ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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059.माताजी का प्रथम शिष्या से वियोग

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माताजी का प्रथम शिष्या से वियोग

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अजमेर से विहार-

अजमेर में चातुर्मास के बाद कालू के श्रावक आचार्य संघ का विहार कराने के लिए प्रार्थना करने आ चुके थे। आचार्यश्री ने स्वीकृति भी दे दी थी अतः संंघ अजमेर से विहार करके पीसांगन नाम के एक छोटे से गाँव में कुछ दिनों के लिए ठहर गया। इधर मैंने सुना कि आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज अजमेर आने वाले हैं, इधर आकर दिल्ली जायेंगे। मेरी इच्छा अपने आद्यगुरु के दर्शनों की थी तथा एक बात और भी सुनने में आई कि आचार्यश्री महावीर कीर्ति जी महाराज गिरनार क्षेत्र से विहार कर चुके हैं, वे भी इधर ब्यावर-अजमेर होते हुए सम्मेदशिखर जायेंगे। इन युगल गुरुओं के दर्शनों की तीव्र उत्कंठा जाग उठी अतः मैंने आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज से निवेदन किया कि-

‘‘मैं यहीं कुछ दिन रूक जाऊंँ, इन आचार्यों के दर्शन करके संघ में आ जाऊँगी।’’ आचार्यश्री ने आज्ञा दे दी। इससे पूर्व अजमेर से सम्मेदशिखर यात्रा के लिए मुनिश्री अभिनन्दन सागर जी ने रूपरेखा बनाई थी, तब उसमें मुनिश्री सुपार्श्वसागर जी प्रमुख थे। आचार्यश्री धर्मसागर जी के पुराने दीक्षित शिष्य दयासागर जी उसमें चले गये थे और भी अनेक मुनि-आर्यिकायें उस यात्रा संघ में चले गये थे। उनमें से दयासागर जी के बारे में आचार्यश्री को बहुत ही दुःख हुआ था। वे यहाँ पीसांगन में मुझसे दो-तीन बार बोले-

‘‘माताजी! मुझे बड़ा आश्चर्य होता है, देखो......दयासागर चला गया। मुझे कभी भी विश्वास नहीं था.....कि दयासागर भी कभी चला जायेगा......।’’ ऐसा सुनकर मैं कहती थी-‘‘महाराज जी! सम्मेदशिखर यात्रा के लिए ही गये हैं। कोई बात नहीं, ये लोग जल्दी ही वापस आ जायेंगे......।’’ इसके सिवाय मैं मन में अवश्य सोच लेती कि- ‘‘वास्तव में किसी शिष्य पर क्या विश्वास करना?’’ मैंने जब आचार्यश्री से यहाँ रहने के लिए प्रार्थना की थी तब मेरी संघस्थ आर्यिकायें-जिनमतीजी, आदिमतीजी, श्रेष्ठमतीजी और रत्नमतीजी तो रहने वाली ही थीं, मुनि श्री संभवसागर एवं वर्धमानसागर भी आचार्यश्री से बोले-

‘‘मैं भी माताजी के पास यहीं रुकना चाहता हूँ। दोनों आचार्यों का दर्शन करके आ जाऊँगा।’’ आचार्यश्री अच्छी तरह जानते थे कि ये दोनों मुनि पहले आर्यिका ज्ञानमती के शिष्य रहे हैं पश्चात् इन्हीं की प्रेरणा से दीक्षा लेकर इन्हीं के पास पढ़ते हैं अतः इनके निमित्त से यहाँ रुक रहे हैं। आचार्यश्री ने इन दोनों के लिए भी आज्ञा दे दी। अब कालू वालों की प्रेरणा से यहाँ से आचार्य संघ का विहार हो गया, मैं कुछ दूर तक जाकर वापस आ गई।

