ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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068.हस्तिनापुर में आचार्य संघ व माताजी संघ का आगमन

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हस्तिनापुर में आचार्य संघ व माताजी संघ का आगमन

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हस्तिनापुर में संघ का आगमन-

दिल्ली चातुर्मास और निर्वाणोत्सव के मंगल कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज को ससंघ हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र के दर्शन कराना था। मेरठ के अनेक श्रीमान् बोरी भर नारियल लेकर भक्तिभाव से श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना करने के लिए आ गये। इसी मध्य कुछ चर्चा आ गई कि-‘‘जिनके घर में अन्तर्जातीय-खण्डेलवाल, अग्रवाल, परवार आदि जातियों-में विवाह संबंध हो चुके हैं, ये साधुगण उनके यहाँ आहार नहीं लेंगे।’’

इस बात से इन लोगों में कुछ रोष व्याप्त हुआ, मेरे पास चर्चा करने आये। मैंने भी यही कहा कि- ‘‘संघ की यही परम्परा है। आचार्यश्री शांतिसागर जी की परम्परा के कोई भी साधु ऐसे संबंध वालों के यहाँ आहार नहीं लेते हैं।’’ अनेक चर्चा करके ऊहापोह के बाद ये मेरठ निवासी नारियल की बोरी लेकर वापस चले गये। जब मैंने देखा कि- ‘‘आचार्यश्री की एवं संघ में सभी साधुओं की इच्छा हस्तिनापुर दर्शन की है। मेरी इच्छा तो इसलिए भी अधिक थी कि मैं यहाँ सुदर्शन मेरु पर्वत का शिलान्यास कराकर गई थी अतः आचार्यश्री का मंगल पदार्पण यहाँ बहुत ही जरूरी था।’’

मैंने लाला श्यामलाल जी, डॉ. कैलाशचंद आदि को आगे किया, उन लोगों ने श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना की और सुखद वातावरण में आचार्यश्री का ससंघ रविवार १५-१२-१९७४ को मध्यान्ह में हस्तिनापुर की ओर विहार हो गया। २२ दिसम्बर को संघ मेरठ आ गया। यहाँ मेरठ वालों ने भक्ति से रेलवे रोड की दिगम्बर जैन धर्मशाला में ठहराया और सभी श्रीमान् जो कि नारियल वापस लेकर आ गये थे वे भी आगे आये, भक्ति से सभी ने घर-घर में चौका लगाया और आचार्यश्री के संघ को कई दिनों तक रोका।

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मेरा हस्तिनापुर आगमन-

आगे फरवरी १९७५ में यहाँ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होने वाली थी अतः मैंने आचार्यश्री से आज्ञा लेकर आर्यिका रत्नमती जी और आर्यिका शिवमतीजी को साथ लेकर शेष अपनी शिष्याओं को संघ में ही छोड़कर मेरठ से हस्तिनापुर के लिए विहार कर दिया। उधर संघ को मेरठ से सरधना के लोग ले गये चूंकि यहाँ फरवरी में प्रतिष्ठा पर आना था। सरधना में भक्ति विशेष थी। पौष शु. १५ दिनाँक २७ जून १९७५ को आचार्यश्री का ६१वां जन्मदिवस समारोह मनाया गया।

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भगवान् महावीर की प्रतिमा विराजमान-

यहाँ बड़े मंदिर वाले भगवान् बाहुबली की एवं जलमंदिर के भगवान् महावीर की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा २० फरवरी से २४ फरवरी तक निश्चित कर चुके थे। मेरी प्रेरणा से इन लोगों ने सोलापुर के पं. वर्धमान शास्त्री को प्रतिष्ठाचार्य के लिए निश्चित किया। यह पहले लिखा गया है कि भगवान् महावीर की सवा नौ फुट की खड्गासन जिनप्रतिमा जम्बूद्वीप स्थल पर विराजमान करने के लिए आ चुकी थीं और वह पेटी में बंद बड़े मंदिर के गुरुकुल में रखी हुई थीं।

