ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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074.हस्तिनापुर में जंबूद्वीप निर्माण कार्य

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हस्तिनापुर में जंबूद्वीप निर्माण कार्य

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इन्द्रध्वज विधान-

ग्रीनपार्कसे विहार कर श्री साहू अशोक कुमार जी के विशेष निवेदन पर उनकी कोठी पर ठहरकर मैं ६ फरवरी १९८० को दिगम्बर जैन मंदिर राजा-बाजार (कनाट प्लेस) आ गई। लाला श्यामलाल जी ठेकेदार आदि के विशेष आग्रह से मैं यहाँ लगभग एक माह तक रही। फाल्गुन की आष्टान्हिका में २३ फरवरी से २ मार्च तक यहाँ ठेकेदार परिवार ने इन्द्रध्वज विधान का आयोजन किया। इसमें भीकूराम जैन संसद सदस्य की धर्मपत्नी आदि महिलाओं ने भी बहुत रुचि से विधान-पूजन को सुनकर प्रसन्नता व्यक्त की। यहाँ पर भी खूब धर्म प्रभावना हुई। इसी मध्य टिकैतनगर (लखनऊ) में १० फरवरी से १९ फरवरी तक इन्द्रध्वज विधान का आयोजन हुआ। इसमें भी प्रद्युम्नकुमार शाह के आग्रह से कु. माधुरी ने जाकर विधान कराया और मोतीचन्द ने भी जाकर विधान का महत्व बतलाया। यह विधान भी इस अवध प्रांत में पहली बार था अतः बहुत ही धर्मप्रभावना हुई। यहाँ राजाबाजार (दिल्ली) में जैन हेप्पी स्कूल में मेरा प्रवचन हुआ। स्कूल के अध्यापक वर्ग और बालकों ने लाभ लिया।

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शिक्षण शिविर-

यहाँ से विहार कर मैं संघ सहित पहाड़गंज, नई दिल्ली आ गई। यहाँ पर भी ७ मार्च रविवार से १६ मार्च मंगलवार तक शिक्षण शिविर रखा गया, जिसमें द्रव्यसंग्रह पद्य की कक्षाएँ बहुत ही सुन्दर रहीं। मध्य में पंचपरमेष्ठी विधान हुआ। चैत्र कृ. ९-११ मार्च को भगवान् आदिनाथ की जयन्ती मनायी गयी। मेरे प्रवचन हुए। इन सर्वस्थानोें में मेरा लेखन कार्य चलता ही रहता था। मैंने रत्नकरंड पद्यावली, शांतिविधान आदि ग्रंथ बनाये।

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महावीर जयंती कार्यक्रम-

चैत्र शु. १-१७ मार्च को पहाड़गंज से चलकर मैं यहाँ कम्मोजी की धर्मशाला में आ गई। दिल्ली में लगभग १ माह तक विशेषकर रविवार के दिन स्थान-स्थान पर महावीर जयन्ती के प्रोग्राम किये जाते हैं। इसी के अंतर्गत २३ मार्च रविवार को प्रातः पहाड़ीधीरज पर ‘‘हीरालाल हायर सेकेन्ड्री स्कूल’’ के प्रांगण में भगवान् महावीर की जयंती का समारोह मनाया गया था। इस कार्यक्रम में मेरा भी प्रवचन हुआ, अच्छी धर्मप्रभावना हुई।

इसी दिन मध्यान्ह में महावीर उद्यान, कैलाशनगर में रथयात्रा का विशाल जुलूस निकाला गया। इस विशाल पांडाल में खचाखच भीड़ में महिला आश्रम की बालिकाओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रदर्शित किया गया। इस सभा के मुख्य अतिथि के रूप में पधारे एच.के. एल. भगत व भीकूराम जैन ने भाषण किया। अनेक वक्ताओं के बाद मेरा प्रवचन हुआ। मैंने भगवान् रामचन्द्र के आदर्श और भगवान महावीर के त्याग पर विशेष प्रकाश डाला।