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प्रथम शिष्या का वियोग-

आचार्य श्री के विहार के साथ आर्यिका संभवमती और उनकी शिष्या आर्यिका शुभमती भी चली गई थीं। प्रातः आर्यिका जिनमती मेरे साथ मंदिर आर्इं, एकांत देखा और मुझे चिपटकर रोने लग गर्इं-बोलीं- ‘‘अम्मा! आपको छोड़ने का भी मन नहीं हो रहा है और मेरी प्रिय शिष्या आर्यिका शुभमती भी न मेरे बगैर रह सकती है और न मैं ही उसके बिना रह सकती हूँ, यह भी आपको मालूम ही है। मैंने बहुत प्रयास किया कि वह यहीं मेरे और आपके पास रहे, जिससे न मुझे क्लेश हो न आपको, किन्तु वह अपनी गुर्वानी संभवमती को भी नहीं छोड़ सकती है। मेरे सामने इस समय ‘‘एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई’’ अम्मा! अब मैं क्या करूँ......?’’ मुझे भी अश्रु आ गये । कुछ क्षण विचार कर मैं मौन रही। पुनः उनकी इच्छा के अनुकूल आज्ञा देनी ही पड़ी। मैंने बार-बार उनके मस्तक पर हाथ फैरते हुए उन्हें विदा किया-एक बार तो ऐसा लगा- ‘‘कलेजा फट रहा है।’’

पुनः ज्ञान और वैराग्य से मन को संभाल कर शांत किया। यद्यपि ऊपर से मैं शांत थी फिर भी अंदर में इस प्रथम शिष्या का प्रथम बार वियोग कचोट रहा था। निकट की महिलाओं ने कहा- ‘‘वास्तव में जब कोई बहू घर में आती है और माता-पिता से उनके प्यारे बेटे को अलग कर देती है तब माता-पिता को दुःख कैसा होता है? वैसे ही यह शिष्या पढ़ने के लिए आई और ज्ञानमती माताजी से उनकी प्यारी शिष्या को छुड़ाकर ले गई।........।’’ सन् १९५५ में मेरे साथ ये आई थीं, तब से हम दोनों माँ बेटी के समान रह रही थीं। अब सन् १९७१ में इनका वियोग हुआ है। इस प्रकार ये सोलह वर्ष तक मेरे पास रही हैं। मेरी माता आर्यिका रत्नमती जी कहने लगीं- ‘‘देखो! घर छोड़ते समय ये मेरी बेटी मैना-आर्यिका ज्ञानमती जी कितनी निर्मोही थीं। आज भी हम लोगों के प्रति ये कितनी निर्मम हैं। अब इन्हें क्या हो गया है? ये शिष्या के मोह में कैसी विक्षिप्त हो रही हैं?’’ मैं भी कभी मन ही मन लज्जा का अनुभव करती थी कि-‘‘देखो! मुझे विवेक से काम लेना चाहिए।

उत्तमा स्वात्मचिंता स्यात् मोहचिंता च मध्यमा।

अधमा कामचिंता स्यात् परचिंता धमाधमा।।

इसके बाद ब्यावर के अनेक श्रावक आकर बार-बार आग्रह करने लगे- ‘‘माताजी! आप ब्यावर पधारें, हम लोग आप के उपदेश का लाभ लेवें। जब आचार्य युगल में से कोई भी अजमेर आयेंगे, आपको हम उनका दर्शन करायेंगे।’’ कुछ दिनों बाद हम सभी ने यहाँ से ब्यावर की ओर विहार कर दिया।

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ब्यावर में धर्म प्रभावना-

उधर आचार्यश्री धर्मसागर जी संघ सहित कालू गाँव में विराज रहे थे और मैं ब्यावर में सेठ साहब चम्पालाल रामस्वरूप जी की नशिया में ऐलक पन्नालाल सरस्वती भवन में ठहर गई। दोनों महाराज जी (मुनि श्री संभवसागर एवं वर्धमानसागर जी) वहाँ मंदिर के नीचे कमरे में ठहर गये।

