ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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077. दिल्ली में माताजी द्वारा चातुर्मास स्थापना

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दिल्ली में माताजी द्वारा चातुर्मास स्थापना

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दिल्ली की ओर मंगल विहार-

जब सबका एक स्वर से यही कहना हुआ कि- ‘‘माताजी! दिल्ली में आपके सानिध्य में ही प्रधानमंत्री इन्दिरागांधी जी द्वारा ज्ञानज्योति का प्रवर्तन होना चाहिए......।’’ तब मैंने भी जैसे-तैसे विहार का भाव बना लिया। उन दिनों आर्यिका रत्नमती माताजी का स्वास्थ्य काफी कमजोर हो चुका था। वे डोली पर बैठकर चलने में भी डोली का हचका-दचका झेल नहीं पाती थीं, उनकी छाती में दर्द होने लगता था। अब मेरे सामने बहुत बड़ी समस्या थी। माताजी को यहाँ अकेले छोड़ना भी तो कैसे? ऐसी अवस्था में कब समाधि हो जाये, निश्चित नहीं है और ले जाना तो कैसे? उनकी इच्छा भी अब विहार करके दिल्ली जाने की और दिल्ली के हल्ले-गुल्ले में रहने की नहीं थी। फिर भी लगभग एक महीने ऊहापोह के बाद आखिर धर्मप्रभावना के भावों को प्रमुख करके, मैंने विहार का निर्णय कर ही लिया।

मैंने आर्यिका रत्नमती जी को लेकर हस्तिनापुर से १३ फरवरी को दिल्ली की ओर विहार कर दिया। मोदीनगर से बहुत ही ठंड बढ़ गई। फिर भी मैं कहीं न ठहर कर गाजियाबाद आदि होते हुए २७ फरवरी को प्रातः ९ बजे दिल्ली पहुँच गयी। मोरीगेट का मंदिर शहर की सड़कों से अंदर था अतः वहाँ हल्ला-गुल्ला कम समझकर वहीं ठहरने का निर्णय लिया। मोरीगेट की शांतिबाई आदि अनेक पुरुष और महिलाएँ आ गर्इं, मंगल प्रवेश हुआ, तब दिल्ली में सर्वत्र खुशी की लहर दौड़ गई।

इसके पूर्व ज्ञानज्योति प्रवर्तन के लिए प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी को लाने के लिए डा. कैलाशचंद जैन (राजा टॉयज) के माध्यम से पुरुषार्थ चल रहा था। १८ जनवरी सोमवार, माघ वदी ८ को मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार, मालती आदि १७ महानुभावों का एक शिष्टमंडल श्रीमती इंदिरा जी से मिलने गया। उनसे ज्ञानज्योति प्रवर्तन के लिए निवेदन किया और तारीख चाही तथा सभी ने उनके साथ गु्रप फोटो खिंचवाया। श्रीमती इंदिराजी ने विचार कर निर्णय देने के लिए कहा।

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इन्द्रध्वज विधान-

इधर २ मार्च १९८२ से आष्टान्हिक पर्व में यहाँ मोरीगेट की धर्मशाला में इन्द्रध्वज महामण्डल विधान का आयोजन किया गया। यह विधान अच्छे उत्साह से यहाँ दूसरी बार मेरे सानिध्य में हो रहा था।

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अभिवन्दन ग्रंथ विमोचन-

आचार्य शिरोमणि श्री धर्मसागर जी महाराज का एक विशाल आकर्षक ‘अभिवंदन ग्रंथ’ तैयार किया था। इसका विमोचन समारोह कई जगह साधु-साध्वियों के सानिध्य में रखा गया था। सो यहाँ मोरीगेट में मेरे सानिध्य में भी उम्मेदमल जी पांड्या ने यह विमोचन समारोह रखा। श्री राजेन्द्र कुमार जी (कम्मोजी) ने यह ग्रंथ विमोचन करके मुझे समर्पित किया। इस ग्रंथ के बारे में और आचार्यश्री के बारे में संक्षिप्त परिचय देते हुए मैंने आचार्यश्री के गुणों की गरिमा पर प्रकाश डालते हुए उनकी परोक्ष में ही वंदना की।

उधर भिंडर में आचार्य कल्पश्री श्रुतसागर जी महाराज के सानिध्य में २८ फरवरी से २ मार्च तक त्रिदिवसीय विद्वत् गोष्ठी समारोह मनाया गया। उसी में २ मार्च को इस ग्रंथ का विमोचन सम्पन्न होकर आचार्यकल्प श्री श्रुतसागर जी के करकमलों में समर्पित किया गया। बाद में पारसोला (उदयपुर) में विराजमान आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज के निकट पहुँचकर मध्यान्ह ११ बजे हाथी के ऊपर सुसज्जित पालकी में ग्रंथ विराजमान करके जुलूस निकाला गया। तब अनेक विद्वान्, श्रीमानों ने मिलकर बड़ी सभा में आचार्यश्री के करकमलों मेंं यह अभिवंदन ग्रंथ समर्पित किया। उस समय आचार्यश्री की जय-जयकार से सारा पांडाल गूँज उठा। इसके बाद आचार्यश्री ने अपने प्रवचन में कहा-

‘‘अभिनंदन करना श्रावकों का कर्तव्य है। उन्होंने गुरुभक्ति की है, गुरु-भक्ति करने वालों को पुण्य मिलता ही है, परन्तु मेरा क्या अभिनंदन!......साधु चाहे नरक में जाये, चाहे निगोद में जाये। गुरुभक्ति करने वाला तो सात भव में मुक्ति प्राप्त करेगा परन्तु साधु का तो अभिनंदन से कोई संबंध नहीं, उन्हें तो अपना हित करना चाहिए.....।’’

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आचार्यश्री देशभूषण जी जयपुर में-

