ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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053. माताजी संघ सहित आचार्य संघ में

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माताजी संघ सहित आचार्य संघ में

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आचार्य संघ के साथ- सलूंबर में जैन समाज में हूमड़ जैन, नागदा जैन, नरसिंहपुरा जैन आदि जैन जातियों के परिवार हैं। अच्छी गुरुभक्ति है। यहां पर उस समय सौ से अधिक चौके लगते थे। विशेषता यह थी कि सभी शूद्र जल त्यागियों के थे। लोग अपने-अपने दरवाजे के सामने साधुओं का पड़गाहन करते समय जब जोर-जोर से-

‘‘हे स्वामिन् ! नमोऽस्तु, नमोऽस्तु, नमोऽस्तु, अत्र तिष्ठ, तिष्ठ, तिष्ठ’’ कहकर पड़गाहन करते थे, तब चतुर्थ काल जैसा दृश्य प्रतीत होता था। बहुत से जैन-जैनेतर इस समय उपस्थित हो जाते थे और जैन मुनि, आर्यिकाओं की चर्या देखकर प्रभावित होते थे। लोगों के मुख से बरबस यह निकल जाता था कि- ‘‘सच्चे साधु हैं तो ये हैं! इनकी आहारचर्या कितनी कठिन है!’’

दीक्षायें-

प्रतापगढ़ निवासी बंबई के सेठ मोतीलाल जी जौहरी क्षुल्लक सुबुद्धिसागर के रूप में थे। इन्होंने आचार्यश्री से मुनि दीक्षा की याचना की। आचार्यश्री ने स्वीकार करके मुहूर्त निश्चित कर दिया। विशाल मंच पर उनकी मुनिदीक्षा हुई। इधर मेरे पास में क्षुल्लिका श्रेयांसमती जी थीं। इनके भाव आर्यिका दीक्षा लेने के थे। मैंने आचार्यश्री से निवेदन कर इन्हें आर्यिका दीक्षा दिला दी। तब आचार्यश्री ने इनका नाम ‘श्रेष्ठमती’ रख दिया। चूँकि उस समय संघ में मुनिश्री श्रेयांससागर जी थे, उनकी धर्मपत्नी आर्यिका बनी थीं, उनका नाम श्रेयांसमती था, इसलिए आचार्यश्री ने इनका नाम इस आर्यिकादीक्षा में बदल दिया था।

अध्यापन कार्य-

कु. विमला, आर्यिका संभवमतीजी की शिष्या थी, उसने आकर मुझसे निवेदन किया-‘‘माताजी! बहुत दिनों से ज्ञान में मैंने आपका नाम सुना था, मैं अब आपसे व्याकरण आदि पढ़ना चाहती हूँ।’’ मैंने उसने कहा-‘‘ठीक है। मेरी शिष्या आर्यिका जिनमती जी तुम्हें पढ़ायेंगी।’’ जिनमती ने उसे पढ़ाना शुरू कर दिया। कुछ वर्ष बाद यह विमला, आर्यिका शुभमती बन गर्इं। आजकल आर्यिका जिनमती इन्हीं के साथ हैं। सलूंबर में आर्यिका सिद्धमती जी आदि कई आर्यिकाओं ने मेरे से निवेदन किया- ‘‘माताजी! आप हम सब को भी कुछ पढ़ाइये।’’ तब मैंने गोम्मटसारजीवकांड ग्रन्थ इन सबको पढ़ाना शुरू किया। पाँच-सात आर्यिकाएँ बैठती थीं और ५-७ ब्रह्मचारिणी भी बैठती थीं। प्रारंभ करके मैंने अपनी शिष्या आर्यिका आदिमतीजी से कहा कि-

‘‘तुम इन सभी को गोम्मटसार पढ़ाओ, तुम्हारा भी विषय पक्का होगा तथा मन स्वस्थ रहने से शरीर भी स्वस्थ रहेगा।’’ तब इन्होंने इन सबको गोम्मटसार पढ़ाना शुरू कर दिया। उधर आर्यिका जिनमती जी, आर्यिका श्रेयांसमती जी को जीवंधरचंपू आदि कई विषय पढ़ाती थीं। कु. विमला को व्याकरण, न्याय, साहित्य, गोम्मटसार आदि कई विषय पढ़ाती थीं। दिन भर इनका समय अध्यापन कार्य में ही बीत रहा था। इधर आदिमती जी भी अनेक आर्यिकाओं, ब्रह्मचारिणियों को गोम्मटसार पढ़ाती थीं और कु. सुशीला को व्याकरण, न्याय, धर्म आदि पढ़ाती थीं। कु. कला और कनक को भी कभी मैं पढ़ा देती थी, कभी आर्यिका जिनमती या आदिमती पढ़ाती थीं।

