ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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057.टोडारायसिंह ग्राम में संघ का आगमन

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टोडारायसिंह ग्राम में संघ का आगमन।

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टोडारायसिंह में संघ-

यहाँ से विहार कर क्रम से आचार्यसंघ टोडारायसिंह गाँव में पहुँच गया। यहाँ के लोगोें में भक्ति बहुत थी। भयंकर सर्दी के दिनों में भी मैं दिन उगते ही मुनियों को स्वाध्याय कराने आ जाती थी। मध्यान्ह में यहाँ के एक पार्श्वनाथ मंदिर में मैं जाकर सामायिक करती थी और साथ में आर्यिका पद्मावती जी मेरे लेखन का सामान ले लेती थीं। सामायिक के बाद वहीं भगवान के सामने मैं अनुवाद करती रहती थी। मुझे यह विश्वास था कि भगवान के सानिध्य में बैठने से अर्थ स्वयमेव स्फुटित हो जाता है। एक दिन टिकैतनगर से प्रकाशचन्द आ गये। मैंने प्रकाशचन्द को बिठाकर कुछ समझाना प्रारंभ किया- ‘‘प्रकाशचन्द! देखो, अनादिकाल से इस संसार में प्राणी जन्म-मरण के दुःख उठा रहा है। जैसे एक महासमुद्र में एक सरसों का दाना डाल दो और सैकड़ों वर्षों के बाद उस समुद्र में ढूँढने जाओ तो भला वह मिलेगा क्या?.....मान लीजिये मिल भी जाये फिर भी उससे भी कठिन मनुष्य पर्याय का पाना है। यह सूक्ति मुझे बचपन से याद है-

‘‘खोजो समुद्र में डाल के राई मिले नहीं। राई भी मिल जाय पर मनुज जनम नहीं।।’’

देखो, प्रकाशचन्द! इस संसार में यह जीव अनादिकाल से पंच परिवर्तन करता चला आ रहा है। मैं एक भव परिवर्तन को ही तुम्हें सुनाउँ तो तुम काँप उठोगे। किसी जीव ने नरकगति में जाने के लिए कम से कम दस हजार वर्ष की आयु बांध ली और वहाँ चला गया पुनः वहाँ से निकलकर मनुष्य या तिर्यंच होकर पुनः दस हजार वर्ष के जितने समय हैं उतनी बार ही यह जघन्य आयु बाँध बाँध कर नरक में जाता रहे। समय कितना सूक्ष्म है जानते हो? पुनः वही जीव कदाचित् दस हजार वर्ष में एक समय बढ़ाकर नरक में जावे। पुनः कभी दो समय बढ़ाकर नरक में जावे, ऐसे ही एक-एक समय के क्रम से वृद्धि करते हुए सातवें नरक की उत्कृष्ट आयु तेंतीस सागर तक पहुँच जावे। सागर में कितने समय हैं? कितने घंटे हैं? कितने वर्ष हैं? अनुमान नहीं कर सकते हैं। बस सर्वज्ञदेव ने कहा है कि असंख्यात वर्षोंं का सागर होता है। सागर यानि सागर, जैसे कि समुद्र के किनारे बैठकर कोई सुई की नोक से जल निकालना शुरू कर दे तो जितने वर्षों में वह समुद्र को खाली कर सकता है। उतने ही वर्षों को सागर समझ लीजिये।

ऐसे अनंत संसार में भ्रमण करते हुए इस जीव ने तिर्यंचगति की जघन्य आयु, एक श्वांस के अठारहवें भाग प्रमाण है, उतनी लेकर जन्मा। पुनः उस जघन्य आयु में भी जितने समय हैं, उतनी बार ही जघन्य आयु ले लेकर तिर्यंचयोनि में जन्मता रहा पुनः एक-एक समय बढ़ाते हुए तिर्यंच की अनंत भव प्राप्त कर लिये। बढ़ते-बढ़ते उत्कृष्ट भोगभूमि के तिर्यंच की तीन पल्य के आयु प्राप्त कर ली। ऐसे ही मनुष्य की भी जघन्य आयु श्वांस के अठारहवें भाग प्रमाण है। उसके समयों की गणना तक जघन्य आयु ग्रहण कर एक-एक समय से बढ़ते हुए तीन पल्य तक की उत्कृष्ट आयु लेकर भोगभूमि में जन्मे। ऐसे ही देवगति की जघन्य आयु दस हजार वर्ष की लेकर जन्मे, पुनः एक-एक समय बढ़ाते हुए नवमें ग्रैवेयक की उत्कृष्ट आयु बाईससागर तक लेकर पहुँचे। इस तरह कहीं एक भवपरिवर्तन होता है। यह नाममात्र से मैंने तुम्हें सुनाया है। इसी प्रकार से द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव ये चार परिवर्तनों से बहुत ही कठिन हैं।