उधर २८ मार्च १९८२ को आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज दक्षिण से विहार करते हुए जयपुर पधारे, चूंकि उनके सानिध्य में वहाँ चूलगिरि पर विशाल जिनबिम्ब की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होने वाली थी।

यहां जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति प्रवर्तन के लिए समय-समय पर मीटिंग होती रहती थीं। ‘जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति प्रवर्तन’ समिति का भी गठन किया गया। इसमें निर्मलकुमार सेठी को ‘अध्यक्ष’, मोतीचन्द व रवीन्द्र कुमार को महामंत्री एवं पं. बाबूलाल जी को संचालक मनोनीत किया गया।

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महावीर जयंती-

दिल्ली में रहने से यत्र-तत्र कालोनियों में विहार करना पड़ता है रविवार ४ अप्रैल को जनकपुरी में मंदिर की वेदी का शिलान्यास था, मैं वहाँ पहुँची, पांडाल में उपदेश हुआ और शिलान्यास कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। वहाँ से वापस विहार कर पूसा रोड, पहाड़ी धीरज होती हुई मोरीगेट आ गई। यहाँ जगह-जगह महावीर जयंती के कार्यक्रम लगभग १ माह तक मनाये जाते हैं।

शनिवार १७ अप्रैल को लालमंदिर में ‘ज्ञानज्योति’ कार्यालय का उद्घाटन हुआ। इस समय सागर (म.प्र.) में आचार्य विद्यासागर के सानिध्य में धवला ग्रन्थ की वाचना होने वाली थी। आर्यिका रत्नमती माताजी की आज्ञा से रवीन्द्र कुमार और मालती दोनों इस वाचना में चले गये। वैशाख सुदी २, रविवार को ‘फिक्की आडीटोरियम’ में महावीर जयंती का कार्यक्रम खंडेलवाल समिति द्वारा आयोजित किया गया था। इसके लिए पहले से ही विजय कुमार लुहाड़िया आदि मेरे से स्वीकृति ले गये थे। वहाँ के लिए मैंने मोरीगेट से विहार कर राजा बाजार-नई दिल्ली में लाला श्यामलाल जी की कोठी पर आहार लिया और वहाँ फिक्की हॉल में उपदेश करके वापस शाम को मोरीगेट आ गई। इस समय शनिवार की रात्रि में खूब बारिश हुई थी, फिर भी समय पर वर्षा रुक गई थी।

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ज्ञानज्योति प्रवर्तन की तैयारियाँ-

इधर बस चेचिस के चारों तरफ अनेक चित्र, जो कि हस्तिनापुर से संबंधित और जंबूद्वीप से संबंधित थे, उन्हें बनवाने के लिए मोतीचन्द ने मारष्ठे (राजस्थान) के सुभाषचंद पेंटर को बुलाया था। इसे मैंने १ मई को १० चित्रों का संक्षिप्त परिचय लिखाया। ये दसों चित्र बहुत सुन्दर बने थे। आज भी ये चित्र ‘जंबूद्वीप ज्ञानज्योति’ ट्रक से निकालकर त्रिमूर्ति मंदिर में लगा दिये गये हैं। इनके परिचय इस प्रकार हैं-

१. प्रथम चित्र में-राजकुमार श्रेयांस राजमहल में सोए हुए हैं, पिछली रात्रि में ‘सुमेरूपर्वत’ आदि सात स्वप्न देख रहे हैं।

२. दूसरे चित्र में-तीर्थंकर ऋषभदेव को राजा सोमप्रभ, उनकी पत्नी और भाई श्रेयांसकुमार इक्षुरस का आहार दे रहे हैं। आकाश से देवगण पंचाश्चर्य वृष्टि कर रहे हैं।

३. तीसरे चित्र में-हस्तिनापुर में जन्मे भगवान् शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ की प्रतिमाएँ हैं।

४. चौथे चित्र में-आचार्य शांतिसागर जी महाराज हैं।

५. पांचवें चित्र में-भगवान् ऋषभदेव ब्राह्मी-सुन्दरी को पढ़ा रहे हैं।

६. छठे चित्र में -सात सौ मुनियों के उपसर्ग निवारण का दृश्य है।

७. सातवें चित्र में-द्रौपदी के चीरहरण का दृश्य है।

८. आठवें चित्र में- सुमेरुपर्वत की पांडुकशिला पर भगवान का अभिषेक हो रहा है।

९. नौवें चित्र में- पद्मसरोवर से गंगा-सिन्धु नदी निकल रही है।

१०. दसवें चित्र में- श्रीबाहुबली का ध्यान करते हुए जंबूद्वीप की उपलब्धि हुई, ऐसा बतलाने वाला मेरा चित्र है। इसी प्रकार तीन लोक आदि के छोटे-छोटे अनेक चित्र तथा अनेक सूक्तियाँ भी लिखी हुई थीं। इस ज्योति वाहन पर सबसे ऊपर सामने धातु के सुमेरुपर्वत पर सबसे ऊपर ज्योति जल रही थी।

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विघ्न बाधाएँ-

इधर इंदिरा जी ने ज्ञानज्योति प्रवर्तन के लिए मना कर दिया है, ऐसा समाचार मिला, फिर भी मोतीचन्द पुनः प्रयास में लगे हुए थे। इन दिनों मोरीगेट पर एक जैन ज्योतिषाचार्य आते रहते थे। मैंने दसों बार उनसे ज्ञानज्योति प्रवर्तन के लिए मुहूर्त निकालने को कहा। महानुभाव आते, पंचांग लेते और कुछ इधर-उधर की कहकर चले जाते। एक बार भी मुहूर्त नहीं निकाला। वे कहते- ‘‘माताजी! आप इस प्रवर्तन की योजना को छोड़ दो। सफलता नहीं मिलेगी, इंदिरा जी तो आयेंगी नहीं.....अथवा जबरदस्ती निकालना ही है, तो आप कुल २।। महिने निकालकर चुप हो जाइये......।’’

