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078.दिल्ली से विहार कर माताजी का हस्तिनापुर में आगमन

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दिल्ली से विहार कर माताजी का हस्तिनापुर में आगमन

मंगल विहार-

१८ नवम्बर १९८२, कार्तिक शु. ३ को मैं कम्मोजी की धर्मशाला से विहार कर नवीन शाहदरा आ गई। यहाँ दो दिन रुकने के बाद दिल्ली से विहार कर दिया। पूर्ववत् साहिबाबाद, गाजियाबाद, मोदीनगर, मेरठ होते हुए मवाना आई। वहाँ से २९ नवम्बर १९८२, कार्तिक शुक्ला तेरस को मैं हस्तिनापुर आ गई।

यहाँ पर त्रिलोकसार, श्लोकवार्तिक आदि का स्वाध्याय चालू हो गया। कुछ न कुछ लेखन कार्य भी चल रहा था। इधर त्रिमूर्ति मंदिर, रत्नत्रयनिलय, भोजनशाला आदि के निर्माण कार्य चल रहे थे। जम्बूद्वीप में भी हिमवान् आदि पर्वतों के कार्य दु्रतगति से चलाये जा रहे थे।

जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति भ्रमण-

४ जून १९८२ को दिल्ली को ज्ञानज्योति भ्रमण शुरू हुआ था। कुछ हरियाणा के गाँव घूमकर, तिजारा क्षेत्र से राजस्थान में प्रवेश कर धर्म-प्रभावना करते हुए दशलक्षण पर्व के निमित्त से, १५ अगस्त १९८२ को ज्ञानज्योति का भ्रमण लगभग १ माह के लिए स्थगित कर दिया गया पुनः १२ सितम्बर से बूँदी गाँव से प्रारंभ हुआ। यह भ्रमण पुनः दीपावली के अवसर पर ९ नवम्बर से १८ नवम्बर तक १० दिन को रोक दिया गया पुनः १९ नवम्बर से डूँगरपुर जिले में प्रवेश हुआ। सर्वत्र धर्म प्रभावना के साथ २० दिसम्बर १९८२ को केशरियानाथ जी तीर्थ क्षेत्र पर राजस्थान का समापन समारोह मनाया गया।

इन्द्रध्वज विधान-

इधर हस्तिनापुर में सरधना के मोहनलाल जी आदि श्रावकों ने यहाँ मेरे सानिध्य में १७ दिसम्बर तक इन्द्रध्वज विधान किया पुनः १७ फरवरी से २७ फरवरी १९८३ तक पवन कुमार मेरठ वालों ने यहीं पर इन्द्रध्वज विधान कराया। बम्बई में आचार्यश्री विमलसागर जी के सानिध्य में त्रिलोकचंद कोठारी-कोटा वालों ने इन्द्रध्वज विधान का आयोजन विशाल स्तर पर किया। इसी मध्य ९ फरवरी को जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति की मीटिंग में अच्छे उत्साह के साथ ‘महाराष्ट्र प्रांतीय जंबूद्वीप ज्ञानज्योति प्रवर्तन समिति’ का गठन हुआ, जिसमें साहू श्रेयांस प्रसाद जी आदि संरक्षक बनाये गये।

इधर २८ जनवरी से २८ फरवरी तक बंगाल में कलकत्ता से लेकर ठाकुरगंज (पूर्णिमा) तक अच्छी धर्म प्रभावना के साथ ज्ञानज्योति का भ्रमण सम्पन्न हुआ पुनः मार्च से बिहार प्रांत में भ्रमण की रूपरेखा बनायी गयी। कलकत्ता में १३ फरवरी को ज्ञानज्योति का स्वागत कार्यक्रम बहुत ही अच्छा रहा है। यहाँ हस्तिनापुर में बड़ौत के निवासी वर्तमान में हस्तिनापुर में रहने वाले अनंतवीर ने १३ मार्च से २४ मार्च तक फाल्गुन की आष्टान्हिका में इन्द्रध्वज विधान कराया।

