ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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06.वेद मार्गणा अधिकार

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वेद मार्गणा अधिकार

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अथ वेदमार्गणाधिकार:

अथ चतुर्भिरन्तरस्थलैः चतुर्दशसूत्रैः एकजीवापेक्षया कालानुगमे वेदमार्गणाधिकारः कथ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले स्त्रीवेदिनां कालनिरूपणत्वेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं । तदनु द्वितीयस्थले पुरुषवेदिनां जघन्योत्कृष्टकालप्रतिपादनत्वेन ‘‘पुरिसवेदा’’ इत्यादिसूत्रत्रयं । तत्पश्चात् तृतीयस्थले नपुंसकवेदिजीवानां स्थितिनिरूपणत्वेन ‘‘णवुंसयवेदा’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं चतुर्थस्थले अपगतवेदानां कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘अवगदवेदा’’ इत्यादिना पंचसूत्राणि इति समुदायपातनिका ।
संप्रति स्त्रीवेदिनां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
वेदाणुवादेण इत्थिवेदा केवचिरं कालादो होंति ?।।११४।।
जहण्णेण एगसमओ।।११५।।
उक्कस्सेण पलिदोवमसदपुधत्तं।।११६।।
सद्धांतिंचतामणिटीका-कश्चित् भावस्त्रीवेदी मुनिः उपशमश्रेणीतोऽवतीर्य सवेदो भूत्वा द्वितीयसमये मृतः, तत्र स्वर्गे गत्वा पुरुषवेदेन परिणतः, तस्य मुनेः एकसमयो लभ्यते जघन्येन ।
उत्कर्षेण-अनर्पितवेदात् स्त्रीवेदं गत्वा पल्योपमशतपृथक्त्वं तत्रैव परिभ्रम्य पश्चादन्यवेदं गतः।
शतपृथक्त्वं इति किं ?
त्रिशतप्रभृति यावत् नवशतानि इति एते सर्वविकल्पाः शतपृथक्त्वमिति उच्यन्ते।
एवं प्रथमस्थले भावस्त्रीवेदिनां द्रव्यस्त्रीवेदिनां च स्थितिकथनमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इदानीं पुरुषवेदिनां कालकथनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
पुरिसवेदा केवचिरं कालादो होंति ?।।११७।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।११८।।
उक्कस्सेण सागरोवमसदपुधत्तं।।११९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिद् मुनिः पुरुषवेदोदयेन उपशमश्रेणीं चटित्वा अपगतवेदो जातः, पुनः उपशमश्रेणीतोऽवतीर्यमाणः सवेदो भूत्वा वेदस्यादिं कृत्वा सर्वजघन्यमन्तर्मुहूर्तकालं स्थितः, पुनरपि उपशमश्रेणीमारुह्य अपगतवेदाभावं गतः तस्य पुरुषवेदस्यान्तर्मूहूर्तमात्रकालः उपलभ्यते।
उत्कर्षेण-नपुंसकवेदे अनंतकालमसंख्यातलोकमात्रं वा स्थित्वा पुरुषवेदं गत्वा तं अत्यक्त्वा सागरोपम-शतपृथक्त्वं तत्रैव परिभ्रम्यान्यवेदं गतस्य तदुपलंभात्। अत्र शतपृथक्त्वेन नवतिशत सागरोपमं गृह्यते।
एवं द्वितीयस्थले पुरुषवेदिनां कालप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
अधुना नपुंसकवेदानां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
णवुंसयवेदा केवचिरं कालादो होंति ?।।१२०।।
जहण्णेण एयसमओ।।१२१।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।१२२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-नपुंसकवेदोदयेन उपशमश्रेणिमारुह्य अवतीर्य सवेदो भूत्वा द्वितीयसमये कालं कृत्वा पुरुषवेदं गतः, तस्य भावनपुंसकवेदिनो मुनेः एकसमयो दृश्यते जघन्येन।
