ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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056.जयपुर से संघ का विहार

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जयपुर से संघ का विहार

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जयपुर से विहार-

एक दिन हम लोग आहार ही कर रहे थे कि सुनने में आया- ‘‘आचार्यश्री आहार के बाद अकेले ही सड़क के मार्ग से विहार करते हुए जा रहे हैं।’’ आहार करके हम लोग भी आचार्यश्री के पीछे-पीछे चल पड़े। आगे किसी छोटे से ग्राम में रात्रि विश्राम के लिए आचार्यश्री वहाँ ठहर गये। उस दिन संघ में और शहर में कोलाहल मच गया। बिना पूर्व सूचना के आचार्यश्री का यह विहार जयपुर की जैन-समाज को भी क्षोभदायी प्रतीत हुआ। संघ के साधुओं की व्यवस्था में भी गड़बड़ हो गई। अनेक श्रावक मेरे पास निवेदन करने लगे-

‘‘माताजी! आप आचार्यश्री को समझाइये........।’’ अनेक श्रावक लोग आचार्यश्री के पास भी गिड़गिड़ाने लगे- ‘‘महाराज जी! आप पूर्वसूचना देते तो हम लोग विधिवत् विहार कराते......।’’ बाद में शांत वातावरण में मैंने बहुत ही विनम्रता से आचार्यश्री से निवेदन किया-

‘‘महाराज जी! आप बहुत बड़े संघ के आचार्य हैं, छोटे-बड़े स्वस्थ-अस्वस्थ सभी तरह के साधु-साध्वी संघ में हैं अतः उन सबको संभाल कर आप चलिये तो अच्छा रहेगा, संघ में शांति रहेगी अन्यथा कोई साधु किधर विहार कर देगा और कोई किधर, आप संंभाल नहीं पायेंगे। यद्यपि आपकी यह वीरचर्या है फिर भी संघ के साधुओं को तो पूर्व सूचना देना आवश्यक है।’’ आचार्यश्री ने मेरी बात स्वीकार की और हँसकर बोले-‘‘ठीक है।’’ इसके बाद पुनः आचार्यश्री ने अपने आचार्यत्व काल में कभी भी बिना पूर्वसूचना के विहार नहीं किया। अनन्तर संघ सांगानेर पहुँच गया, वहाँ कुछ दिन के लिए ठहर गया।

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मेरी अस्वस्थता-

वहाँ मुझे एक छोटी सी फुड़िया हो जाने से उठने-बैठने में तकलीफ थी, मैं अस्वस्थ रूप से घास में लेटी हुई थी। एक दिन मोतीचंद ने आकर बताया कि- टिकैतनगर से तार आया है। पिताजी का स्वर्गवास हो गया है। बीमारी में मैं लेटी हुई थी अतः कुछ शोक का उद्रेक उमड़ आया। उसके कुछ ही क्षण पश्चात् सोचने लगी- ‘‘जिन माता-पिता के प्रति मैं निर्मोही थी। उनके जीवन में उनकी उपेक्षायें की हैं और उनके जाने के बाद अब उनके प्रति मोह क्यों आया? अपनापन क्यों?......अरे! अनंत-अनंत जन्मों में अनंतों माता-पिता बनाये हैं फिर भला किसके जाने के बाद शोक करना?.....’’ स्मरण में आया कि-‘‘जो घर का त्याग कर देते हैं, उन्हें घर के किसी भी जन के मरने पर पातक नहीं लगता है किन्तु पिता के मरने पर एक दिन का पातक लग जाता है। ऐसा श्रावकाचार में आया है।

इसके पूर्व जब जयपुर में पिता की बीमारी का समाचार आया था तब मैंने माँ को यह लिखाया था कि- आप और पुत्र-पुत्रवधुएँ सभी पिता को धर्म की बातें सुनाते रहना। उनका अन्त-समाधिमरण अच्छा करा देना। कोई भी रोना-धोना नहीं करना, मोह से उनका अन्त नहीं बिगाड़ना। धैर्य के साथ समाधिमरण पाठ आदि सुनाना। महामंत्र भी सुनाते रहना।’’ इसके अनुसार तथा स्वयं भी विवेकशीला होने से माँ मोहिनी ने सभी को समझाये रखा। समाधिमरण बहुत ही सुन्दर कराया। अनंतर पिता के प्राण निकल जाने के बाद ही लोग रोये थे। पहले सभी ने धैर्य रखा था।