श्री सुकुमारचंद आदि महानुभावों ने कहा कि- ‘‘माताजी! इन प्रतिमाजी को यहीं गुरुकुल में खड़ी करके प्रतिष्ठित करा देंगे पुनः जब जम्बूद्वीप पर मंदिर बनेगा, तब ले चलकर वहाँ विराजमान कर देंगे।’’ मैं सरल थी अतः ‘‘ठीक है’’ ऐसा कह दिया था। इसी बीच एक दिन मेरे पैर के अंगूठे पर बहुत बड़ी लकड़ी की फड़ गिर जाने से नाखून में काफी चोट आ गई थी। उस दर्द से बुखार आ गया था। मैं चुपचाप सोयी थी। दो-तीन दिन से मोतीचंद-रवीन्द्रकुमार बहुत ही सुस्त थे। सहसा मैंने पूछा- ‘‘क्या बात है? तुम दोनों इतने सुस्त-उदास क्योें हो?’’

दोनों एक-दूसरे का मुख देखते रहे और कुछ नहीं बोले। बार-बार पूछने पर साहस कर बोले कि-‘‘मंदिर वालों की एक चिट्ठी आई है।....’’ मैंने कहा -‘‘क्या है? लाओ, दिखाओ। इन बातों से मेरे मन पर कोई असर नहीं होता है।’’ पत्र लाकर पढ़कर सुनाया। उसमें लिखा था कि- ‘‘आप की जम्बूद्वीप स्थल की प्रतिमा की प्रतिष्ठा नहीं हो सकेगी। जब वहाँ मंदिर बन जायेगा, तब वहीं विराजमान कराकर प्रतिष्ठा कराना।’’ मैं उठकर बैठ गई और बोली-

‘‘देखो, मोतीचंद! रवीन्द्र! तुम दोनों मिलकर ऐसा प्रयास करो, जिससे छोटा सा गर्भागार अर्थात् छोटा सा कमरा ८-१० दिन में बन जाये और उसमें प्रतिमाजी खड़ी कर दी जायें। मंदिर बाद में बनता रहेगा। चिंता मत करो। मेरी इच्छा है कि इसी प्रतिष्ठा में आचार्यश्री धर्मसागर जी उस प्रतिमा को सूरिमंत्र दे दें। फिर क्या पता, आचार्यश्री का समागम जम्बूद्वीप स्थल को मिलेगा या नहीं, कौन जाने? अतः प्रतिमाजी की प्रतिष्ठा अभी ही करा लेनी है।’’ इसी मध्य पं. वर्धमान शास्त्री का भी एक पत्र आ गया कि-

‘‘बिना मंदिर बने हम आपकी जिनप्रतिमा की प्रतिष्ठा नहीं करेंगे।’’ मुझे बहुत ही दुःख हुआ और सोचने लगी- ‘‘देखो, ये विद्वान् लोग कैसे होते हैं? मैंने कितने प्रयास से इनका नाम इसलिए रखाया था कि ये अपने विद्वान् हैं। मैं इन पं. वर्धमान जी को अपना ही, अपने संघ का ही परम मुनिभक्त समझती थी और आज ये इनके यहाँ प्रतिष्ठा के लिए आने को हुए तो उनके कहे अनुसार पत्र लिख दिया......।’’ खैर। मैंने कहा-‘‘तुम लोग चिंता मत करो, पुरुषार्थ करो।’’

तभी इन दोनों ने वहीं मंदिर पर काम करने वाले कारीगरों को बुलाकर बात की- ‘‘हमें कारीगर कहाँ से मिल सकते हैं? जो कि ८-१० दिन में एक कमरा बना दें।’’ चूँकि इन दोनों का अभी किसी से कोई परिचय तो था नहीं। तब कारीगरों ने कहा- ‘‘बाबूजी! हम लोग आपका काम रात्रि-रात्रि में कर देंगे।’ अब इन दोनों के पास पैसे की समस्या थी। मेरे से बोले-