इस प्रकार से अपनी शिष्याओं को पढ़ाने और पढ़ने में दत्तचित्त देखकर मैं बहुत ही प्रसन्न थी। जैसे अपनी संतान के उत्कर्ष को देखकर माता-पिता फूले नहीं समाते हैं, वैसे ही मैं भी शिष्याओं की योग्यता, क्षमता, देख-देखकर हर्षित होती रहती थी। मेरा स्वास्थ्य कमजोर होने से मैंने अध्यापन का अधिक भार अब नहीं लिया था। दूसरी बात-मेरा अभिप्राय सदैव यह रहा है कि पढ़ाकर ज्ञान अधिक प्रस्फुट होता है अतः अपनी शिष्याओं को सदा ही पढ़ाने की प्रेरणा दिया करती थी। आ. जिनमती भी स्वयं कहा करती थीं-

‘‘अम्मा! मैंने द्रव्यसंग्रह, गोम्मटसार, प्रमेयकमलमार्तंड आदि पढ़े हैं, याद करके सुना देती थी किन्तु मेरे हृदय में कम उतरते थे। अब जब मैं पढ़ाती हूँ, तब मुझे इनका विषय अच्छी तरह समझ में आता है और अत्यधिक खुशी होती है।’’ उन दिनों कुछ लोग ऐसे भी थे कि जो मेरा उत्कर्ष, मेरी शिष्याओं की विशेषतायें, नहीं सहन कर पाते थे, वे प्रायः अकारण ही मेरी झूठी-झूठी निंदा किया करते थे। फिर भी सहनशीलता के निमित्त से मैं उनकी असत्य बातों का प्रायः प्रतीकार नहीं करती थी, जिसका फल मुझे मधुर न प्रतीत होकर कड़वा ही प्रतीत हुआ है, फिर भी सहनशीलता के बिना मोक्ष नहीं होगा, यह निश्चित है।

शिक्षण शिविर में विघ्न-

मैंने सोलापुर, सनावद और इंदौर के समान यहाँ सलूंबर में भी शिक्षण शिविर की रूपरेखा बनाई। कई साधु-साध्वियों को तथा कई एक प्रबुद्ध श्रावकों को यह बहुत अच्छा लगा, किन्तु किन्हीं ने इसे अनुपयोगी बतला दिया अतः जब आचार्यश्री के पास मैं आज्ञा लेने गई, तब आचार्यश्री ने भी इसका कोई उपयोग नहीं समझकर टाल दिया और बोले-‘‘यहाँ संघ के कौन-कौन साधु पढ़ायेंगे?.......।’’ मैंने सोचा था-‘‘गाँव-गाँव में शिक्षण शिविर लगाऊंगी।’’

मेरी इस भावना पर पानी फिर गया। मैंने संतोष की सांस ली और संघ में चुप बैठकर रहना ही श्रेयस्कर समझा। एक बार आर्यिका विशुद्धमती ने भी सभा में अपने प्रवचन में कहा था कि- ‘‘सामने वाले से युद्ध के समय समान ही शस्त्र लेने चाहिए, वैसे ही कहानपंथ-निश्चयएकांतपक्ष के खंडन में समान ही कार्य करने चाहिए।’’ तब कुछ प्रबुद्ध श्रावकों ने आकर कहा-‘‘माताजी! देखो, वे लोग जगह-जगह शिक्षण शिविरों के माध्यम से खूब धर्म-प्रचार कर रहे हैं अतः आप भी शिक्षण शिविर की रूपरेखा बनाइये.....सात-आठ दिन के शिक्षण शिविर में भी बहुत कुछ धर्म-संस्कार बनते हैं......इत्यादि।’’ किन्तु उस समय ना सो, ना ही रहा। आगे भी यह परम्परा नहीं चल पाई। हाँ! सन् १९६९ में जयपुर में मैंने ‘जैनज्योतिर्लोक’ पर एक शिक्षण शिविर लगाया था, जिसमें बड़े-बड़े विद्वानों ने भी भाग लिया था।