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रत्नमती माताजी की चर्या-

अजमेर से विहार कर रत्नमती माताजी यहाँ ब्यावर तक पैदल आई थीं। इनका स्वास्थ्य ठीक था। उसके अतिरिक्त मनोबल विशेष था। दीक्षा लेते ही दोनों समय संघ के साथ प्राकृत का प्रतिक्रमण करती थीं। अन्य आर्यिकाओं को प्रायः दीक्षा के बाद संस्कृत भक्तियाँ और प्राकृत का प्रतिक्रमण पाठ अनेक बार पढ़ाना पड़ता, तब कहीं वे पढ़ पातीं किन्तु ये स्वयं शुद्ध पढ़ने लगींं। इन्हें किसी से पढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी। ये ही संस्कार इनकी सारी सन्तानों में रहे हैं। गृहस्थावस्था में ये नित्य ही त्रिकाल सामायिक में ‘‘काल अनन्त भ्रम्यो जग में सहिये दुःख भारी।’’ यह हिन्दी भाषा की सामायिक करती थीं, मैंने कहा- ‘‘अब आप आचारसार आदि ग्रन्थों में मान्य देववंदना विधि की सामायिक करिये। यही प्रामाणिक है।’’ रत्नमती माताजी ने उसी दिन से वही सामायिक करना शुरू कर दिया। इसमें श्री गौतम स्वामी द्वारा रचित संस्कृत चैत्यभक्ति और श्री कुन्दकुन्द देव द्वारा रचित प्राकृत पंचगुरु भक्ति का पाठ है। इस प्रकार दोनों समय प्रतिक्रमण और तीनों काल सामायिक विधिवत् करते रहने से इन्हें एक महीने के अंदर ही ये पाठ कंठाग्र हो गये। रत्नमती माताजी एक बार मुझसे बोलीं-

‘‘माताजी! आपको तो संस्कृत व्याकरण मालूम है। आप सामायिक की भक्तियों का अर्थ समझ लेती हैं किन्तु मुझे तो अर्थ का बोध नहीं हो पाता है अतः आप इनका हिन्दी पद्यानुवाद कर दें तो बहुत ही अच्छा हो।’’

मैंने इसके पूर्व ही टोंक में इस देववंदना विधि का हिन्दी पद्मानुवाद किया हुआ था सो इनको दिखाया। ये बहुत ही प्रसन्न हुर्इं और इसे शीघ्र ही मुद्रित कराने की प्रेरणा दी। फलस्वरूप वह पुस्तक ‘‘सामायिक’’ नाम से प्रकाशित हो गई। रत्नमती माताजी उस पुस्तक से हिन्दी ‘‘सामायिक’’ पढ़कर चैत्यभक्ति आदि का अर्थ समझकर गद्गद हो जाती थीं।

ब्यावर में प्रातः प्रतिदिन मेरा उपदेश होता था और मध्यान्ह में छहढाला की कक्षा चलती थी, अनन्तर उपदेश होता था। ब्यावर के सभी पुरुष अधिक संख्या में भाग लेते थे। साथ ही सेठ हीरालाल जी स्वयं उपदेश और कक्षाओं में उपस्थित रहते थे। रत्नमती माताजी भी दोनों समय उपदेश में बैठती थीं। मैं तो दिन भर प्रायः राजवार्तिक, अष्टसहस्री आदि गंथों के अध्यापन में व्यस्त रहती थी। उस समय जैनेन्द्र प्रक्रिया का अध्ययन भी करा रही थी जिसे मुनि वर्धमानसागर, आर्यिका आदिमती जी, ब्र. मोतीचंद, कु.माधुरी, कला आदि पढ़ते थे। यहाँ संघ नशिया में ठहरा हुआ था और चौके शहर में होते थे। सेठ हीरालाल जी रानीवाला, सोहनलाल जी अग्रवाल आदि भक्तों की भक्ति से आर्यिका रत्नमती जी भी प्रतिदिन आहार को इतनी दूर जाया करती थीं। इनकी चर्या पूर्णतया व्यवस्थित रहती थी।

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जम्बूद्वीप रचना मॉडल-

अजमेर में कई बार मैंने सेठ साहब भागचन्द जी सोनी से जम्बूद्वीप रचना के बारे में परामर्श किया था। यहाँ भी एक दिन सेठ साहब आये। उनकी विशेष प्रेरणा रही कि एक कमरे में इस जम्बूद्वीप का मॉडल बनवाना चाहिए। ब्यावर के प्रमुख भक्तगण, जिसमें सेठ हीरालाल रानीवाला, धर्मचन्द मोदी आदि ने भी मेरे से आग्रह करके पंचायती नशिया के मंदिर जी के एक कमरे में यह मॉडल बनवाना चाहा। मेरी आज्ञा लेकर मोतीचन्द ने कारीगरों को हर एक चीजों का माप बताया और बैठकर बहुत ही श्रम के साथ सीमेंट से जम्बूद्वीप का भव्य मॉडल तैयार करवाना शुरू कर दिया। यह मॉडल आज भी वहाँ मंदिर के कमरे में बना हुआ है।

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अष्टसहस्री ग्रन्थ प्रकाशन योजना-