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अन्त समय दर्शन की इच्छा-

सन् १९६९ के २५ दिसम्बर को पिता ने मेरे दर्शनों की भावना को लिए हुए तथा महामंत्र का श्रवण करते हुए इस नश्वर शरीर को छोड़कर समाधिमरणपूर्वक अपना परलोक सुधार लिया और स्वर्ग सिधार गये। इनकी समाधि के कुछ ही दिन पूर्व आचार्य सुमतिसागर जी महाराज ससंघ टिकैतनगर आये थे। उन्होंने घर जाकर पिता को सम्बोधित किया। पिताजी ने बड़े प्रेम से संघ के दर्शन किये और माँ ने घर में उनके आहार का लाभ लिया था।

पिताजी के स्वर्गवास के बाद संघ से मोतीचन्द टिकैतनगर गये। समय पाकर उन्होंने माँ से कहा- ‘‘आर्यिका ज्ञानमती माताजी ने ऐसा कहा है कि अब आप संघ में चलें और अपनी आत्मा का कल्याण करें। अब घर में रहकर क्या करना?.......।’’ माँ ने यह बात कैलाशचन्द आदि पुत्रों के सामने रखी। तब सभी पुत्र रो पड़े और बोेले- ‘‘अभी-अभी पिता का साया सिर से उठा ही है, भला हम लोग अभी आपके बगैर कैसे रह सकेगे..........?’’

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मुनिश्री सन्मतिसागर जी के दर्शन-

पिताजी के स्वर्गवास को १४-१५ दिन ही हुए थे कि टिकैतनगर में मुनि श्री सन्मतिसागर जी महाराज (टोडारायसिंह वाले) अपने संघ सहित पहुँच गये। माँ मोहिनी जी ने बहुत ही धैर्य रखा था और अपने पुत्र, पुत्रवधू तथा पुत्रियों को भी समझाती रहती थीं, घर में रोने-धोने का वातावरण नहीं था अतः माँ ने चौका किया और महाराज जी को आहार दिया। जब संघ वहाँ से विहार करने लगा तब मोहिनी जी चौका लेकर उनके संघ की व्यवस्था बनाकर अपनी बड़ी बहन को साथ लेकर कानपुर तक उन्हें पहुँचाने गर्इं। तब श्री सन्मतिसागर जी महाराज ने एक बार सभा में माँ मोहिनी की प्रशंसा करते हुए कहा कि- ‘‘किसकी माँ ने ऐसी अजवाइन खाई है जो कि आर्यिका ज्ञानमती माताजी जैसी कन्या को जन्म दे सके......।’’ पुनः महाराज जी मोहिनी जी से कहने लगे-

‘‘माँ जी! आपकी पुत्री आर्यिका ज्ञानमती जी मेरी बहुत ही उपकारिणी माता हैं। मैं जब क्षुल्लक था, तब एक बार संघ से अलग बगरू (जयपुर के पास) चला गया था। तब माताजी वहाँ आर्इं, वे मुझे संबोधित कर आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के पास वापस अपने साथ ले आर्इं। तब आचार्यश्री उनसे बहुत ही प्रसन्न हुए थे....। मैंने माताजी के पास प्रतिक्रमण का अर्थ, देववंदना विधि, आलाप पद्धति आदि ग्रन्थ भी पढ़े हैं।’’ इत्यादि। यह उनकी गुणग्राहकता थी। टिकैतनगर से मोतीचंद ने यहाँ आकर मुझे बताया कि-

