ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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07.कषायमार्गणा अधिकार

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कषायमार्गणा अधिकार

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अथ कषायमार्गणाधिकार:

अधुना कषायमार्गणायां कषायसहितरहितानां स्वामित्वप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते—
कसायाणुवादेण कोधकसाई माणकसाई मायकसाई लोभकसाई णाम कधं भवदि ?।।४०।।
चरित्तमोहणीयस्स कम्मस्स उदएण।।४१।।
अकसाई णाम कधं भवदि ?।।४२।।
उवसमियाए खइयाए लद्धीए।।४३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-क्रोधो द्विविधो-द्रव्यक्रोधो भावक्रोधश्चेति। द्रव्यक्रोधः भावक्रोधोत्पत्तिनिमित्त-द्रव्यं। तद् द्विविधं-कर्मद्रव्यं नोकर्मद्रव्यं च। यत् कर्मद्रव्यं यत्त्रिविधं-बंधोदयसत्त्वभेदेन।
यत्क्रोधनिमित्तनोकर्मद्रव्यं नैगमनयाभिप्रायेण लब्धक्रोधव्यपदेशं तद् द्विविधं सचित्तमचित्तं च । एते क्रोधकषायाः यस्य सन्ति स क्रोधकषायी। अत्र प्रथमसूत्रे अर्पितक्रोधकषायी कथं भवति ? केन प्रकारेण भवतीति पृच्छा कृता। एवं शेषकषायाणामपि वक्तव्यं। अविवक्षितकषायान् निवार्य अर्पितकषायज्ञापनार्थ-मुत्तरसूत्रमवतारितं।
चारित्रमोहनीयस्य कर्मणः उदयेन जीवः क्रोधकषायी भवति, इति शेषाणामपि कषायाणां विषये ज्ञातव्यः। तेन क्रोधकषायस्योदयेन क्रोधकषायी, मानकषायस्योदयेन मानकषायी, मायाकषायस्योदयेन मायाकषायी, लोभकषायोदयेन लोभकषायीति सिद्धं भवति।
पूर्वोक्तकषायाणां कस्याभावेन अकषायी भवति इति पृच्छासूत्रमवतार्य अग्रे समाधत्ते आचार्यदेवः-
चारित्रमोहनीयस्य उपशमेण क्षयेण च या उत्पन्ना लब्धिः, तया अकषायत्वं सिद्ध्यति, न शेषकर्मणां क्षयेणोपशमेण वा, तस्मात् जीवस्य उपशामक-क्षायिकलब्ध्योः अनुत्पत्तेः।
एवं कषायिणां अकषायिणां च प्रतिपादनपरत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानाम षष्ठोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ कषायमार्गणा अधिकार

अब कषायमार्गणा में कषायरहित जीवों का स्वामित्व निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणानुसार जीव क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी किस कारण से होता है ?।।४०।।

चारित्रमोहनीय कर्म के उदय से जीव क्रोध कषायी आदि होता है।।४१।।

जीव अकषायी किस कारण से होता है ?।।४२।।

औपशमिक व क्षायिक लब्धि से जीव अकषायी होता है।।४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-क्रोध के दो भेद हैं-द्रव्यक्रोध और भावक्रोध। भावक्रोध की उत्पत्ति के निमित्तभूत द्रव्य को द्रव्यक्रोध कहते हैं। वह द्रव्यक्रोध दो प्रकार का है-कर्मद्रव्य और नोकर्मद्रव्य। कर्मद्रव्य बंध, उदय और सत्व के भेद से तीन प्रकार का है।

क्रोध के निमित्तभूत जिस नोकर्मद्रव्य ने नैगम नय के अभिप्राय से क्रोध संज्ञा प्राप्त की है, वह दो प्रकार का है-सचित्त और अचित्त। ये सब क्रोधकषाय जिस जीव के होते हैं, वह क्रोधकषायी हैं। प्रस्तुत सूत्र में यह बात पूछी गई है कि विवक्षित क्रोधकषायी कैसे अर्थात् किस प्रकार से होता है ? इसी प्रकार से शेष कषायों का भी कथन करना चाहिए। अविवक्षित कषायों का निवारण करके विवक्षित कषायों का ज्ञान कराने के लिए उत्तर सूत्र अवतरित हुआ है।

चारित्रमोहनीय कर्म के उदय से जीव क्रोधकषायी होता है, इसी प्रकार शेष कषायों के प्रति भी जानना चाहिए। अत: क्रोधकषाय के उदय से क्रोधकषायी, मानकषाय के उदय से मानकषायी, मायाकषाय के उदय से मायाकषायी और लोभकषाय के उदय से जीव लोभकषायी होता है, यह बात सिद्ध हो जाती है।

पूर्वोक्त कषायों में से किस कषाय के अभाव से जीव अकषायी होता है, ऐसा पृच्छा सूत्र यहाँ अवतरित करके आगे आचार्यदेव समाधान करते हैं- चारित्रमोहनीय कर्म के उपशम से और क्षय से जो लब्धि उत्पन्न होती है, उसी से अकषायपना उत्पन्न होता है। शेष कर्मों के क्षय व उपशम से अकषायपना उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि उससे जीव के (तत्प्रायोग्य) औपशमिक या क्षायिक लब्धियाँ उत्पन्न नहीं होती है।

इस प्रकार कषायी और अकषायी जीवों का स्वामित्व बतलाने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार समाप्त हुआ।