ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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06.वेदमार्गणा अधिकार

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वेदमार्गणा अधिकार

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अथ वेदमार्गणाधिकार:

संप्रति वेदमार्गणायां स्वामित्वनिरूपणाय प्रश्नोत्तराभ्यां सूत्रद्वयमवतार्यते-
वेदाणुवादेण इत्थिवेदो पुरिसवेदो णवुंसयवेदो णाम कधं भवदि ?।।३६।।
चरित्तमोहणीयस्स कम्मस्स उदएण इत्थि-पुरिस-णवुंसयवेदा।।३७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-किमौदयिकेन भावेन इति पंचविधभावान् प्रश्नरूपेण मनसि अवधार्य स्त्रीवेदादयः कथं भवन्ति इति कथितं प्रथमसूत्रे। एवंविधसंशयविनाशनार्थमुत्तरसूत्रं कथितं श्रीभूतबलिसूरिवर्येण।
अतः स्त्रीवेदोदयेन स्त्रीवेदः, पुरूषवेदोदयेन पुरुषवेदः, नपुंसकवेदोदयेन नपुंसकवेदः इति इमे त्रयोऽपि भेदाः चारित्रमोहनीयस्य भवन्ति।
अत्र कश्चिदाह-स्त्रीवेदद्रव्यकर्मजनितपरिणामः किं स्त्रीवेदः उच्यते, नामकर्मोदयजनितस्तन-जघन-योनिविशिष्टशरीरं वा। न तावत् शरीरं स्त्रीवेदः ‘चारित्रमोहोदयेन वेदानामुत्पत्तिं प्ररूपयता’ एतेन सूत्रेण सह विरोधात्। शरीरसहितानामपगतवेदत्वाभावाच्च। न प्रथमपक्षः, एकस्मिन् कार्यकारणभावविरोधात् ?
अत्र परिहारःक्रियते-न स्तन-जघन-योनिविशिष्टशरीरं स्त्रीवेदरूपोऽयं द्वितीयपक्षः, अनभ्युपगमात्। किंच नामकर्मोदयस्य प्रधानत्वमत्र। न च प्रथमपक्षे कथितदोषोऽत्र, परिणामात् परिणामिनः जीवस्य कथंचित् भेदेन एकत्वाभावात्।
कुतः ?
चारित्रमोहनीयस्य उदयः कारणं,कार्यं पुनः तदुदयविशिष्टः स्त्रीवेदसंज्ञितः जीवः। तेन पर्यायेण तस्योत्पद्यमानत्वात् न कार्यकारणभावोऽत्र विरुद्ध्यते। एवं शेषवेदयोरपि वक्तव्यं।
अपगतवेदिनः केन कारणेन इति प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते-
अवगदवेदो णाम कधं भवदि ?।।३८।।
उवसमियाए खइयाए लद्धीए।।३९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थः सुगमः। विवक्षितवेदोदयेन उपशमश्रेणिमारुह्य मोहनीयस्य अंतरं कृत्वा यथायोग्यस्थाने विवक्षितवेदस्य उदय-उदीरणा-उत्कर्षण-अपकर्षण-परप्रकृतिसंक्रमण-स्थिति-अनुभाग-खण्डैर्विना जीवे पुद्गलस्कंधानामवस्थानमुपशमः। तदानीं यावत् जीवस्य वेदाभावस्वरूपा लब्धिः, तस्याः येन अपगतवेदो भवति। तेन औपशमिक्याः लब्धेः अपगतवेदो भवति इति उक्तं सूत्रे।
विवक्षितवेदोदयेन क्षपकश्रेणिं आरुह्य अन्तरकरणं कृत्वा यथायोग्यस्थाने विवक्षितवेदस्य पुद्गलस्कंधानां स्थिति-अनुभागाभ्यां सह जीवप्रदेशेभ्यः निःशेषोऽपसरणं क्षयो नाम। तत्रोत्पन्नजीवपरिणामः क्षायिकः, तस्य लब्धिः क्षायिका लब्धि:, तस्याः क्षायिकायाः लब्धेः वा अपगतवेदो भवति।
कश्चिदाह-वेदाभाव-लब्ध्योः एककाले एव उत्पद्यमानयोः कथं आधाराधेयभावः कार्यकारणभावो वा ?
तस्य परिहारः क्रियते-नैतद् वक्तव्यं, समकालेन उत्पद्यमानछायांकुरयोः कार्यकारणभावदर्शनात्, घटोत्पत्तौ कुशूलाभावदर्शनाच्च।
भवतु नाम, त्रिवेदद्रव्यकर्मक्षयेण भाववेदाभावः, कारणाभावात् कार्यस्याभावस्यापि न्यायत्वात्। किंतु उपशमश्रेण्यां द्रव्यकर्मस्कंधेषु त्रिवेदसंबंधिषु सत्सु भाववेदाभावो न घटते, सति कारणे कार्याभावविरोधात् ?
न, औषधीनां दृष्टशक्तीनां अजीर्णरोगिणि जीवे प्रयुक्तानां आमरोगेण प्रतिहतशक्तीनां स्वकार्यकारणानु-पलंभात्।
अत्र वेदमार्गणायां एष विशेषो ज्ञातव्य:-ये केचित् द्रव्यवेदेन पुरुषा: भाववेदेन स्त्रीवेदिनो नपुंसकवेदिनो वा त एव उपशमश्रेणिं क्षपकश्रेणिं वारोढुं क्षमा भवन्ति न च द्रव्येण स्त्रीवेदिनो नपुंसकवेदिनो वा। अस्मिन् षट्खण्डागमग्रंथे सर्वत्र वेदमार्गणायां भाववेदापेक्षयैव कथनमवगन्तव्यम्।
एवं वेदसहितानां अपगतवेदानां च स्वामित्वनिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ वेदमार्गणा अधिकार