‘‘पिताजी ने अंतिम दिन कहा-मुझे ज्ञानमती माताजी के दर्शन करा दो। ऐसा बार-बार कहने पर माँ ने गाँव की एक श्वेतवस्त्रधारिणी ब्रह्मचारिणी को ले जाकर खड़ा कर दिया और बोलीं, देखो! माताजी आ गई हैं, इनके दर्शन कर लो। पिता ने देखकर कहा-नहीं, ये मेरी माताजी नहीं हैं। पुनः बार-बार आपका स्मरण करते हुए उन्होंने आँखें बंद कर लीं। सभी लोग णमोकार मंत्र सुनाते रहे और उनकी आत्मा शरीर से प्रयाण कर गई। वे अंत में आपका स्मरण करते हुए और महामंत्र सुनते हुए इस लोक से चले गये।’’ एक बार माँ मोहिनी ने यह भी बताया कि-पिताजी कई दिन पूर्व माँ से बोले थे कि-‘‘तुम्हें मैंने जो धर्मकार्य से बहुत रोका था वह मेरा एकमात्र मोह ही था, उसे तुम क्षमा कर दो। अब तुम मेरे बाद खूब धर्म करना। चाहो तो माताजी के पास चली जाना और वहीं रहकर अपना जीवन धर्म में लगाना।’’

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निवाई में प्रभावना-

वहाँ से संघ निवाई आ गया। महावीर जयंती के समय यहाँ एक विशाल सभा का आयोजन किया गया। एक महानुभाव जैनेतर थे, उन्होंने अपने भाषण में स्त्रीमुक्ति के बारे में प्रतिपादन कर दिया, तभी उनके भाषण के मध्य ही कई साधु आवेश की मुद्रा में होकर कभी मेरी और पुनः कभी आचार्यश्री की ओर देखने लगे। बाद मैं मेरे उपदेश का नम्बर आया। मैंने बहुत ही शांति से उपदेश के मध्य यह विषय लिया और खुलासा किया कि-

‘‘दिगम्बर जैन संप्रदाय में स्त्रियों को हीन संहनन माना है अतः उनके मुक्ति प्राप्ति के योग्य शुक्लध्यान संभव नहीं है। दूसरी बात यह है कि स्त्रीपर्याय में वस्त्र का त्याग कर दिगंबर अवस्था नहीं धारण की जा सकती है। तीसरी बात यह है कि स्त्री और पुरुषों को सर्वथा समान अधिकार नहीं है। स्त्रियाँ गर्भ धारण करने की योग्यता रखती हैं, पुरुष नहीं रखते हैं। इस प्रकार अनेक कारणों से दिगंबर जैन धर्म में स्त्रीमुक्ति का निषेध है।’’

मेरे उपदेश सुनकर वे प्रभावित हुए। बाद में वे विद्वान् मेरे पास आकर गलती महसूस करते हुए बोले- ‘‘माताजी! मैंने श्वेतांबर संप्रदाय के ही ग्रन्थ पढ़े हैं, दिगंबर संप्रदाय के ग्रन्थ नहीं पढ़े हैं अतः मुझे कुछ अपने संप्रदाय के ज्ञानवर्धक ग्रंथ दीजिये।’’ वातावरण शांत रहा। अगर उस समय उन महानुभाव को गुस्से में रोका-टोका जाता, फटकारा जाता, तो पहले तो सभा का ही माहौल बिगड़ जाता। दूसरी बात, हो सकता था कि वे महानुभाव भी तर्क-वितर्क में पड़ जाते। या अपनी बात की ही पुष्टि में लग जाते। मेरी ऐसी भावना रहती है कि- ‘‘सभा में विपरीत प्रतिपादन होने पर शांति से ही उसे समझाने का और गंभीरता से ही अपनी बात कोे सुनाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसे-ऐसे प्रसंगों पर आवेश लाने से हानि की ही संभावना रहती है।’’ इस शांतिपूर्ण वातावरण से और उन महानुभाव के जिज्ञासापूर्ण व्यवहार से आचार्य महाराज भी प्रसन्न हो गये और उस सभा की समाप्ति सुखद रही।