‘‘माताजी! आप सरलता में किसी से यह नहीं कह देना कि मेरी संस्था में पैसा नहीं है। चूँकि इससे संस्थान की साख जाती रहेगी....।’’ मैंने कहा-‘‘ठीक है, तुम दोनों अपने-अपने घर पत्र लिखकर ५-५ हजार रुपये मंगा लो, जब दस हजार की बात है तो कमरा तैयार हो जायेगा। इन दोनों ने ऐसा ही किया। ५ हजार रुपये सनावद से और ५ हजार रुपये टिकैतनगर से आ गये। मोतीचंद रात्रि में मंदिर से यहाँ खुले खेत में रजाई ओढ़कर आकर उस जनवरी-फरवरी की ठण्ड में बैठते थे और कारीगरों से, मजदूरों से काम कराते थे। वो समय वह था कि जब रात्रि में क्या, दिन में लोग इधर जंगल मानकर आने से डरते थे। सात-आठ दिन में कमरे की नींव भरकर दीवारें खड़ी हो गर्इं। अब समय तो था नहीं। ऊपर सीमेंट से छत का लेंटर पड़े, वह १०-१२ दिन बाद खुले, तब कहीं प्रतिमाजी वहाँ विराजमान की जा सके। यह भी एक समस्या आ गई। एक दिन मध्यान्ह में मंदिर में मानस्तम्भ के पास तख्त पर बैठी हुई थी। मोतीचंद, रवीन्द्रकुमार भी इसी समस्या को लेकर बैठे हुए थे। कई एक महानुभाव मेरठ के भी थे। ऊहापोह चल रहा था। इसी बीच एक महानुभाव बोले- ‘‘अ अ अ अ असंभव है...।’’

पुनः कुछ सोचकर एक-दूसरे महानुभाव बोल उठे- ‘‘मोतीचंद! आप ऐसा करो, सीमेंट का लेंटर न डालकर पुराने ढंंग से लोहे के गाटर लाकर डाल दो तथा पत्थर बिछा दो, बस छत तैयार हो जायेगी। दो दिन में मंदिर बन जायेगा।’’ इतना सुनते ही मोतीचंद और रवीन्द्र खुश हो गये। इसी प्रकार गाटर डालकर पत्थर की शिला से छत बना दी गई और समय पर भगवान की प्रतिमा जी यहाँ इस नूतन निर्मित गर्भागार में क्रेन से खड़ी की गर्इं जब प्रतिमाजी खड़ी की जा रही थीं, तब उपाध्याय मुनिश्री विद्यानंद जी स्वयं आकर यहां विराज गये और आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज भी संघ सहित आहार के बाद यहीं जंबूद्वीप स्थल पर आकर बैठ गये। उस समय यहाँ पर खुले खेत में कोई व्यवस्था तो थी नहीं, हाँ, कुछ! लकड़ी की फड़ें पड़ी थीं, उन्हें ही डाल दिया गया। उन्हीं पर सब साधु-साध्वियां दिन भर बैठे रहे।

जब मूर्ति की पेटी खोली गई थी, तब श्री विद्यानंद जी महाराज ने तत्क्षण ही कपूर जलवाकर काजल लेकर मूर्ति के गाल पर लगा दिया पुनः पूरी खोलने दिया और बोले- ‘‘माताजी! यह मूर्ति बहुत ही सुन्दर है और बहुत ही चमत्कारिक है। ऐसी मूर्ति मिलना दुर्लभ है।’’ उस समय के उन उपध्यायश्री के वचन वास्तव में फल गये। यह भगवान् महावीर स्वामी की मूर्ति मानो साक्षात् कल्पवृक्ष ही हैं। आज यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर जो लगभग डेढ़ करोड़ का वैभव दिख रहा है-यह विशाल जंबूद्वीप रचना दिख रही है, वह सब इनका ही प्रभाव है। इस मूर्ति के खड़े होते समय उनके नीचे ‘अचलयंत्र’ को आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज ने स्थापित किया था। आश्चर्य की बात यह है कि सन् १९७५ की फरवरी से जिस छोटे से गर्भागार में भगवान महावीर स्वामी विराजमान किये गये थे, वे आज तक वहीं पर खड़े हैं। मैंने भी यह निश्चय कर दिया था कि ‘‘ये प्रतिमाजी यहीं पर ही विराजमान रहेंगी।’’ दैवयोग से सन् १९८७ में उन प्रभु का कमल मंदिर बनाया गया। यह कमलमंदिर भी सारे भारत में दिगम्बर जैन संप्रदाय में पहला ही होगा। इसको बनाने के लिए आसाम से कारीगर बुलाये गये।

