ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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07. अप्रमत्तविरत गुणस्थान

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७. अप्रमत्तविरत गुणस्थान

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संज्वलन और नोकषाय के मंद उदय से सकल संयमी मुनि के प्रमाद नहीं है अत: ये अप्रमत्तविरत कहलाते हैं। इसके दो भेद हैं—स्वस्थान अप्रमत्त, सातिशय अप्रमत्त। जब तक चारित्र मोहनीय की २१ प्रकृतियों का उपशमन, क्षपण कार्य नहीं है किन्तु ध्यानावस्था है तब तक स्वस्थान अप्रमत्त हैं । जब २१ प्रकृतियों का उपशमन या क्षपण करने के लिए मुनि होते हैं तब वे सातिशय अप्रमत्त कहलाते हैं। ये श्रेणी चढ़ने के सम्मुख होते हैं । इस गुणस्थान का काल अंतर्मुहूर्त है। चारित्र मोहनीय की २१ प्रकृतियों का उपशम या क्षय करने के लिए तीन प्रकार के विशुद्ध परिणाम होते हैं—अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण। करण नाम परिणामों का है । ये सातिशय अप्रमत्त मुनि अध:प्रवृत्तकरण को करते हैं ।