ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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06. पंचम चूलिका अधिकार ( तृतीय महादण्डक )

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'पंचम चूलिका अधिकार (तृतीय महादण्डक)'

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अथ तृतीयो महादण्डक:

पंचमचूलिकाधिकार:
मंगलाचरणम्
-उपजातिछंद-
कल्याणकल्पद्रुमसारभूतं, चिंतामणिं चिंतितदानदक्षम्।
श्रीपार्श्वनाथस्य सुपादपद्मं, भक्त्या नुमोऽभीप्सितसौख्यसिद्ध्यै।।१।।
अथ षट्खंडागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे जीवस्थानचूलिकाया: अन्तर्गतपंचमचूलिकायां तृतीयो महादण्डक: कथ्यते। तत्र तावत्सूत्रद्वयं निगद्यते।
संप्रति तृतीयमहादण्डककथनप्रतिज्ञापनाय सूत्रमवतरति-तत्थ इमो तदिओ महादंडओ कादव्वो भवदि।।१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यद्यपि एतस्य तृतीयत्वमनुत्तेऽपि ज्ञायते पूर्वं द्वयो: दण्डकयोरुपलंभात्, तथापि युक्तिवादे अकुशलशब्दानुसारिशिष्यानुग्रहार्थत्वात् अस्य सूत्रस्यावतारो जात:।
अधुना सप्तमनरकभूमिनारकाणां प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखानां बंधयोग्यप्रकृतीनां प्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
पंचण्हं णाणावरणीयाणं णवण्हं दंसणावरणीयाणं सादावेदणीयं मिच्छत्तं सोलसण्हं कसायाणं पुरिसवेद-हस्स-रदि-भय-दुगुंछा। आउगं च ण बंधदि। तिरिक्खगदि-पंचिंदियजादि-ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीर-समचउरससंठाण-ओरालियंगोवंग-वज्जरिसहसंघडण-वण्ण-गंध-रस-फास-तिरिक्खगदिपा-ओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुव-उवघाद-परघाद-उस्सासं। उज्जोवं सिया बंधदि, सिया ण बंधदि। पसत्थविहायगदि-तस-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-णिमिण-णीचागोद-पंचण्हमंतराइयाणं एदाओ पयडीओ बंधदि पढमसम्मत्ताहिमुहो अधो सत्तमाए पुढवीए णेरइओ।।२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथमसम्यक्त्वाभिमुख: सप्तमीपृथिवीगत: कश्चिद् नारक: एता: ज्ञानावरणादि-प्रकृती: बध्नाति। आयु:कर्म न बध्नाति, ‘च’ शब्देन अन्याश्च प्रकृती: न बध्नाति। उद्योतप्रकृतिं कथंचित् बध्नाति, कथंचिच्च न बध्नाति।
तिर्यग्गति-तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वि-उद्योत-नीचगोत्राणां अत्र कथं न बंध: व्युच्छिन्न: ?
न, सप्तमपृथिवीगत-नारकमिथ्यादृष्टे: शेषगतिबंधं प्रति भवसंक्लेशेण अयोग्यस्य तिर्यग्गति-तिर्र्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वि-नीचगोत्रान् मुक्त्वा सर्वकालं अन्यासामेतासां प्रतिपक्षप्रकृतीनां बंधाभावात्। न च विशुद्धिवशेन धु्रवबंधिप्रकृतीनां बंधव्युच्छेदो भवति, ज्ञानावरणादीनामपि तत: बंधव्युच्छेदप्रसंगात्। न चैवं अनवस्थापत्ते:। ‘आउगं च ण बंधदि’ इति ‘च’ शब्देन सूचिताबध्यमानप्रकृतयोऽपि अत्र वक्तव्या:।
ता: का: ?
उच्यते-असातावेदनीय-स्त्रीवेद-नपुंसकवेद-अरति-शोक-नरकगति-मनुष्यगति-देवगति-एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रियजाति-वैक्रियिक-आहारशरीर-न्यग्रोधपरिमंडल-स्वाति-कुब्जक-वामन-हुंडकसंस्थान-वैक्रियिकांगोपांग-आहारांगोपांग-वङ्कानाराचसंहनन-नाराचसंहनन-अर्धनाराच-कीलित-असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन-नरकगति-मनुष्यगति-देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वि-आतप-अप्रशस्तविहायोगति-स्थावर-सूक्ष्म-अपर्याप्त-साधारणशरीर-अस्थिर-अशुभ-दुर्भग-दु:स्वर-अनादेय-अयश:कीर्ति-तीर्थकर-उच्चगोत्राणि-इमा: प्रकृती: सप्तमपृथिवीगतनारक: प्रथमसम्यक्त्वग्रहणाभिमुख: मिथ्यादृष्टि: न बध्नाति।
एवं ‘कदि काओ पयडीओ बंधदि’ इति यत्पदं पूर्वं कथितं, तस्य व्याख्यानं कृतम्।
तात्पर्यमेतत्-त्रिविधमहादण्डकेषु कथितबंधापसरणविधिना परिणामविशुद्ध्या विशुद्ध्यद्भि: भव्यै: प्रथमसम्यक्त्वं संप्राप्य अनन्तसंसारं अद्र्धपुद्गलपरावर्तमात्रं क्रियते पुनश्च जिनदेवभक्त्या ‘कालानियमाच्च निर्जराया:’ इति श्रीमद्भट्टाकलंकदेवस्याभिप्रायं मुहुर्मुहु: चिन्तयद्भि: अस्माभि: ईदृश: पुरुषार्थ: कर्तव्य: यत् सत्वरमेव सर्वकर्मणां विनाशो भवेत्। अतएव याच्यते मया नित्यमेव।
कालचक्राद् विनिर्गन्तुं, त्रिकालं नौमि निष्कलान्।
कालकलाव्यतीतांश्च, पुष्यन्तु न: समीहितम्।।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे श्रीभूतबलि-विरचितजीवस्थानचूलिकाया: अन्तर्गतपंचमचूलिकायां गणिनीज्ञानमती-कृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां तृतीयो महादण्डको नाम पंचमचूलिकाधिकार: समाप्त:।