अब वेदमार्गणा में स्वामित्व का निरूपण करने हेतु प्रश्नोत्तर रूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं- 'सूत्रार्थ-'

वेदमार्गणानुसार जीव स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी और नपुंसकवेदी किस कारण से होता है ?।।३६।।

चारित्रमोहनीय कर्म के उदय से स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद होते हैं।।३७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-क्या औदयिक भाव से अथवा पाँचों प्रकार के भावों को प्रश्नरूप मन में धारण करके स्त्रीवेद आदि किस कारण से होते हैं, ऐसा प्रश्न उपर्युक्त प्रथम सूत्र में किया गया है। इस प्रकार के संशय का विनाश करने हेतु श्री भूतबली आचार्य ने उत्तर सूत्र कहा है।

अत: स्त्रीवेद के उदय से स्त्रीवेद उत्पन्न होता है, पुरुषवेद के उदय से पुरुषवेद उत्पन्न होता है और नपुंसकवेद के उदय से नपुंसकवेद उत्पन्न होता है, ये तीनों भेद चारित्रमोहनीय के होते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है-स्त्रीवेद द्रव्यकर्म से उत्पन्न हुए परिणाम को क्या स्त्रीवेद कहते हैं या नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुए स्तन, जांघ, योनि आदि से विशिष्ट शरीर को स्त्रीवेद कहते हैं ? शरीर को तो यहाँ स्त्रीवेद मात्र नहीं कह सकते, क्योंकि वैसा मानने पर चारित्रमोह के उदय से वेदों की उत्पत्ति का प्ररूपण करने वाले इस सूत्र से विरोध आता है और शरीर सहित जीवों के अपगत वेदपने के अभाव का भी प्रसंग आता है। प्रथम पक्ष तो बनता नहीं है, क्योंकि एक में कार्य-कारणभाव होने में विरोध आता है ?

