ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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06. छठा भव

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(छठा भव)

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प्रश्न १ -अच्युत देव स्वर्ग से च्युत होकर कहाँ जन्मे?

उत्तर -अच्युत देव स्वर्ग से च्युत होकर जम्बूव्दीप के पश्चिम विदेह में पद्म देश के अश्वपुर नगर में शिशु वङ्कानाभि के रूप में जन्मे।

प्रश्न २ -अश्वपुर नगर के राजा का नाम बताइये?

उत्तर -अश्वपुर नगर के राजा महाराज वङ्कावीर्य नरेन्द्र थे।

प्रश्न ३ -शिशु वङ्कानाभि की माता का क्या नाम था?

उत्तर -शिशु वङ्कानाभि की माता का नाम महारानी विजया था।

[सम्पादन] प्रश्न ४ -शिशु वङ्कानाभि की माता ने उसके जन्म से पूर्व कितने स्वप्न देखे?

उत्तर -शिशु वङ्कानाभि की माता ने उसके जन्म से पूर्व ५ स्वप्न देखे।

प्रश्न ५ -वे स्वप्न क्या थे?

उत्तर -(१) सुदर्शन मेरु (२) सूर्य (३) चन्द्रमा (४) देवविमान (५) जल से परिपूर्ण सरोवर।

प्रश्न ६ -रानी विजया ने उन स्वप्नों का फल किससे पूछा?

उत्तर -रानी विजया ने उन स्वप्नों का फल महाराजा वङ्कावीर्य से पूछा।

प्रश्न ७ -राजा ने उनका क्या फल बताया?

उत्तर -राजा ने स्वप्नों का फल बताते हुए कहा कि तुम चक्रवर्ती पुत्ररत्न को जन्म दोगी।

[सम्पादन] प्रश्न ८ -चक्रवर्ती राजा कितने खण्ड का स्वामी होता है?

उत्तर -छ: खण्ड का।

प्रश्न ९ -चक्रवर्ती का क्या वैभव होता है?

उत्तर -चक्रवर्ती के ऐरावत हाथी के समान ८४ लाख हाथी होते हैं, वायु के समान वेगशाली रत्नों से निर्मित ८४ लाख रथ होते हैं, पृथ्वी की तरह आकाश में भी गमन करने वाले अठारह करोड़ उत्तम घोड़े होते हैं और योद्धाओं का मर्दन करने वाले ८४ करोड़ पदाति (पियादे) होते हैं। ३२ हजार नाट्यशालाएं, ७२ हजार नगर, ९६ करोड़ गाँव, ९९ हजार द्रोणमुख, ४८ हजार पत्तन, १६ हजार खेट, ५६ अन्तद्र्वीप, १४ हजार संवाह होते हैं। भोजनशाला में चावल पकाने के लिए १ करोड़ हंडे, बीज बोने की नली लगे १ लाख करोड़ हल, ३ करोड़ गौशालाएं, ७०० कुक्षवास, २८ हजार गहनवन व अठारह हजार आर्यखण्ड के म्लेच्छ राजा होते हैं।

प्रश्न १०-चक्रवर्ती का शरीर कैसा होता है?

उत्तर -चक्रवर्ती का शरीर वङ्कामय होता है, उनका संस्थान समचतुरस्र होता है, छह खण्ड के सभी राजाओं में जितना बल होता है, उन सबसे अधिक बल उनके एक शरीर में होता है।
प्रश्न ११-उनके चक्ररत्न का क्या प्रभाव रहता है?

उत्तर -उनके चक्ररत्न के प्रभाव से छह खण्ड के सभी राजा उनकी आज्ञा को सिर से धारण करते हैं। ३२ हजार मुकुटबद्ध राजा उनके चरणों में नत रहते हैं।

[सम्पादन] प्रश्न १२-चक्रवर्ती की कितनी रानियाँ होती हैं?

