोगों को कुछ न कुछ नियम दिया और मोतीचन्द से बोले- ‘‘तुम्हें तो अब संघ में रहना है, घर जाने का त्याग करो।’’ मोतीचंद ने हँसते हुए कहा- ‘‘महाराज जी! अभी तो घर जाना है, फिर मैं पिताजी की आज्ञा लेकर आऊँगा, तब रहूँगा......।’’ बाद में आचार्यश्री ने कहा-

‘‘देखो! इन सात सौ रुपयों से शांतिवीरनगर महावीरजी से ‘समाधि-तंत्र’ पुस्तके मंगाकर संंघों में वितरित कर देना......।’’ आचार्यश्री की आज्ञा से ऐसा ही किया गया। आचार्यश्री श्रावकों से जितनी सरलता से हँसते हुए ‘‘दक्षिणा देना है’’ ऐसा बोलकर, जो शास्त्रदान-ज्ञानदान करा लेते थे, वह उनका बुद्धिचातुर्य ही था। आज भी हमें उनकी यह पद्धति याद आ जाती है। वास्तव में उनकी प्रेरणा से ही शांतिवीरनगर-महावीरजी में इतनी विशालकाय भगवान् शांतिनाथ की २५ फुट की मूर्ति विराजमान हुई है। उन्होंने यह बात मुझे स्वयं कही थी कि-

‘‘माताजी! मेरे मन में विशाल खड्गासन प्रतिमा यहाँ महावीर जी में विराजमान कराने का भाव था, तब मैंने डीमापुर की महिला अंगूरीबाई से प्रेरणा की थी और मेरी प्रेरणा से उन्होंने यह मूर्ति यहाँ विराजमान करायी है।’’ इसके बाद और अन्य साधु-साध्वियों के आहार सनावद वालों के चौके में हुये। बाद में ये सब सनावद के लोग आचार्यश्री आदि साधुओं का और मेरा आशीर्वाद लेकर वहाँ से रवाना होकर सनावद पहुँच गये।

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पाँच वर्ष की यात्रा का उपसंहार-

सन् १९६२ के दिसम्बर माह में मैंने आचार्य श्री का संघ ‘नावा’ राजस्थान से छोड़ा था। वहाँ से निकलकर पदमपुरा महावीरजी और मथुरा सिद्धक्षेत्र के दर्शन किये पुनः सन् १९६३ में अयोध्या, नौराही-रत्नपुरी, बनारस, चंपापुरी, राजगृही, कुण्डलपुर, पावापुरी, गुणावां दर्शन करते हुए सम्मेदशिखर पहुँची। महान तीर्थराज के दर्शन किये।

अनंतर सन् १९६४ में पुनः कलकत्ता चातुर्मास से सम्मेदशिखर आकर गिरिराज की वंदनाएँ कीं पुनः यहाँ से विहार करके उड़ीसा में खंडगिरि-उदयगिरि की यात्रा की।

सन् १९६५ में श्रवणबेलगोल मेंं विराजमान भगवान बाहुबलि के दर्शन किये। एक वर्ष उनके चरण सान्निध्य में रहने का शुभ अवसर मिला। इसके बाद सन् १९६६ में मूडविद्री, कारकल, वेणूर, हुम्मच पद्मावती, धर्मस्थल, कुदकुंदाद्रि के दर्शन किये पुनः बीजापुर आकर निकटवर्ती क्षेत्र बाबा नगर के दर्शन किये। इसके बाद सोलापुर चातुर्मास के अनंतर विहार कर कुंथलगिरि के दर्शन करके तेर, पैठण, कचनेर आदि अतिशय क्षेत्रों के दर्शन किये और पुनः औरंगाबाद पहुँच गई।

इसके बाद सन् १९६७ में एलोरा के दर्शन करके आगे बढ़कर गजपंथा और मांगीतुंगी के दर्शन किये पुनः बड़वानी, ऊन के दर्शन करके सिद्धवरकूट के दर्शन किये। उसके बाद सनावद से विहार कर राजस्थान में संघ में आ गई।

इन पाँच वर्षों में मैंने १९६३ में कलकत्ता में चातुर्मास किया। १९६४ में हैदराबाद में चातुर्मास किया। १९६५ में श्रवणबेलगोल में चातुर्मास किया। १९६६ में सोलापुर में किया तथा १९६७ में सनावद में चातुर्मास किया था।

मैं संघ में सकुशल सब आर्यिकाओं और क्षुल्लिकाओं को लेकर आ गई। मुझे भी खुशी हुई और संघ में सभी साधु-साध्वियों को भी खुशी हुई।