केशरियाजी की यात्रा के भाव-

उदयपुर, भिंडर आदि के अनेक श्रावक-श्राविकाएँ यहाँ आते ही रहते थे। मोतीलाल- जी मींडा आदि अनेक लोगों ने मुझसे प्रार्थना की- ‘‘माताजी! यहाँ से केशरियाजी तीर्थक्षेत्र नजदीक है। हम लोग आप को यात्रा करा देंगे। पास में उदयपुर में भी अनेक मंदिर हैं, आपके दर्शन हो जायेंगे और इस निमित्त से सारा उदयपुर का जैन समाज आपके दर्शन का व आपके उपदेश का लाभ ले लेगा, सो आप एक माह का कार्यक्रम बनाकर चलिये।’’ मैंने भी सोचा कि-

पुनः इधर से विहार हो जाने के बाद केशरियाजी तीर्थ के दर्शन नहीं हो सकेगे अतः मैंने आचार्यश्री शिवसागरजी के पास जाकर प्रार्थना की, तब आचार्य श्री ने कहा- ‘‘पांच वर्ष तक यात्रा करके अभी पेट नहीं भरा है क्या?......बस, अब शांति रखो, कहीं नहीं जाना है..........फिर तुम्हारा स्वास्थ्य भी तो ज्यादा घूमने लायक नहीं है।’’ इतना सुनकर मैं चुप हो गई और पुनः यात्रा के लिए सोचा ही नहीं। कुछ दिन बाद यहाँ से विहार करते हुए संघ बांसवाड़ा आ गया।

बांसवाड़ा में आचार्य संघ-

यहाँ गर्मी के दिनों में तेज गर्मी पड़ रही थी अतः मेरा स्वास्थ्य काफी कमजोर रहता था। यहाँ के श्रावक आचार्य संघ का चातुर्मास कराने के लिए बहुत प्रयत्नशील थे। चूँकि संघ में प्रवेश करने के पूर्व मैं यहाँ आ चुकी थी, यहाँ कई एक श्रावक मेरे निकट भक्त बन गये थे, उनमें हीरालाल जी मेहता आदि थे। यहीं के पन्नालाल ने अपनी दो पुत्रियाँ मुझे दी थीं। अनेक श्रावक मेरे पास आ-आकर संघ की अनेक व्यवस्थाओं में परामर्श किया करते थे। चातुर्मास के लिए आचार्यश्री से बार-बार निवेदन कर ही रहे थे, मेरे पास भी आकर निवेदन करते थे कि-

‘‘माताजी! आप भी आचार्यश्री को और सभी साधुओं को यहीं चातुर्मास करने की प्रेरणा दीजिये।’’ आचार्यश्री कभी-कभी यहाँ की भक्ति से प्रभावित हो जाते थे। उधर प्रतापगढ़ के भक्त लोग भी चातुर्मास के लिए निवेदन करने हेतु बार-बार आ रहे थे। आचार्यश्री का एक उद्देश्य था कि-

‘‘हमारे संघ को चातुर्मास के बाद जहाँ के लोग श्रीमहावीर जी अतिशय क्षेत्र पहुँचा देंगे, हम वहीं चातुर्मास करेंगे।’’ आचार्यश्री ने प्रतापगढ़ वालों के आग्रह से एवं कई एक कारण विशेष से प्रतापगढ़ में चातुर्मास करने का आश्वासन दे दिया। यहाँ से प्रतापगढ़ की ओर संघ का विहार हो गया। यथासमय प्रतापगढ़ में संघ का मंगल प्रवेश हुआ। वहाँ के श्रावकों में हर्ष की लहर दौड़ गई। इतने बड़े संघ की व्यवस्था में कदाचित् जरा भी कमी होती थी, तो कोई न कोई साध्वियाँ जाकर आचार्यश्री से शिकायत कर देती थीं, तब कई बार आचार्यश्री इन श्रावकों से बोलते-

