ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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079.आर्यिका रत्नमतीजी को अभिनंदन ग्रंथ समर्पण

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आर्यिका रत्नमती को अभिनंदन ग्रंथ समर्पण-

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यहाँ चातुर्मास में मेरे पास बैठकर एक दिन रवीन्द्र कुमार और माधुरी ‘‘आर्यिका रत्नमती अभिनंदन ग्रंथ’’ के फोटो आदि को सुव्यवस्थित कर रहे थे। आर्यिका रत्नमती जी ने देख लिया और उन्हें मालूम हो गया कि- ‘‘मेरा अभिनन्दन ग्रंथ तैयार हो रहा है, मुझे समर्पित करेंगे।....’’ तो वे सहज ही मुझे बुलाकर बोलीं- ‘‘माताजी! यह क्या हो रहा है? आप मेरी हंसी क्यों करा रही हो? भला मैंने क्या काम किया है? यह अभिनंदन ग्रंथ आदि सब आपको शोभते हैं। ऐसा करोगी तो मैं सभा में भी नहीं आऊँगी....।’’

उनके सभी शब्दों में ऐसा लगा कि-‘‘इन्हें बहुत बड़ा संकोच हो रहा है’’। मैंने थोड़े शब्दों में कहा- ‘‘गृहस्थावस्था का आपका आदर्श जीवन, पुनः ऐसा हरा-भरा परिवार छोड़कर दीक्षा लेना, यह आदर्श सभी महिलाओं के लिए अनुकरणीय है अतः यह अभिनंदन ग्रंथ समर्पण आदि कार्य कोई अनुचित नहीं है.....।’’

पुनः वह मंगल तिथि आ गई। इस प्रसिद्ध तीर्थ हस्तिनापुर में कार्तिक शुक्ला १५ को प्रतिवर्ष की तरह इस बार भी मेला था। इस कार्तिक शु.१५, २० नवम्बर १९८३ को यहाँ जम्बूद्वीप स्थल पर विशाल पांडाल बनाया गया। ग्रंथ विमोचन व समर्पण के लिए कांग्रेस (इंदिरा) संसदीय दल के सचिव व संसद सदस्य श्री जे.के. जैन मुख्य रूप से आमंत्रित थे। इस प्रसंग पर अमरचंद पहा़डिया (कलकत्ता), निर्मल कुमार जी सेठी, गणेशीलाल रानीवाला, लाला श्यामलाल जी ठेकेदार आदि अनेक गणमान्य भक्तगण उपस्थित थे। ग्रंथ के सम्पादक डा. कस्तूरचंद कासलीवाल, पं. बाबूलाल जमादार आदि विद्वान् मौजूद थे। विशाल सभा में मेरी विशेष प्रेरणा से आर्यिका रत्नमती माताजी का परिचय दिया गया। श्री जे.के. जैन का पुष्पहार से स्वागत किया गया। इसके बाद जे.के. जैन ने मेरी आज्ञा लेकर अभिनंदन ग्रंथ का विमोचन किया और पूज्य आर्यिका रत्नमती जी के करकमलों में समर्पित किया। रत्नमती माताजी ने उस समय भावविह्वल मुद्रा में उस ग्रंथ को हाथ में लेकर मुझे दे दिया, पुनः जे.के. जैन आदि सभी को आशीर्वाद दिया। जे.के. जैन ने अपने वक्तव्य में ज्ञानज्योति प्रवर्तन द्वारा होने वाली धर्मप्रभावना का उल्लेख करते हुए आर्यिका रत्नमती जी के आदर्श जीवन पर प्रकाश डाला।