इसी तरह एक प्रसिद्ध साधु ने भी कहलाया कि- ‘‘मेरा निमित्तज्ञान कहता है, मेरी भविष्यवाणी है कि इंदिरा जी नहीं आयेंगी.....।’’ इत्यादि। मैं सब सुनती रहती थी और अपने आप में, अपने निर्णय में दृढ़ थी। एक बार किसी ने कहा-‘‘जे.के. जैन संसद सदस्य हैं, वे इंदिरा जी को ला सकते हैं, उनसे संपर्क किया जाये।’’ मैंने वैद्य शांतिप्रसाद जी, जो कि संस्थान के पहले महामंत्री थे तथा वर्तमान में उपाध्यक्ष थे, उन्हें बुलाकर कहा- ‘‘मेरे पास जे.के. जैन को ले आइये।’’ इस चर्चा के बाद जे.के. जैन के भाई और उनके अभिन्न मित्र के.सी. जैन वकील आये। मुझसे बहुत सी चर्चा करके सारी रूपरेखा समझकर गये और पुनः इंदिरा जी को लाने के लिए प्रयास चालू हुआ।

इधर नई बस चेचिस मेरठ से पास होकर ११ मई की रात्रि में यहाँ दिल्ली आ गई। उधर जयपुर में आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज के सानिध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हो रही थी। वहाँ जयपुर शाखा की ज्ञानज्योति प्रवर्तन के संदर्भ में मीटिंग भी थी अतः मोतीचन्द जी और माधुरी १२ मई को जयपुर चले गये। इधर १३ मई, ज्येष्ठ वदी ५ को मध्यान्ह में २ बजे जे.के. जैन के भाई और के.सी. जैन आये। बोले- ‘‘माताजी! इंदिराजी के आने की स्वीकृति मिल गई है। कल करनाल में जे.के. जैन ने उनसे स्वीकृति ले ली है। आप अभी प्रेस मैटर और पोस्टर बनवाकर भेज दो। पोस्टर १२ बजे मिल जाना चाहिए।’’

मैंने उसी समय डा. कैलाशचंद जी और कैलाशचंद करोलबाग वालों को बुलाया और उनसे प्रेस मैटर और पोस्टर बनवाकर छपवाने को दिला दिये। यथा समय पोस्टर आ गये। उस समय बहुत ही उत्साह से डा. कैलाशचंद और उनकी धर्मपत्नी शुद्ध लेही बनाकर पोस्टर लेकर जे.के. जैन के पास और उनके बताये स्थानों पर पहुँच-पहुँच कर सड़कों पर हाथ से पोस्टर चिपकाने लगे।

अगले दिन मोतीचन्द आ गये, सारी व्यवस्था संभाल ली। मॉडल वाला मॉडल के काम को पूरा करने में विलम्ब कर रहा था। बार-बार उसके यहाँ जाना पड़ता था। उधर रवीन्द्रकुमार को सागर में टेलीफोन कर दिया कि- ‘‘इंदिरा जी के आने की स्वीकृति मिल चुकी है, आप आ जाइये।’’ समाचार पाते ही प्रसन्न हुए रवीन्द्र कुमार, मालती और गणेशीलाल रानीवाला यहाँ मोरीगेट पर आ गये। अभी इंदिराजी ने तारीख निश्चित नहीं की थी। कुछ भक्त लोग मेरी हंसी-मखोल बना रहे थे। पं. बाबूलाल जी बोले- ‘‘माताजी! आप मॉडल के रथ में हाथ लगा दो, बस उद्घाटन हो गया। अब देरी नहीं करना है, हम लोग इस ज्योतिरथ को लेकर भ्रमण में निकलें......।’’ मैंने कहा-‘‘शांति रखो, कार्य बढ़िया होगा......।’

मैं मोतीचंद से परामर्श करने लगी, उनका साहस अच्छा था, दृढ़ थे। बोले- ‘‘माताजी! आप आकुलता न करें, निश्चिन्त रहें, भले ही अभी उद्घाटन न होकर अक्टूबर में हो....परवाह नहीं, किन्तु इंन्दिरा जी से ही प्रवर्तन कराना है।’’ इनका अभिप्राय यही था कि ‘‘यदि इंदिरा जी से इस रथ का उद्घाटन सम्पन्न होगा, तो जगह-जगह राजनैतिक व्यक्तियों द्वारा स्वागत और सम्मान मिलने से जैन तो क्या, जैनेतर समाज लाखों की संख्या में भगवान् महावीर के उपदेश को, अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह के सिद्धान्त को समझेंगे, तो जैन धर्म की महान् प्रभावना होगी.....।’ इसलिए ये अड़े हुए थे। २७ मई को सायंकाल में जे.के. जैन ने ५-७ महानुभावों को बुलाया। पं. बाबूलाल जी मुझसे बोले- ‘‘माताजी! आशीर्वाद दो आज कार्य बन जावे, नहीं तो अब हम लोग ऐसे ही इस ज्योति रथ का उद्घाटन करा लेंगे।’’ तभी मेरे मुख से सहसा निकल गया-

‘‘पंडित जी! आप लोग आज जावो, सफलता मिलेगी’’ पुनः मैंने पंडित जी से कहा-‘‘पंडित जी! आज मध्यान्ह में मेरी नव लाख जाप्य पूर्ण हुई है।’’ पंडित जी आशीर्वाद लेकर मेरे चरण स्पर्श कर आगे बढ़े। मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार ने भी चरण छुए। जिनेन्द्र प्रसाद ठेकेदार आदि कई महानुभाव साथ गये। डेढ़-दो घंटे बाद जोर-जोर से जय बोलते हुए आम्रफल हाथ में लेकर पंडित जी आदि आ गये और फल चढ़ाकर वंदामि करके बोले- ‘‘माताजी! ४ जून शुक्रवार को ‘जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति’ उद्घाटन के लिए इंदिरा जी की स्वीकृति मिल गई है, अब मंगल आशीर्वाद दीजिये, हम लोग अपने कार्य को निर्विघ्न पूरा कर सके।’’

