ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्ज एप पर मेसेज करें|

073.ग्रीनपार्क में धर्म प्रभावना

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


ग्रीनपार्क में धर्म प्रभावना

Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg
Final22 copy.jpg

यहाँ मोरीगेट की धर्मशाला में मैंने आर्यिका रत्नमती माताजी एवंं आर्यिका शिवमती जी के साथ ८ जुलाई १९७९, आषाढ़ शु. चतुर्दशी को चातुर्मास स्थापित किया। यहाँ प्रातः उपदेश होता था, अच्छी प्रभावना हो रही थी। श्रावण शु. ७ को सब्जी मण्डी दिल्ली में लोगों के आग्रह से निर्वाणलाडू के उत्सव में मेरा प्रवचन हुआ। वहाँ मल्लिसागर जी मुनिराज भी पधारे थे।

इन्द्रध्वज विधान-

इसके बाद यहाँ दशलक्षण पर्व में महिला समाज ने आगे होकर इन्द्रध्वज मण्डल विधान का आयोजन किया, जिसमें बहुत से पुरुष और महिलाओं ने भाग लिया। सम्पूर्ण विधि-विधान को रवीन्द्र कुमार ने कराया। कु. मालती, माधुरी, मंजू आदि इस विधान की पूजाओं को मधुर कंठ से पढ़ती थीं, तब सभी भक्तगण और दर्शकगण भक्ति में विभोर हो जाते थे। यह विधान दिनाँक २७-८-७९ से ८-९-१९७९ तक सम्पन्न हुआ और अच्छी धर्म प्रभावना हुई। इस विधान को देखने के लिए दिल्ली के कोने-कोने से जैन समाज के लोग आये। चूँकि दिल्ली में यह विधान प्रथम बार था।

हस्तिनापुर में प्रतिमाएँ-

२० जुलाई १९७९ को शुक्रवार की रात्रि में नशियाँ जी प्रथम की तलहटी में नहर की खुदाई करने वालों के द्वारा जैन मूर्तियों के प्राप्त होने का समाचार पाकर जैन समाज में हर्ष की लहर दौड़ गई। ये मूर्तियाँ भगवान शांतिनाथ, अरहनाथ की हैं और एक मूर्ति अम्बिका देवी की है। इसके मस्तक पर भगवान् नेमिनाथ की प्रतिमा है। इन तीनों प्रतिमाओं को बड़े मंदिर वालों ने एक वेदी बनाकर विराजमान कर दिया। अम्बिका देवी की मूर्ति के बारे में मंदिर वाले तेरहपंथियों में ही आपस में मतभेद पड़ गया। तब उन लोगों ने उस अम्बिका देवी की प्रतिमा को मंदिर जी के परिसर में एक कोने के कमरे में रख दिया। उन्हीं में देवी जी के भक्तों का विरोध होता रहा। किन्हीं ने यहाँ तक कह दिया कि- ‘‘या इन अम्बिका देवी जी को महावीर जी भेज दें या जम्बूद्वीप स्थल पर दे दें, ऐसी बंद कोठरी में क्यों रखा है?’’

फिर भी आज भी ये प्रतिमा जी उसी कोने की कोठरी में विराजमान हैं। वहीं अम्बिकादेवी के भक्तगण उनकी भक्ति करते हैं, दीपक जलाते हैं और प्रसाद चढ़ाते हैं। एक दिन मैंने देखा कि उन देवी के मस्तक पर स्वर्ण का छत्र लगा हुआ था। वास्तव में शासनदेवी के भक्तों की आज उन तेरहपंथियों में भी कमी नहीं है। वैसे शासन देव-देवी, दिग्पाल, क्षेत्रपाल आदि की पूजा के प्रमाण आगम में हैं। ऐसा जानना चाहिए।

शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर-

इस वर्ष भी आश्विन में शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर के आयोजन का निर्णय हो चुका था। मोरीगेट पर स्थान छोटा था, अपने को दरियागंज के बालाश्रम की जगह चाहिए थी। एक दिन मोरीगेट मंदिर में रमेश चंद जैन पी.एस. मोटर वाले दर्शन करने आये, मैंने परिचय पूछा। परिचय देने के बाद उन्होंने कहा- ‘‘कुछ आज्ञा दीजिये।’’

