ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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07.ज्ञानमार्गणाधिकार

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ज्ञानमार्गणाधिकार

अथ ज्ञानमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन एकादशसूत्रैः ज्ञानमार्गणानाम सप्तमोऽधिकारः प्रारभ्यते । तत्र तावत् प्रथमस्थले त्रिमिथ्याज्ञानिनां अंतरनिरूपणत्वेन ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादिना षट्सूत्राणि। ततः परं द्वितीयस्थले पंचविधज्ञानिनामंतरप्ररूपणत्वेन ‘‘आभिणि’’ इत्यादि सूत्रपञ्चकमिति समुदायपातनिका।
इदानीं मत्यज्ञानि-श्रुताज्ञानिनां अंतरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
णाणाणुवादेण मदिअण्णाणी-सुदअण्णाणीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।९७
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।९८।।
उक्कस्सेण बेछावट्ठिसागरोवमाणि देसूणाणि।।९९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-मतिश्रुताज्ञानाभ्यां सम्यक्त्वं गृहीत्वा सम्यग्ज्ञानेषु जघन्यकालान्तरं प्राप्य पुनः मतिश्रुताज्ञाने गतस्य तदुपलंभात्। उत्कर्षेण-मतिश्रुताज्ञानिनोः सम्यक्त्वं गृहीत्वा संज्ञानेषु षट्षष्टिसागरोपम-देशोनकालस्यान्तरं प्राप्य पुनः सम्यग्मिथ्यात्वं गत्वा मिश्रज्ञानैः अंतरित्वा पुनः सम्यक्त्वं गृहीत्वा षट्षष्टिसागरदेशोन कालं भ्रमित्वा मिथ्यात्वं गतस्य तदुपलंभात्।
कुतो देशोनत्वं ?
उपशमसम्यक्त्वकालाद् द्वय-षट्षष्टि-अभ्यन्तरमिथ्यात्वकालस्य बहुत्वोपलंभात्। सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां ज्ञानं मतिश्रुताज्ञानमिति मत्वा केचित् आचार्याः सम्यग्मिथ्यात्वेन सह नान्तरं कुर्वन्ति । तन्न घटते, सम्यग्मिथ्या-त्वभावायत्तज्ञानस्य सम्यग्मिथ्यात्वं च प्राप्तजात्यन्तरस्य मतिश्रुताज्ञानत्वविरोधात्।
विभंगावधिज्ञानिनामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
विभंगणाणीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१००।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१०१।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।१०२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिद् देवो नारको वा विभंगज्ञानी दृष्टमार्गः सम्यक्त्वं गृहीत्वावधिज्ञानेन सह जघन्यमंतर्मुहूर्तं स्थित्वा विभंगज्ञानं मिथ्यात्वं च युगपत् प्रतिपन्नस्तस्य जघन्यान्तरमुपलभ्यते। उत्कर्षेण- विभंगज्ञानस्य मति-अज्ञानं गत्वान्तरं प्राप्यावलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनकालप्रमाणं परिवत्र्य विभंगज्ञानं गतस्य तदुपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले त्रिविधाज्ञानिनामंतरनिरूपणत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
इदानीं पंचविधज्ञानिनामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रपञ्चकमवतार्यते-
आभिणिबोहिय-सुद-ओहि-मणपज्जवणाणीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१०३।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१०४।।
उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणं।।१०५।।
केवलणाणीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१०६।।
णत्थि अंतरं णिरंतरं।।१०७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिद् देवो नारको वा मतिश्रुतावधिज्ञानेषु स्थितः, मिथ्यात्वं गत्वा कुमति-कुश्रुत-विभंगाज्ञानैरन्तरं प्राप्य पुनः मति-श्रुतावधिज्ञानं आगतः तस्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तान्तरमुपलभ्यते।
एवं मनःपर्ययज्ञानी संयतः तज्ज्ञानं विनाश्यान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा तस्यैव ज्ञानस्य पुनः आनेतव्यः।
उत्कर्षेण-कश्चिदनादिमिथ्यादृष्टिर्जीवः अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्य प्रथमसमये उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपद्य तत्रैव देवनारकेषु विरोधाभावात् मतिश्रुतावधिज्ञानान्युत्पाद्य षडावलिकाप्रमाणं उपशमसम्यक्त्वकालमस्ति इति सासादनं गत्वान्तरं प्राप्य पुनः मिथ्यात्वेनाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाणं भ्रमित्वान्तर्मुहूर्तावशेषे संसारे सम्यक्त्वं प्रतिपद्य मतिश्रुतज्ञानयोरन्तरं समानीय पुनः अंतर्मुहूर्तं गत्वावधिज्ञानमुत्पाद्य तत्रैव तदनंतरं अपि समानीयान्त-र्मुहूर्तेन केवलज्ञानमुत्पाद्याबंधभावं गतस्तस्योपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनान्तरमुपलभ्यते।
एवं मनःपर्ययज्ञानस्यान्तरं-उपशमसम्यक्त्वेन सह मनःपर्ययज्ञानस्य विरोधात् प्रथमसम्यक्त्वकालं समाप्य मुहूर्तपृथक्त्वे गते मनःपर्ययज्ञानस्यादौ अंते चान्तरं अस्य ज्ञानस्योत्पादयितव्यं।
केवलज्ञानस्य नास्त्यन्तरं, किच-केवलज्ञाने समुत्पन्ने पुनः तस्य विनाशाभावात्।
तात्पर्यमेतत्-अस्य केवलज्ञानस्य प्राप्त्यर्थमेव स्वाध्यायो ध्यानं तपश्चरणदीक्षाग्रहणादिकं वर्तते, प्रतिदिनं प्रतिक्षणं वा मम अस्य ज्ञानस्य लब्धये प्रयासो भवेदिति याचेऽहं पुनः पुनः भगवत्केवलि-तीर्थकरपादपयोरुहेषु।
एवं द्वितीयस्थले मतिज्ञानादिज्ञानपंचकानामन्तरप्ररूपणत्वेन सूत्रपंचकं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षयान्तरानुगमे गणिनीज्ञानमती-कृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां ज्ञानमार्गणानाम सप्तमोऽधिकारः समाप्तः।