इसके बाद पंडित जी ने अनेक सभाओं में मेरे इस ‘नव लाख’ जाप्य का चमत्कार सुनाया है। यद्यपि मैंने किसी अभिप्राय से जाप्य नहीं किये थे, प्रत्युत कई माह से प्रतिदिन ५ हजार जाप्य करके २० दिन में एक लाख पूर्ण कर लेती थी। जाप में कभी महामंत्र और कभी सिद्धचक्र मंत्र का जाप्य किया करती थी। मैंने आशीर्वाद दिया। आगे के कार्यों के लिए तत्काल मीटिंग होकर पांडाल व्यवस्था आदि के कार्यभार लोगों को सौंपे गये। ज्येष्ठ शु. ५, २७ मई को मोतीचन्द ने पोस्टर का मैटर बनाया, चूँकि समय बहुत कम था और प्रचार विशेष करना था। जैसे-जैसे जे.के. जैन बताते जाते थे, वैसे-वैसे ही ये लोग कार्य करते जाते थे। २८ मई को इंदिराजी की स्वीकृति प्राप्त हुई और २९ मई से पोस्टर छपाने की व्यवस्था बनाने आदि का कार्य विधिवत् शुरू हुआ।

इस मंगल कार्य के होने से आर्यिका रत्नमती माताजी भी बहुत ही प्रसन्न थीं। इधर मोतीचन्द रात-दिन एक करके मॉडल, बस चेचिस की सीटें, कार्यक्रम के लिए पांडाल आदि की व्यवस्था में लगे हुए थे और रवीन्द्र कमरे, आफिस, पत्र-पोस्टर आदि की व्यवस्था संभाल रहे थे। कमेटी के पदाधिकारीगण भी अपने-अपने कार्यों में लगे हुए थे। कार्यक्रम के पांडाल का गेट मेरु के आकार का बनाने का निर्णय हुआ था।

अथक परिश्रम करने पर मॉडल रथ के ऊपर स्थापन करने हेतु धातु का सुमेरु ढाई फुट का २६ मई को बनकर आ गया। एक-एक चीजें तैयार हो रही थीं। इंदिराजी की भेंट के लिए चांदी का सुन्दर सुमेरु बनवाया गया। ज्येष्ठ शु. १२, ३ मई को जम्बूद्वीप मॉडल, जो कि मोरीगेट में शांतिबाई के घर में रखाया गया था, मैं वहाँ जाकर जिनाभिषेक पूजा कराकर उस मॉडल और मेरु की शुद्धि कराकर, उसमें यंत्र स्थापित करवाकर आ गई।

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इंदिरा जी का सभा में प्रवेश-

लालकिला मैदान में बनाये गये विशाल पांडाल में ४ जून १९८२ को मध्यान्ह में ३ बजे से ५ बजे तक विशाल सभा का आयोजन हुआ। प्रधानमंत्री ने ४ से ५ बजे तक आने का समय दिया था। ३ बजे से ही पांडाल भर गया। ठीक ४ बजे पांडाल के पास श्रीमती इंदिरा जी की कार पहुँच गई। संस्थान के पदाधिकारियों ने आगे बढ़कर स्वागत किया। जैन हैप्पी स्कूल के बालकों ने बैंड बजाकर स्वागत किया। जे.के. जैन ने पहले ही मंच के पास फूस की एक कुटिया बनवा दी थी, वहीं मैं बैठी हुई थी। सर्वप्रथम इंदिराजी को मेरी कुटिया में लाये। उन्होंने भक्ति से नमस्कार किया और यथोचित आसन पर बैठ गयी। एक-दो फोटो खिंचवाकर जे.के. जैन ने वहाँ से सबको हटा दिया और आप स्वयं भी बाहर चले गये। पूर्व में निर्धारित समय के अनुसार दो मिनट तक मुझसे अकेले में वार्तालाप करना था, फिर भी इंदिराजी ने मुझसे कई बातें पूछीं, मैंने समयोचित उत्तर दिया पुनः उन्होंने देश की कई एक समस्याओं को रखा, मैंने उस विषय में भी समाधान प्रस्तुत किया। वे स्वयं वार्तालाप में इतनी तन्मय हो गयीं कि २ मिनट क्या, १५ मिनट हो गये। उधर सभा में जनता आकुलता करने लग गयी। यहाँ वार्तालाप में मैंने अहिंसा धर्म और भारतीय संस्कृति की सुरक्षा पर जोर दिया था। मेरा कहना था कि- ‘‘धर्म से ही राष्ट्र में शांति हो सकती है और जन-जन में भी शांति हो सकती है। साम्प्रदायिकता के नाम पर हिंसा व अनैतिकता देश के लिए सर्वथा हानिप्रद ही है....इत्यादि।’’ इंदिरा जी ने आगे हस्तिनापुर आने के लिए भी मनोभाव व्यक्त किये थे। इस सुखद वार्तालाप के बाद इंदिरा जी मंच पर पधारीं। मैं भी यथोचित आसन पर पहुँच गई। सारी जनता ने इंदिरा जी का हाथ जोड़कर अभिवादन किया और इंदिरा जी ने भी हाथ जोड़कर सबका अभिवादन स्वीकार किया। जे.के. जैन ने मंच का संचालन अपने हाथ में रखा था। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सर्वप्रथम कु. माधुरी ने मंगलाचरण किया-वह संदर्भित प्रसंग में यह था-