इस सभा में प्रसिद्ध लाला श्यामलाल जी ठेकेदार को रजतपट्ट पर लिखी प्रशस्ति देकर सम्मान किया गया। जे.के. जैन ने पूज्य रत्नमती माताजी को नवीन पिच्छी देकर उनकी पुरानी पिच्छी प्राप्त की। श्री अमरचंद पहाड़िया ने मेरी पिच्छी बदलायी। समारोह का संचालन पं. बाबूलाल जमादार ने किया और संस्थान की गतिविधियों पर रवीन्द्र कुमार ने प्रकाश डाला। अन्य महानुभावों ने भी आर्यिका रत्नमती जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए अनेक प्रेरणायें प्राप्त कीं। अंत में मेरा आशीर्वादात्मक प्रवचन हुआ, जिसमें मैंने ‘दहेज दो तो ऐसा दो’ इस विषय पर जोर दिया और बतलाया कि-

‘‘आज से लगभग ७० वर्ष पूर्व सन् १९१४ में महमूदाबाद के श्रेष्ठी लाला सुखपालदास जी के यहाँ एक कन्यारत्न मोहिनी ने जन्म लिया था। लाल सुखपाल दास जी ने अपनी कन्या को विवाह के समय ‘पद्मनंदिपंचविंशतिका’ नाम का ग्रंथ दिया था। मोहिनी जी ने उसे पढ़कर आजन्म शीलव्रत और अष्टमी, चतुर्दशी पर्व में ब्रह्मचर्य व्रत का नियम लिया था पुनः उन्होंने सन् १९३४ में शरद पूर्णिमा (आसोज शु. १५) २२ अक्टूबर को एक कन्या को जन्म देकर ‘‘मैना’’ नाम रखा था। इन माता मोहिनी ने अपनी कन्या को भी इस ग्रंथ के स्वाध्याय की प्रेरणा दी थी। उस कन्या ने भी उस ग्रंथ को पढ़कर वैराग्य से ओतप्रोत हो १८ वर्ष की वय में दीक्षा ली थी। सो ही मैं आज ज्ञानमती हूँ। इन आर्यिका रत्नमती माताजी के जीवन में जो त्याग, तपस्या और साधना दिख रही है तथा मेरे जीवन में जो ज्ञान का प्रकाश दिख रहा है, उन सबमें उस दहेज के ग्रंथ का ही प्रमुख प्रभाव है। इसलिए सभी भव्य श्रावक-श्राविकाओं! आप लोग भी अपनी कन्या को दहेज में धार्मिक ग्रंथ अवश्य दो।’’

इस मेले पर आगत यात्रियों को प्रीतिभोज कराया गया। इस मंगल अवसर पर श्रीरत्नमती माताजी की प्रशस्ति पढ़ी गई, वह निम्न प्रकार है-

‘‘लोकालोकप्रकाशिकेवलज्ञानज्योतिषा सकलचराचरवस्तुसाक्षात्कारि-महाश्रमणभगवद्-वर्धमानस्य सार्वभौमशासनं वर्धयति। श्री कुन्दकुन्दम्नाये नंदिसंघे सरस्वतीगच्छे बलात्कारगणे चारित्रचक्रवर्ती श्रीशांतिसागराचार्यवर्यस्तत्पट्टे श्रीवीरसागरमुनीन्द्रस्तत्पट्टाधीशोश्रीशिवसागर-सूरिस्तत्पट्टस्थितः श्री धर्मसागराचार्योऽस्य करकमलात् ‘‘वीराब्दे अष्टानवत्युत्तरचतुर्विंशतिशततमे वर्षे मार्गशीर्षमासे कृष्णपक्षे तृतीयातिथौ अजमेरपत्तने’’ दीक्षिता संयतिका आर्यिकारत्नमती माता इह भूतले चिरं जीयात् ।

अधुना वीराब्दे नवोत्तरपंचविंशतिशततमे वर्षे कार्तिकमासे शुक्लपक्षे पूर्णिमातिथौ अद्यावधि श्रीज्ञानमतीमातुः संघे द्वादशवर्षायोगं व्यतीत्य निर्विघ्नतया संयमं परिपालयन्ती सत्यग्रेऽपि यावज्जीवं निर्बाधं चारित्रे स्थेयात् । इति वद्र्धतां जिनशासनम् ।’’