रत्नमती बालविद्या मंदिर-

टिकैतनगर में१ प्रकाशचंद जैन ने ११ दिसम्बर १९८२ को मातृभक्ति से प्रेरित होकर अपनी माँ के नाम पर ‘रत्नमती बालविद्या मंदिर’ नाम से एक विद्यालय की स्थापना की थी, जो कई वर्षों तक उनके अथक प्रयत्न से निराबाध रूप से चलता रहा है। इसमें छोटे-छोटे बालक धर्म के संस्कारों में ढाले जाते थे।

जम्बूद्वीप निबन्ध प्रतियोगिता-

‘जम्बूद्वीप निबन्ध प्रतियोगिता’ दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान द्वारा घोषित की गयी। इसमें अनेक निबंध आये और लेखों के अनुसार प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार दिये गये जिसमें कु. माधुरी (संघस्थ), कु. भावना (गुजरात) इन्हें प्रथम पुरस्कार मिला।

पं. बाबूलाल जी जमादार का सहयोग-

२ मार्च से बिहार में भागलपुर से ज्ञानज्योति का भ्रमण प्रारंभ हुआ। पं. बाबूलाल जमादार ने २३ मार्च तक ज्ञानज्योति प्रवर्तन में संचालन का भार संभाला था। इसमें बीच-बीच में मोतीचन्द जी जाते रहते थे। इसके बाद उनका स्वास्थ्य कमजोर हो जाने से वे इच्छा होते हुए भी नहीं जा पाये। २४ मार्च से रवीन्द्र कुमार ने ज्योति संचालन का भार संभालकर ८-७-१९८३ तक जमशेदपुर टाटा नगर तक धर्म प्रभावना के साथ ज्योति प्रवर्तन कराया। ८ अप्रैल के बाद यह ज्ञानज्योति उड़ीसा, कटक होते हुए महाराष्ट्र के लिए बम्बई रवाना हो गई।

बम्बई में ज्ञानज्योति-

राजस्थान, बंगाल, बिहार और उड़ीसा में भ्रमण कर महाराष्ट्र के प्रमुख शहर बम्बई में ज्ञानज्योति पहुँची। इस समय महानगरी में १७ अप्रैल से २९ अप्रैल १९८३ तक विभिन्न स्थानों में जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति का स्वागत किया गया और शोभायात्रा निकाली गयी। १९ अप्रैल को जे.के. जैन (दिल्ली) ने ज्ञानज्योति का बंबई में स्वागत किया।

डायनिंग हॉल का उद्घाटन-

यहाँ जम्बूद्वीप स्थल पर यात्रियों के लिए निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की गई थी। उसके लिए एक भोजनशाला का निर्माण हुआ। ६ मार्च १९८३ को जे.के. जैन संसद सदस्य के करकमलों से इस भोजनशाला (डायनिंग हॉल) का उद्घाटन कराया गया। उस समय एक छोटा सा समारोह सम्पन्न हुआ। उस समय जे.के. जैन के अमूल्य सहयोग का उल्लेख करते हुए संस्थान की ओर से उन्हें अभिनंदन-पत्र भेंट किया गया।

आचार्य वीरसागर संस्कृत विद्यापीठ-

सन् १९७९ में मेरी प्रेरणा से यहाँ मेरे गुरुदेव के नाम को चिरस्थायी रखने के लिए जो ‘आचार्य श्री वीरसागर संस्कृत विद्यापीठ’ खोला गया था, उसमें प्राचार्य गणेशीलाल जी साहित्याचार्य का कुशल नेतृत्व होने से प्रायः रविवार को और विशेष पर्व तिथियों में ‘सम्यग्ज्ञान गोष्ठी’ होती रहती थी। इसमें विद्यार्थियों ने धार्मिक क्षेत्र में अच्छी प्रगति की। उस समय जून १९८३ का सम्यग्ज्ञान ‘विद्यापीठ अंक’ निकाला गया, जिसमें विद्यापीठ की प्रगति पर प्रकाश डाला गया।