ॐ नमः सिद्धेभ्यः

त्वया धीमन् ब्रह्मप्रणिधिमनसा जन्मनिगलं।
समूलं निर्भिन्नं त्वमसि विदुषां मोक्षपदवी।।
त्वयि ज्ञान ज्योतिर्विभवकिरणैर्भाति भगवन् ।
अभूवन् खद्योता इव शुचिरवावन्यमतयः।।

मंगलाचरण के अनन्तर तत्कालीन गृहमंत्री श्री प्रकाशचंद सेठी ने पुष्पहार से इंदिरा जी का स्वागत किया। निर्मलकुमार सेठी ने सम्मान-पत्र पढ़ा। पश्चात् रवीन्द्र कुमार ने संस्थान का परिचय सुनाया। अनन्तर मोतीचन्द ने जम्बूद्वीप ज्ञान ज्योति के प्रारूप एवं उनकी व्यवस्था आदि के बारे में जानकारी दी पुनः मेरा आशीर्वाद रूप में प्रवचन हुआ। उसमें मैंने युगादि पुरुष भगवान् ऋषभदेव के समय की व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कर्मभूमि की व्यवस्था बताई, पुनः जम्बूद्वीप का संक्षिप्त परिचय देकर भरत क्षेत्र के आर्यखण्ड की इस पवित्र वसुंधरा पर प्रकाश डाला। मैंने कहा- ‘‘यह महर्षियों का क्षेत्र है, यहाँ पर पुण्यशाली तपस्वियों ने अपनी साधना और तपस्या के बल से अपने को तो पवित्र बनाया ही है साथ ही देश में सच्चरित्र का निर्माण करके तमाम जीवों को पवित्र बनाया है और सुख शांति की स्थापना की है। मुझे जैन रामायण की एक सूक्ति याद आती है-

यस्य देशं समाश्रित्य साधवः कुर्वते तपः।

षष्ठमंशं नृपस्तस्य लभते परिपालनात् ।।

जिस देश में रहकर साधुजन तपस्या करते हैं, वहाँ के शासक उनका प्रतिपालन करने से उन साधुओं की तपश्चर्या का छठा भाग पुण्य प्राप्त कर लिया करते हैं अतः मैं स्पष्ट कहूँगी कि साधुओं की तपश्चर्या का पुण्य इंदिरा जी को स्वयं ही मिल रहा है....। वास्तव में यह तो कहना ही पड़ेगा कि इंदिरा जी का बहुत बड़ा सौभाग्य है। मैंने स्वयं देखा है इन दस वर्षों में अनेक धार्मिक आयोजनों में वे अपना समय निकालकर भाग लेती आ रही हैं।....इत्यादि।’’

सभा में अनेक पत्रकारों ने मेरे इस वक्तव्य को नोट किया। मैंने यह भी कहा कि-‘‘संसार में अज्ञान के समान कोई अंधकार नहीं है और ज्ञान के समान कोई प्रकाश नहीं है। यह ज्ञानज्योति सारे भारत में भ्रमणकर प्राणियों के अज्ञान अंधकार को दूर करे, ज्ञान का प्रचार करे, उसके साथ ही सारे विश्व में सुख-शांति की स्थापना करे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शुभ हस्तों से ऐसे-ऐसे पुण्य कार्य सदैव होते रहें तथा यह जनतंत्रशासन जनता में धर्मनीतिमय अनुशासन करता रहे, मेरा यही आशीर्वाद है।’’ श्रीमती इंदिरा जी ने अपने भाषण में कहा कि-

‘‘जम्बूद्वीप का वर्णन हमारे सभी शास्त्रों में है, जैसे बौद्ध, जैन और वैदिक धर्म में जो-जो वर्णन है, वह केवल भारतवर्ष का ही नहीं है बल्कि उससे बहुत बड़ा है। इससे कोई यह न समझे कि हमारी नीयत दूसरों पर है या हम दूसरों से सब कुछ चाहते हैं। हम अपनी धरती से और अपनी जनता से ही संतुष्ट हैं.....।’’ आगे पुनः कहा- ‘‘पूज्य ज्ञानमती माताजी ने जो यह मॉडल बनाया है तथा जो हस्तिनापुर में इसको बनाया जा रहा है, इससे लोग इस जम्बूद्वीप के बारे में ज्यादा से ज्यादा ठीक जानकारी प्राप्त कर सकेंगे और जहाँ-जहाँ यह ज्ञानज्योति में जायेगी, वहाँ भी इसके द्वारा एक नई धार्मिक भावना जागेगी। मैं आपके सामने आभार ही प्रकट कर सकती हूँ कि ऐसे शुभ अवसर पर आपने मुझे बुलाया कि मैं इसका प्रवर्तन करूँ। यह देखकर मुझे बहुत खुशी है.....।’’ पुनः जे.के. जैन के वक्तव्य के अनंतर इंदिराजी जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति रथ पर पहुँचीं। वहाँ श्लोक और मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनके करकमलों से विधिपूर्वक उद्घाटन कराया गया।सर्वप्रथम उनके हाथ धुलाकर संघस्थ ब्रह्मचारिणी बहन ने हाथ में कंकण सूत्र बांधा।

अर्हंतो मंगलं कुर्युः सिद्धाः कुर्युश्च मंगलं।

आचार्याः पाठकाश्चापि साधवो तव मंगलं।।
बोलकर पुष्पांजलि क्षेपण कराई पुनरपि-
ज्योतिर्व्यंतर-भावनामरगृहे मेरौ कुलाद्रौ तथा।
जम्बूशाल्मलिचैत्यशाखिषु तथा वक्षाररूप्याद्रिषु।।
इष्वाकारगिरौ च कुंडलनगे द्वीपे च नंदीश्वरे।
शैले ये मनुजोत्तरे जिनगृहाः कुर्वंतु ते मंगलं।।