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अथ तृतीय महादण्डक(पंचम चूलिका अधिकार)

मंगलाचरण

श्री पार्श्वनाथ भगवान के चरणकमल मनवांछित, हितकारी फल को देने में कल्पवृक्ष के समान सारभूत हैं, चितित फल को देने में कुशल चितामणिरत्न के समान हैं, ऐसे तेईसवें तीर्थंकर भगवान के चरणकमलों को हम अपने अभीष्ट सौख्य की सिद्धि के लिये नमस्कार करते हैं।।१।।

अब षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड के छठे ग्रन्थ में जीवस्थानचूलिका के अन्तर्गत पाँचवीं चूलिका में तीसरा महादण्डक कहा जा रहा है। इसमें दो सूत्र कहेंगे।

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अब तृतीय महादण्डक को कहने की प्रतिज्ञारूप से सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

उन तीन महादण्डकों में से यह तृतीय महादण्डक कहा जाता है।।१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यद्यपि इस महादण्डक को तृतीयपना बिना कहे भी जाना जाता है, क्योंकि इसके पूर्व दो दण्डक कहे गये हैं, फिर भी युक्तिवाद में अकुशल ऐसे शब्दानुसारी के अनुग्रह के लिये इस सूत्र का अवतार हुआ है।

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अब प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख ऐसे सातवें नरक के नारकी जीवों के बंध योग्य प्रकृतियों का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख ऐसा नीचे सातवीं पृथिवी का नारकी मिथ्यादृष्टि जीव पाँचों ज्ञानावरणीय, नवों दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबंधी आदि सोलह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, इन प्रकृतियों को बांधता है किन्तु आयुकर्म को नहीं बांधता है। तिर्यग्गति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिक शरीर, तैजस शरीर, कार्मण शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिक शरीर-अंगोपांग, वङ्काऋषभनाराचसंहनन, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, तिर्यग्गति प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास इन प्रकृतियों को बांधता है। उद्योत प्रकृति को कदाचित् बांधता है और कदाचित् नहीं बांधता है। प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश:कीर्ति, निर्माण, नीच गोत्र और पाँचों अन्तराय कर्म, इन प्रकृतियों को बांधता है।।२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख सातवीं पृथिवी का कोई एक नारकी इन ज्ञानावरणीय आदि प्रकृतियों को बांधता है। वह आयु कर्म को नहीं बांधता है और सूत्र में आये ‘च’ शब्द से अन्य और प्रकृतियों को भी नहीं बांधता है। कथंचित् उद्योत प्रकृति को बांधता है और कथंचित् नहीं भी बांधता है।

शंका-तिर्यग्गति, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उद्योत और नीच गोत्र, इन प्रकृतियों की यहाँ पर बन्ध-व्युच्छित्ति क्यों नहीं होती ?