‘‘भैया! अभी तो बेटी बाप की है, अभी तो मैं स्वतंत्र हूँ, तुम्हारी व्यवस्था में गड़बड़ हुई तो हम अन्यत्र चातुर्मास कर लेंगे।’’ आचार्यश्री के मुख से ऐसे वचन सुनकर लोग हँस भी देते थे और घबरा कर व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने में लग जाते थे। यहाँ के श्रावक मुझसे परामर्श लेने आ जाते थे, तब मैं उन्हें उचित व्यवस्था के लिए समझा देती थी।

वास्तव में बड़े-बड़े संघों में सारी व्यवस्था आचार्यश्री के ऊपर ही नहीं रहती है। मैंने देखा था, आचार्यश्री वीरसागर जी के समय में भी बहुत से प्रसंग आर्यिका सुमतिमती माताजी संभाल लेती थीं और श्रावकों को उचित मार्गदर्शन देती रहती थीं। ब्रह्मचारी सूरजमल जी भी बहुत सी व्यवस्था बनवाते रहते थे। इस समय न तो आर्यिका सुमतिमती जी थीं और न ही ब्र. सूरजमल जी संघ में रहते थे, तब आचार्यश्री से छोटी-छोटी शिकायतें करने के बजाए, श्रावकों को उचित मार्गदर्शन दे देना, मैं अपना कर्तव्य समझती थी।

वर्षायोग स्थापना-

सन् १९६८ में आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी के दिन श्रावकों की प्रार्थना से आचार्यश्री शिवसागरजी ने अपने विशाल संघ सहित प्रतापगढ़ में वर्षायोग की स्थापना की। यहाँ बहुत चौके लगते थे, साधु-साध्वियों के आहार हो जाते थे। कई बार कोई-कोई ब्रह्मचारी को निमंत्रण न आने से, उनके भोजन की व्यवस्था आहार के बाद करानी पड़ती थी। मतलब यह था कि श्रावक लोग पहले दिन सभी व्रती वर्ग को निमंत्रण देना भूल जाते थे। इस पर एक दिन आचार्यश्री चिढ़ गये, उन्होंने मुझे बुलाया और पूछा- ‘‘तुम्हारी शीला ब्रह्मचारिणी के पास कुछ रुपये हैं?’’

मैंने कहा-‘‘हाँ, अवश्य होंगे।’’ महाराज ने कहा-‘‘बुलावो उसे।’’ मैंने समझा, किसी को दिलाने की कुछ आवश्यकता होगी। अतः मैंने शीघ्र ही कु. शीला को बुला दिया......। आचार्यश्री ने शीला से कहा-‘‘देखो, एक हजार रुपये ले आओ और अमुक-अमुक ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी को सौ-सौ रुपये दे दो।’’ उन सबको भी बुलाकर मंदिर में एकांत में सभी के हाथ में रुपये दिला दिये और बोले- ‘‘देखो! श्रावक का निमंत्रण न आने पर तुम लोग स्वयं भोजन बनाओ और खाओ, हाँ! बिना निमंत्रण किसी के घर नहीं जाना।’’ यह बात एक-दो श्रावकों के कान में पड़ गई, वे लोग मेरे पास दौड़े-दौड़े आये और घबराये हुए बोले- ‘‘यह क्या हुआ?’’

मैंने हँसकर उन्हें सांत्वना दी और समझाकर कहा- ‘‘तुम लोग सारे ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणियों के नाम की सूची बना लो और प्रतिदिन आपस में कुछ लोगों में निर्धारित कर लो कि इन्हें ये-ये लोग निमंत्रण देंगे। बस, व्यवस्था बन जायेगी। अरे भाई! व्यवस्था अच्छी बनाने के लिए ही तो आचार्यश्री ने ऐसा अनुशासन किया है।’’ वास्तव में अनेक चौके, अनेक श्रावक और अनेक व्रती वर्ग होने से किसी का निमंत्रण चूक जाना स्वाभाविक सा हो जाता था। उस समय मेरे निकट ही अधिक परिकर था। एक बार सेठ हीरालालजी पाटनी निवाई वाले आये और गिनकर हँसते हुए बोले- ‘‘माताजी! आपके सानिध्य में मोतीचंद और यशवंत ये दो छात्र हैं। सुशीला, शीला, कला, मनोरमा, गेंदीबाई, ताराबाई ये छह छात्रायें हैं। सबसे बड़ा परिवार आपका ही है।’’ तब मैंने कहा- ‘‘देखिये, सेठजी! मैंने आज तक आचार्यश्री के पास किसी भी व्यवस्था के बारे में जरा भी श्रावकों की शिकायत नहीं की है पुनः आप मेरे शिष्यों की गिनती क्यों कर रहे हो?’’ वे हँसकर चुप हो गये।

