ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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06.कषायमार्गणाधिकार

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विषय सूची

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कषायमार्गणाधिकार

अथ कषायमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन चतुर्भिः सूत्रैः कषायमार्गणानाम अधिकारो निगद्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले सकषायवतां जीवानां अंतरनिरूपणत्वेन ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले अकषायवतां अंतरप्रतिपादनत्वेन ‘‘अकसाई’’ इत्यादिसूत्रमेकं इति पातनिका भवति।
अधुना सकषायिजीवानामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
कसायाणुवादेण कोधकसाई-माणकसाई-मायकसाई-लोभकसाईणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।९३।।
जहण्णेण एगसमओ।।९४।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।९५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कस्यचिद् जीवस्य क्रोधेन स्थित्वा मानादिं गतस्य द्वितीयसमये व्याघातेन, कालं कृत्वा नारकेषु उत्पादेन वा, आगतक्रोधोदयस्य एकसमयान्तरोपलंभात्। एवमेव शेषकषायाणामेकसमयान्तर-प्ररूपणा कर्तव्या। केवलं तु व्याघातेऽन्तरस्य एकसमयो नास्ति, व्याघाते क्रोधकषायस्यैवोदयदर्शनात्। कितु मरणेन एकसमयो वक्तव्यः, मनुष्य-तिर्यग्देवेषु उत्पन्नप्रथमसमये मानमायालोभानां नियमेनोदयदर्शनात् प्रोक्तं जघन्यांतरं।
उत्कर्षेण विवक्षितकषायाद् अविवक्षितकषायं गत्वोत्कृष्टमंतर्मुहूर्तं स्थित्वा विवक्षितकषायमागतस्य तदुत्कृष्टकालोपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले कषायसहितानां जीवानामंतरनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
इदानीमकषायिणामंतरनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
अकसाई अवगदवेदाण भंगो।।९६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-जघन्येनांतर्मुहूर्तमंतरं। उत्कर्षेण उपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाणं। क्षपकं प्रतीत्य नास्त्यन्तरमिति ज्ञातव्यं अपगतवेदिनामिव।
तात्पर्यमेतत्-क्रोधादिकषायारीन् कृशीकृत्य अकषायावस्थां प्राप्तुकामैः भवद्भिः स्वशुद्धात्मभावना भावयितव्या। पुनश्च-
यदा मोहात् प्रजायेते, रागद्वेषौ तपस्विनां।
तदैव भावयेत्स्वस्थमात्मानं शाम्यतः क्षणात्।।३९।।
इति चिंतनीयं निरन्तरम् ।
एवं द्वितीयस्थले अकषायिणामन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षयान्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानाम
षष्ठोऽधिकारः समाप्तः।


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अथ कषायमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में चार सूत्रों के द्वारा कषायमार्गणा नाम का अधिकार कहा जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में कषायसहित जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में कषायरहित जीवों का अन्तर कथन करने हेतु ‘‘अकसाई’’ इत्यादि एक सूत्र है। इस प्रकार अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

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अब सकषायी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणानुसार क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।९३।।

क्रोधादि चार कषाय वाले जीवों का जघन्य अन्तर एक समय होता है।।९४।।

क्रोधादि चार कषाय वाले जीवों का उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है।।९५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-किसी जीव के क्रोधकषाय के साथ रहकर मानादि कषाय में जाने के दूसरे ही समय में व्याघात से अथवा मरणकर नारकी जीवों में उत्पत्ति हो जाने से क्रोध के उदय को प्राप्त हुए जीव के क्रोधकषाय का एक समय मात्र अन्तरकाल प्राप्त होता है। इसी प्रकार शेष कषायों के भी अन्तर की प्ररूपणा करनी चाहिए। केवल विशेषता यह है कि मानादि कषायों के व्याघात होने पर एक समय प्रमाण अन्तरकाल नहीं होता, क्योंकि व्याघात होने पर क्रोध का ही उदय देखा जाता है। किन्तु मरण के द्वारा मानादिकषायों का एक समय प्रमाण अन्तर कहना चाहिए, क्योंकि मनुष्य, तिर्यंच व देवों में उत्पन्न हुए जीव के प्रथम समय में क्रमश: मान, माया व लोभ का नियम से उदय देखा जाता है। यह जघन्य अन्तर कहा गया है।

उत्कृष्ट से-विवक्षित कषाय से अविवक्षित कषाय में जाकर उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्तप्रमाणकाल तक रहकर विवक्षित कषाय में आये हुए जीव के उस कषाय का अन्तर्मुहूर्तप्रमाण उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त होता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में कषायसहित जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब कषायरहित जीवों का अन्तर निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

अकषाय वाले जीवों का अन्तर अपगतवेदी जीवों के समान होता है।।९६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन जीवों का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण होता है। क्षपक की अपेक्षा अन्तर नहीं होता, निरन्तर है। इस प्रकार इस अपेक्षा से अकषाय वाले जीवों के अन्तर में अपगतवेदियों के अन्तर से भेद नहीं है।

तात्पर्य यह है कि-क्रोधादि कषायरूपी शत्रुओं को कृश करके अकषाय अवस्था को प्राप्त करने की इच्छा से आप सभी को अपनी शुद्धात्मा की भावना भानी चाहिए। पुनश्च कहा भी है-

श्लोकार्थ-जिस समय तपस्वियों के मोहकर्म के उदय से राग और द्वेष उत्पन्न होने लगें, उसी क्षण वे अपनी स्वस्थ आत्मा की भावना भाएँ, जिससे क्षणमात्र में वे रागद्वेष शांत हो जाएंगे।।३९।। ऐसा निरन्तर चिंतन करते रहना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में कषाय रहित जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार समाप्त हुआ।