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अचलयंत्र स्थापना-

इससे पूर्व बड़े मंदिर पर बाहुबली की प्रतिमाजी खड़ी होते समय उसके नीचे ‘अचलयंत्र’ मैंने स्थापित किया था और जलमंदिर के भगवान महावीर की प्रतिमा को खड़े करते समय वहाँ भी अचलयंत्र मैंने ही स्थापित किया था।

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पंचकल्याणक प्रतिष्ठा-

प्रतिष्ठा के पूर्व जब सहारनपुर के अहाते में पांडाल बनाया जा रहा था, तब वह एक-दो बार आंधी-तूफान से गिर पड़ा। श्री सुकुमार चंद जी मेरे पास आये और समस्या सुनाकर बोले- ‘‘माताजी! जल्दी ही कुछ उपाय कीजिये, जिससे कि ये विघ्न-बाधाएँ दूर हों।’’ मैंने भोजपत्र पर एक यंत्र बनाकर उस पर मंत्र पढ़कर, उसे एक डिब्बी में रख दिया और उनसे कह दिया- ‘‘पांडाल में वेदी में जो प्रतिष्ठित प्रतिमाजी रहेंगी, उनके सिंहासन के नीचे यह यंत्र रख दो, प्रतिष्ठा पूर्ण होने तक कोई भी विघ्न नहीं आयेगा।’’ हुआ भी वैसा ही, यह प्रतिष्ठा सानन्द सम्पन्न हुई। किसी भी प्रकार की बाहरी विघ्न-बाधाएँ पुनः नहीं आर्इं।

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अंकन्यास विधि-

प्रतिमा की प्रतिष्ठा में केवलज्ञान कल्याणक से पूर्व सर्वत्र प्रतिमाजी के अंग-उपांग में मंत्र लिखे जाते हैं। ये मंत्र केशर से सोने की लेखनी से लिखे जाते हैं। शास्त्रोक्त विधि से मंत्रों को लिखते समय, अंकन्यास करते समय एक विद्वान् ने वहाँ बाहुबली की प्रतिमा के निकट दौड़कर आचार्यश्री धर्मसागर जी का हाथ पकड़कर उन्हें रोका। आचार्यश्री विधिवत् कार्यों में किसी की कब मानने वाले थे? इसी मध्य कुछ हल्ला सा हुआ, मेरे पास आकर एक महानुभाव ने बताया कि- ‘‘माताजी! इस अंकन्यास को केशर से मूर्ति पर लिखने का प्रमाण दिखाइये।’’ मैंने उसी क्षण शीतल प्रसाद ब्रह्मचारी का ‘प्रतिष्ठापाठ संग्रह’ लेकर वह प्रकरण खोलकर दिखा दिया जिसमें लिखा था कि- ‘‘यह मंत्र अंकन्यास विधि, केसर से प्रतिमा के ऊपर सोने की कलम से लिखी जानी चाहिए।’’ खैर! तब तक यह विधि पूर्ण हो चुकी थी। आचार्य श्री ने ही सर्वत्र बड़ी प्रतिमाओें को सूरिमंत्र प्रदान किया और पं. वर्धमान शास्त्री ने भी सर्वविधि शास्त्र के अनुसार पूर्ण कीं।