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अध्यापन कार्य-

यहाँ मैं आचार्यश्री की आज्ञा से गोम्मटसार का अध्ययन कराती थी। उसमें सभी मुनिराज विराजते थे और अनेक आर्यिकायें भी बैठती थीं। आचार्यश्री भी कुछ निकट ही आसन पर विराजते हुए अपना स्वाध्याय करते रहते थे और बहुत खुश होते रहते थे। यहाँ मैं अपना अष्टसहस्री का अनुवाद कार्य भी प्रातः और रात्रि में किया करती थी। अष्टसहस्री आदि ग्रंथों के अध्ययन में मुनिश्री अभिनंदनसागर जी तो बैठते ही थे। वे एक दिन सभा में बोले- ‘‘आर्यिका ज्ञानमती माताजी कुशल शिल्पी हैं, गढ़गढ़ कर मूर्तियाँ बनाती हैं और आचार्यश्री उनकी प्रतिष्ठा करके-उन्हें दीक्षा देकर मुनि-आर्यिका बनाकर उन्हें पूज्य बना देते हैं।’’ इन शब्दों को सुनकर सेठ हीरालालजी ने भी मुनिराज की गुण-ग्राहकता की बहुत ही सराहना की और मुझसे आकर बोले- ‘‘माताजी! आप इन छोटे-छोटे मुनियों को खूब सिद्धांतादि ग्रंथों का अध्ययन कराकर, इन्हें आर्षपरम्परा के अच्छे योग्य साधु बना दो, जिससे इनके द्वारा आर्षपरम्परा की रक्षा होती रहे।’’

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टोंक में आगमन-

वहाँ से विहार कर संघ टोंक नगर में आ गया। गर्मी में यहीं पर ठहरा। मैं अपने लेखन कार्य में और अध्यापन कार्य में संलग्न रहती थी। संघ एक माह करीब नई टोंक में रहा। यहाँ कुछ वर्षों पूर्व अनेक जिनप्रतिमाएँ निकली थीं, उनके दर्शन किये। इसके बाद संघ पुरानी टोंक में आ गया।। यहाँ भी अच्छी धर्म प्रभावना हुई पुनः आचार्यश्री संघ सहित नई टोंक में नशियाजी में ही आ गये। लोगों के विशेष आग्रह से यहाँ संघ का चातुर्मास होना निश्चित हो गया।

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वर्षायोग स्थापना-

आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी की पूर्वरात्रि में आचार्य संघ ने विधिवत् चातुर्मास स्थापना की। यहाँ अच्छी धर्म प्रभावना हो रही थी। यहाँ मुझे जुकाम शुरू हो गया। खुले स्थान में ठंड लग जाने से कुछ ऐसा ही हुआ कि सर्दी-जुकाम से मेरा स्वास्थ्य काफी बिगड़ गया। फिर भी मैंने लिखाई नहीं छोड़ी।

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माता मोहिनी जी का आगमन-

यहाँ चातुर्मास में दर्शन करने और आहार देने के लिए टिकैतनगर से माँ मोहिनी जी, कैलाशचंद, उनकी धर्मपत्नी चन्दा, सुभाषचन्द और उनकी धर्मपत्नी सुषमा आदि लोग आये, लगभग एक माह ठहरे। चौका लगाकर प्रतिदिन आहार देते थे। यहाँ मोहिनी जी की छोटी पुत्री कु. त्रिशला थी जो कि लगभग ९ वर्ष की थी। वह मेरे पास आकर बैठ जाती और बोलती- ‘‘माताजी! कुछ पढ़ा दीजिये।’’ मैंने कहा-‘‘मैं गोम्मटसार पढ़ाती हूँ, तू पढ़ेगी?’’ वह बोली-‘‘हाँ, मैं आपसे ही पढूँगी, चाहे जो पढ़ा दीजिये।’’ मैंने भी कुतूहल में उसे गोम्मटसार कर्मकांड की कुछ गाथायें पढ़ा दीं। उसका उच्चारण शुद्ध था और क्षयोपशम अच्छा था अतः उसने वह गाथाएँ अर्थसहित याद कर मुझे सुना दीं। सुनकर बहुत ही प्रसन्नता हुई। अब यहाँ भी मैं पूर्व स्वभाव के अनुसार माँ मोहिनी जी के पीछे पड़ गई कि- ‘‘आप कुछ वर्ष इस बालिका को मेरे पास छोड़ दें, मैं कुछ धर्म पढ़ाकर इसे तुम्हें वापस कर दूँगी।’’ अनेक समझाने-बुझाने के बाद अनेक पुरुषार्थ से मैंने उसे रोक लिया। इसने मोतीचन्दजी, रवीन्द्र जी आदि के साथ ही शास्त्री का कोर्स पढ़ लिया। राजवार्तिक, अष्टसहस्री के सारांश, गोम्मटसार कर्मकांड पढ़कर शास्त्री की परीक्षा दे दी। आचार्यश्री कभी-कभी सायंकाल में प्रतिक्रमण के बाद इन विद्यार्थियों से कर्मकांड की चर्चा करते थे। वे जो भी प्रश्न पूछते, त्रिशला को गाथाएँ कंठाग्र होने से झट से वह उत्तर दे देती। आचार्यश्री बहुत ही प्रसन्न होते थे। यह कु. त्रिशला सन् १९७० में मेरे पास रही थी। सन् १९७९ तक रही, बाद में घर चली गई। उसके बाद सन् १९८० में उसका विवाह लखनऊ में हो गया है। अभी उसके दो बच्चे हैं। आज भी मैं उसके ज्ञान, अध्ययन और क्षयोपशम को याद करती हूँ तो आश्चर्य हो जाता है कि ‘‘वास्तव में इतनी छोटी उम्र में उसने कैसे ये सिद्धान्त, न्याय, व्याकरण, काव्य, अलंकार आदि पढ़े थे।’’