पुरुषवेदस्य एकसमयः किन्न लब्धः ?
न, अपगतवेदो भूत्वा सवेदजातद्वितीयसमये कालं कृत्वा देवेषूत्पद्यते, तस्यापि पुरुषवेदं मुक्त्वा अन्यवेदस्योदयाभावेन एकसमयो नोपलभ्यते ।
उत्कर्षेण-अविवक्षितवेदात् नपुंसकवेदं संप्राप्य आवलिकाया असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनकाल-प्रमाणं परिवर्तनं कृत्वा अन्यवेदं गतस्य तदुत्कृष्टकालं उपलभ्यते।
एवं तृतीयस्थले नपुंसकवेदस्थितिनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति अपगतवेदानां महामुनीनां कालप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-
अवगतवेदा केवचिरं कालादो होंति ?।।१२३।।
उवसमं पडुच्च जहण्णेण एगसमओ।।१२४।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१२५।।
खवगं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१२६।।
उक्कस्सेण पुव्वकोडी देसूणं।।१२७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिन्मुनिः उपशमश्रेणिमारुह्य अपगतवेदो भूत्वा एकसमय मात्रं तत्र स्थित्वा द्वितीयसमये मृत्वा वेदभावं गतस्य तज्जघन्यकालः उपलभ्यते। स्त्रीवेदोदयेन नपुंसकवेदोदयेन वा उपशमश्रेणिं चटित्वापगतवेदो भूत्वा सर्वोत्कृष्टमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा वेदभावं गतस्य तदुत्कृष्टकालो लभ्यते।
क्षपकश्रेण्यपेक्षया कश्चिन्महासाधुः क्षपकश्रेणिं चटित्वापगतवेदो भूत्वा सर्वजघन्येन कालेन परिनिर्वृतिं संप्राप्तस्तस्य जघन्यकालः दृश्यते। उत्कर्षेण-कश्चिद् देवो नारको वा क्षायिकसम्यग्दृष्टिः पूर्वकोट्यायुष्केषु मनुष्येषु उत्पन्नः, तत्राष्टवर्षाणि गमयित्वा संयमं प्रतिपद्य सर्वजघन्यकालेन क्षपकश्रेणिं चटित्वापगतवेदो भूत्वा केवलज्ञानं समुत्पाद्य देशोनपूर्वकोटिकालं विहृत्य अबंधकभावं गतस्तस्य तदुत्कृष्टकालः उपलभ्यते।
कश्चिद् द्रव्यवेदी पुरुषो भावेन स्त्रीवेदी नपुंसकवेदी पुरुषवेदी वा भवेत्, तस्य उत्तमसंहननादिद्रव्यक्षेत्र-कालभावसामग्रीभिः रत्नत्रयाराधना भवति। ततः अयं महामुनिः रागद्वेषादिविभावभावं त्यक्त्वा निरंतरं वैराग्यभावनां भावयति। तथाहि-
कति न कति न वारान् भूपतिर्भूरिभूतिः, कति न कति न वारानत्र जातोऽस्मि कीटः।
नियतमिति न कस्याप्यस्ति सौख्यं न दुःखं, जगति तरलरूपे किं मुदा किं शुचा वा।।४७।।
इत्थं मुहुर्मुहुः संचिन्त्य ये महापुरुषाः शुद्धात्मानं ध्यायन्ति त एव अपगतवेदा भवन्ति, त एव शीघ्रं निजात्मानं परमात्मानं कृत्वा अनंतानंतकालं अतीद्रियसुखं अनुभवन्ति। ये केचित् एतन्मार्गमनुसरन्ति, ते आचार्यवर्यैरपि नमस्याः भवन्ति।
उक्तं च पद्मनंद्याचार्यदेवेन-
अनघ्र्यरत्नत्रयसंपदोऽपि, निग्र्रन्थतायाः पदमद्वितीयम् ।
जयन्ति शान्ताः स्मरवैरिवध्वाः, वैधव्यदास्ते गुरुवो नमस्याः।।५८।।
एवं चतुर्थस्थले वेदविरहितानां महासाधूनां कालनिरूपणत्वेन पंच सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षयाकालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायांवेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकारः समाप्तः।