उत्तर -चक्रवर्ती की ९६ हजार रानियाँ होती हैं जिनमें से ३२ हजार रानियाँ आर्यखण्ड की, ३२ हजार रानियाँ विध्याधर कन्याएं एवं ३२ हजार रानियाँ म्लेच्छ खण्ड में जन्में राजाओं की हैं। ये सब अप्सराओं के समान सुन्दर होती हैं।

प्रश्न १३-चक्रवर्ती की कितनी निधियाँ होती हैं?

उत्तर -९ निधियाँ होती हैं?

प्रश्न १४-९ निधियों के नाम बताइये?

उत्तर -काल, महाकाल, नैसर्प, पांडुक, पद्म, माणव, पिंगल, शंख और सर्वरत्न।

प्रश्न १५-काल निधि से किसकी प्राप्ति होती है?

उत्तर -काल निधि से काव्य, कोश, अलंकार, व्याकरण आदि शास्त्र और वीणा, बांसुरी, नगाड़े आदि मिलते रहते हैं।

[सम्पादन] प्रश्न १६-महाकाल निधि का क्या उपयोग है?

उत्तर -महाकाल निधि से असि, मसि, कृषि आदि छह कर्मों के साधन ऐसे समस्त पदार्थ और संपदाएं निरन्तर उत्पन्न होती रहती हैं।

प्रश्न १७-नैसर्प निधि क्या देती है?

उत्तर -नैसर्प निधि शय्या, आसन, मकान आदि देती है।

प्रश्न १८-पांडुक निधि का क्या कार्य है?

उत्तर -पांडुक निधि समस्त धान्य और छहों रसों को उत्पन्न करती है।

प्रश्न १९-पद्मनिधि क्या करती है?

उत्तर -पद्मनिधि रेशमी, सूती वस्त्र आदि प्रदान करती है।

[सम्पादन] प्रश्न २०-शंखनिधि का क्या उपयोग है?

उत्तर -शंखनिधि सूर्य की प्रभा को तिरस्कृत करने वाले सुवर्ण को देती है।

प्रश्न २१-सर्वरत्न निधि क्या देती है?

उत्तर -सर्वरत्ननिधि महानील, इन्द्रनील, पद्मराग, वैडूर्य, स्फटिक आदि अनेक प्रकार के रत्नों और मणियों को देती है।

प्रश्न २२-चक्रवर्ती के कितने रत्न होते हैं?

उत्तर -१४ रत्न होते हैं।

प्रश्न २३-इनमें से कितने रत्न सजीव और कितने निर्जीव होते हैं?

उत्तर -इनमें से ७ रत्न सजीव और ७ रत्न निर्जीव होते हैं।

[सम्पादन] प्रश्न २४-इन रत्नों का क्या कार्य है?

उत्तर -ये सब रत्न पृथ्वी की रक्षा और विशाल ऐश्वर्य और उपभोग के साधन हैं।

प्रश्न २५-१४ रत्नों में से ७ निर्जीव रत्नों के नाम बताइये?

उत्तर -चक्र, छत्र, दंड, खड्ग, मणि, चर्म और कांकिणी ये सात निर्जीव रत्न हैं।

प्रश्न २६-सात सजीव रत्नों के नाम बताइये?

उत्तर -सेनापति, गृहपति, हाथी, घोड़ा, स्त्री, तक्ष (सिलावट) और पुरोहित ये सात सजीव रत्न हैं।

प्रश्न २७-चक्रवर्ती वङ्कानाभि के चक्र का क्या नाम था?

उत्तर -सुदर्शन चक्र।

[सम्पादन] प्रश्न २८-उनके छत्र का क्या नाम था?

उत्तर -सूर्यप्रभ छत्र।

प्रश्न २९-उनके दण्डरत्न का क्या कार्य है?

उत्तर -दण्डरत्न से गुफा का व्दार खोलते हैं।

प्रश्न ३०-सौनन्दक नामक तलवार से क्या करते हैं?

उत्तर -सौनन्दक तलवार को देखकर वैरीजन कम्पित होकर चक्रवर्ती की शरण में आ जाते हैं।

प्रश्न ३१-मणिरत्न का काम बताइये?