समाधान-नहीं, क्योंकि भव सम्बन्धी संक्लेश के कारण शेष गतियों के बन्ध के प्रति अयोग्य, ऐसे सातवीं पृथिवी के नारकी मिथ्यादृष्टि के तिर्यग्गति, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी और नीच गोत्र को छोड़कर सदाकाल इनकी प्रतिपक्षस्वरूप अन्य प्रकृतियों का बन्ध नहीं होता है तथा विशुद्धि के वश से ध्रुवबन्धी प्रकृतियों का बन्ध-व्युच्छेद नहीं होता है अन्यथा उसी विशुद्धि के वश से ज्ञानावरण आदि प्रकृतियों के भी बन्ध-व्युच्छेद का प्रसंग आता है किन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि वैसा मानने पर अनवस्था दोष आता है।

‘आउगं च ण बंधदि’ इस वाक्य में पठित ‘च’ शब्द के द्वारा सूचित अबध्यमान प्रकृतियाँ यहाँ जानकर कहना चाहिये। वे प्रकृतियाँ कौन-कौन सी हैं ? सो ही कहते हैं-

‘च’ शब्द से सूचित प्रकृतियाँ इस प्रकार हैं-असातावेदनीय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, अरति, शोक, नरकगति, मनुष्यगति, देवगति, एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रिय जाति, वैक्रियिक शरीर, आहारकशरीर, न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान, स्वातिसंस्थान, कुब्जकसंस्थान, वामनसंस्थान, हुण्डकसंस्थान, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग, आहारकशरीर अंगोपांग, वङ्कानाराचसंहनन, नाराचसंहनन, अर्धनाराचसंहनन, कीलितसंहनन, असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप, अप्रशस्तविहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण शरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयश:कीर्ति, तीर्थंकर और उच्चगोत्र, इन प्रकृतियों को प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख हुआ सातवीं पृथिवी का मिथ्यादृष्टि नारकी नहीं बांधता है।

इस प्रकार ‘कितनी और किन प्रकृतियों को बांधता है’ यह जो सूत्रोक्त पद है, उसका व्याख्यान समाप्त हुआ।

यहाँ तात्पर्य यह है कि-तीन प्रकार के महादण्डकों में कही गई बंधापसरण की विधि से परिणामों की विशुद्धि से विशुद्ध होते हुए भव्य जीवों को प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करके अनन्त संसार को अद्र्धपुद्गल परिवर्तनमात्र करना चाहिये, पुन: जिनेन्द्र भगवान की भक्ति से तथा ‘निर्जरा के लिये काल का कोई नियम नहीं है’, इस श्रीमान् भट्टाकलंक देव के अभिप्राय को बार-बार िंचतन करते हुये हम सभी को ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिये कि शीघ्र ही सभी कर्मों का विनाश हो जावे। इसलिये हम नित्य ही याचना करते हैं-

कालचक्र से निकलने के लिये हम तीनों कालों में काल की कला से रहित ऐसे निष्कल-सिद्ध परमेष्ठी भगवन्तों को नमस्कार करते हैं, वे सिद्ध भगवान हम सभी के अभीष्ट को पूर्ण करें।।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदन्त-भूतबलि आचार्यप्रणीत षट्खण्डागम ग्रन्थराज के प्रथम खण्ड में छठी पुस्तक में श्री भूतबलि सूरि विरचित जीवस्थान चूलिका के अन्तर्गत पांचवीं चूलिका में गणिनीज्ञानमतीकृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में यह ‘तृतीय महादण्डक’ नाम का पांचवां चूलिका अधिकार पूर्ण हुआ।