मैंने कहा-‘‘ऐसे.......प्रशिक्षण शिविर आयोजन के लिए बालाश्रम का स्थान चाहिए।’’ उन्होंने फोन करके ही निर्णय लेकर मुझे सूचित कर दिया और २३ सितम्बर से ३० सितम्बर तक वहाँ दरियागंज आश्रम में दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर एवं सिद्धान्त संरक्षिणी सभा के तत्त्वावधान में यह द्वितीय शिविर भी बहुत अच्छा हुआ। इसमें भी प्रो. मोतीलाल कोठारी को कुलपति मनोनीत किया गया था। विद्वत् परिषद के विद्वान् पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य भी पधारे हुए थे। श्री शीलचंद जी जौहरी ने दीप प्रज्ज्वलित कर इसका उद्घाटन किया। सेठ पन्नालाल जी गंगवाल ने अध्यक्षता ग्रहण की। सात दिन तक प्रत्येक कक्षाओं में सेठ पन्नालाल गंगवाल, प्रेमचंद जी (जैना वाच), शांतिलाल जी कागजी आदि महानुभावों ने समय को ध्यान में रखकर भाग लिया और विद्वानों के शिक्षण-प्रशिक्षण से तथा शंका-समाधान से प्रभावित रहे। दिल्ली में ऐसा शिविर पहली बार ही हुआ था।

इन्द्रध्वज विधान-

इसके बाद डिप्टीगंज में सौ. रत्नमाला की प्रेरणा से ३ अक्टूबर से झंडारोहण होकर १४ अक्टूबर को रथयात्रापूर्वक इन्द्रध्वज महामण्डल विधान सम्पन्न हुआ। इसमें लगभग ९६ स्त्री-पुरुष विधान में सम्मिलित हुए। बहुत ही प्रभावना के साथ विधान सम्पन्न हुआ। रथयात्रा के दिन वर्षा होती रही थी, रथयात्रा के समय रुक गई, तब लोगों ने विधान को अतिशायि चमत्कारिक माना।

पुनः मैं संघ सहित वर्षायोग ग्रहण करने के स्थान (मोरीगेट) पर वापस आ गई। १५-१०-७९ से १७-१०-७९ तक पंचपरमेष्ठी विधान का आयोजन भक्ति में विभोर हो रमेशचंद जैन ने सपरिवार सम्पन्न किया। इसके बाद मेरे द्वारा दीपावली के दिन चातुर्मास समापन किया गया।

हीरकजयन्ती समारोह-

श्री भारतवर्षीय अनाथरक्षक जैन सोसायटी, जैन बाल आश्रम, दरियागंज, नई दिल्ली ने अपने जीवन के ७५ वर्ष पूरे करके हीरकजयन्ती महोत्सव मनाया। इस अवसर पर मैं यहाँ ठहरी हुई थी। मैंने सोसायटी के कार्यकर्ताओं को मंगल आशीर्वाद दिया। इस अवसर पर अटल बिहारी वाजपेयी (तत्कालीन भाजपा नेता)पधारे थे, उन्हें भी मैंने शुभाशीर्वाद दिया और मोतीचन्द ने मेरे द्वारा लिखित-संस्थान द्वारा प्रकाशित साहित्य उन्हें भेंट किया।

मना करने आये थे, पक्का करके गये-

श्री राजेन्द्र प्रसाद जैन (कम्मोजी) ने मोतीचन्द आदि से चर्चा की थी कि- दरियागंज, दिल्ली के बालाश्रम के मंदिर में इन्द्रध्वज विधान कराना चाहता हूूँ। एक दिन कम्मोजी ने मोरीगेट आकर नमोऽस्तु किया। उनके आते ही मैं झट बोल पड़ी- ‘‘हाँ, मोतीचन्द! इन्हें विधान के सामान की सूची देवो और देखो, मैं अमुक तारीख को वहाँ जाऊँगी।’’ इतना सुनते ही कम्मोजी कुछ नहीं बोले, सहर्ष सूची हाथ में ली और मेरे विहार की, विधान की सारी रूपरेखा बनाने लगे। उठते-उठते हँसकर उन्होंने बताया- ‘‘माताजी! मैं तो आज आपके पास विधान करने को मना करने के लिए आया था लेकिन आपके भावों को देखकर मना नहीं कर सका। विधान करने को पक्का करके जा रहा हूँ।’’ इतना कहकर वे खूब हँसे, मैं भी हँसने लगी।