कुल मिलाकर मैंने अनेक वैराग्य उपदेश सुना-सुनाकर प्रकाशचन्द का मन कुछ क्षण के लिए तो संवेग भाव से आद्र्र-गीला कर दिया। वे बोले- ‘‘माताजी! वास्तव में यह संसार एक महासमुद्र है.....देखो! यदि मैं निकलकर भी पुनः इसी में फस गया हूं तो जो है सो है, अब दूसरों को फसाने के लिए पुरुषार्थ नहीं करूँगा।

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अष्टसहस्री अनुवाद पूर्ण-

यहाँ मैंने पौष शु. १२ के दिन अष्टसहस्री का अनुवाद पूर्ण कर लिया। इसमें भावना, नियोग आदि के जो प्रकरण थे मैंने उन्हें छोड़ दिया था। यहाँ से मैने पं. माणिकचन्द जी न्यायाचार्य फिरोजाबाद वालों से और कई एक विद्वानों से पत्र द्वारा सहयोग चाहा और बुलाया कि आप यहाँ आकर इन कठिन विषयों में मुझे कुछ सहयोग दे दें, लेकिन सभी के यही पत्र आये कि यह न्याय का विषय अब हमें उपलब्ध नहीं रहा है, हम लोग अक्षम हैं। तब मैंने भगवान् की प्रतिमा के समक्ष बैठकर उन कठिन विषयों का भी अनुवाद शुरू किया और वहीं बहुत शीघ्र ही पूरा कर दिया, साथ ही चौवन सारांश भी बना दिये।

इधर सनावद से श्री रखबचन्द पांड्या और उनकी पत्नी कमलाबाई आये हुए थे। मोतीचन्द ने इनसे श्रुतस्कंध विधान कराकर मेरे द्वारा अनुवादित अष्टसहस्री की दस कापियों की पूजा कराई।

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आचार्यश्री का जयंती समारोह-

मैंने यहाँ एक माह पहले से ही आचार्यश्री की जन्म जयंती समारोह की रूपरेखा बनवा रखी थी। सभी कहते थे कि ‘‘आचार्य महाराज अपनी जयंती नहीं मनाने देंगे’’ किन्तु मैंने आचार्यश्री से आज्ञा ले ली थी। उस पौष शुक्ला पूर्णिमा के दिन रथयात्रा का भी कार्यक्रम बनवा दिया था कि जिससे आचार्यश्री भी जुलूस में चल सके।

इस दिन रथयात्रा के साथ एक पालकी में मेरे द्वारा अनुवादित सब दसों कापियां और मूल अष्टसहस्री ग्रन्थ को विराजमान किया गया। रथयात्रा के साथ ही साथ पालकी में ग्रन्थ का भी जुलूस निकाला गया। शाम को जब जुलूस वापस आया, मैंने अपनी कापियाँ संभाली, तो बीच की एक मोटी कापी गायब थी। मेरी तो सांस जहाँ की तहां रुक गई, एक क्षण के लिए तो मानों मैं अचेतन सी हो गई। बाद में मैं घबराते हुए मोतीचंद से बोली- ‘‘यह क्या हुआ? मेरी कापी कहाँ गिर गई? या कौन ले गया?......’’ मोतीचंद ने मेरी आकुलता देखकर समझाना शुरू किया-

‘‘माताजी! लाखों रुपये का मनुष्य मर जाता है तो भी चिंता नहीं करना चाहिए......शांति रखो, मैं अभी पता लगाता हूँ।’’ उस समय मोतीचंद की शिक्षा तो मुझे बहुत ही कड़वी लगी और मैं झुंझलाने लग गई। खैर! पता लगाने पर एक महानुभाव ने लाकर हँसते हुए मेरी कापी मोतीचंद को दे दी और बोले- ‘‘मैंने तो जुलूस के समाप्त होते ही यह कापी सिर्फ देखने के लिए निकाल ली थी।’’ खैर! वे लोग हँसने लग गये। मैंने कहा-