उत्तर -मणिरत्न (चूड़ामणि) अंधकार को दूर कर देता है।

[सम्पादन] प्रश्न ३२-चर्मरत्न और कांकिणी का क्या अर्थ है?

उत्तर -चर्मरत्न से मेघकृत जल के उपद्रव से सेना की रक्षा होती है और कांकिणी रत्न से गुफा में सूर्य-चंद्र का आकार बनाकर प्रकाश फैलाया जाता है।

प्रश्न ३३-सेनापति रत्न और गृहपति रत्न का क्या कार्य है?

उत्तर -सेनापति रत्न दिग्विजय में सभी योद्धाओं से अजेय रहता है और कामवृष्टि नामक गृहपति रत्न घर के सारे काम-काज संभाल लेता है।

प्रश्न ३४-अन्य सजीव रत्नों के क्या-क्या कार्य हैं?

उत्तर -विजयगिरि नामक ऐरावत सदृश उत्तम हाथी राजा का वाहन बनता है। पवनंजय नाम का घोड़ा स्थल के समान समुद्र में भी दौड़ लगाता है। सुभद्रा नाम का स्त्रीरत्न चक्रवर्ती के भोगसुख का साधन है जो कि अपने हाथ की शक्ति से वङ्का को भी दूर कर सकती है। भद्रपुर नामक तक्ष रत्न स्थान-स्थान पर सुन्दर महलों का निर्माण करता है और बुद्धिसागर नाम का पुरोहित रत्न सभी निमित्तादि विध्या में प्रवीण रहता है, सभी धार्मिक कार्य उसी के अधीन रहते हैं।

प्रश्न ३५-चक्रवर्ती के अन्य भोगोपभोग साधन कितने और कौन से हैं?

उत्तर -चक्रवर्ती के नवनिधि, पट्टरानियां, नगर, शय्या, आसन, सेना, नाट्यशाला, भाजन, भोजन और सवारी ये दस प्रकार के भोगोपभोग के साधन रहते हैं।

[सम्पादन] प्रश्न ३६-चक्रवर्ती के भण्डार का क्या नाम है?

उत्तर -चक्रवर्ती के भण्डार का नाम कुबेरकांत है जो कभी खाली नहीं होता है।

प्रश्न ३७-कोठार का क्या नाम है?

उत्तर -‘वसुधारक’ नाम का अटूट कोठार है।

प्रश्न ३८-उनकी रत्नमाला का नाम बताइये?

उत्तर -अवतंसिका।

प्रश्न ३९-उनके तंबू और शय्या का क्या नाम है?

उत्तर -उनका बहुत ही मनोहर कपड़े का बना हुआ ‘देवरम्य’ नाम का तम्बू है जिसके पायें रत्नमयी हैं, जो सिंह के आकार के हैं, ऐसी ‘सिंहवाहिनी’ नाम की शय्या है।

[सम्पादन] प्रश्न ४०-सिंहासन का क्या नाम है?

उत्तर -‘अनुत्तर’ नाम का सबसे श्रेष्ठ सिंहासन है।

प्रश्न ४१-चामर का नाम बताइये?

उत्तर -‘अनुपमा’ (देवप्रदत्त)।

प्रश्न ४२-उनके मणिकुंडल, खड़ाऊँ व कवच का नाम बताइये?

उत्तर -विध्युत्प्रभ नामक मणिकुंडल हैं, रत्नों की किरणों से व्याप्त ‘विषमोचिका’ नाम की खड़ाऊँ है जो कि चक्रवर्ती के सिवाय अन्य किसी के पैर का स्पर्श होते ही विष को छोड़ने लगती है तथा कवच का नाम ‘अभेध्य’ है।

प्रश्न ४३-वङ्कानाभि चक्रवर्ती के रथ का नाम बताइये?

उत्तर -अजितंज।

[सम्पादन] प्रश्न ४४-धनुष और बाण का क्या नाम है?