यहाँ सरस्वती भवन में पं. हीरालाल सिद्धांत शास्त्री रहते थे। उनकी भी अच्छी भक्ति थी। मैंने उन्हें अपने द्वारा अनुवादित अष्टसहस्री दिखाई-पहले तो वे यही कहते रहे- ‘‘माताजी! मैंने ४०-४५ वर्ष पूर्व अष्टसहस्री पढ़ी थी अतः अब मेरा उसके विषय में-न्याय के विषय में बिल्कुल उपयोग नहीं है।’’ फिर भी मेरी विशेष प्रेरणा से उन्होंने एक दो बार मेरे पास बैठकर मूलप्रति सामने रखकर हिन्दी अनुवाद पढ़ा, तब वे बहुत खुश हुए और बोले- ‘‘माताजी! एक दरबारीलाल विद्वान क्या, अनेक न्यायाचार्य मिलकर भी इतना बढ़िया हिन्दी अनुवाद नहीं कर सकते हैं। अनुवाद बहुत अच्छा है, शब्दशः व्याकरण और न्याय के अनुकूल बहुत ही शुद्ध है.....। अब आप अधिक ऊहापोह न कर इसे छपा दीजिये।’’ इसके बाद ७-८ दिनों तक उन्होंने अनुवाद के कुछ पेज पढ़े पुनः रख दिये और बोले- ‘‘ज्यादा जाँचने का चक्कर छोड़ो, प्रेस में भिजवाने की सोचो।’’ मोतीचन्द से बोले-‘‘आपको इसे जल्दी छपाना चाहिए।’’

एक दिन सहसा सेठ हीरालाल जी रानीवाला आये और बोले- ‘‘मोतीचन्द जी! मेरे पुत्र देवेन्द्र कुमार बम्बई से आये थे, वे पाँच हजार रुपये दे गये हैं, आप चाहे जिस काम में लगा दें।’’ मैंने कहा-‘‘जो यहाँ जंबूद्वीप का मॉडल बन रहा है, उसी में लगा दो।’’ सेठ जी बोले-‘‘नहीं, यहाँ तो काम चल ही रहा है अतः आप संघ के ही किसी काम में लगा दो।’’ तब मोतीचंद ने मुझसे कहा- ‘‘माताजी! इन पाँच हजार रुपये से कागज खरीदकर अष्टसहस्री छपने प्रेस में दे दूँ। यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं अजमेर जाकर कोई अच्छी प्रेस देखूँ।’’ मैंने कहा-‘‘देखो! चांदमलजी पांड्या हमेशा कहा करते थे कि अन्य कोई दातार नहीं लेना, मैं ही पूरी अष्टसहस्री छपाऊँगा अतः वे कैसे मानेंगे?’’ मोतीचंद ने कहा-‘‘इन दिनों सेठ साहब आये नहीं हैं। जब आयेंगे, तब विचार किया जायेगा, तब तक इन रुपयों से मैं कागज तो खरीद कर प्रेस में दे ही दूँ।’’ मैंने कहा-‘‘ठीक है।’’

बस आज्ञा मिलनी थी कि मोतीचंद अजमेर गये। प्रेस का निर्णय कर कागज खरीद लिया और आकर मेरे पास बैठकर भिन्न-भिन्न टाइप निश्चित कर प्रेस में मैटर दे दिया। पहले अलग-अलग कम्पोज होकर आया। मैंने एक-एक पेज के हिसाब से संस्कृत, हिन्दी, टिप्पण आदि का मैटर व्यवस्थित कर दिया। कुछ फर्मे छपे।

इधर सरस्वती भवन में एक अष्टसहस्री की मूल प्रति बहुत ही प्राचीन हस्तलिखित की प्राप्त हुई। उसे मैंने देखा, वह खूब शुद्ध थी। उसमें कुछ टिप्पण विशेष थे। पहले हस्तलिखित प्रति को पढ़ने का मैंने अभ्यास बनाया। इसमें मात्रायें पीछे पड़ी रहती हैं। मैंने रवीन्द्र कुमार, कु. माधुरी को इसका अभ्यास कराया और उस मूल प्रति से कुछ पाठांतर और टिप्पण लिखाना शुरू कर दिया।

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आचार्य संघ का दर्शन नहीं हुआ-

