ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

07.अनित्यत्वाधिकार प्रश्नोत्तरी

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
अनित्यत्वाधिकार

Fom bor1342.jpg
Fom bor1342.jpg
Fom bor1342.jpg
Fom bor1342.jpg

प्रश्न १५९—मनुष्य का शरीर अनित्य कैसे है ?
उत्तर—नित्य भोजन, पानी आदि को देने से ही शरीर चलता है, एक दिन भी इनके अभाव में यह मुरझा जाता है। हथियार, रोग, जल, अग्नि आदि से भी यह पल भर में नष्ट हो जाता है।

प्रश्न १६०—शरीर अपवित्र किस प्रकार है ?
उत्तर—इस देह रूपी झोपड़े में दुर्गन्धित और अपवित्र मल, मूत्र, विष्टा आदि भरा है, ऊपर से चाम ढका हुआ है, भूख—प्यास आदि दुख लगे हैं अर्थात् यह दुखों का भण्डार है तथा वृद्धावस्थारूपी अग्नि है।

प्रश्न १६१—अपनी प्रिय वस्तु के नष्ट होने पर शोक करने से क्या नष्ट हो जाता है ?
उत्तर—अपने प्रिय स्त्री, पुत्रादि के नष्ट होने पर प्राणी उन्मादी मनुष्य के समान बिना प्रयोजन अत्यन्त शोक करता है जिससे उसके धर्म, अर्थ व काम आदि का नाश हो जाता है।

प्रश्न १६२—जन्म, जरा, मृत्यु से छुटकारा कौन दिलाता है ?
उत्तर—धर्म ही जन्म, जरा, मृत्यु से छुटकारा दिलाता है।

प्रश्न १६३—आचार्यों ने पुत्र, स्त्री आदि को किसकी उपमा दी है ?
उत्तर—आचार्यों ने पुत्र, स्त्री आदि को बिजली के समान चंचल तथा विनाशीक बताया है।

प्रश्न १६४—द्रव्र्यािथक और पर्यार्यािथक नय की अपेक्षा वस्तु का स्वरूप क्या है ?
उत्तर—द्रव्र्यािथक नय की अपेक्षा वस्तु सर्वथा नित्य है और पर्यार्यािथक नय की अपेक्षा यह पैदा होती है और नष्ट भी होती है।

प्रश्न १६५—अपनी प्रिय वस्तु के नष्ट होने पर शोक करने से क्या मिलता है ?
उत्तर—क्षेत्र में बोया हुआ छोटा भी वटवृक्ष का बीज जिस प्रकार शाखा—प्रशाखा रूप स्वरूप में परिणत होकर फैल जाता है उसी प्रकार अपने प्रिय स्त्री, पुत्र आदि के मरने पर जो अत्यन्त शोक किया जाता है वह शोक उस असाता कर्म को पैदा करता है जिससे नरक, तिर्यंच आदि अनेक योनि में भ्रमण करना पड़ता है।

प्रश्न १६६—यम अर्थात् काल से प्राणी कहाँ बच सकता है ?
उत्तर—काल सब जगह चलता है अर्थात् काल प्राणियों को पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि आदि किसी स्थान पर नहीं छोड़ता है।

प्रश्न १६७—क्या पूर्वकाल में बंधे हुए कर्म का देव आदिक निवारण कर सकते हैं ?
उत्तर—पूर्वकाल में बांधे हुए कर्म नियम से उदय में आते हैं, बलवान से बलवान देव, देवी, वैद्य, विद्या, मणि, मंत्र, भृत्य, मित्र, सुगन्ध तथा राजा आदिक कोई भी निवारण नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न १६८—मोही प्राणी की स्थिति कैसी है ?
उत्तर—मोही प्राणी अनेक जीवों को मरा हुआ जानकर और देखकर भी मोह से आत्मा को निश्चल ही मानता है और वृद्धावस्था के आने पर भी पुत्र, स्त्री, धन आदि के मोह में और ज्यादा बंधता जाता है, धर्म की ओर कुछ भी लक्ष्य नहीं देता है।

प्रश्न १६९—क्या स्त्री, संपदा, पुत्रादिक में अभिमान करना उचित है ?
उत्तर—जिस प्रकार आकाश को मुट्ठी से मारना, सूखी नदी को तिरना और मरीचिका का पीना बिना प्रयोजन का है उसी प्रकार अत्यन्त चंचल तथा विनाशीक संपदा, पुत्र, स्त्री आदि में अहंकार करना व्यर्थ है।