‘‘भाई! जो भी अनुवाद मैंने किया है अब वापस मैं मेरे जीवन में वैसा नहीं लिख सकती हूँ.....। इसलिए लाखों रुपये से भी अधिक मूल्यवान मेरी ये कापियाँ हैं।’’ आज मैं सोचती हूँ कि इस सुविधा के युग में उस समय मैं यह नहीं समझ सकी थी कि इनकी फोटो कापी करवा लूँ या टाइप करवा लूँ। आज तो मैंने स्वयं अपने कल्पदु्रम विधान की शीघ्र ही फोटो कापियाँ करा ली थीं और अन्य लेखन कार्यों की शीघ्र ही टाइप कापी करवा लेती हूँ। खैर! आज भी उस अष्टसहस्री ग्रन्थ की अनुवादित सारी कापियाँ यहां हस्तिनापुर में रत्नत्रय निलय में सुरक्षित रखी हुई हैं। उस दिन उस अनुवाद वाली कापियों की आरती की गई। आचार्यश्री ने बहुत ही प्रसन्न होकर कहा- ‘‘माताजी! ऐसे-ऐसे महान कार्य आप करती रहें, यही मेरा आशीर्वाद है।’’ बाद में मैंने न्यायकुमुदचन्द्र नामक ग्रन्थ के मूल आधारभूत श्लोकों का अनुवाद किया है जो कि ‘लघीयस्त्रीय’ नाम से अनुवादित अभी अप्रकाशित जम्बूद्वीप स्थल पर रत्नत्रयनिलय के ग्रन्थ भंडार में सुरक्षित रखी है।

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पंचकल्याणक प्रतिष्ठा-

इसके बाद संघ यहाँ से विहार कर वापस टोंक आ गया। यहाँ माघ में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होनी थी। फरवरी १९७१ में इस प्रतिष्ठा में टिकैतनगर से छोटी शाह, कैलाशचंद जी और उनके साथ रवीन्द्र कुमार भी आये हुए थे। अब मैंने जैसे-तैसे रवींद्र कुमार को समझाना शुरू किया। कई बार अकेले में बिठा-बिठाकर वैराग्य का उपदेश देने लगी। एक दिन काल परिवर्तन का स्वरूप समझाने लगी। मैंने कहा- ‘‘रवीन्द्र कुमार! देखो, इस मनुष्य पर्याय से ऐसा काम करो, जो सर्वश्रेष्ठ हो। श्री पूज्यपाद स्वामी ने कहा है-

इतश्चिंतामणिर्दिव्य इतः पिण्याकखंडकं।

ध्यानेन चेदुभे लभ्ये क्वांद्रियन्तां विवेकिनः।।

एक हाथ में चिंतामणि रत्न है और एक हाथ में खली का टुकड़ा, बताओ भला विवेकी लोग किसमें आदर करेंगे? अरे! ये पांचों इंद्रियों के विषय-संसार के सुख खली के टुकड़े के समान हैं और यह धर्म दिव्य चिंतामणि रत्न है।

पुनः मैंने कहा-देखो! एक अवसर्पिणी और दूसरा उत्सर्पिणी, ऐसे दो कालों का एक कल्पकाल होता है। एक अवसर्पिणी दस कोड़ा-कोड़ी सागर की एवं एक उत्सर्पिणी दस कोड़ा-कोड़ी सागर की, ऐसे बीस कोड़ा-कोड़ी सागर का एक कल्पकाल है। एक करोड़ को एक करोड़ से गुणा करने पर कोड़ा-कोड़ी बनता है और सागर-यानि सागर के अगाध-अथाह।

किसी जीव ने अवसर्पिणी के प्रथम समय में जन्म लिया और अपनी आयु पूरी कर मर गया। वही जीव दूसरी अवसर्पिणी के दूसरे समय में जन्म लेवे, तीसरी अवसर्पिणी के तीसरे समय में जन्म लेवे, चौथी अवसर्पिणी के चौथे समय में जन्म लेवे। इस प्रकार से एक अवसर्पिणी में जितने समय हैं उतने ही अवसर्पिणी के समय बराबर एक-एक समय अधिक में जन्म लेते हुए असंख्यात अवसर्पिणी व्यतीत कर दे, ऐसे ही उत्सर्पिणी को जन्म से पूरा करे।

पुनः वही जीव एक अवसर्पिणी के प्रथम समय में मरे, वही जीव द्वितीय अवसर्पिणी के द्वितीय समय में मरे, तृतीय अवसर्पिणी के तृतीय समय में मरे, इसी प्रकार के मरण से अवसर्पिणी के समय बराबर अवसर्पिणी समाप्त कर, उत्सर्पिणी में मरण प्रारंभ करके समाप्त करे, तब कहीं एक काल परिवर्तन पूर्ण होता है।

समय की व्याख्या तो बहुत ही सूक्ष्म है। एक आवली में असंख्यात समय होते हैं और आवली तो एक सेकेड से भी छोटी होती है। उदाहरण के लिए खाने वाले नागरबेल के सौ पानों की एक गड्डी बनावो। एक सुई लेकर उसमें एक दम से छेद कर दो। एक-एक पान को छेदने में जो समय लगा है, वह समय है। यह भी बहुत मोटी व्याख्या है। वास्तव में जिस काल का दूसरा हिस्सा-विभाग हो ही न सके, ऐसे सूक्ष्म काल को समय कहते हैं।