मुख्य रूप से चैत्र शु. १३ दिनाँक २९ मार्च १९८० के दिन भगवान् महावीर जयंती का समारोह विशेष रूप में आयोजित किया जाता है। यहां सुभाष मैदान में पांडाल बनता है। तीन दिन तक प्रातः, मध्यान्ह और रात्रि में अनेक कार्यक्रम सम्पन्न किये जाते हैं। इन समयों में प्रातः और मध्यान्ह मेरे प्रवचन होते थे। यहाँ पांडाल में जनता की उपस्थिति विशेष रहती थी।

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जम्बूद्वीप निर्माण कार्य-

हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर जम्बूद्वीप के अंतर्गत हिमवान आदि पर्वत, गजदंत, भरत क्षेत्र आदि का निर्माण कार्य तेजी से चलाया जा रहा था। विद्यापीठ में विद्यार्थी भी धर्म अध्ययन में प्रगति कर रहे थे। इस विद्यापीठ के निमित्त से समय-समय पर यहाँ हस्तिनापुर में कोई न कोई समारोह मनाये ही जाते थे। अक्षय तृतीया का मेला आया पुनः ज्येष्ठ वदी चौदश को भगवान् शांतिनाथ का निर्वाण महोत्सव मनाया गया। इधर दिल्ली में कई एक जगह महावीर जयंती के कार्यक्रम में मुझे उपदेश के लिए जाना पड़ा।

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शांति विधान-

यहाँ दिल्ली में १३ जून से २८ जून तक सोलह दिवसीय विधान हुआ। श्री विजेन्द्र कुमार जैन सर्राफ ने मेरे सानिध्य में ज्येष्ठ शु. १ से ज्येष्ठ शु. १५ तक सोलह दिन के शांति विधान का आयोजन किया। जब शुक्ल पक्ष सोलह दिन का होता है, तब यह विधान विधिवत् किया जाता है। श्री विजेन्द्र कुमार जी ने सपरिवार विधान सम्पन्न किया। इसमें मेरे द्वारा अनुवादित शांतिविधान काव्य छप चुका था। उस पूजा के करने-कराने वालों को बहुत ही आनंद आया। विजेन्द्र कुमार के पुत्रों का उत्साह देखकर लगता था कि दिल्ली के नवयुवकों में कैसी नई चेतना है और धर्म के प्रति कितनी आस्था है? बहुत संतोष होता था।

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सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर-

दिनांक २७ मई से ६ जून १९८० तक यहाँ इसी कम्मोजी की धर्मशाला में ‘सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर’ का आयोजन किया गया। बालक, बालिकाएँ, महिलाएँ, प्रौढ़ पुरुषवर्ग सबके लिए अलग-अलग कक्षायें थीं। बालविकास, द्रव्यसंग्रह, रत्नकरंड-पद्यावली आदि के शिक्षण दिये गये। आबालगोपाल ने बहुत ही लाभ लिया। यह अनुभव में आता है कि बालक इन शिविरों में १० दिन तक भी जो पुस्तक रट लेते हैं वह उन्हें हमेशा याद रहती है और उसके संस्कार अमिट हो जाते हैं। इस शिविर में ७०-८० वर्ष के कई एक वृद्ध महानुभावों ने भी पढ़कर परीक्षा दी और प्रमाण-पत्र ग्रहण किया, तब बड़ा आनन्द आया। सन् १९७८ से १९८० तक के प्रायः सभी शिविरों में मंच संचालन पंडित बाबूलाल जी जमादार करते रहे हैं। इनकी संचालन कुशलता और ओजस्वी भाषण से लोग बहुत प्रभावित होते थे।