पुनः पुष्पांजलि क्षेपण कराकर मॉडल पर स्वास्तिक बनाकर नारियल चढ़वाया। इसके बाद-

‘ ॐ श्रीमज्जिनशासने भगवतो महतिमहावीरवद्र्धमानतीर्थंकर धर्मतीर्थस्य श्री मूलसंघे मध्यलोके जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखंडे इन्द्रप्रस्थनगरे ज्येष्ठमासे शुक्लपक्षे त्रयोदश्यां तिथौ शुक्रवासरे शुभलग्ने मंगलबेलायां आर्यिकारत्नश्रीज्ञानमतीसन्निधौ भारतदेशस्य प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी अस्याः करकमलाभ्यां जम्बूद्वीप-ज्ञानज्योतिः प्रवर्तनं कारयिष्यामहे। श्रीजिनेन्द्रदेवाः जगतां सर्वशांतिं कुर्वंतु, तुष्टिं कुर्वंतु, पुष्टिं कुर्वंतु सर्वजनमनसि सम्यव् ज्ञानज्योतिः प्रद्योतनं कुर्वंतु स्वाहा।

इस प्रशस्ति के बाद इंदिरा जी ने मॉडल की आरती उतारी। अनंतर-

संपूजकानां प्रतिपालकानां, यतीन्द्रसामान्यतपोधनानां।

देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः, करोतु शांतिं भगवान् जिनेन्द्रः।।

यह श्लोक बोलकर झारी से शांतिधारा कराकर पुनः पुष्पांजलि क्षेपण कराकर रथ को बुलाया गया। उस समय भगवान महावीर स्वामी की जय! अहिंसा धर्म की जय! जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति की जय! आर्यिका ज्ञानमती माताजी की जय! आदि जयकारे से सारा सभा मंडप गूंज उठा। बैंडबाजों की मधुर ध्वनि और उच्चध्वनि ने तो दिल्ली के संपूर्ण चांदनी चौक को मुखरित कर दिया। वह मंगलमयी भव्य समारोह और हर्ष का वातावरण आज भी जब स्मरण पथ पर आता है, तब सारा का सारा दृश्य मानों दृष्टि के सामने ही आ जाता है, हृदय गद्गद हो जाता है और शरीर रोमांचित हो उठता है।

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दिल्ली से ज्ञानज्योति का जुलूस-

उसी क्षण इंदिराजी तो अपने स्थान पर चली गर्इं और जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति का जुलूस बड़े ही महोत्सव के साथ चाँदनी चौक होता हुआ निकाला गया। पहले से ही निर्मलकुमार जी सेठी आदि महानुभावों ने सौधर्म इन्द्र आदि की बोेलियाँ ली थीं। वे इस ज्योतिरथ पर इन्द्र-इन्द्राणी के वेष में बैठे। जमीन भयंकर तप रही थी, फिर भी उत्साह में लालमंदिर से कुछ दूर तक मैं भी जुलूस में साथ रही। यह जुलूस रात्रि में लगभग ९ बजे करोलबाग पहुँचा वहाँ उस दिन की शोभा यात्रा समाप्त हुई पुनः ६ जून को ग्रीनपार्क दिल्ली में बोलियाँ होकर शोभा यात्रा हुई। इसके बाद क्रमशः राजस्थान में तिजारा तीर्थ में प्रथम प्रवेश हुआ।

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संचालक पं. बाबूलाल जमादार-

पं. बाबूलालजी जमादार बहुत ही उत्साह से संचालक पद का भार संभाल रहे थे। साथ ही महामंत्री मोतीचन्द जी इधर कार्यालय की व्यवस्था संभालते हुए भी समय-समय पर ज्ञानज्योति प्रवर्तन में भी पहुँचते थे और सारी जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

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जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति रूपरेखा-

जैनागम में वर्णित भूगोल एवं खगोल के विषय के अध्ययन, अनुसंधान की प्रक्रिया को गतिशील बनाने आदि के उद्देश्य से मेरी प्रेरणा से दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के तत्त्वावधान में परमपुनीत हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप की रचना बन रही थी। इस महत्वपूर्ण योजना के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति प्रवर्तन की योजना बनाई गई थी। इस प्रवर्तन में जम्बूद्वीप के मॉडल को एक सुन्दर ट्रक पर रखा गया। यह वाहन २५ फुट लम्बा, ८ फुट चौड़ा एवं १३ फुट ऊँचा था। यह मॉडल विद्युतप्रकाश, झरना और नदियों आदि के प्रवाह से बहुत ही सुन्दर बना था। इसी वाहन पर बोली लेने वाले इन्द्रों के बैठने के लिए एवं गुप्तदान पेटिका रखने के लिए व्यवस्था की गयी थी।

प्रवर्तन समिति के निर्णयानुसार प्रत्येक क्षेत्र में एक महानुभाव संयोजक के रूप में रहे हैं। स्थानीय कार्यक्रमों में मार्गदर्शन एवं केन्द्रीय समिति से संपर्क करके उन्होंने शोभायात्रा आदि कार्यक्रम सफल बनाये हैं। पूर्व निर्धारित समय के अनुसार ज्ञानज्योति जहाँ-जहाँ पहुँचती थी, पहले से ही उत्साही श्रावकगण पलक पावड़ें बिछाकर ज्योति का स्वागत करते थे और सभा के बाद बोली लेकर इन्द्र बनकर वाहन में बैठते थे। तब जुलूस निकलता था।