इधर आचार्य देशभूषण जी महाराज अजमेर नहीं आये। वहाँ उनके दर्शन का लाभ मुझे नहीं मिल सका। प्रत्युत् कुछ ही दिनों में एक दूसरा आकस्मिक समाचार मिला कि- ‘‘आचार्य श्री महावीरकीर्ति जी महाराज का महसाना में समाधिमरणपूर्वक स्वर्गवास हो गया है।’’ इस घटना से मुझे कुछ विक्षिप्तता हुई। सोलापुर बम्बई की परीक्षा देने वाली संघस्थ छात्रायें कु. माधुरी, त्रिशला, कला आदि अपने शास्त्रीय विषयों की तैयारी कर रही थी। इधर मुझे रवीन्द्र के लिए चिंता हो रही थी कि- ‘‘यदि रवीन्द्र अधिक दिन घर में रहेेंगे, तो गृहस्थाश्रम में फस जायेंगे।’’ इसलिए मैंने कई एक पत्र लिखाये थे कि रवीन्द्र कुमार अब संघ में आ जाएँ। माताजी याद कर रही हैं।’’

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रवीन्द्र का पत्र-

तभी घर से रवीन्द्र कुमार जी का एक पत्र आया कि- ‘‘मैंने दुकान के ऊपर एक नया कमरा बनवाकर उसमें ‘‘उपहार साड़ी और रेडीमेड केन्द्र’’ नाम से एक नई दुकान खोलने का निर्णय किया है। तदनुरूप दिनाँक १२ अप्रैल १९७२ को उसके उद्घाटन का मुहूर्त है। इस अवसर पर यदि भाई मोतीचन्द जी यहाँ आ जाएँ तो भले ही मैं उनके साथ संघ में आ सकता हूँ अन्यथा मेरा आना कठिन है......।’’ मोतीचन्द जी को उस समय ज्वर आ रहा था, वे चादर ओढ़कर सोये हुए थे। कुछ ही देर बाद मैं मंदिर में आई। वहीं बरामदे में मोतीचंद को मैंने वह पत्र दे दिया। पढ़ते ही उनका बुखार भाग गया। वे उठकर बैठ गये और पसीना पोंछने लगे। बोले- ‘‘माताजी! मैं टिकैतनगर जाऊंगा।’’ मैं बोली-‘‘अभी तो तुम्हें चार डिग्री बुखार था। तुम कैसे जा सकोगे?’’ मोतीचन्द ने कहा-‘‘नहीं, अब देख लो, मुझे बुखार नहीं है। मेरे मन में इतनी प्रसन्नता हुई कि जैसे मानो मोतीचंद को अपने घर ही जाना है।’’ मोतीचन्द अगले दिन रवाना हुए, टिकैतनगर पहुँचे। मुहूर्त पर नई दुकान का उद्घाटन हुआ। बाद में मोतीचन्द ने रवीन्द्र कुमार को साथ चलने का प्रोग्राम बनाया। इसी प्रसंग में भाई कैलाश चन्द और प्रकाश चन्द आदि ऐसे चिपट गये, बोले- ‘‘रवीन्द्र को हम लोग किसी हालत में भी नहीं भेजेंगे।’’ कुल मिलाकर बड़े ही श्रम से रवीन्द्र का प्रोग्राम ब्यावर के लिए बन पाया। मोतीचन्द खुश हुए, साथ में रवीन्द्र को लेकर ब्यावर आ गये। मुझे भी हार्दिक प्रसन्नता हुई। यहाँ रवीन्द्र कुमार जी कई दिन रहे। प्रतिदिन मेरी यही प्रेरणा चलती रही कि- ‘‘अब तुम आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत लेकर ही घर जाना अन्यथा एक दिन विवाह के बंधन में बंध जाओगे। देखो! यह मनुष्य पर्याय आत्महित के लिए मिली है, इसे नश्वर भोगों में लगाकर व्यर्थ मत करो। जिस शरीर से आत्म निधि प्रकट की जा सकती है, उससे इस चंचल लक्ष्मी के कमाने का कार्य क्या मायने रखता है?......’’ इत्यादि प्रकार से बहुत सी शिक्षास्पद बातें कहा करती थी। आखिरकार मेरी शिक्षाओं का रवीन्द्र के ऊपर भी प्रभाव पड़ ही गया। रवीन्द्र ने ब्रह्मचर्य व्रत लेने की इच्छा जाहिर की। तत्क्षण ही मैंने कहा-