क्षुल्लिका अभयमती के दर्शन-

टिकैतनगर में सन् १९६८ में जैनमित्र में पढ़ा गया कि आचार्य शिवसागर के संघ का चातुर्मास प्रतापगढ़ में हो रहा है। वहीं पर आर्यिका ज्ञानमती माताजी संघ सहित आ चुकी हैं। पिता ने माँ मोहिनी जी के आग्रह से प्रतापगढ़ का कार्यक्रम बनाया। साथ में कैलाशचन्द, पुत्रवधू चन्दा, रवीन्द्र कुमार और एक पुत्री कामिनी को लाये थे। यहाँ इनके आते ही संघ में स्थित मोतीचन्द ने इनका स्वागत किया। समाज को उनका परिचय देकर, सेठ मोतीलाल जी जौहरी की कोठी के सामने एक कमरे में इन्हें ठहराया गया। यहाँ आकर इन लोगों ने मेरे और क्षुल्लिका अभयमती के दर्शन किये, आनंद का अनुभव किया क्योंकि पाँच वर्ष बाद माँ-पिता ने मेरा दर्शन किया था। पिताजी प्रतिदिन आहार दान देते थे।

यहाँ पर कलकत्ता से चाँदमल जी बड़जात्या आये हुए थे। उनसे भी चर्चा हुई। मैं सन् १९६३ से ६७ तक पाँच वर्ष यात्रा करने में रही थी। मेरे पृथक चातुर्मास में मुझे अनेक शिष्य-शिष्यायें मिली थीं। जो सब इस समय यहीं पर थे।

शिष्य-शिष्याओं का परिचय-

कलकत्ता चातुर्मास में कु. सुशीला को ५ वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत दे दिया था। वह और उसकी माँ बसन्तीबाई दोनों, यहाँ मेरे सानिध्य में थीं। ब्र. कु. शीला, कु. मनोरमा और कु. कला भी थीं। ब्र. गेंदीबाई थीं तथा मोतीचन्द और यशवंत कुमार भी यहीं संघ में थे। ये सभी मेरे पास ही अध्ययन कर रहे थे। एक बार (माँ) मोहिनी ने मुझसे पूछा-आपने इन सबको कैसे निकाला?

मैंने क्रम-क्रम से सबका इतिहास सुना दिया। सुशीला, कला की हँसमुख और चंचल प्रवृत्ति, शीला की गंंभीरता, यशवंत की कार्य-कुशलता और मोतीचन्द की पुत्र भावना से ये लोग बहुत ही प्रसन्न होते थे और इन सबको निकालने में मुझे कितने संघर्ष झेलने पड़े हैं, ऐसा सुनकर पिताजी बहुत ही आश्चर्य करने लगे।

मोतीचन्द तो टिकैतनगर परिवार से इतने प्रसन्न थे कि ऐसा लगता था, मानो हमें कोई निधि ही मिल गई है। ये दोनों माता-पिता की तथा उनके चौके की हर एक व्यवस्था में लगे रहते थे। यहाँ मैं सतत पढ़ने-पढ़ाने में ही लगी रहती थी। कभी-कभी मेरा सभा में उपदेश भी होता रहता था।

आचार्य शिवसागर जी की उदारता-

एक दिन क्षुल्लिका अभयमती की किसी माताजी के साथ कुछ कहा-सुनी हो गई। बात उसी क्षण महाराज जी के पास आ गई। आचार्य महाराज ने दोनों साध्वियों को ७-७ दिन के लिए सब रसों का परित्याग करा दिया। एक दिन माँ मोहिनी आचार्य महाराज के पास आकर बैठ गर्इं और काफी देर तक बैठी ही रहीं किन्तु कुछ भी बोली नहीं।