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अथ वेदमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब चार अन्तरस्थलों में चौदह सूत्रों के द्वारा एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में वेदमार्गणा नाम का अधिकार कहा जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में स्त्रीवेदी जीवों का कालनिरूपण करने वाले ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। पुन: द्वितीय स्थल में पुरुषवेदी जीवों का जघन्य और उत्कृष्टकाल प्रतिपादन करने हेतु ‘‘पुरिसवेदा’’ इत्यादि तीन सूत्र हैें। तत्पश्चात् तृतीयस्थल में नपुंसकवेदी जीवों की स्थिति निरूपण करने हेतु ‘‘णवुंसयवेदा’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद चतुर्थ स्थल में अपगतवेदियों का काल कथन करने वाले ‘‘अवगदवेदा’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब स्त्रीवेदी जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणानुसार जीव स्त्रीवेदी कितने काल तक रहते हैं ?।।११४।।

जघन्य से एक समय तक जीव स्त्रीवेदी रहते हैं।।११५।।

उत्कृष्ट से सौ पल्योपमपृथक्त्व काल तक जीव स्त्रीवेदी रहते हैं।।११६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई भावस्त्रीवेदी मुनि उपशमश्रेणी से उतरकर सवेद अर्थात् स्त्रीवेदी होकर द्वितीय समय में मृत्यु को प्राप्त हो गये, वहाँ स्वर्ग में जाकर पुरुषवेद से परिणत हो गये, उन मुनि के जघन्य से एक समय पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-अविवक्षित वेद से स्त्रीवेद को प्राप्त होकर और पल्योपमशतपृथक्त्व काल तक वहीं-स्त्रीवेदियों में ही परिभ्रमण करके पश्चात् अन्य वेद को प्राप्त हो गया।

प्रश्न-शतपृथक्त्व किसे कहते हैं ?

उत्तर-तीन सौ से लेकर नौ सौ तक ये सभी विकल्प ‘‘शतपृथक्त्व’’ नाम से कहे जाते हैं। इस प्रकार प्रथम स्थल में भावस्त्रीवेदी जीवों की और द्रव्यस्त्रीवेदी जीवों की स्थिति का कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब पुरुषवेदी जीवों का काल कथन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्र्थ-

जीव पुरुषवेदी कितने काल तक रहते हैं ?।।११७।।

उत्कृष्ट से सौ सागरोपमपृथक्त्व काल तक जीव पुरुषवेदी रहते हैं।।११९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई मुनि पुरुषवेद के उदय से उपशमश्रेणी पर चढ़कर अपगतवेदी हो गये, पुन: उपशमश्रेणी से उतरते हुए सवेद होकर वेद का आदि करके-वेद में सर्वजघन्य अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर, फिर उपशम श्रेणी पर चढ़कर अपगतवेदपने को प्राप्त हुए जीव के पुरुषवेद का जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल पाया जाता है।

उत्कृष्टरूप से-नपुंसकवेद में अनन्तकाल अथवा असंख्यात लोकप्रमाणकाल तक रहकर पुरुषवेद को प्राप्त होकर और उसे न छोड़कर सौ सागरोपमपृथक्त्व काल तक उसमें ही परिभ्रमण करके अन्यवेद को प्राप्त हुए जीव के वह सूत्रोक्त काल पाया जाता है। यहाँ शतपृथक्त्व से ९०० सागरोपम शतपृथक्त्व से ग्रहण किये गये हैं।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में पुरुषवेदी जीवों का काल प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब नपुंसकवेदी जीवों का काल बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव नपुंसकवेदी कितने काल तक रहते हैं ?।।१२०।।

जघन्य से एक समय तक जीव नपुंसकवेदी रहते हैं।।१२१।।

उत्कृष्ट से अनंत काल तक जीव नपुंसकवेदी रहते हैं जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण है।।१२२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नपुंसकवेद के उदय से उपशमश्रेणी पर चढ़कर, फिर उतरकर, सवेद होकर और द्वितीय समय में मरकर पुरुषवेद को प्राप्त हुए भावनपुंसकवेदी जीव के नपुंसकवेद का जघन्य से एक समय काल देखा जाता है।

शंका-पुरुषवेद का जघन्यकाल एक समय क्यों नहीं पाया जाता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि अपगतवेद होकर और सवेद होने के द्वितीय समय में मरकर देवों में उत्पन्न हुए, उसके भी पुरुषवेद को छोड़कर अन्य वेद के उदय का अभाव होने से एक समय काल नहीं पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-अविवक्षित वेद से नपुंसकवेद को प्राप्त होकर और आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण पुद्गलपरिवर्तनकाल तक परिभ्रमण करके अन्य वेद को प्राप्त हुए जीव के उत्कृष्टकाल पाया जाता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में नपुंसकवेद की स्थिति का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब अपगतवेदी महामुनियों का काल प्रतिपादन करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