सौधर्म इन्द्र, ऐशान इन्द्र, सानत्कुमार इन्द्र, माहेन्द्र इंद्र और कुबेर की ऐसी पांच बोलियाँ होती थीं पुनः लोगों की भावना के अनुसार ज्योति की आरती की भी बोली रखी गयी थी। इस ज्योति भ्रमण में नृत्यकार, संगीतकार आदि भी समय-समय पर रहे हैं। संचालक के साथ अन्य विद्वान पं. गणेशीलाल जी प्राचार्य१ आदि भी रहे हैं। इस कार्यक्रम में वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला से प्रकाशित साहित्य एवं सम्यग्ज्ञान पत्रिका का भी अच्छा प्रचार हुआ है।

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आचार्यों के आशीर्वाद-

इस ज्ञानज्योति को सर्वप्रथम जयपुर में आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज का आशीर्वाद मिला पुनः क्रम से लोहारिया में आचार्यश्री धर्मसागर जी महाराज का आशीर्वाद मिला। आचार्यश्री ससंघ इस ज्योति की शोभायात्रा में चलते रहे हैं। ऐसे ही आचार्य श्री विमलसागर जी आदि सभी के आशीर्वाद प्राप्त हुए हैं।

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चातुर्मास स्थापना-

११ जून १९८२, आषाढ़ कृ. ४ को निर्मलकुमार जी सेठी, उम्मेदमलपांड्या, पन्नालाल जी-तेजप्रेस, जिनेन्द्र प्रसाद ठेकेदार, सुमतप्रकाश जी आदि महानुभाव आये और प्रार्थना करते हुए बोले-

‘‘माताजी! इन दिनों गर्मी बहुत पड़ रही है, अतः आप यहीं दिल्ली में चातुर्मास कीजिये। हम लोगों की प्रार्थना है कि आप संघ सहित यह चातुर्मास वूâचा सेठ-शहर में ही करें।’’ लोगों की प्रार्थना स्वीकार कर तथा आर्यिका रत्नमती माताजी से परामर्श कर मैंने स्वीकृति दे दी। लोगों में हर्ष की लहर दौड़ गयी।

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मोरीगेट से विहार- वर्षायोग स्थापना-

रविवार ४ जुलाई, आषाढ़ शु. १२ को मोरीगेट से विहार कर मैं यहाँ साइकिल मार्कट स्थित अतिथि भवन में आ गई। यहाँ सभा में मंगल आशीर्वाद दिया। सोमवार ५ जुलाई १९८२, आषाढ़ शु. १४ को रात्रि में आठ बजे से सभा शुरू हुई। अनंतर लोगों की प्रार्थना के बाद मैंने वर्षायोग स्थापना की। यहाँ दिल्ली में सर्व कालोनी आदि स्थानों में हर एक साधु जाते-आते रहते हैं अतः मैंने भी पूरे शहर में आने-जाने की छूट कर ली थी। रविवार ११ जुलाई को अक्टूबर में जम्बूद्वीप में सेमिनार करने का निर्णय लिया गया।

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विभिन्न कार्यक्रम-

२० अगस्त को वेदवाड़ा की दिगम्बर जैन समाज ने आचार्य शांतिसागर जी की पुण्यतिथि मनायी। वहाँ जाकर उपदेश करना हुआ। अच्छी प्रभावना हुई। यहाँ शहर के बड़े मंदिर में समय-समय पर विशेष रूप से मेरे उपदेश होते रहते थे। ४ अगस्त, श्रावण शु. १५ को मैं ऊपर से सीढ़ी से उतरते समय एक सीढ़ी से गिर पड़ी, पैर में मोच आ गई। उस समय मैंने परवाह नहीं की। बड़े मंदिर में जाकर रक्षाबंधन पर्व पर उपदेश दिया। आते समय मार्ग में ही बैठ गई। जैसे-तैसे आ पाई, पैर में खूब सूजन आ गई थी। यह मोच की दर्द लगभग ४ माह तक चलती रही है। दशलक्षण पर्व में पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य को बुलाया गया था। बड़े मंदिर में पंडित जी तत्त्वार्थ सूत्र पर प्रवचन करते थे और मेरा धर्म पर प्रवचन होता था। इस प्रकार यह पर्यूषण पर्व सानन्द सम्पन्न हुआ।

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इन्द्रध्वज विधान-

पहाड़गंज के हेमचंद जी, उग्रसेन जी अपने यहाँ इन्द्रध्वज विधान कराने के लिए मेरा सानिध्य चाहते थे। जून से आग्रह कर रहे थे, अब मैंने उन्हें स्वीकृति दे दी और अतिथि भवन से विहार कर पहाड़गंज आ गई। १० सितम्बर १९८२, आसोज वदी ७ को झंडारोहण कराया गया। रविवार १२ सितम्बर को वार्षिक रथयात्रा बहुत ही अच्छी रही पुनः १३ सितम्बर से विधान प्रारंभ हो गया। शुक्रवार को यहाँ जलयात्रा पूर्वक विधान पूर्ण हुआ।

उधर शाहदरा के लोग पहले से ही इन्द्रध्वज विधान के लिए आग्रह कर रहे थे। वहाँ उसी दिन ही प्रवीण चंद शास्त्री को भेज दिया, उन्होंने झंडारोहण करा दिया। यहाँ आर्यिका रत्नमती माताजी को २-३ दिन ज्वर आ जाने से एक दिन अकस्मात् स्थिति सीरियस हो गई, वास्तव में अब इनका स्वास्थ्य इधर-उधर विहार कराने का नहीं था। फिर भी शाहदरा के श्रावकों के विशेष आग्रह से कम्मोजी की धर्मशाला में जाकर एक दिन विश्राम कर शाहदरा के लिए विहार कर दिया। वहाँ पर महमूदाबाद के प्रेमचंद जी सपरिवार अपने गांव के अनेक महानुभावों को साथ लेकर, तीस चौबीसी विधान करने आ गये थे। उनकी व्यवस्था भी शाहदरा में कराई गई।

