ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावनायै नमः"

06.तीर्थंकर जन्मभूमि वंदना

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तीर्थंकर जन्मभूमि वंदना

(मंगलचतुर्विंशतिका)

-अनुष्टुप् छंद-

अयोध्या मंगलं कुर्या-दनन्ततीर्थकर्तृणाम्।
शाश्वती जन्मभूमिर्या, प्रसिद्धा साधुभिर्नुता।।१।।

ऋषभोऽजिततीर्थेशोऽप्यभिनंदनतीर्थकृत्।
श्रीमान् सुमतिनाथश्चा - नन्तनाथजिनेश्वर:।।२।।

पंचतीर्थकृतां गर्भ - जन्मकल्याणकादिषु।
इन्द्रादिभि: सदा वंद्या, वंद्यते वंदयिष्यते।।३।।

संप्रति कालदोषेण शेषास्तीर्थंकरा: पृथक्।
संजातास्ता अपि जन्म-भूमयो मंगलं भुवि।।४।।

श्रावस्ती मंगलं कुर्यात्, संभवनाथजन्मभू:।
तनुतान्मे मनःशुद्धिं, भव्यानां भवहारिणी।।५।।

कौशाम्बी मंगलं कुर्यात्, पद्मप्रभस्य जन्मभू:।
जिनसूर्यो मनोऽब्जं मे, प्रपुल्लीकुरुतादपि।।६।।

वाराणसी जगन्मान्या, मंगलं तनुतान्मम।
जन्मभूमि: सुरै: पूज्या, सुपाश्र्वपाश्र्वनाथयो:।।७।।

चन्द्रपुरी सुरैर्मान्या, मंगलं कुरुतात्सदा।
चन्द्रप्रभजिनेंद्रस्य, जन्मभूर्जन्मपावनी।।८।।

कावंâदी मंगलं कुर्यात्, पुष्पदन्तस्य जन्मभू:।
आनंदं तनुताद् भूमौ, सर्वमंगलकारिणी।।९।।

मंगलं कुरुतान्नित्यं, जन्मभूर्भद्रकावती।
शीतलस्य जिनेंद्रस्य, मनो मे शीतलं क्रियात्।।१०।।

सिंहपुरी जगन्मान्या, मंगलं कुरुतान्मम।
श्रीश्रेयांसजिनेंद्रस्य, जन्मभूमि: शिवंकरा।।११।।

चंपापुरी जगद्वंद्या, मंगलं तनुताद् ध्रुवं।
वासुपूज्यजिनेंद्रस्य, जन्मभूमिर्नुतामरै:।।१२।।

सा वंâपिलापुरी नित्यं, मंगलं कुरुतान्मम।
मच्चित्तं विमलीकुर्यात्, विमलेश्वरजन्मभू:।।१३।।

रत्नपुरी यतीन्द्राणां, मंगलं कुरुताच्च न:।
सद्धर्मवृद्धये भूयाद्, धर्मनाथस्य जन्मभू:।।१४।।

हस्तिनागपुरी नित्यं, मंगलं तनुतान्मम।
शांतिवुंथ्वरतीर्थेशां, जन्मभूमिर्जगन्नुता।।१५।।

या मिथिलापुरी शश्वत्, मंगलं कुरुतान्मम।
जन्मभूमि: प्रसिद्धाभूत्, मल्लिनाथनमीशयो:।।१६।।

मंगलं संततं कुर्यात्, राजगृही सुजन्मभू:।
मुनिसुव्रतनाथस्य, दद्यान्मे सुव्रतं त्वसौ।।१७।।

शौरीपुर्यद्र्धचक्रयाद्यै:, मान्या मे मंगलं क्रियात्।
इन्द्रादिभि: सदा वंद्या, नेमिनाथस्य जन्मभू:।।१८।।

या कुण्डलपुरी पूज्या, मंगलं कुरुताद् भुवि।
जन्मभूमि: प्रसिद्धास्ति, महावीरस्य संप्रति।।१९।।

राजधानीह सिद्धार्थ-भूपते: साधुभिर्नुता।
नंद्यावर्तं च प्रासादं, रत्नवृष्ट्या सुमंगलम्।।२०।।

चतुर्विंशतितीर्थेशां, षोडश जन्मभूमय:।
वंद्यास्ता मंगलं कुर्यु:, घ्नन्तु जन्मपरम्परां।।२१।।

दीक्षाज्ञानस्थलं पूज्यं, प्रयागश्चाहिच्छत्रवं।
संततं मंगलं कुर्यात्, पूर्णज्ञानद्र्धये भवेत् ।।२२।।

वैलाशचंपापावोर्ज-यन्तसम्मेदशृंगिषु।
निर्वाणभूमयो यास्ता:, कुर्वन्तु मम मंगलम्।।२३।।

पंचकल्याणवै: पूज्या, भूमिसरोवराद्रय:।
तास्तान् ज्ञानमती याचे, दद्यु: सिद्धिं च मे धु्रवम्।।२४।।