इस शंका का परिहार करते हैं-स्तन, जांघ और योनि आदि से विशिष्ट शरीर सहित स्त्रीवेदरूप द्वितीय पक्ष यहाँ नहीं बनता है, क्योंकि वैसा स्वीकार नहीं किया गया है तथा यहाँ नामकर्म के उदय की प्रधानता है और प्रथमपक्ष में कथित दोष भी यहाँ उपस्थित नहीं होगा, क्योंकि परिणाम से परिणामी कथंचित् भिन्न होने के कारण एकत्व का अभाव पाया जाता है।

प्रश्न-ऐसा कैसे सिद्ध होता है ?

उत्तर-क्योंकि चारित्रमोहनीय का उदय तो कारण है और उसका उस कर्मोदय से विशिष्ट स्त्रीवेदी कहने वाला जीव कार्य है। चूँकि विवक्षित कर्मोदय से उस पर्याय से विशिष्ट वह जीव उत्पन्न हुआ है, अतएव यहाँ कारण-कार्य भाव विरोध को प्राप्त नहीं होता। इसी प्रकार शेष दोनों वेदों के विषय में भी कहना चाहिए।

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अपगतवेदी किस कारण से होते हैं ? इस प्रकार के प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अपगतवेदी किस कारण से होतें हैं ?।।३८।।

औपशमिक व क्षायिक लब्धि से जीव अपगतवेद होते हैं।।३९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। विवक्षित वेद के उदय से उपशमश्रेणी पर चढ़कर, मोहनीय कर्म का अंतर करके यथायोग्य स्थान में विवक्षित वेद के उदय, उदीरणा, उत्कर्षण, अपकर्षण, परप्रकृति संक्रमण, स्थितिकाण्डक और अनुभागकाण्डक के बिना जीव में जो पुद्गलस्कंधों का अवस्थान होता है उसे उपशम कहते हैं। उस समय जीव की जो वेद के अभावरूपलब्धि है, उससे अपगतवेद होता है। इस कारण उपशमलब्धि से अपगतवेद होता है यह सूत्र में कहा गया है।

विवक्षित वेद के उदय से क्षपक श्रेणी पर चढ़कर अन्तरकरण करके यथायोग्य स्थान में विवक्षित वेद संबंधी पुद्गलस्कंधों के स्थिति और अनुभागसहित जीव प्रदेशों से निशेषत:-पूर्णरूप से दूर हो जाने को क्षय कहते हैं। उस अवस्था में जो जीव का परिणाम होता है वह क्षायिक भाव है। उस भाव की लब्धि को क्षायिक लब्धि कहते हैं। अथवा उस क्षायिक लब्धि से अपगतवेद होता है।

यहाँ कोई शंका करता है-वेद का अभाव और वेद के अभाव से होने वाली लब्धि ये दोनों जब एक ही काल में उत्पन्न होते हैं, तब उनमें आधार-आधेयभाव या कार्य-कारणभाव कैसे बन सकता है ?

उसका समाधान करते हैं-नहीं, क्योंकि समान काल में उत्पन्न होने वाले छाया और अंकुर में कार्य कारण भाव देखा जाता है तथा घट की उत्पत्ति के काल में ही कुशूल का अभाव देखा जाता है।

शंका-तीनों वेदों संबंधी द्रव्यकर्मों के क्षय से भाववेद का अभाव भले ही हो, क्योंकि कारण के अभाव से कार्य का अभाव होना भी न्यायसंगत है। किन्तु उपशमश्रेणी में त्रिवेद संबंधी पुद्गलस्कंधों के रहते हुए भाववेद का अभाव घटित नहीं होता है, क्योंकि कारण के सद्भाव में कार्य का अभाव मानने में विरोध आता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि जिनकी शक्ति देखी जा चुकी है, ऐसी औषधियाँ जब किसी अजीर्णरोग सहित अर्थात् अजीर्ण के रोगी जीव को दी जाती हैं, तब उस अजीर्ण रोग से उन औषधियों की वह शक्ति नष्ट हो जाती है अत: वे अपने कार्य सहित कारणरूप से नहीं पाई जाती है, उसी प्रकार यहाँ भी जानना चाहिए।

इस प्रकार वेदसहित जीवों का और वेदरहित भगवन्तों का स्वामित्व बतलाने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार समाप्त हुआ।