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अथ ज्ञानमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में ग्यारह सूत्रों के द्वारा ज्ञानमार्गणा नाम का सातवाँ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में तीनों मिथ्याज्ञानी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में पाँचों प्रकार के ज्ञानी जीवों का अन्तर प्ररूपण करने हेतु ‘‘आभिणि’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

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अब कुमति और कुश्रुतज्ञानियों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

ज्ञानमार्गणानुसार मतिअज्ञानी और श्रुतअज्ञानी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।९७।।

मतिअज्ञानी और श्रुतअज्ञानी जीवों का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होता है।।९८।।

मति अज्ञानी और श्रुतअज्ञानी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छ्यासठ सागरोपम अर्थात् एक सौ बत्तीस सागरोपमकाल होता है।।९९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मति अज्ञान व श्रुत अज्ञान अर्थात् कुमति-कुश्रुत ज्ञान से सम्यक्त्व ग्रहण कर मतिज्ञान व श्रुतज्ञान में आकर जघन्य काल का अन्तर देकर पुन: कुमति-कुश्रुत ज्ञान को प्राप्त हुए जीव के अन्तर्मुहूर्तप्रमाण अन्तरकाल पाया जाता है। उत्कृष्टरूप से-मति-श्रुतअज्ञानी जीव के सम्यक्त्व को ग्रहण करके सम्यग्ज्ञान द्वारा कुछ कम छ्यासठ सागरोपम काल प्रमाण अन्तर देकर पुन: सम्यग्मिथ्यात्व में जाकर मिश्रज्ञानों का अन्तर देकर पुन: सम्यक्त्व ग्रहण करके कुछ कम छ्यासठ सागरोपमप्रमाण काल तक परिभ्रमण कर मिथ्यात्व को प्राप्त होने वाले के दो छ्यासठ सागरोपमप्रमाण मतिश्रुत अज्ञानों का अन्तरकाल पाया जाता है।

शंका-दो छ्यासठ सागरोपमों में जो कुछ कम काल बतलाया है, ऐसा क्यों है ?

समाधान-क्योंकि उपशमसम्यक्त्वकाल से दो छ्यासठ सागरोपमों के भीतर मिथ्यात्व का काल अधिक पाया जाता है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि के ज्ञान को मति-श्रुत अज्ञानरूप मानकर कितने ही आचार्य पूर्वोक्त अन्तर प्ररूपणा में सम्यग्मिथ्यात्व के साथ अन्तर नहीं करते हैं। पर यह बात घटित नहीं होती है, क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्वभाव के आधीन हुआ ज्ञान सम्यग्मिथ्यात्व के समान प्राप्त वह ज्ञान एक अन्य जाति का बन जाता है अत: उस ज्ञान को मति श्रुत अज्ञानरूप मानने में विरोध आता है।

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अब विभ्गावधिज्ञानियों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

विभंगज्ञानियों का अन्तर कितने काल होता है ?।।१००।।

विभंगज्ञानियों का जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है।।१०१।।