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पंचामृत अभिषेक-

जब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा पूर्ण हो गई, उसके बाद संघ के ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणियों ने मिलकर बड़े रूप में यहाँ जम्बूद्वीप स्थल पर भगवान् महावीर स्वामी की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक किया। इस समय उपाध्याय मुनिश्री विद्यानंद जी महाराज भी आ गये और बोले- ‘भला इस अभिषेक के समय मुझे क्यों नहीं बुलाया? इस प्रकार प्रतिष्ठा के बाद वहाँ मंदिर पर, जहाँ एक कमरे में संघ की प्रतिमाजी विराजमान थीं, वहीं पर आकर विद्यानंद जी महाराज बैठ जाते थे और बहुत कुछ परामर्श करते रहते थे।

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संघस्थ साधुगण-

सन् १९७५ में यहाँ पर विशाल साधु समुदाय विराजमान था। १. पूज्य आचार्यश्री धर्मसागर जी

२. मुनि श्री वृषभसागर जी

३. श्री सुपार्श्वसागर जी

४. श्री बोधिसागर जी

५. श्री संयमसागर जी

६. श्री दयासागर जी

७. श्री महेन्द्रसागर जी

८. श्री अभिनंदनसागर जी

९. श्री संभवसागर जी

१०. श्री वर्धमानसागर जी

११. श्री भूपेन्द्रसागर जी

१२. श्री बुद्धिसागर जी

१३. श्री चारित्रसागर जी

१४. श्री विनयसागर जी

१५. श्री विजयसागर जी,

१६. श्री कीर्तिसागर जी,

१७. श्री गुणसागर जी,

१८. श्री भद्रसागर जी।

इसी प्रकार तथा उपाध्याय मुनि श्री विद्यानंद जी महाराज।

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आर्यिकाएँ-

१. आर्यिका जिनमती जी

२. आर्यिका संभवमती जी

३. आर्यिका आदिमती जी

४. आर्यिका भद्रमती जी

५. आर्यिका कल्याणमती जी

६. आर्यिका श्रेष्ठमती जी

७. आर्यिका गुणमती जी

८. आर्यिका विद्यामती जी

९. आर्यिका सिद्धमती जी

१०. आर्यिका जयामती जी

११. आर्यिका विमलमती जी

१२. आर्यिका निर्मलमती जी

१३. आर्यिका शुभमती जी

१४. आर्यिका श्रुतमती जी

१५. आर्यिका यशोमती जी

१६. आर्यिका संयममती जी

१७. आर्यिका विपुलमती जी।

इसी प्रकार १. मैं (आर्यिका ज्ञानमती)

२. आ. रत्नमती जी और

३. आ. शिवमती जी।


सब मिलकर २० आर्यिकायें थीं। १. ऐलक वैराग्यसागर जी,

२. क्षुल्लक सुरत्नसागर जी और

३. क्षुल्लक निर्वाणसागर जी थे।

इस प्रकार यहाँ १९ मुनि, २० आर्यिकायें और तीन ऐलक-क्षुल्लक मिलकर ४२ साधु-साध्वियाँ उपस्थित थे।

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जम्बूद्वीप मॉडल-

इसी मध्य आचार्यश्री और उपाध्यायश्री के तथा चतुर्विध संघ के सानिध्य में यहाँ बनने वाली जम्बूद्वीप रचना का एक भव्य मॉडल, जो कि दिल्ली में तैयार हुआ था बड़े मंदिर के परिसर में एक कमरे में रखा गया था, उसका अनावरण दिल्ली निवासी लाला श्रीचंद जी चावल वालों ने किया। उस समय सुकुमार चंद जी आदि ने अपने-अपने उद्गार व्यक्त किये और उपाध्याय श्री तथा आचार्य श्री ने बनने वाले जम्बूद्वीप के लिए बहुत-बहुत आशीर्वाद प्रदान किया और श्रावकों को तन-मन-धन से सहयोग करने के लिए प्रेरणा दी।