ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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06.दान प्रश्नोत्तरी

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दान

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प्रश्न १३२—चतुर्थकाल में व्रततीर्थ को किसने प्रकट किया ?
उत्तर—चतुर्थकाल की आदि में सर्वप्रथम व्रत तीर्थ की प्रवृत्ति श्री ऋषभदेव भगवान ने की थी।

प्रश्न १३३—चतुर्थकाल में सर्वप्रथम दान की प्रवृत्ति किसने की ?
उत्तर—चतुर्थकाल में दान की प्रवृत्ति करने वाले राजा श्रेयांस हैं जिन्होंने सर्वप्रथम भगवान ऋषभदेव को इक्षुरस का आहारदान दिया था।

प्रश्न १३४—गृहस्थाश्रम को किस प्रकार सफल किया जा सकता है ?
उत्तर—गृहस्थाश्रम में धन—कुटुम्ब आदि से अधिक मोह रहता है इसलिए गृहस्थपना केवल संसार में डुबाने वाला है परन्तु उस गृहस्थपने में दान दिया जावे तो वह दान मनुष्य को संसार रूपी समुद्र में डूबने नहीं देता है।

प्रश्न १३५—धन की अच्छी गति क्या है ?
उत्तर—धन की अच्छी गति केवल दान ही है अर्थात् वह धन दान से ही सफल होता है।

प्रश्न १३६—लक्ष्मी की वृद्धि किस प्रकार सम्भव है ?
उत्तर—जो मनुष्य लक्ष्मी पाकर निरभिमान होकर दान देते हैं वे इन्द्रादि सम्पदाओं का भोग करते हैं इसलिए लक्ष्मी की वृद्धि की आकांक्षा करने वाले मनुष्य को दान देना चाहिए।

प्रश्न १३७—मुनि को दिया गया आहारदान क्या फल प्रदान करता है ?
उत्तर—जो श्रावक भक्तिपूर्वक मुनि को शाकपिण्ड का भी आहार देता है वह उसी प्रकार अनन्त सुखों का भोक्ता होता है जिस प्रकार किसान थोड़ा बीज बोता है उससे बीज की अपेक्षा अधिक धान्य पैदा होता है। इसके साथ ही वह दाता इन्द्रादि पदवी को भी आगामी भव में प्राप्त करता है।

प्रश्न १३८—आहार देने वाला किस प्रकार महिमाशाली है ?
उत्तर—इस संसार में मोक्ष का कारण रत्नत्रय है, उस रत्नत्रय को शरीर में शक्ति होने पर मुनिगण पालते हैं और मुनियों के शरीर में शक्ति अन्न से होती है, उस अन्न को श्रावक ही भक्तिपूर्वक देते हैं इसलिए वास्तविक रीति से वह मोक्षमार्ग को धारण करते हैं।

प्रश्न १३९—पुरूषार्थ कितने होते हैं, नाम बताइये ?
उत्तर—पुरूषार्थ चार होते हैं—(१) धर्म, (२) अर्थ, (३) काम, (४) मोक्ष।

प्रश्न १४०—जिन घरों में तथा जिन गृहस्थों के दान आदि नहीं है वह कैसे हैं ?
उत्तर—जिन घरों की भूमि मुनियों के चरणकमल के स्पर्श से पवित्र हो जाती है तथा वे दान देते हैं वे प्रयोजनीभूत हैं तथा जिन घरों में मुनियों का आहार नहीं होता, दानादि नहीं देते वे घर तथा गृहस्थ दोनों ही बिना प्रयोजन के और असार हैं।

प्रश्न १४१—आचार्यों ने गृहस्थों के लिए क्या आवश्यक बताया है ?
उत्तर—आचार्यों ने गृहस्थों के लिए दान और पूजा को मुख्य माना है।

प्रश्न १४२—दानादि न देकर स्वयं को धर्मात्मा कहने वाला क्या कहलाता है ?
उत्तर—जो मनुष्य धन के होते हुए भी दान देने में आलस्य करता है तथा अपने को धर्मात्मा कहता है वह मनुष्य मायाचारी कहलाता है।

प्रश्न १४३—उनकी क्या गति होती है ?
उत्तर—उन मनुष्यों को तिर्यञ्चगति में जाना पड़ता है जहां उनको नाना प्रकार के भूख—प्यास सम्बन्धी दुख भोगने पड़ते हैं।