दूसरे दिन आचार्य महाराज ने आहार को निकलते समय क्षुल्लिका अभयमती को अपने साथ आने का संकेत कर दिया। वह आचार्यश्री के पीछे-पीछे चली गयी। महाराज जी सीधे माँ मोहिनी के सामने जाकर खड़े हो गये। अभयमती भी वहीं खड़ी हो गर्इं। माँ-पिता ने बड़ी भक्ति से आचार्य श्री की प्रदक्षिणा देकर उन्हें चौके में ले जाकर नवधाभक्ति की। क्षुल्लिका अभयमती को भी पड़गाहन कर चौके में बिठाया। आचार्यश्री की थाली परोसे जाने के बाद उन्होंने दूसरी थाली परोसने का भी संकेत दिया। माँ को उनके रस परित्याग की बात मालूम थी अतः वे नीरस परोसने लगीं। तभी महाराज ने संकेत कर उस थाली में दूध, घी आदि रस रखवा दिये पुनः महाराज जी का आहार शुरू हो गया। बाद में महाराज जी ने अभयमती को भी दूध, घी, नमक लेने का संकेत दिया। आचार्य महाराज की आज्ञानुसार अभयमती जी ने रस ले लिये। माता-पिता आचार्यश्री की इस उदारता को देखकर बहुत ही आश्चर्यान्वित हुए। मध्यान्ह में आकर माँ मोहिनी ने सारी बातें मुझको सुना दीं और बोलीं-

‘‘देखो! आचार्यश्री ने गलती पर अनुशासन भी किया और मैं कल मध्यान्ह में देर तक उनके पास बैठी रही थी, शायद इससे मेरे हृदय में इसके त्याग का दुख है, ऐसा जानकर आज स्वयं मेरे चौके में आये और अभयमती को भी लाकर उन्हें रस दिला दिया। सच में गुरु का हृदय कितना करुणार्द्र होता है!’’

रवीन्द्र कुमार को व्रत-

मैंने वहीं एक दिन रवीन्द्र कुमार को समझाया कि- ‘‘तुम अब एक वर्ष संघ में रहकर धार्मिक अध्ययन कर लो।’’ रवीन्द्र ने कहा-‘‘मैं अभी बी.ए. तक पढ़ूँगा।’’ तब मैंने रवीन्द्र को कुछ उपदेश देकर, समझाकर दो वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत दे दिया और यह भी नियम दे दिया कि- ‘‘जब तुम नया व्यापार शुरू करो या विवाह करो, उसके पूर्व संघ में आकर मुझसे आशीर्वाद लेकर जाना।’’ मैंने यह बात माँ को बता दी।

कामिनी के लिए प्रयास-

माँ मोहिनी की कामिनी पुत्री लगभग १३ वर्ष की थी। यह समय-समय पर मेरे पास आकर बैठ जाती और कुछ न कुछ धर्म का अध्ययन करती रहती। मैंने देखा इसकी बुद्धि बहुत ही कुशाग्र है। यह लड़की गणित में भी कुशल है। तभी मैंने उसे संघ में कुछ दिन रहकर धर्म अध्ययन करने की प्रेरणा दी, वह भी तैयार हो गई। अब क्या? मैंने जैसे-तैसे समझा-बुझाकर माँ को राजी कर लिया कि वो कामिनी को ४-६ महीने के लिए यहाँ छोड़ जावें। चूँकि संघ में साड़ी पहनना पड़ेगा अतः कामिनी ने माँ से आग्रह कर पेटीकोट, ब्लाऊज भी बनवा लिये और माँ से एक साड़ी ले ली।

पिताजी प्रायः प्रतिदिन आकर १०-१५ मिनट मेरे पास बैठते थे। वे कभी-कभी घर और दुकानों की कुछ समस्याएँ भी रख देते थे और समाधान अथवा परामर्श की प्रतीक्षा करते रहते थे। मैं ऐसे प्रसंगों पर बिल्कुल मौन रहती थी। तब वे अपने कमरे में आकर मोहिनी जी से कहते- ‘‘देखो! मैंने अमुक-अमुक विषयों पर माताजी से परामर्श चाहा किन्तु वे कुछ भी नहीं बोलती हैं।’’ माँ कहतीं- ‘‘वे घर संंबंधी चर्चाओं में परामर्श नहीं देंगी चूँकि उनके अनुमतित्याग है।’’ पिताजी चुप हो जाया करते थे। एक दिन मैंने उनसे कहा- ‘‘इस कामिनी की बुद्धि बहुत अच्छी है, तुम इसे मेरे पास २-४ महीने के लिए छोड़ जावो। कुछ थोड़ा धार्मिक अध्ययन कराकर भेज दूँगी।’’ इतना सुनकर पिताजी खूब हँसे और बोले-