रत्नत्रयनिलय का उद्घाटन-

यहाँ जम्बूद्वीप स्थल पर साधुओं के लिए हेमचंद जैन (दिल्ली) के सहयोग से ‘रत्नत्रयनिलय’ नामक वसतिका (त्यागी भवन) का निर्माण हुआ है। रविवार अक्षय- तृतीया, दिनाँक १५ मई १९८३ को इसका उद्घाटन समारोह मनाया गया। ७ बजे भगवान् शांतिनाथ की प्रतिमा को यहाँ लाये, शांति विधान कराया पुनः ९ बजे रथयात्रा हुई। वापसी में यहीं पर हॉल में भगवान् ऋषभदेव का अभिषेक सम्पन्न हुआ। अनंतर उपदेश व आशीर्वाद के बाद श्री उग्रसेन हेमचंद जैन ने ११ बजकर ४५ मिनट पर शिलालेख का अनावरण कर ‘रत्नत्रयनिलय’ का उद्घाटन किया। रथयात्रा की वापसी में भगवान् की प्रतिमा के साथ मैंने संघ सहित इसमें प्रवेश किया।

प्रशिक्षण शिविर-

दशलक्षण पर्व में जैन मंदिरों में जाकर विद्वान् तत्त्वार्थसूत्र और दशधर्म पर प्रवचन कर सके, इस उद्देश्य से प्रशिक्षण शिविर ५ जून से १५ जून तक रखा गया था। सरधना निवासियों के विशेष आग्रह से मैंने सरधना की ओर विहार की स्वीकृति दे दी थी। इधर आर्यिका रत्नमती माताजी का स्वास्थ्य बहुत ही नाजुक चल रहा था। फिर भी मैं साहस कर वैशाख शु. ७ दिनाँक १९ मई १९८३ को सायं ५ बजे विहार कर गणेशपुर पहुँची। वहाँ रात्रि में आर्यिका रत्नमती जी की तबियत बहुत खराब हो गई। फिर भी मैं रात्रि के १२ बजे तक दृढ़ रही और मन में यही सोचती रही कि-

‘‘जो भी हो, या तो मैं इन्हें वापस हस्तिनापुर भेज दूँगी या साथ ही जैसे-तैसे ले जाऊँगी।’’ इसके बाद उनके मुख से ऐेसे शब्द निकले कि- ‘‘माताजी! अब मेरा शरीर काम नहीं कर रहा है, तुम मेरी समाधि अच्छी तरह से हस्तिनापुर तीर्थ पर करा दो......।’’ इन शब्दों को सुनने के बाद रात्रि २ बजे के बाद मेरे मन में अकस्मात् परिवर्तन आया और मैंने सोचा कि- ‘‘न तो इन्हें लेकर मैं सरधना पहुँच सकती हूँ, चूंकि मार्ग में ही हालत सीरियस हो जायेगी.....और यदि इन्हें वापस हस्तिनापुर भेज देती हूँ तो भी इनकी वैयावृत्ति कौन करेगा? समाधि कौन बनायेगा?’’

पुनः मन में विचार आया-‘‘मैंने प्रभावना तो खूब कर ली है। अब इनकी समाधि अच्छी कराना भी तो मेरा कर्तव्य है......।’’ ऐसा सोचकर मैंने रात्रि ३ बजे वापस आने का निर्णय किया और प्रातः ऐसी ही नाजुक स्थिति में रत्नमती माताजी को डोली में लेकर वहाँ से-गणेशपुर से हस्तिनापुर की ओर विहार कर दिया। यहाँ वापस आकर माताजी का स्वास्थ्य कई दिनों तक काफी अस्वस्थ रहा। उनके मन पर भी असर हुआ कि-

‘‘मेरे निमित्त से सरधना की समाज माताजी के उपदेश आदि से वंचित रह गई।’ खैर! यहाँ आकर मैंने प्रशिक्षण शिविर यहीं कराने का निर्णय लिया। मोतीचंद ने मेरी आज्ञा से जिम्मेदारी संभाली अतः ज्ञानज्योति में नहीं जा सके। पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य को कुलपति बनाया गया और ४०-५० विद्वानों ने तत्त्वार्थसूत्र तथा दशधर्म पर प्रशिक्षण ग्रहण किया।

