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07.क्षेत्रपाल पूजा

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क्षेत्रपाल पूजा

क्षेत्रपालाय यज्ञेऽस्मिन्नेतत्क्षेत्राधिरक्षणे।

बलिं दिशामि दिग्यग्नेर्वेद्यां विघ्नविघातिने।।१।।

ॐ आं क्रों ह्रीं अत्रस्थक्षेत्रपाल! आगच्छ आगच्छ संवौषट्। तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:, मम सन्निहितो भव भव वषट् इति पुष्पांजलि:।

क्षेत्रपाल का तेल से अभिषेक
सद्यस्केन सुगंधेन स्वच्छेन बहलेन च।
स्नपनं क्षेत्रपालस्य तैलेन प्रकरोम्यहं।।२।।

ॐ ह्रीं तैलेन क्षेत्रपाल अभिषेचयामि इति स्वाहा।

सिंदूर चढ़ाने का श्लोक
सिंदूरैरारुणाकारै: पीतवर्णै: सुसंभवै:।
चर्चनं क्षेत्रपालस्य सिंदूरै: प्रकरोम्यहं।।३।।

ॐ ह्रीं सिंदूरै: क्षेत्रपालार्चनं करोमीति स्वाहा।

क्षेत्रपाल के लिए अर्घ
भो: क्षेत्रपाल! जिनपप्रतिमांकभाल।
दंष्ट्राकराल जिनशासनवैरिकाल।।
तैलादिजन्म गुडचंदनपुष्प धूपै: ।
भोगं प्रतीच्छ जगदीश्वर यज्ञ काले।।४।।

ॐ आं क्रों ह्रीं हे क्षेत्रपाल! इदं जलादिकं गृहाण गृहाण। ॐ भूर्भुव: स्व: स्वधा स्वाहा।
इति क्षेत्रपालार्चनं।