‘‘आपने मनोवती को माताजी बना दिया, उसे कितने कष्ट सहन करने पड़ते हैं, सो मैं देख रहा हूँ। अब तुम्हारे पास किसी को भी नहीं छोडूँगा।’’ मेरा भी कुछ ऐसा स्वभाव ही था कि मेरे पास जब भी पिताजी आकर बैठते, मैं कामिनी के बारे में ही उन्हें समझाने लगती और अति आग्रह करती कि- ‘‘इसे छोड़कर ही जाओ............।’’ पिताजी कभी हँसते रहते, कभी चिढ़ जाते और कभी उठकर चले जाते। अपने स्थान पर जाकर माँ से कहते- ‘‘देखो ना! माताजी कितनी स्वार्थी हैं! मैं चाहे जितनी बातें ही पूछता रहता हॅूं, एक का भी जवाब नहीं देती हैं किन्तु अब मैं जैसे ही उनके पास पहुँचता हूं कामिनी बिटिया को अपने पास रखने के लिए वे मुझे समझाना शुरू कर देती हैं........।’’ इतना कहकर वे खूब हँसते और कामिनी से कहते- ‘‘कामिनी बिटिया! तुम माताजी की बातों में नहीं आना। हाँ! देखो ना, तुम्हारी बहन मनोवती को इन्होेंने कैसी माताजी बना दिया है?’’ तब कामिनी भी खूब हँसती और कहती-

‘‘मैं तो यदि रहूँगी तो दीक्षा थोड़े ही ले लूँगी। मैं तो मात्र कुछ दिन पढ़कर घर आ जाऊँगी।’’ एक दिन मैंने कु. कला और मनोरमा का परिचय कराकर पिता से कहा- बांसवाड़ा के सेठ पन्नालाल की ये दो कन्यायें हैं। एक बार वहाँ उपदेश में मैंने कहा कि यदि भक्तगण एक-एक गाँव से एक-एक कन्या भी हमें देने लग जावें और वे मेरे पास पढ़कर गृहस्थाश्रम में भी रहीं, तो आज गाँव-गाँव में सती मनोरमा और मैना सुन्दरी के आदर्श दिख सकते हैं। इसी बात पर पन्नालाल ने अपनी दो कन्यायें हमारे पास छोड़ी हैं। ऐसे ही आप भी इस कन्या को हमारे पास मात्र पढ़ने के लिए छोड़ दो, वापस घर ले जाना.......’’ किन्तु पिताजी हँसते ही रहे। उन पर इन शिक्षाओं का कुछ भी असर नहीं हुआ।

जब टिकैतनगर जाने के लिए इन लोगों ने तिथि निश्चित कर ली, सब सामान बंध गया, तब कामिनी ने एक छोटी सी पेटी मेें अपना सब सामान रख लिया और इधर-उधर हो गयी। पिताजी ने हल्ला-गुल्ला मचाकर उसे ढूंढ लिया और गोद में उठाकर, जाकर ताँगे में बैठ गये। जब सब वहाँ से रवाना होकर स्टेशन पर आ गये, तब उनके जी में जी आया। पुनः रास्ते में मोहिनी जी से बोले- ‘‘अब तुम्हें कभी भी संघ में नहीं लाऊँगा और न कभी बच्चों को ही।’’ माता मोहिनी जी, रवीन्द्र कुमार आदि मेरे वियोग से हुए दुःख को हृदय में समेटे हुए तथा संघ के साधुओं की चर्चा और गुणों की चर्चा करते हुए अपने घर पहुँच गये।