वहाँ दरियागंज मैं पहुँच गई, वहाँ का खुला वातावरण आर्यिका रत्नमती जी को बहुत ही पसंद था। २८ अक्टूबर से ४ नवम्बर तक कार्तिक की आष्टान्हिका में यह विधान सम्पन्न हुआ। यहाँ विधान को देखने के लिए एक दिन एक केन्द्रिय मंत्री भी पधारे थे। इस विधान में ४५८ मंदिर और ध्वजाएँ चढ़ाई जाती हैं। कम्मोजी ने सूखे गोले छिलवाकर उसे केशर में रंग कर, उनके ऊपर गोटे की सुन्दर कलगी लगाकर, ऐसे ४५८ से अधिक गोले मण्डल पर चढ़ाये थे। एक दिन ‘टेलीविजन’ में भी इस विधान का दृश्य आया, जिसे लाखों नर-नारियों ने देखा।

ग्रीनपार्क में प्रभावना-

यहाँ से विहार कर मैं संघ सहित २५ नवम्बर को ग्रीनपार्क, दिल्ली पहुँची। वहाँ पर २९ नवम्बर से ९दिगम्बर तक ‘ध्यान साधना शिविर’ का आयोजन हुआ। कु. माधुरी ने सबको सामायिक विधि सिखायी और मैंने ‘ह्रीं ’ का ध्यान सिखाया। इस ध्यान से बहुत से स्त्री-पुरुषों ने लाभ लिया।

महासभा के अध्यक्ष-

यहाँ पर शीतकाल में मैं लगभग ढाई महीने रही। प्रतिदिन प्रातः द्रव्यसंग्रह की कक्षा चलायी जाती थी, पुनः मेरा उपदेश होता था। निर्मल कुमार जी सेठी ने यहाँ मंदिर से कुछ दूर सफदरगंज डेवलपमेंट एरिया में कोठी ली थी। इन्होंने अपने पिताजी को ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, में भर्ती किया हुआ था। उनके पिताजी को गुर्दे की बीमारी में ‘डायलसिस’ पर रखा हुआ था, अतः सेठी जी प्रतिदिन कोठी से यहां आकर भगवान् का दर्शन कर मेरा कुछ प्रवचन भी सुनते और मेरा आशीर्वाद लेकर अपने पिताजी की परिचर्या में पहुँच जाते थे। इन्होंने यहीं मंदिर में महामंत्र का अखण्ड पाठ कराया और पंचपरमेष्ठी विधान किया, तब अपने पिताजी को भी लाये थे।

इन्हीं दिनों सेठी जी ने मेरे निकट बैठकर संस्थान की पुरानी बातें सुनीं, समझीं और आगे की गतिविधियों में रुचि ली थी। मैंने भी इनकी धर्मरुचि और उत्साह को देखकर महासभा के बारे में चर्चा आने पर ‘महासभा’ के अध्यक्ष बनाने के लिए लोगों को प्रेरणा दी थी पुनः महासभा के अध्यक्ष पद पर इनके मनोनीत होने के बाद मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुई थी। सेठी जी की भी मेरे प्रति भक्ति विशेष है। हर एक कार्यों में ये यहां आकर मेरा आशीर्वाद ग्रहण करते ही हैं। यहाँ से मोतीचंद जी वर्धा (महाराष्ट्र) में सेठ हीरालाल रानी वाला, उनके पुत्र सुरेन्द्र जी रानी वाला के आग्रह से इन्द्रध्वज विधान कराने पहली बार गये थे। यह विधान २६ नवम्बर से ७ दिसम्बर तक धर्म प्रभावना के साथ सम्पन्न हुआ था।