रत्नत्रय निलय में शिविर समापन समारोह-

समापन के अवसर पर विद्वद्गण अपने-अपने उद्गार व्यक्त कर रहे थे उसी के मध्य पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य ने कहा कि- ‘‘यहाँ सुमेरु की वंदना करने से जो आनंद हुआ है, वह अपूर्व है। आज जो भी इस महान् जम्बूद्वीप निर्माण की निंदा करते हैं, मैं माताजी से प्रार्थना करूँगा कि वे निश्चित ही इसके दर्शन कर एक न एक दिन प्रभावित होकर अवश्य ही प्रशंसा करेंगे.....। मैंने माताजी द्वारा लिखित ‘मेरी स्मृतियाँ’ नाम से कुछ संस्मरण पढ़े। वास्तव में माताजी ने अपने वचन को पूरा निभाया है। उनके घर से निकलते समय उनकी माँ (आर्यिका रत्नमती माताजी) ने जो कहा था कि.....बेटी! आज मैं तुम्हें सहयोग दे रही हूँ, आगे तुम मुझे भी सहयोग देकर घर से निकाल लेना’’ सो आज देख रहा हूँ कि माताजी ने आज से १२ वर्ष पूर्व अपनी मां को घर से निकालकर आज उन्हें आर्यिका के महान् पद पर विराजमान किया है। माताजी ने उस समय के वचन को अच्छी तरह निभाया है......।’’ ये संस्मरण कहते-कहते उनका गला भी भर आया और उनकी आँखें सजल हो गर्इं। उपस्थित सभी विद्वानों के भी नेत्र सजल हो गये, उस समय वहीं बैठी हुई आर्यिका रत्नमती माताजी भी रो पड़ीं। वह दृश्य बहुत ही हृदय द्रावक था। इन विद्वानों ने भी जम्बूद्वीप की प्रशंसा में और रत्नमती माताजी के गौरव में अच्छे-अच्छे उद्गार व्यक्त किये।

एक साथ दो सिद्धचक्र विधान-

रविवार १७ जुलाई आषाढ़ शु. ८ से अष्टान्हिक पर्व शुरू हो गया। मेरठ के कुछ महानुभाव तथा महमूदाबाद के श्रेयांसकुमार आदि महानुभाव सिद्धचक्र विधान करने के लिए आये। डायनिंग हाल में दो मण्डल बनाये गये। मेरठ वालों ने तेरहपंथ से विधान किया और महमूदाबाद वालों ने बीसपंथ से विधान किया। इन दोनों ने आपस में बहुत ही प्रेमभाव रखा, यह बहुत ही अच्छा उदाहरण बना है।

सुमेरुपर्वत की १०८ वंदना-

२२ जुलाई १९८२, आषाढ़ शु. १३ मंगल त्रयोदशी के दिन मैंने सुमेरु पर्वत की १०८वीं वंदना की, मन बहुत ही प्रसन्न हुआ। लगभग १० महीने में मैंने सुमेरु पर्वत की १०८ वन्दनाएं की हैं पुनः२३ जुलाई आषाढ़ शु. १४ की रात्रि में वर्षायोग स्थापना की। दिल्ली के लोगों ने आकर प्रार्थना करके चातुर्मास स्थापना करायी।

ज्ञानज्योति प्रवर्तन-

उधर ज्ञानज्योति का मोतीचन्द प्रवर्तन करा रहे थे। उन्हें बहुत तेज ज्वर आ जाने से नवलचंद चौधरी उन्हें सनावद उनके घर पहुँचाकर आये। ज्ञानज्योति से समाचार आया कि मोतीचन्द जी के अस्वस्थ हो जाने से यहाँ कोई भी संचालक नहीं है। इधर रवीन्द्रकुमार को जाने के लिए कहा। उनके पेट में अकस्मात् दर्द उठ जाने से यहाँ के यशवन्तराव और नरेशचन्द विद्यार्थी को भेजा गया। सुनकर खुशी इस बात की हुई कि वहाँ पर कैलाशचंद प्रचारक-सम्यग्ज्ञान और ज्योतिचालक (ड्राइवर) ने सकुशल दो गाँवों का प्रोग्राम संभाल लिया, कुछ-कुछ उपदेश करके शोभायात्रा करा दी। वास्तव में ज्ञानज्योति के साथ रहकर सभी लोग अनुभव ज्ञान प्राप्त कर कुशल हो गये थे।