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एक माह उपवासी की पारणा-

यहाँ आर्यिका पद्मावती माताजी ने एक माह का उपवास किया था। ये मेरे पास रहती थीं। उपवास में भी प्रायः मेरी वैयावृत्ति करती रहती थींं। मैं यदि दिन मेें पाँच घंटे पढ़ाती थी तो ये बराबर मेरे पास ही बैठी रहती थीं। इन्होंने भाद्रपद के इस एक माह के उपवास मं तीन-चार बार ही गर्म जल लिया था। ऐसा एक माह का उपवास मैंने पहली बार ही देखा था। जब मैं इनसे कहती कि- ‘‘थोड़ा विश्राम किया करो।’’ तो ये बोलतीं-‘‘अम्मा! आपके मुख से दिन भर पढ़ने-पढ़ाने में धर्म सुन-सुन कर मैं अमृत जैसी तृप्ति का अनुभव करती हूँ, मुझे थकान-कमजोरी नहीं लगती हैं।’’ उनका मनोबल गजब का था। उनके उपवास निर्विघ्न सम्पन्न हुए। आसोज सुदी दूज को मेरा आहार माता मोहिनी के यहाँ हो गया। तभी ३१ उपवास के बाद बत्तीसवें दिन माँ मोहिनी जी के पुण्योदय से इनका पड़गाहन भी उन्हीं के यहाँ हो गया। इस एक माह उपवास के बाद उनकी पारणा कराकर उन लोगों को बड़ा ही आनन्द आया। इस अवसर पर पद्मावती माताजी की पुत्री बाल-ब्रह्मचारिणी कु. स्नेहलता भी आई हुई थीं।

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सप्तम प्रतिमा के व्रत-

एक दिन मोहिनी जी ने आचार्यश्री के समक्ष श्रीफल लेकर सप्तम प्रतिमा के व्रत हेतु याचना की। आचार्यश्री ने बड़े प्रेम से उन्हें सप्तम प्रतिमा के व्रत दे दिये। वैसे माँ मोहिनी ने पिता के स्वर्गवास के बाद ही अपने केश काट दिये थे और तब से सफेद साड़ी ही पहनती थीं। अब तो ये ब्रह्मचारिणी हो गर्इं। यद्यपि मैंने मोहिनी जी से आग्रह किया था कि- ‘‘अब आप घर का मोह छोड़कर संघ में ही रहो।’’ किन्तु उन्होंने कहा-‘‘अभी मैं घर जाकर पुत्री कामिनी की शादी करूँगी। अगली बार आकर रहने का प्रोग्राम बना सकती हूँ।’’ इस प्रकार आनंद और प्रभावना के वातावरण में यहाँ का चातुर्मास सम्पन हुआ।