ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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07. बंगाली विवाह

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बंगाली विवाह

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आदान प्रदान — यह विवाह के पहले होने वाली रस्म है, जिसमें पुरोहित की उपस्थिति में विवाह की स्वीकृति होने के पश्चात् , वर—वधू, माता—पिता तथा समस्त निकटतम संबंधी साथ बैठकर, विवाह की तिथियाँ तय करते हैं।

विरिधि — विवाह के एक दिन पूर्व, पुरोहित द्वारा वर तथा वधू के घर पर सम्पन्न की जाने वाली पूजा की विधि को विरिधि कहते हैं। यह पूजा पूर्वजों के लिए की जाती है।

दोधी मंगल — विवाह के दिन, सूर्योदय होने के पूर्व, दोधी मंगल विधि निभाई जाती है। इसमें आठ से दस विवाहित स्त्रियाँ, वर वधू के साथ तालाब के पास जाती हैं और देवी गंगा को आमंत्रित करती हैं तथा कलश भर कर, जल अपने साथ ले जाती हैं, जिसे वर—वधू के स्नान हेतु, उपयोग में लाया जाता है।

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विवाह की धर्मक्रिया — विवाह की इस क्रिया में वर तथा वधू की माताएं सम्मिलित नहीं होतीं। ऐसी मान्यता है कि माताओं की अनुपस्थिति के कारण, वर—वधू की किसी भी अपशगुन से रक्षा की जा सकती है। वर के आने पर, घंटियों और शंख की मधुर ध्वनियों से उसका स्वागत किया जाता है। जल पैरों पर डाला जाता है तथा वर का मुँह मीठा कराया जाता है। अंदर आने पर परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में, पुरोहित, पूजा, सम्पन्न करते हैं तथा वरमालाओं का आदान—प्रदान होता है। इस रस्म को माला बदल के नाम से जाना जाता है। पूरी रात्रि समस्त निकटतम संबंधी, वर—वधू के साथ अमोद—प्रमोद के खेल खेलते हैं, गीत गाते हैं।

मंडप — सुबह होने पर वर, वधू की मांग में सिंदूर भरता है तथा पुरोहित की उपस्थिति में सूर्य देव की पूजा की जाती है। एवं सभी का आशीर्वाद लेकर, वधू, वर के घर को रवाना होती है।

बऊ भात — वधू का शंख नादों से घर में स्वागत किया जाता है। वधू, दूध से भरे कलश को पैर से गिराकर, घर में प्रवेश करती है। वधू अपने पति के घर, कुछ नहीं खाती, उसका भोजन पड़ोसी के घर से आता है। अगले दिन बऊ भात की रस्म निभाते हुए, वधू को नई थाली में खाना परोसा जाता है। शाम में सह—भोज का आयोजन किया जाता है, जिसमें वधू पांरपरिक बंगाली साड़ी तथा वर धोती धारण करता है।

फूल सज्जा — इस सुन्दर सी रस्म के लिए पुष्प तथा वर—वधू के वस्त्र वधू के घर से आते हैं। फूल सज्जा के बाद शादी की सारी रस्में अदा हो जाती है। यह विवाह का यौगोलिक—मंगल—प्रतीक है।


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