सनावद में श्रावण शु. २ से इन्द्रध्वज विधान शुरू हुआ। इधर माधुरी, रवीन्द्र को लेने के लिए सनावद से लोग आये। माधुरी को भेजा। वहाँ विधान पूर्णकर रक्षाबंधन के बाद मोतीचन्द जी उधर से ही ज्ञानज्योति में पहुँच गये और सुचारू रूप से व्यवस्था संभाल ली। महाराष्ट्र में ज्ञानज्योति भ्रमण में बहुत ही अच्छी धर्म प्रभावना हुई है।

जम्बूद्वीप दर्शन एवं उपदेश से प्रभावित-

वी.पी. धवन (केन्द्रीय शिक्षण संस्थान, नई दिल्ली), एस.के. मनचन्दा (भारत स्काउट एवं गाइड कमिश्नर, नई दिल्ली), जी. रंगाराव (नेशनल ट्रेनिंग कमिश्नर उ.प्र.) पंचमढ़ी, मनीपुरस्टेट-राजस्थान, उ.प्र., उड़ीसा, झाँसी, बिहार, मणीपुर, जम्बू और कश्मीर केन्द्रीय विद्यालय संगठन, नई दिल्ली आदि १३ राज्यों के स्काउट और गर्ल्स गाइड के लगभग ३०० छात्र-छात्राओं ने यहाँ आकर दर्शन किये एवं मेरे उपदेश से लाभान्वित होकर अच्छे उद्गार व्यक्त किये।

इधर १९८३ में भी दशलक्षण पर्व के अवसर पर ९ से २६ सितम्बर तक प्रोग्राम स्थगित रखा पुनः २७ अक्टूबर से कोल्हापुर जिले में ज्ञानज्योति का भ्रमण अच्छा रहा।

आचार्यों, मुनिसंघों को यहाँ आने की प्रार्थना-

२८ अक्टूबर १९८३ को संस्थान का एक शिष्टमण्डल रवीन्द्र कुमार के साथ सर्वप्रथम निकला। प्रतापगढ़ में आचार्यश्री धर्मसागर जी, डूंगरपुर में आचार्य श्री सन्मतिसागरजी आदि के दर्शन किये, सभायें हुर्इं। वहाँ इन २० सदस्यों ने रवीन्द्र के साथ संघ में नारियल चढ़ाकर प्रार्थना की कि- ‘‘आप सभी साधु वर्ग हस्तिनापुर पधारकर जम्बूद्वीप के जिनबिम्बों की महान प्रतिष्ठा कराइये।’’

आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज ने कहा कि- ‘‘ज्ञानमती माताजी बहुत पुरुषार्थी हैं। इतने विरोध के होते हुए भी वे अडिग रहीं। जम्बूद्वीप निर्माण का कार्य पूरा हुआ है और ज्ञानज्योति भी निर्विघ्न चल रही है, यह बहुत ही प्रसन्नता का विषय है इत्यादि।’’

उपाध्याय मुनि अजितसागर जी अपने संघ सहित घाटोल में थे। उन्हें भी नारियल चढ़ाया और प्रार्थना की। पूज्य दयासागर जी, अभिनंंदनसागर जी आदि सागवाड़ा में थे, वहाँ भी पहुँचे और श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना की। उदयपुर में आर्यिका विशुद्धमती जी को नारियल चढ़ाया। इस प्रकार ४ दिन के अंदर राजस्थान में विराजमान लगभग १० स्थानों पर १०० से अधिक दिगम्बर साधु-साध्वियों के दर्शन करके, श्रीफल चढ़ाकर उन सबसे यहाँ प्रतिष्ठा पर पधारने हेतु निवेदन किया। इसी प्रकार औरंगाबाद में वर्षायोग कर रहे आचार्यश्री विमलसागर जी के चरणोें में श्रीफल चढ़ाकर मोतीचन्द, निर्मल कुमार सेठी, जे.के. जैन आदि महानुभावों ने हस्तिनापुर पधारने के लिए प्रार्थना की।