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आर्यिका रत्नमती जी अस्वस्थ-

यहाँ ज्येष्ठ की भयंकर गर्मी में आर्यिका श्री रत्नमती माताजी को पीलिया हो गया था। यहाँ पर स्थानीय लगभग ९७ की उम्र के वैद्य अतरसेन जैन बहुत ही अनुभवी वैद्य थे। इन्होंने इन माताजी के लिए एक छोटा सा यूनानी नुस्खा बताया था। वही दवा दी जा रही थी। उसी से उन्हें फायदा हुआ। वह नुस्खा यह है- कासनी के बीज १० ग्राम, सौंफ ५ ग्राम, कालीमिर्च ५ नग, खरबूजे की गिरी २ ग्राम, लौंग नग १, बड़ी इलाइची नग १, मकोय २ ग्राम। इसको पीसकर पानी की आधा गिलास ठंडाई बनाई जावे, उसमें शक्कर मिलाकर दी जावे। पुनः भीषण गर्मी के निमित्त से उन्हें फिर पीलिया हो गया। कुल मिलाकर इस गर्मी में उन्हें तीन बार पीलिया हुआ। राजेन्द्र प्रसाद जी (कम्मोजी) कई बार परीक्षण कराने के लिए डाक्टरों को ले आते थे। एक बार डाक्टर ने कह दिया- ‘‘इनके पीलिया बहुत बढ़ चुकी है, कमजोरी भी बहुत है, अब ये दो-चार दिन ही टिक सकती हैं, बचेंगी नहीं।’’ एक बार कम्मोजी कोई एक पीलिया झाड़ने वाले को ले आये। मैंने भी लक्ष्य नहीं दिया। उन्हें कुछ मालूम नहीं था। उनसे श्रावक ने कहा-‘माताजी! आप पाँच मिनट बैठ जाइये।’ वे बैठ गर्इं। झाड़ने वाले ने थाली, जल आदि रखकर कुछ पढ़ा। वे बाद में पूछने लगीं- ‘‘ये कौन था, क्या पढ़ रहा था?’’ किसी ने कहा-‘‘यह पीलिया झाड़ने के लिए आया था.....।’’ तभी माताजी ने मुझे बुलाया और दुःखित हो बोलीं- ‘‘माताजी! आप दुनिया को तो यंत्र-मंत्र देती रहती हैं पुनः मेरी पीलिया झाड़ने के लिए किस मंत्रवादी को बुला लिया?....मैं सम्यग्दृष्टी हूँ। अजैन मंत्रों का प्रयोग नहीं कराऊँगी, मुझे तो आपके मंत्रों पर ही विश्वास है। आप ही मंत्र पढ़कर झाड़ दिया करो।’’ ‘‘यह थी उनकी श्रद्धा और इतनी अस्वस्थता में भी इतनी विशेष सावधानी!’’ उस दिन से प्रायः अपने लेखन आदि कार्यों से समय निकालकर मैं मंत्र पढ़कर उन्हें पीछी से झाड़ देती थी। इसी से उन्हें आत्मसंतोष हो जाता था। उधर आहार में मात्र वह उपर्युक्त ठंडाई और जरा सा अनार का रस ही ले पाती थीं। धीरे-धीरे उन्हें इसी ठंडाई से लाभ हुआ। यही ठंडाई, सन् १९८५ में मुझे जब पीलिया हो गई थी, तब मेरे लिए जीवन दान देने वाली हुई थी। लीवर की कमजोरी में आज तक मुझे यह ठंडाई आहार में दी जा रही है।

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चातुर्मास स्थापना और साहित्य सृजन-

दिल्ली जैन समाज के विशेष आग्रह से यह २६ जून सन् १९८० का चातुर्मास मेरा यहीं अतिथिभवन कूचा बुलाकीबेगम में स्थापित हुआ। इस अवसर पर यहाँ मेरुमंदिर में २० जुलाई से २९ जुलाई तक इन्द्रध्वज विधान का आयोजन किया गया। यहाँ मेरु मंदिर में नंदीश्वर के ५२ चैत्यालयों की भव्य रचना बनी हुई है। दर्शन करके मन हर्षविभोर हो जाता है। इधर ‘भगवान् बाहुबली के सहस्राब्दी महामस्तकाभिषेक’ की तैयारियाँ जोरों से चल रही थीं। श्रावकों के आग्रह से समयोचित साहित्य के निर्माण में मेरा समय व्यतीत हो रहा था। भगवान् बाहुबली के विषय में ‘योगचक्रेश्वर बाहुबली’ नाम से एक पुस्तक लिखी, जो उपन्यास की शैली में थी। ‘कामदेव बाहुबली’ नाम से एक लघु पुस्तिका लिखी, जो पाँच भाषाओं में कई हजार छपी है। ‘बाहुबली नाटक’ लिखा और ‘भरत-बाहुबली’ नाम से एक चित्रकला (कॉमिक्स) लिखी। मेरी ‘भगवान बाहुबली’ रचना पुरानी थी। उसका रिकार्ड बनवाया गया। इसे भी छपाया गया तथा भगवान् बाहुबली की पूजा की प्रति भी कई हजार छपायी गयी। साथ ही ‘बाहुबली स्तोत्र’ जो कि मेरी संस्कृत में सर्व प्रारंभिक रचना थी, उसका भी प्रकाशन हुआ। कई एक लोगों की प्रेरणा से रवीन्द्र कुमार ने संकल्प किया कि- ‘‘इस सहस्राब्दी महोत्सव में मैं पूज्य माताजी की एक लाख पुस्तके छपाऊँगा।’’ अतः उन्होंने पूर्व में लिखे गये और तात्कालिक लिखे गये, ऐसे मेरे साहित्य का एक लाख की संख्या में प्रकाशन कराया पुनः यह ‘कॉमिक्स’ टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन से लगभग डेढ़ लाख छपी। एक लाख हिन्दी और पचास हजार इंगलिश में छपीं।