श्राविका की सल्लेखना-

एक दिन ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान’ से एक मेटाडोर इधर मंदिर के सामने से निकल गई पुनः ५ मिनट में ही वापस आ गई। उसमें से एक महिला निकलकर दौड़ी-दौड़ी मंदिर के नीचे हाल में आर्इं और जल्दी-जल्दी बोलीं- ‘‘माताजी! एक जीव की समाधि करा दीजिये, समाधि करा दीजिये।’’ सभी लोग एकटक हो देखने लगे, उसने कहा- ‘‘माताजी! यह मेरी बहन है, इसे जलोदर रोग हो गया था। यहाँ हास्पिटल में भर्ती थी। इसने कई बार डाक्टर से कहा था कि-मेरी सीरियस स्थिति में मुझे यहाँ नहीं मरना है, त्याग से घर में मरना है, सल्लेखना लेकर मरना है अतः एक दिन पहले तुम हमें सूचना दे देना......। डाक्टर ने आज कह दिया कि अब यह २४ घंटे से अधिक नहीं बचेगी अतः इसने वहीं पर चतुर्विधाहार त्याग कर दिया और बोली है कि घर चलो, समाधि करा दो। लेकिन मैंने सोचा कि यहाँ आपसे अच्छी समाधि भला कौन करा सकता है? अतः मैं यहाँ ले आई हूँ, आइये, आइये उसे आशीर्वाद दीजिये।’’

मेरा उपदेश चल रहा था, रोककर मैं उठकर बाहर आई। उन लोगों की इच्छा से और पास में खड़े प्रकाशचंद जौहरी के परामर्श से मैंने उन्हें नीचे उतारकर हॉल में लाने को कहा, वे लोग ले आये। उन महिला को पूर्ण सावधानी थी अतः मैंने उनसे बातचीत करके, सम्बोधन करके विधिवत् चार प्रकार के आहार का त्याग करा दिया तथा शरीर के ऊपर पहने हुए वस्त्र के सिवाय सर्व परिग्रह और आरंभ का भी त्याग करा दिया। उसके साथ में उस महिला के पति, पुत्र थे और शायद सास-श्वसुर भी थे। यहाँ पर मैंने, संघ की आर्यिकाओं ने, सभी श्रावकों ने, उसे णमोकार मंत्र सुनाना शुरू कर दिया। उसके पति, पुत्र को समझाने के बाद वे लोग वहां आकर रोये नहीं, प्रत्युत् सबने शांति रखी। वह दिन बीता और रात्रि व्यतीत हो गई पुनः दूसरी रात्रि में महामंत्र सुनते-सुनते उसके प्राण निकल गये। एक श्राविका इस प्रकार से स्वयं हास्पिटल से होश में चतुर्विधाहार त्याग कर गुरु के पास आकर सल्लेखना विधि से मरण करे, इस बात का प्रभाव वहाँ समाज में और दिल्ली में बहुत ही अच्छा रहा। वास्तव में श्री कुन्दकुन्ददेव ने कहा है कि-

‘‘वीरता से भी मरना होता है और कायरता से भी मरना होता है, फिर यदि वीरता से मरने में संसार भ्रमण समाप्त हो सकता है तो पुनः कायरता से क्यों मरना?’’ उन्हीं दिनों एक दिन ऐसा सुनने में आया कि आध्यात्मिक महापुरुष कानजी भाई हास्पिटल में गये हैं, उनकी नाक में नली डालकर सांस क्रिया आदि चलाई जा रही थी, वहीं उनका मरण हो गया। भला अध्यात्म ज्ञान के बाद इस प्रकार से मरना उचित है क्या? पुनः जीवन में आध्यात्मिकता ही क्या रही? इसलिए प्रतिदिन यह भावना भाते रहना चाहिए-

‘‘अब या अरज करूं प्रभु सुनिये मरण समय यह माँगो।

रोग जनित पीड़ा मत होवो अरु कषाय मत जागो।।
यह मुझ मरण समय दुःखदाता इन हर साता कीजे।
जो समाधियुत मरण होय मुझे अरु मिथ्यागद छीजे।।
अथवा- प्रभुवीर यह विनय है जब प्राण तन से निकलें।
तुम नाम जपते-जपते यह प्राण तन से निकलें।

इत्यादि। ऐसी भावना करते हुए अन्त में गुरुओं के पास समाधिमरण करना चाहिए। जिन्होंने मुझे सूचना दी थी, वे गृहस्थावस्था के मेरे पिता की बुआ की पौत्र-वधू थीं। मैं टिकैतनगर से आकर बाराबंकी में इनके घर में ही रही थी, ये आरा की कन्या थीं। धार्मिक विचार इनके बहुत अच्छे थे।