देखो! हमने तुमने, सभी जीवों ने इस संसार में परिभ्रमण करते हुए पता नहीं कितने पंच परिवर्तन समाप्त कर दिये हैं। जन्ममरण के दुःख सहते-सहते अब कहीं जैनधर्म में जन्म लेकर कुछ योग्यता प्राप्त की है कि जिससे गुरुओं का उपदेश ग्रहण कर सके। गुरु ही ऐसे होते हैं जो हाथ पकड़कर भव्यों को मोक्षमार्ग में लगाते हैं।

इस मनुष्य पर्याय से आप चाहें तो संसार के एहिक सुखों का उपयोग करें उसे समाप्त कर दें और चाहें तो इसी शरीर से मोक्षमार्ग की साधना करके संसार को समाप्त कर दें।

जैसे वृक्ष के नीचे पहुँचकर वृक्ष की छाया से संतुष्ट होने वाला एक व्यक्ति है, दूसरा उसके अमृत फलों को खाकर तृप्त होने वाला व्यक्ति है। यह सांसारिक सुख छाया के समान तुच्छ है और धर्मसाधना से प्राप्त होने वाला सुख, स्वर्ग-मोक्ष का वैभव अमृत फलों के समान है।

इत्यादि प्रकार से अनेक बार समझाने पर रवीन्द्र कुमार के मन में वैराग्य का अंकुर प्रस्फुटित हो गया पुनः प्रतिष्ठा पूर्ण होने के बाद मेरी शिक्षाओं से प्रभावित हुए रवीन्द्र को मैंने कहा- ‘‘इस बार दो-ढाई महीने के लिए यहाँ रुककर शास्त्री का कोर्स पढ़ लो और बम्बई परीक्षालय की परीक्षा दे लो। बाद में जैसा विचार बने वैसा करना।’’ तब रवीन्द्र कुमार ने भी इस बार यहाँ रहने के भाव व्यक्त किये। मुझे बहुत खुशी हुई पुनः किसी प्रसंग में मैं किन्हीं श्रीमान का परिचय दे रही थी तभी ये बोल उठे- ‘‘माताजी! आप कहाँ चाहती हैं कि मैं भी ऐसा ही व्यापारी-उद्योगपति बनूूँ, ऐसा ही श्रीमान बनूँ.....?आप तो चाहती हैं कि मैं भी यहां संघ में रहकर घर-घर में भोजन करूँं.....। मैंने कहा-‘‘रवीन्द्र! मैं तो यह चाहती हूँ कि तुम ऐसे आदर्श और महान् बनो कि ये और इन जैसे अनेक श्रीमान तुम्हारे चरणों में नमस्कार करें......।’’ इतना सुनकर रवीन्द्र कुमार कुछ सोचने लगे- ‘‘आपका चाहना भी ठीक ही है.....संभव है, आपके वचन फलें और ऐसी योग्यता मैं प्राप्त कर सकू तो अच्छा ही है।’’ बाद में उनके भाई कैलाशचन्द्र को मैंने जैसे-तैसे समझा-बुझाकर घर वापस भेज दिया और रवीन्द्र कुमार को रोक लिया।

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सुमेरु की प्राण प्रतिष्ठा-

इधर मॉडल के रूप में या प्रारंभ में निर्विघ्न कार्य की सिद्धि के रूप में मोतीचन्द ने मेरी इच्छानुसार मकराने से एक साढ़े तीन फुट उँचा पाषाण का सुमेरु बनवाया था। जिसमें सोलह चैत्यालयों में सोलह जिनप्रतिमाएँ बनवाई गई थीं। उसको यहाँ लाकर पंचकल्याणक के अवसर पर प्रतिष्ठा कराई गई। पुनः टिकैतनगर के प्रद्युम्नकुमार छोटी शाह ने आकर कहा- ‘‘माताजी! यह सुमेरु मैं अपने गांव टिकैतनगर ले जाउगा, अपने मंदिर में विराजमान करूँगा।’’ मैंने स्वीकृति दे दी, तब वे मोतीचन्द से बातचीत करके उसे अपने गांव ले गये। मंदिर में विराजमान कर दिया। इसे देखकर दरियाबाद के एक श्रेष्ठी अमृतलाल जी ने भी मोतीचन्द से निवेदन कर दूसरा मेरु और बनवाया। वह आज भी दरियाबाद के मंदिर में विराजमान है।