साधुओं की समाधि-

यहाँ मुनिश्री जयसागर जी की समाधि हो गई। वे अन्त में अध्यात्म भावना की रट लगा रहे थे। ‘चिन्मयस्वरूपोहं, निर्विकारोऽहं, शुद्धोऽहं, बुद्धोऽहं, निरंजनोऽहं’ इत्यादि भावना को भाते हुए उन्होंने नश्वर शरीर को छोड़ दिया। जब जयपुर में सन् १९५४ में आचार्यश्री देशभूषण जी के साथ मेरा चातुर्मास हुआ था, तब ये पाटोदी मंदिर में प्रतिदिन दर्शनार्थ आते रहते थे। इन्हें लोग्याजी कहते थे। इन्होंने अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़कर, आचार्यश्री वीरसागर जी से दीक्षा ली थी। दीक्षा से पूर्व जयपुर में मेरे निकट बैठकर कहा करते थे- ‘‘माताजी! आपने इतनी छोटी उम्र में दीक्षा ले ली है, मैं भी दीक्षा लेना चाहता हूँ लेकिन मेरा पुत्र छोटा है, वह घर कैसे संभालेगा? यह चिंता है......।’’ तब मेरे निकट बैठी क्षुल्लिका विशालमती जी कह देतीं- ‘‘भाई! दीक्षा लेने वाले किसी का भविष्य नहीं सोचते हैं। सबका भाग्य अपने-अपने साथ है। वे महानुभाव सुनकर हँस देते और कहते- ‘‘मुझे इन छोटी सी माताजी को देखकर खूब वैराग्य उमड़ता है।’’ मैं भी कह देती-

‘‘बाबाजी! आप घर छोड़ो। देखो! बेटा अपने आप योग्य बन जायेगा।’’ आखिर वही बात हुई। उन्होंने घर छोड़ा, दीक्षा ली। उनका बेटा योग्य बनकर घर संभालने में कुशल हो गया। इसके कुछ ही दिन बाद आर्यिका सिद्धमती माताजी ने भी शरीर की क्षीणता और वृद्धावस्था के निमित्त से सल्लेखना ले ली। उनका भी समाधिमरण महामंत्र सुनते-सुनते हो गया। ये दो समाधियाँ यहाँ हुई थीं, जो कि वैराग्य को बढ़ाने वाली थीं।

प्रीतिभोज-

इधर प्रांत में श्रावक धार्मिक आयोजन में प्रायः प्रीतिभोज करते हैं, तो उसमें बहुत बड़ी-बड़ी पूड़ियाँ बनाते हैं। यह इस प्रांत का भोजन हर प्रांत की अपेक्षा विलक्षण था। संघ के लोग उनकी पूड़ियाँ देख-देख हँसते रहते और आकर हम लोगों को सुनाते रहते थे। ये पूड़ियाँ लगभग एक-डेढ़ फुट की गोल रहती थीं। एक तो क्या, आधी पूड़ी से ही लोगों का पेट भर जाता था। मुनियों के केशलोंच के अवसर पर ‘प्रभावना’ के नाम से बड़े-बड़े बताशे बांटे जाते थे।

अध्ययन-अध्यापन-

मैं यहाँ कुछ शिष्य-शिष्याओं को न्यायदीपिका, कातंत्रव्याकरण, गोम्मटसार आदि ग्रन्थों का अध्ययन कराती थी। यहाँ पर पं. रतनचन्द जी मुख्तार आये हुए थे। वे धवला आदि के स्वाध्याय में गणित अच्छी समझाते थे। एक बार मैंने उनसे कहा- ‘‘पंडित जी! मुझे तिलोयपण्णत्ति से ज्योतिर्लोक की कुछ गणित आपसे समझना है।’’

उन्होंने कुछ अरुचि दिखाई, फिर भी मैं ग्रंथ लेकर बैठ गई और उन्हें दिखाया कि- ‘‘धातकी खंड में सूर्य की गलियाँ कहाँ से कहाँ तक हैं?’’ उन्होंने उस समय उस विषय को समझाने में असमर्थता प्रगट कर दी, तब मैंने स्वयं के पुरुषार्थ से, भगवान के सामने बैठकर, बार-बार उसी का अध्ययन करना शुरू किया तो उसकी परिधि के माप से उसकी गलियों के माप को भी समझ लिया। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। इस ज्योतिर्लोक का मैंने सन् १९६९ में जयपुर में शिविर भी लगाया था पुनः ‘जैनज्योतिर्लोक’ नाम से पुस्तक भी छप चुकी है, उसमें भी मैंने खुलासा कर दिया है।