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दशलक्षण पर्व-

दशलक्षण पर्व में इस अतिथि भवन में ही मेरा विशेष प्रवचन रखा गया। जो मध्यान्ह में वूâचा सेठ के बड़े मंदिर में होता था। इस अवसर पर संघस्थ श्रीमती उषा जैन (बम्बई वाली) ने दश उपवास किये। उनका सम्मान किया गया। इधर समय-समय पर भट्टारक चारुकीर्ति जी महाराज दिल्ली आते थे तो महोत्सव के बारे मेंं चर्चायें होती रहती थीं।

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मंगलकलश प्रवर्तन-

इस महामस्तकाभिषेक के अवसर पर दिल्ली में मंगलकलश प्रवर्तन की योजना बनी। श्रवणबेलगोल में स्थापित गोम्मटेश्वर बाहुबली को सन् १९८१ में एक हजार वर्ष पूर्ण होने वाले थे अतः इस उपलक्ष्य में ९ फरवरी से १५ मार्च तक श्रवणबेलगोल में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये गये थे। २२ फरवरी १९८१ रविवार वीर निर्वाण सं. २५०७ को प्रमुख महोत्सव था।

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इन्द्रध्वजमंडल विधान-

श्रीपन्नालाल जी सेठी, डीमापुर वालों ने सपरिवार यहाँ मेरे सानिध्य में इन्द्रध्वजमहामंडल विधान किया। ९ अगस्त से १९ अगस्त तक श्रावण मास में यह विधान हुआ। विधानाचार्य का स्थान मोतीचन्द ने संभाला और बहुत ही उत्साह से विधान कराया। इस विधान में दिल्ली के विपिनचंद जैन, विमल किशोर जैन आदि अनेक महानुभावों ने भाग लिया। यहाँ अतिथि भवन के हाल में हस्तिनापुर-जम्बूद्वीप स्थल से जिन प्रतिमा लाकर विराजमान कर यह विधान बीसपंथ आम्नाय से हुआ था। इसी अवसर पर श्री विमल किशोर और उनकी धर्मपत्नी दमयंती देवी ने जम्बूद्वीप स्थल पर भगवान् आदिनाथ का मंदिर बनवाने की भावना व्यक्त की थी।

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मंगलकलश उद्घाटन-

२९ सितम्बर सोमवार को भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी के करकमलों से इस मंगलकलश का उद्घाटन कराया गया। उस समय मेरा भी मंगल आशीर्वाद हुआ। मैंने अपने तीन (३) मिनट के वक्तव्य में कहा- ‘‘जिस प्रकार गुल्लिकायिज्जी नाम की वृद्धा ने भगवान् बाहुबली का अभिषेक कर धर्म प्रभावना की थी, ऐसा लगता है मानों उन गुल्लिकायिज्जी ने ही इन्दिराजी को यहाँ भेजकर इस मंगलकलश का उद्घाटन कराया है।...’’ यह जनमंगल महाकलश अनेक स्थलों में घूमकर धर्मप्रभावना करते हुए महामस्तकाभिषेक के अवसर पर श्रवणबेलगोल पहुँचा था।