इसी मध्य १४ अक्टूबर को ज्ञानज्योति कुम्भोज पहुँची। वहाँ पर विराजमान मुनिश्री समंतभद्र जी महाराज एवं एलाचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज ने ज्ञानज्योति को बहुत-बहुत आशीर्वाद दिया। जम्बूद्वीप का मॉडल देखा और मुनिश्री समंतभद्र जी ने तो बार-बार कहा कि- ‘‘आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने अथक परिश्रम करके महान् कार्य किया है, उनका समाज पर बहुत बड़ा उपकार है और उनके कार्य भी अप्रतिम हैं.....।’’

हस्तिनापुर के इण्टर कालेज में उपदेश-</font color></center>== २ अक्टूबर १९८३ को गांधी जयंती के अवसर पर यहाँ हस्तिनापुर टाउन में गवर्नमेंट इण्टर कालेज में मेरा सारगर्भित प्रवचन हुआ। इस अवसर पर कालेज के प्रिंसिपल, अध्यापकगण एवं विद्यार्थियों ने लाभ लिया। गांधी जी की अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की विचारधारा से ही देश और जन-जन का हित है, ऐसा सभी ने स्वीकार किया।

ज्ञानज्योति कर्नाटक में-

उधर ज्ञानज्योति का भ्रमण ८ नवम्बर से कर्नाटक में शुरू हुआ। मोतीचन्द ने बहुत ही मनोयोग से विशेष उत्साह के साथ ज्योति भ्रमण को संभाला और सर्वत्र अच्छी धर्म प्रभावना की। मोतीचन्द महीने-डेढ़ महीने बाद जब यहाँ आते तब ज्ञानज्योति के प्रवर्तन में आने वाले अच्छे-अच्छे अनुभव सुना-सुनाकर खूब प्रसन्न होते और मेरा मन भी प्रसन्न करते पुनः आगे की रूपरेखा बनाकर, आज्ञा लेकर चले जाते। इधर मैं यही सोचा करती-

‘‘भगवन् ! ज्ञानज्योति के सारे भारत भ्रमण तक मोतीचन्द का उत्साह न घटे, दिन पर दिन बढ़ता ही रहे। जिससे ज्ञानज्योति भ्रमण निर्विघ्न सम्पन्न हो.....।’ क्योंकि इधर सन् १९८१ से ही मोतीचन्द ने भोजन में नमक और मीठे का जम्बूद्वीप प्रतिष्ठा होने तक के लिए त्याग कर दिया था। शुद्ध घी और शुद्ध दूध लेते थे। हाथ का पिसा हुआ आटा आदि शुद्ध भोजन करते थे अतः कहीं-कहीं मध्यान्ह में २-२।। बजे रूखा-सूखा बिना नमक का भोजन मिलता था। कहीं-कहीं अच्छी व्यवस्था भी हो जाती थी फिर भी ये उस कष्ट को कुछ ना समझकर उत्साह से नये-नये गाँव, नये-नये श्रावक, नये-नये राजनैतिक व्यक्तियों को पाकर बहुत ही गद्गद होते थे और आकर कहते थे- ‘‘माताजी! इस ज्योति भ्रमण के अतिरिक्त समय में लाखों रुपया खर्च करके भी यह आनन्द नहीं मिल सकता है इत्यादि।’’ कभी-कभी महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि स्थानों के कार्यक्रम के कुछ टेप कैसेट भेज देते थे, जिन्हें सुनकर यहाँ मैं खुश होती रहती थी चूूंकि मुझे मराठी और कन्नड़ भाषा कुछ समझ में आ जाती है। आर्यिका रत्नमती माताजी यद्यपि मराठी और कन्नड़ किंचित् भी नहीं समझती थीं, फिर भी वे टेप कैसेट सुनकर बहुत खुश होती रहती थीं।

इन्द्रध्वज विधान-

रविवार ११ सितम्बर १९८३, भादों सुदी ५ से यहाँ हस्तिनापुर में आनन्द प्रकाश जैन, सोरम वालों ने इन्द्रध्वज विधान शुरू किया। दशलक्षण पर्व में विधान के आयोजन से बहुत ही धर्ममय वातावरण बन गया। इसके बाद ७ नवम्बर से १५ नवम्बर तक जयकुमार जी विनायका भागलपुर वालों ने यहाँ इन्द्रध्वज विधान किया।