विभंगज्ञानियों का उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकाल है, जो असंख्यात पुद्गल परिवर्तन के बराबर होता है।।१०२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जिसने सम्यक्त्व को प्राप्त करने का मार्ग देख लिया है, ऐसे किसी विभंगज्ञानी देव या नारकी जीव के सम्यक्त्व ग्रहण कर अवधिज्ञान के साथ जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर विभंगज्ञान और मिथ्यात्व को एक साथ प्राप्त होने पर विभंगज्ञान का अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य अन्तर प्राप्त होता है। उत्कृष्ट से-विभंगज्ञान से मति अज्ञान को प्राप्तकर अन्तर प्रारंभ कर आवली के असंख्यातवें भाग मात्र पुद्गलपरिवर्तनप्रमाणकाल तक परिभ्रमण कर विभंगज्ञान को प्राप्त होने वाले जीव के विभंगज्ञान का सूत्रोक्त अन्तर काल पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में तीन प्रकार के अज्ञानी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब पाँच प्रकार के ज्ञानी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी और मन:पर्ययज्ञानी जीवों का अन्तर कितने काल होता है ?।।१०३।।

आभिनिबोधिक आदि उक्त चार ज्ञानियों का जघन्य अन्तर अन्तर्र्मुहूर्त होता है।।१०४।।

आभिनिबोधिक आदि चार ज्ञानों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन-प्रमाण होता है।।१०५।।

केवलज्ञानियों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१०६।।

केवलज्ञानियों में केवलज्ञान का अन्तर ही नहीं है, वह ज्ञान निरन्तर है।।१०७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मति, श्रुत और अवधिज्ञानों में स्थित किसी देव या नारकी जीव के मिथ्यात्व में जाकर कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान व विभंगअज्ञान के द्वारा अन्तर को प्राप्त करके पुन: मतिज्ञान, श्रुतज्ञान व अवधिज्ञान में आने पर उक्त ज्ञानों का अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य अन्तर प्राप्त होता है।

इसी प्रकार मन:पर्ययज्ञानी संयत जीव मन:पर्ययज्ञान को नष्ट करके अन्तर्मुहूर्त काल तक उस ज्ञान के बिना रहकर फिर उसी ज्ञान में लाया जाना चाहिए।

उत्कृष्ट से-किसी अनादिमिथ्यादृष्टि जीव ने अपने अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल के प्रथम समय में उपशमसम्यक्त्व को ग्रहण किया और उसी अवस्था में मतिज्ञान, श्रुतज्ञान व अवधिज्ञान उत्पन्न किये, क्योंकि देव और नारकी जीवों में उक्त अवस्था में इनके उत्पन्न होने में कोई विरोध नहीं आता है। फिर उपशम सम्यक्त्व के काल में छह आवली शेष रहने पर वह जीव सासादनगुणस्थान में गया और इस प्रकार मतिज्ञान आदि तीनों ज्ञानों का अन्तर प्रारंभ हो गया। फिर उसी जीव ने मिथ्यात्व के साथ अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल तक भ्रमण कर संसार के अन्तर्मुहूर्तमात्र शेष रहने पर सम्यक्त्व को ग्रहण करके मति-श्रुत ज्ञानों का अन्तर पूरा किया। पुन: अन्तर्मुहूर्त काल व्यतीत करके उसने अवधिज्ञान उत्पन्न कर लिया और उसी अवस्था में ही अवधिज्ञान का अन्तर पूरा किया। फिर उसने अन्तर्मुहूर्त काल से केवलज्ञान उत्पन्न कर अबंधक भाव प्राप्त कर लिया। ऐसे जीव के मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान का उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण उत्कृष्ट अन्तर पाया जाता है।

इसी प्रकार मन:पर्यय ज्ञान का भी उत्कृष्ट अन्तर उपशमसम्यक्त्व के साथ मन:पर्ययज्ञान का विरोध होने के कारण प्रथमोपशमसम्यक्त्व का काल समाप्त कर मुहूर्तपृथक्त्व हो जाने पर आदि में व अन्त के अन्तर में मन:पर्ययज्ञान को उत्पन्न कराना चाहिए।

केवलज्ञानियों के कोई अन्तर नहीं पाया जाता है, क्योंकि केवलज्ञान उत्पन्न होने पर फिर उसका विनाश नहीं होता है।

तात्पर्य यह है कि-इस केवलज्ञान की प्राप्ति के लिए ही स्वाध्याय, ध्यान, तपश्चरण, दीक्षा ग्रहण आदिक कार्य किये जाते हैं। प्रतिदिन अथवा प्रतिक्षण मेरा इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयास सफल होवे, ऐसी पुन: पुन: तीर्थंकर केवली भगवान के चरण कमलों में मेरी याचना है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में मतिज्ञानादि पाँचों ज्ञानों का अन्तर प्ररूपण करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धांतचिंतामणिटीका में ज्ञानमार्गणा नाम का सप्तम अधिकार समाप्त हुआ।