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एक साथ दो विधान-

रविवार २६ सितम्बर से जैन धर्मशाला में इन्द्रध्वज मंडल विधान शुरू किया गया। उधर वहीं मंदिर जी में मध्यान्ह में महमूदाबाद वालों द्वारा तीस चौबीसी विधान का आयोजन किया गया। इस प्रकार यहाँ एक साथ दो-दो विधान चल रहे थे। प्रातः १ बजे से २ बजे तक इन्द्रध्वज विधान होता था पुनः २ बजे से ही तीस चौबीसी विधान शुरू हो जाता था, तो सायंकाल तक चलता था। रविवार १० अक्टूबर को रथयात्रा करके विधान का समापन समारोह मनाया गया। अच्छी प्रभावना रही पुनः वहाँ पर शांति विधान आदि कई छोटे-छोटे विधान सम्पन्न हुए।

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मंदिर का शिलान्यास-

भोगल में मंदिर का शिलान्यास होना था। वहाँ के जैन महानुभावों के विशेष आग्रह से मैं सोमवार को विहार कर भोगल पहुँची। वहाँ १८ अक्टूबर को प्रातः साढ़े दस बजे तक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। मेरा मंगल आशीर्वाद हुआ और शिलान्यास हुआ पुनः आहार के अनन्तर मध्यान्ह में ३ बजे उपदेश हुआ। अगले दिन प्रातः विहार कर रास्ते में जे.के. जैन की कोठी पर १५-२० मिनट ठहरी, उसके बाद विहार कर नई दिल्ली राजाबाजार के मंदिर में आ गई। यहाँ मध्यान्ह में २० अक्टूबर को जैन हैप्पी स्कूल में मेरा उपदेश हुआ।

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जम्बूद्वीप ज्ञान ज्योति सेमिनार-

२१ अक्टूबर से २ नवम्बर १९८२ तक जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति सेमिनार होना था। उसका उद्घाटन फिक्की आडिटोरियम में रखा गया। जे.के. जैन के सत्प्रयत्न से संसद सदस्य श्री राजीव गांधी ने उद्घाटन किया। वहाँ भी पहले राजीव गांधी जी को मेरे पास लाये, ५-७ मिनट वार्तालाप करके आशीर्वाद देकर सभा में कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। श्री राजीव जी ने अपने वक्तव्य में कहा- ‘‘धर्म को राजनीति से अलग रखना ही आवश्यक है।’’ पुनः मैंने अपने वक्तव्य में कहा-

‘‘धर्म को राजनीति से अलग रखा जाये, यह बात ठीक है, पर इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीति को धर्मनीति के साथ चलाया जाये, तभी देश में सुख और शांति हो सकती है।......’’ मैंने इस बात पर भी जोर दिया कि शासन से हिंसा को प्रश्रय नहीं मिलना चाहिए। राजीव गांधी ने सात दीपक की ज्योति को प्रज्ज्वलित करके सेमिनार का उद्घाटन किया। जम्बूद्वीप सेमिनार स्मारिका का भी श्री गांधी ने विमोचन कर मुझे भेंट की। इस अवसर पर जम्बूद्वीप का मॉडल रजत प्लेट पर बनवाया गया था, वह राजीव जी को भेंट किया गया। सफलतापूर्वक उत्साह के वातावरण में सम्पन्न इस उद्घाटन समारोह के बाद मेरठ विश्वविद्यालय के कुलपति की अध्यक्षता में प्रथम सत्र वहीं पर चलाया गया। इस सेमिनार के उद्घाटन के समाचार सभी राष्ट्रीय दैनिक पत्रों, अंग्रेजी, उर्दू आदि में तथा रेडियो, टेलीविजन आदि पर भी प्रकाशित एवं प्रचारित हुए।

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अतिथि भवन में शेष दिन सेमिनार-

उसी दिन सायं मैं वहाँ से विहार कर साइकिल मार्कट की अतिथि भवन धर्मशाला में आ गई। इस सेमिनार में एक जापानी महानुभाव भी पधारे थे। पटियाला विश्वविद्यालय के प्रोफैसर एस.एस. तिलक भी इसमें विशेष थे। इस सेमिनार में आधुनिक विद्वान अधिक थे। अनेक विद्वानों के शोधपूर्ण लेख भी आये थे, जो पढ़े गये। इसमें आर्यिका विशुद्धमती द्वारा भेजा गया भी एक लेख पढ़ा गया।

प्रायः प्रत्येक सत्र के समापन में मैं अनेक शंकाओें का समाधान देते हुए तिलोयपण्णत्ति, श्लोकवार्तिक आदि ग्रंथों को पढ़ने की प्रेरणा दिया करती थी। एक बार एक जैन विद्वान ने प्रो. अली की पुस्तक के आधार से इसी उपलब्ध विश्व में पूरे जम्बूद्वीप को घटाने का प्रयास किया, तब मैंने उन्हें श्लोकवार्तिक की पं. माणिकचंद कृत हिन्दी को पढ़ने की प्रेरणा दी और उस गंथ के विशेष अंश भी सुनाये।

२ नवम्बर को मध्यान्ह में ४ बजे इस सेमिनार का समापन कार्यक्रम मनाया गया। आये हुए समस्त विद्वानों को प्रमाण-पत्र, सम्मान-पत्र, सुमेरु का प्रतीक, फोटो एवं साहित्य भेंट किया गया। इसी मध्य १ नवम्बर को दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान का अधिवेशन संपन्न हुआ। ज्ञान ज्योति पूर्वांचल समिति की बैठक हुई एवं अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद की भी बैठक हुई।

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जन्म दिवस समारोह-

१ नवम्बर १९८२, शरद पूर्णिमा को मेरा उन्चासवाँ जन्मदिवस मनाया गया। ४९ दीपकों से रात्रि में आरती हुई।