प्रश्न १४४—यदि कोई व्यक्ति दरिद्र है तो वह किस प्रकार दान कर सकता है ?
उत्तर—दरिद्र होते हुए भी अपने धन के अनुसार एक ग्रास अथवा आधा ग्रास अथवा चौथाई ग्रास दान देकर भी वह महान पुण्य का संचय करता है।

प्रश्न १४५—मनुष्य के लिए कौन सा धन उसका अपना होता है ?
उत्तर—जो धन जिनमंदिर के काम में, जिनेन्द्र भगवान की पूजा में, आचार्यों की पूजा में, विद्वानों के सम्मान में तथा संयमीजनों के दान में खर्च किया जाता है, दुखितों को दिया जाता है वही धन अपना होता है। वह इस भव में तथा परभव में र्कीित तथा सुख का देने वाला होता है।

प्रश्न १४६—मृत्यु के पश्चात् कौन सा ऐसा मित्र है जो जीव के साथ जाता है ?
उत्तर—मृत्यु के समय धन एक पैंड भी नहीं जाता, बन्धुओं का समूह श्मशानभूमि से लौट आता है परन्तु इस दीर्घ संसार में भ्रमण करते हुए एक पुण्य ही ऐसा मित्र है जो जीव के साथ जाता है।

प्रश्न १४७—सत्पात्र को दान देने पर क्या मिलता है ?
उत्तर—सत्पात्र को दान देने से सौभाग्य, शूरता, सुख, विवेक आदि तथा विद्या, शरीर, धन, घर और उत्तम कुल में जन्म इत्यादि बातों की प्राप्ति होती है।

प्रश्न १४८—पात्र कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर—पात्र पाँच प्रकार के होते हैं—(१) उत्तम पात्र, (२) मध्यम पात्र, (३) जघन्य पात्र, (४) कुपात्र, (५) अपात्र।

प्रश्न १४९—उत्तम पात्र कौन से हैं ?
उत्तर—उत्तम पात्र महाव्रती अर्थात् मुनि, आर्यिकादि हैं।

प्रश्न १५०—मध्यम पात्र कौन से हैं ?
उत्तर—मध्यम पात्र अणुव्रती अर्थात् श्रावक हैं।

प्रश्न १५१—जघन्य पात्र कौन हैं ?
उत्तर—व्रत रहित सम्यग्दृष्टि जघन्य पात्र हैं।

प्रश्न १५२—कुपात्र कौन हैं ?
उत्तर—व्रत सहित मिथ्यादृष्टि कुपात्र हैं।

प्रश्न १५३—अपात्र किसे कहते हैं ?
उत्तर—अव्रती मिथ्यादृष्टि अपात्र हैं।

प्रश्न १५४—उत्तम पात्र को दान देने से क्या फल मिलता है ?
उत्तरउत्तम पात्र को निर्मल भाव से दिया हुआ दान सम्यग्दृष्टि को तो स्वर्ग, मोक्ष आदि उत्तम फल को देने वाला है तथा मिथ्यादृष्टि को भोगभूमि के सुख को देना वाला है।

प्रश्न १५५—मध्यम पात्र में दिया हुआ दान क्या फल देता है ?
उत्तर—मध्यम पात्र में दिया हुआ दान सम्यग्दृष्टि को तो स्वर्ग फल का देने वाला है और मिथ्यादृष्टि को मध्यम भोगभूमि के सुख का देने वाला है।

प्रश्न १५६—जघन्य पात्र में दिया हुआ दान क्या फल देता है ?
उत्तर—जघन्य पात्र में दिया हुआ दान सम्यग्दृष्टि को तो स्वर्गफल का देने वाला है और मिथ्यादृष्टि को जघन्य भोगभूमियों के सुख का देने वाला है।

प्रश्न १५७—कुपात्र को दान देने का क्या फल है ?
उत्तर—कुपात्र को दिया हुआ दान कुभोगभूमि के फल का देने वाला है।

प्रश्न १५८—अपात्र को दान देने से क्या होता है ?
उत्तर—अपात्र में दिया हुआ दान व्यर्थ जाता है अथवा दुर्गति के फल का देने वाला है।