‘‘मोतीचन्द! तुम इन्हें साथ लेकर नागौर चले जाओ। वहाँ आचार्यश्री धर्मसागर जी से इन्हें व्रत दिलाकर ले आवो।’’ ये दोनों नागौर पहुँच गये। रवीन्द्र ने श्रीफल चढ़ाकर आचार्यश्री से आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर लिया। संघ के सभी साधुओं को भी बहुत ही प्रसन्नता हुई। नागौर की जैन समाज ने भी रवीन्द्र कुमार का अच्छा सम्मान किया पुनः ये दोनों खुशी-खुशी ब्यावर आ गये। यहाँ पर भी मोतीचन्द ने समाज को सारी बातें बताई पुनः इनके परिचय का छोटा सा फोल्डर तैयार किया, छपवा लिया और समाज में सभा का आयोजन कर इन्हें फूलमालाओं से सम्मानित किया। रत्नमती माताजी ने भी शुभाशीर्वाद दिया कि- ‘‘तुम अपने जीवन में धर्मरूपी धन का खूब संग्रह करो तथा त्याग में आगे बढ़ते हुए एक दिन अपने लक्ष्य को प्राप्त करो।’’ मैंने भी यही आशीर्वाद दिया कि-

‘‘इस नश्वर शरीर से ही अविनश्वर सुख प्राप्त किया जा सकता है। अब तुमने वनिता बेड़ी को तो काट दिया है इसलिए घर कारागृह में मत फसना। अभी तुम्हारी विद्या अध्ययन की उम्र है अतः इसका मूल्यांकन कर घर-दुकान का मोह छोड़कर जल्दी ही संघ में आओ।’’ रवीन्द्र ने मेरे शुभाशीर्वाद को, शिक्षाओं को ग्रहण किया। कुछ दिन वहाँ ठहरे। इसी मध्य सोलापुर की परीक्षाएँ आरंभ हो गयीं। संघस्थ बालिकाओं ने प्रश्न-पत्र किये। अनन्तर रवीन्द्र कुमार सभी का आशीर्वाद लेकर वापस घर चले गये।

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नई दुकान, नया उत्साह-

चूँकि इन्होंने स्वयं नई दुकान खोली थी, नया उत्साह था। नये जीवन के साथ नई कमाई का, स्वयं की कमाई का पैसा साथ में होना उन्हें आवश्यक महसूस हो रहा था। मैं भी अब निश्चिंत थी। सोचती थी- ‘‘अब यह कितने दिन घर रहेंगे? कितने दिन दुकान करेंगे? जब ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया है तो मोक्ष मार्ग में तो लग ही गये हैं। एक न एक दिन संघ में रहकर आत्मसाधना को ही अपना लक्ष्य बनायेंगे।’’

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दिल्ली विहार की चर्चा-

इसी मध्य फलटन के माणिकचन्द आये हुए थे। उन्होंने वहाँ जम्बूद्वीप मॉडल बनते हुए देखा, बहुत प्रसन्न हुए और बार-बार मुझसे प्रार्थना करने लगे- ‘‘भगवान महावीर का २५००वाँ निर्वाणोत्सव धूमधाम से मनाए जाने की तैयारी चल रही है। इस निर्वाणोत्सव प्रसंग में यह रचना अभूतपूर्व रहेगी। अखिल भारतीय स्तर पर इसका प्रचार होना चाहिए। आप दिल्ली पधारें तो अच्छा रहेगा।’’

सर सेठ भागचन्द जी सोनी की भी यही प्रेरणा थी। सेठ हीरालाल रानी वाला से परामर्श करने में उन्होंने भी इसी बात को पुष्ट किया। दिल्ली के परसादी लाल जी पाटनी का भी विशेष आग्रह रहा। साथ ही महासभा के अध्यक्ष और परमगुरुभक्त चाँदमल जी (गोहाटी) का विशेष आग्रह था कि- ‘‘माताजी! आप दिल्ली पधारें। निर्वाण महोत्सव को सफल करने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी आप जैसे साधु-साध्वियों पर है। यह कार्य भी आपकी पवित्र प्रेरणा से दिल्ली महानगरी में होना चाहिए। दिल्ली भारत की राजधानी होने के साथ ही जैन समाज का भी एक केन्द्र स्थान है।’’ टिकैतनगर से प्रकाशचन्द जी आये थे। उन्होंने भी मुझे दिल्ली विहार के लिए प्रेरणा दी। तब मैंने रत्नमती जी से परामर्श कर उनकी अनुमति ली। दोनों मुनि और संघ की आर्यिकाओं से बातचीत कर मोतीचन्द को नागौर आचार्यश्री की आज्ञा लेने भेज दिया। आचार्यश्री की आज्ञा प्राप्त कर मैंने ब्यावर से विहार कर दिया। नसीराबाद में आचार्य कल्प श्रुतसागर जी महाराज के संघ के दर्शन किये।