उपशम की अपेक्षा जघन्य से एक समय तक जीव अपगतवेदी रहते हैं।।१२४।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव अपगतवेदी रहते हैं।।१२५।।

क्षपक की अपेक्षा जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक अपगतवेदी रहते हैं।।१२६।।

उत्कृष्ट से कुछ कम एक पूर्वकोटि वर्ष तक जीव अपगतवेदी रहते हैं।।१२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई मुनि उपशमश्रेणी पर चढ़कर अपगतवेदी होकर और एक समय तक रहकर द्वितीय समय में मरकर सवेदपन को प्राप्त हुए जीव के एक समय काल पाया जाता है। स्त्रीवेद के उदय से या नपुंसकवेद के उदय से उपशमश्रेणी पर चढ़कर, अपगत वेदी होकर और सर्वोत्कृष्ट अन्र्तुहूर्त काल तक वहाँ रहकर वेदपने को प्राप्त हुए जीव के उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त काल पाया जाता है।

क्षपक श्रेणी की अपेक्षा कोई महामुनि क्षपकश्रेणी पर चढ़कर और अपगतवेदी होकर सर्वजघन्य काल से मुक्ति को प्राप्त हुए। उनके सर्वजघन्य काल पाया जाता है। उत्कृष्ट से-कोई देव अथवा नारकी क्षायिकसम्यग्दृष्टि के पूर्वकोटि आयु वाले मनुष्योेंं में उत्पन्न होकर आठ वर्ष बिताकर संयम को प्राप्त कर, सर्वजघन्य काल में क्षपकश्रेणी पर चढ़कर अपगतवेदी होकर, केवलज्ञान को उत्पन्न कर और कुछ कम पूर्वकोटि वर्ष तक विहार करके अबंधक अवस्था को प्राप्त हुए जीव के उत्कृष्ट काल पाया जाता है।

कोई द्रव्यवेदी पुरुष भाव से यदि स्त्रीवेदी, नपुंसकवेदी अथवा पुरुषवेदी होता है, उसके उत्तम संहनन आदि द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावरूप सामग्री के मिल जाने पर रत्नत्रय की आराधना होती है। उसके पश्चात् वह महामुनि राग-द्वेष आदि विभाव भाव को त्यागकर निरन्तर वैराग्य भावना को भाते हैं। उसी को बताते हैं-

श्लोकार्थ-इस संसार में कितनी-कितनी बार तो हम बड़ी-बड़ी संपत्ति के धारी राजा नहीं हुए क्या तथा कितनी-कितनी बार इसी संसार में हम क्षुद्र कीड़े नहीं हो चुके क्या, इसलिए यही मालूम होता है कि चंचलरूप इस संसार में किसी का सुख तथा दु:ख निश्चित नहीं है, अत: सुख और दु:ख के होने पर हर्ष और विषाद कदापि नहीं करना चाहिए।।

इस प्रकार बार-बार चिन्तवन करके जो महापुरुष शुद्धात्मा का ध्यान करते हैं वे ही अपगतवेदी बनते हैं, वे ही अपनी आत्मा को शीघ्र परमात्मा बनाकर अनन्तानन्त काल तक अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करते हैं। जो इस मार्ग का अनुसरण करते हैं वे आचार्यों के द्वारा भी नमस्कृत होते हैं। श्री पद्मनंदि आचार्यदेव ने कहा है-

श्लोकार्थ-अमूल्य रत्नत्रयरूपी संपत्ति के धारी होकर भी जो निग्र्रन्थपद के धारक हैं तथा शान्तमुद्रा के धारी होने पर भी जो कामदेवरूपी वैरी की स्त्री को विधवा करने वाले हैं, ऐसे वे शांत और उत्तमगुरु सदा नमस्कार करने योग्य हैं। वे सदा ही जयशील रहें।

अर्थात् जो रत्नत्रय के धारी हैं तथा निग्र्रंथ हैं और शांत मुद्रा के धारक हैं तथा कामदेव के जीतने वाले हैं उन गुरुओं को सदा मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में वेदरहित महासाधुओं का कालनिरूपण करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम के क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार समाप्त हुआ।