उत्तर -‘वङ्काकांड’ नाम का धनुष है और ‘अमोघ’ नाम के सफल बाण हैं।

प्रश्न ४५-उनके पास कौन सी शक्ति है?

उत्तर -शत्रु को नाश करने वाली ‘वङ्कातुंडा’ नाम की प्रचंड शक्ति है।

प्रश्न ४६-भाला एवं छुरी का नाम बताइये?

उत्तर -‘सिंहाटक’ नाम का भाला और रत्ननिर्मित मूठ वाली ‘लोहवाहिनी’ नाम की छुरी है।

प्रश्न ४७-विशेष शस्त्र का क्या नाम है?

उत्तर -‘मनोवेग’ नाम का कठाव जाति का एक विशेष शस्त्र है।

[सम्पादन] प्रश्न ४८-चक्रवर्ती की बारह भेरियों के नाम बताइये?

उत्तर -चक्रवर्ती के ‘आनंदिनी’ नाम की बारह भेरी हैं जो अपनी आवाज को १२ योजन तक लाकर बजा करती हैं।

प्रश्न ४९-नगाड़े कितने हैं? नाम बताइये?

उत्तर -‘विजयघोष’ नाम के १२ नगाड़े हैं जिनकी आवाज लोग आनंद के साथ सुना करते हैं।

प्रश्न ५०-उनके शंखों की कितनी संख्या है?

उत्तर -उनके ‘गंभीरावर्त’ नाम के २४ शंख हैं जो कि समुद्र से उत्पन्न हुए हैं।

प्रश्न ५१-उनका दिव्य भोजन क्या है?

उत्तर -चक्रवर्ती के ‘महाकल्याण’ नाम का दिव्य भोजन है।

प्रश्न ५२-पताकाएं कितनी हैं?

उत्तर -४८ करोड़।

[सम्पादन] प्रश्न ५३-क्या इतने वैभव को प्राप्त कर भी वे धर्मकार्य करते थे?

उत्तर -चक्रवर्ती वङ्कानाभि इतने वैभव को प्राप्त करके भी धर्म को नहीं भूले थे प्रत्युत् अधिक-अधिक रूप से प्रतिदिन जिनेन्द्रदेव की पूजन करते थे, निग्रँथ गुरुओं व अन्य त्यागियों को आहारादि दान देते थे तथा निरन्तर शील का पालन करते हुए समय-समय पर उपवास भी करते थे।

प्रश्न ५४-वङ्कानाभि चक्रवर्ती को इतने अतुल्य वैभव के बीच वैराग्य कैसी हुआ?

उत्तर -एक बार उस नगर में एक महामुनि पधारे, उनके व्दारा दिये गए दिव्य अमृतमयी उपदेश को सुनकर वे पंचेन्द्रियों के विषयों से विरक्त हो गए और निग्रँथ महामुनि बन गए।

प्रश्न ५५-दीक्षा के पश्चात् उन्होंने क्या किया?

उत्तर -दीक्षा के पश्चात् उन्होंने दुध्वॅर तपश्चरण किया।

प्रश्न ५६-महामुनि वङ्कानाभि के ऊपर उपसर्ग किसने किया?

उत्तर -एक व्रूरकर्मा भिल्लराज ने कुपित होकर अपने तीक्ष्ण बाणों से उनके शरीर का भेदन कर कायर जनों से असहनीय भयंकर उपसर्ग किया।

प्रश्न ५७-ऐसी स्थिति में मुनिराज ने क्या किया?

उत्तर -मुनिराज शरीर से पूर्णतया निस्पृह होकर ज्ञानदर्शन स्वरूप अपनी आत्मा का ध्यान करते हुए धर्मध्यान में स्थिर हो गए और इस नश्वर शरीर से चैतन्य आत्मा का प्रयाण हो गया।

प्रश्न ५८-इस नश्वर देह का त्याग कर उन्होंने किस गति की प्राप्ति की?

उत्तर -इस नश्वर देह का त्यागकर वे मध्यम ग्रैवेयक के मध्यम विमान में श्रेष्ठ अहमिन्द्र हो गए।