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जम्बूद्वीप मात्र बनवाने का निर्णय-

मोतीचन्द कई बार कहा करते थे- ‘‘माताजी! आप मध्यलोक के तेरह द्वीपों की अकृत्रिम रचना और उनके चार सौ अट्ठावन चैत्यालय के बजाय मात्र जम्बूद्वीप को ही बनवाने की बात सोचिये, तब तो यह संभव हो सकेगा, चूँकि आप खुले मैदान में यह रचना चाहती हैं। कम से कम सौ फुट ऊँचा सुमेरुपर्वत चाहती हैं......।’’ मैंने भी बहुत कुछ सोचकर एक दिन निर्णय कर लिया और कहा-‘‘ठीक है, जम्बूद्वीप निर्माण की ही स्कीम लेवो और इसे खुले मैदान में लगभग दो सौ या ढाई सौ फुट में सम्पन्न करो।’’ मोतीचन्द आदि श्रावकों से मैं यही कहा करती थी-‘‘किन्हीं आचार्यों का आश्रय लेकर यह रचना पृथ्वी पर बनवानी चाहिए। मैं आगे नहीं होना चाहती हूँ।’’ किन्तु मोतीचन्द कहा करते थे- ‘‘माताजी! आपके मार्गदर्शन के बगैर यह रचना असंभव है अतः आपको आगे होना ही पड़ेगा। हाँ! जो भी आप कहें, मैं वैसा करने को तैयार हूँ।’’ तभी मैंने एक दिन हँसते हुए कहा- ‘‘मोतीचन्द! तुम लिखकर देवो कि इस रचना में तन,मन, धन से कार्य करके उसे पूरा करोगे। मेरे संयम में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आना चाहिए। मैं किसी से पैसे की याचना नहीं करूँगी। तुम्हें यह मंजूर हो, तो मैं आगे होऊँगी।’’ मोतीचन्द ने उसी समय एक कागज लेकर, पेन से लिखकर मुझे दे दिया। उसमें ये शब्द थे- ‘‘माताजी! मैं जंबूद्वीप निर्माण में तन, मन, धन से कार्य करते हुए इस रचना को पूर्ण कराउँगा। आपके संयम में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आने दूँगा। आप किसी से भी पैसे की याचना नहीं करना। मैं यथाशक्ति रुपये लाकर यह रचना बनवाऊँगा। बस, आप हम लोगों को मार्गदर्शन देते रहिये। आपकी प्रमुखता और आशीर्वाद ही मेरे लिए सब कुछ है।’’ इसके बाद मैंने दिल्ली की ओर विहार का विचार बनाया।

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मुनिश्री श्रुतसागर जी के दर्शन-

एक दिन सुनने में आया कि आचार्यकल्प श्री श्रुतसागर जी महाराज यहाँ ब्यावर के पास नसीराबाद में आ गये हैंं। सन् १९६९ में ये जयपुर खानिया से संघ से अलग हुए थे पुनः अब सन् १९७२ में तीन वर्ष बाद उनके दर्शन का योग आया। मन में बहुत ही खुशी हुई और मैंने, संघस्थ सभी आर्यिकाओं ने और दोनों मुनियों ने यहाँ से विहार कर दिया, नसीराबाद आ गये। यहीं पर आचार्यश्री ज्ञानसागर जी महाराज ठहरे हुए थे। उनके शिष्य मुनिश्री विद्यासागर जी भी उनके पास थे। दोनों संघ के दर्शन कर मन प्रसन्न हुआ।

ब्यावर में ही मेरा निर्णय दिल्ली की ओर विहार करने का बन चुका था। ज्ञानसागर जी महाराज से भी वार्तालाप हुई। एक दिन विशेष रूप से विद्यासागर जी मुनि से मैंने लगभग एक घंंटे संस्कृत में वार्तालाप किया। मुनिश्री का संस्कृत व्याकरण का ज्ञान देखकर मन बहुत ही प्रसन्न हुआ।