साहू अशोक कुमार जैन-

यहाँ ग्रीनपार्क में साहू अशोक कुमार जैन मेरे दर्शनार्थ आये। मैंने उन्हें उनके पिता साहू शांतिप्रसाद की तरह समाज में आगे आने के लिए प्रेरणा दी। तब उन्होंने कहा- ‘‘माताजी! अभी हमें आने में कुछ वर्षों की देरी है। दूसरी बात यह है कि मेरे ताऊजी श्रेयांसप्रसाद जी मेरे पिता के स्थान में समाज में काफी कार्यरत हैं.....।’’ यहाँ पर ‘इन्दू जैन’ उनकी धर्मपत्नी भी दो बार आर्इं। कुछ योग-ध्यान आदि के बारे में उन्होंने चर्चायें भी कीं।

यों तो एक बार ‘आर.के. पुरम्’ आते समय साहू शांतिप्रसाद जी की कोठी पर डाक्टर कैलाशचंद ने मुझे ठहराया था। तब साहू शांतिप्रसाद जी और उनकी पत्नी रमाजी ने घंटों बैठकर मेरे पास चर्चायें की थीं एवं समाज सुधार के बारे में अपने मनोभाव व्यक्त किये थे। इसके बाद निर्वाणोत्सव के प्रसंग में आचार्यश्री के समक्ष अनेक बार मुझसे चर्चा कर चुके थे। यहाँ ग्रीनपार्क में शायद दो-तीन बार अशोक कुमार जी दर्शनार्थ आये, पुनः उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि- ‘‘माताजी! आप मेरी कोठी पर पधार कर अनुग्रह करें।’’ ‘‘मैंने कहा-‘‘नई दिल्ली-राजाबाजार के मंदिर जाते समय मार्ग में आपकी कोठी पर ठहरना हो सकता है।.....’’

जम्बूद्वीप का शिलान्यास-

हस्तिनापुर-जम्बूद्वीप स्थल पर जम्बूद्वीप का प्रथमचरण सुदर्शनमेरु पर्वत बनकर उसकी प्रतिष्ठा हो चुकी थी। अब जम्बूद्वीप के हिमवान् आदि पर्वतों का निर्माण कराना था अतः द्वितीय चरण के प्रारंभ में शिलान्यास का मुहूर्त माघ शु. १५, दिनाँक ३१ जनवरी १९८० का निकाला गया। मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार आदि ने प्रयास करके साहू श्रेयांसप्रसाद और साहू अशोक कुमार से इस पुनीत कार्य के लिए निवेदन किया। उनकी स्वीकृति मिल जाने पर शिलान्यास का समारोह अच्छे उत्सव के साथ किया गया। हस्तिनापुर में ३१ जनवरी को दिन में १२ बजे श्री आनन्द कुमार जैन (एक्सपोर्ट्स इण्डिया) दिल्ली वालों ने इस समारोह की अध्यक्षता की। उस दिन क्षेत्र पर दिल्ली आदि से बसें पहुँचीं, लगभग ५ हजार की भीड़ हो गई।

साहू श्रेयांसप्रसाद जी, साहू अशोक कुमार जी और इंदू जैन ने शिलान्यास कार्य सम्पन्न किया। सुकुमारचंद जैन मेरठ आदि महानुभाव उपस्थित थे। सभी ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये। साहू ट्रस्ट की ओर से एक लाख रुपये के दान की घोषणा की गई। रात्रि में यह शिलान्यास कार्यक्रम टेलीविजन पर आया, जिसे लाखों लोगों ने देखा और प्रसन्नता व्यक्त की। आगे इस दान से निषध पर्वत का निर्माण होकर, उस पर्वत के चैत्यालय में साहू परिवार के नाम से सिद्ध प्रतिमा को विराजमान किया गया है। साहू श्रेयांसप्रसाद जी ने उस समय अपने वक्तव्य में कहा कि- पहले हम लोग नजीबाबाद से बैलगाड़ी में बैठकर यहाँ क्षेत्रदर्शन को आते थे। आज तो यह क्षेत्र बहुत तरक्की पर है। आगे इसे जम्बूद्वीप के निर्माण के बाद विश्व में ख्याति प्राप्त होगी, इत्यादि।