मैंने समयोचित विषयों पर कुछ प्रश्नोत्तर भी किये-जैसे कि बिना यज्ञोपवीत धारण किये श्रावकों से आहार ले लेना। जाति-व्यवस्था एवं वर्ण-व्यवस्था को नहीं मानना आदि। चूँकि अभी तक हर एक मुनि यज्ञोपवीत देकर ही आहार लेते हैं। आचार्य ज्ञानसागर जी भी जब संघ में थे, बिना जनेऊ वाले श्रावक से कभी आहार नहीं लिया था इत्यादि। ‘‘माताजी! आज के नवयुवकों को कैसे आकर्षित किया जाये? कैसे धर्म में लगाया जाये? मुझे ऐसा ही प्रयास करना है, आदि।’’

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माधुरी को शुद्ध जल का नियम-

कु. माधुरी ने कहा-‘‘माताजी! आप दिल्ली के लिए विहार कर रही हैं। फिर क्या पता ये संघ कब मिले? अतः मैं शुद्ध जल का नियम लेकर आहार देना चाहती हूँ।’’

मेरी आज्ञा प्राप्त कर माधुरी ने सभी साधु-साध्वियों को आहार देकर हर्ष माना और कई दिनों बाद मुनिश्री ने अजमेर की ओर विहार कर दिया। मैंने भी अजमेर के लिए विहार कर दिया।

यहाँ पर कई दिन तक हम लोग रहे। यहाँ मुनिश्री सन्मतिसागर जी महाराज भी अपने संघ सहित ठहरे थे। आर्यिका रत्नमती माताजी उनके पास बैठकर खूब धर्मचर्चायें-गुणस्थान, मार्गणा की चर्चायें किया करती थीं।

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गोम्मटसार त्रिलोकसार अनुवाद की प्रेरणा-

एक दिन मैंने मुनिश्री अजितसागर जी, आर्यिका श्री विशुद्धमती जी आदि से निवेदन किया-‘‘मेरी इच्छा है कि गोम्मटसार जीवकांड, कर्मकांड, त्रिलोकसार, लब्धिसार और क्षपणासार इन पांच गंरथों का संस्कृत टीका के आधार से हिन्दी अनुवाद होना चाहिए।’’ आर्यिका विशुद्धमती से भी मैंने विशेष रूप से कहा कि-

‘‘आपकी अलौकिक गणित अच्छी है अतः आप इनके अनुवाद कार्यों को करने में समर्थ हैं। अपनी विद्वत्ता का उपयोग जिनवाणी की सेवा में कीजिये।’’

मुझे खुशी है कि श्री विशुद्धमती जी ने त्रिलोकसार का स्वाध्याय करते हुए इसका अनुवाद भी कर दिया है। पहले उन्हें इन नीरस भौगोलिक ग्रन्थों से प्रेम नहीं था, पुनःपं. रतनचंद जी मुख्त्यार के साथ स्वाध्याय करके इसका अनुवाद किया, जो छपकर प्रकाशित हो चुका है। बाद में तो इन्होंने ‘सिद्धान्तसार दीपक’ का अनुवाद किया, वह भी तीन लोक से संबंधित ही ग्रंथ था पुनः अभी तिलोयपण्णत्ति का भी संशोधन-अनुवाद करके प्रकाशन कराया है।

पहले जब सन् १९६७ में मेरे द्वारा लिखित भगवान बाहुबली पुस्तक छपी थी, तब इनका कहना था कि आर्यिकायें उपचार से महाव्रती हैं, इसलिए इनके द्वारा लिखित ग्रंथ प्रमाण कैसे होंगे? जबकि पं. आशाधर, पं. चामुंडराय आदि द्वारा लिखित अनगारधर्मामृत, चारित्रसार आदि प्रमाण की कोटि में हैं। खैर! बाद में तो स्वयं उन्होंने भी ग्रन्थ अनुवाद एवं लेखन कार्य किया है, यह खुशी की बात है।

इधर मैंने अपनी शिष्या आर्यिका आदिमती से गोम्मटसार कर्मकांड का अनुवाद कराया था। वह भी प्रकाशित हो चुका है। इससे पूर्व अपनी शिष्या आर्यिका जिनमती को प्रमेयकमलमार्तंड पढ़ाकर सन् १९७० में उसका अनुवाद कराया था, वह भी छप चुका है।