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आर्यिका रत्नमती माताजी का संक्षिप्त जीवन-

अवध प्रांत के सीतापुर जिले में महमूदाबाद नाम से एक ग्राम प्रसिद्ध है। वहाँ के लाला सुखपालदास जी अच्छे धर्मात्मा व्यक्ति थे। उनके दो पुत्री और दो पुत्र थे- राजदुलारी, मोहिनी, महिपालदास और भगवानदास। इनकी द्वितीय पुत्री टिकैतनगर के लाला धनकुमार जी के सुपुत्र छोटेलाल जी से विवाही गर्इं। सन् १९३२ में इनका विवाह हुआ और सन् १९३४ में २२ अक्टूबर को इन्होंने पहली संतान को पुत्री मैना के रूप में जन्म दिया, जो मैं ज्ञानमती हूूँ। इसके बाद इनकी सभी संतानों में ८ कन्यायें एवं चार पुत्र और हुए। इनके नाम प्रारंभ से क्रमशः इस प्रकार हैं- (१) मैना

(२) शांति

(३) कैलाशचंद

(४) श्रीमती

(५) मनोवती (आर्यिका अभयमती)

(६) प्रकाशचन्द्र

(७) सुभाषचन्द

(८) कुमुदनी

(९) रवीन्द्रकुमार

(१०) मालती

(११) कामनी

(१२) माधुरी और

(१३) त्रिशला।

इन संतानों में मैना, मनोवती, रवीन्द्रकुमार और माधुरी ये चार बालब्रह्मचारी हैं जो कि आज समाज में सभी से परिचित हैं। पिता छोटेलाल जी का २५ दिसम्बर सन् १९६९ को घर में ही समाधिमरण पूर्वक स्वर्गवास हुआ था। इसके बाद माता मोहिनी ने अजमेर में सन् १९७१ में मगसिर कृ. ३ को आर्यिका दीक्षा लेकर आर्यिका ‘रत्नमती’ नाम को पाया था। तब से लेकर १३ वर्ष तक मेरे संघ में रहकर अपनी साधना में तत्पर रही हैं। कुल ३ वर्ष पूर्व१ १५ जनवरी १९८५ को उन्होंने यहीं हस्तिनापुर में समाधिपूर्वक नश्वर शरीर को छोड़कर देवपद प्राप्त किया है।

यह मुझे गौरव के साथ लिखना होता है कि उनकी सभी संतानें, जो कि गृहस्थाश्रम में हैं, धर्मनिष्ठ हैं, देवपूजा, गुरुपास्ति और स्वाध्याय आदि आवश्यक क्रियाओं को करते हुए, अपने कत्र्तव्य का पालन करते हुए, गृहस्थाश्रम का कुशल संचालन कर रहे हैं और सभी वैराग्यप्रिय हैं।

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ज्ञानज्योति भ्रमण-

कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु में जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति का प्रवर्तन हो रहा था। इसमें मोतीचन्द जी महामंत्री साथ में रहते हुए उस प्रांत में ज्योति भ्रमण के माध्यम से आम जनता को जम्बूद्वीप का महत्त्व बतलाते हुए जैनधर्म की पताका फहरा रहे थे पुनः१ फरवरी १९८४ से मध्य प्रदेश में ज्योति प्रवर्तन कराने के लिए मोतीचन्द स्वयं उत्साह के साथ कई बार सनावद मीटिंग करके अच्छी प्रभावना से शुभारंभ कराना चाहते थे। मध्य प्रदेशीय प्रवर्तन समिति के गठन में श्री देवकुमार सिंह कासलीवाल (इंदौर) को अध्यक्ष बनाया गया। जबलपुर से प्रारंभ करना था, अतः वहाँ के शीलचंद जैन ने अध्यक्ष पद का भार ग्रहण किया।

जबलपुर में १ फरवरी सन् १९८४ को ज्ञानज्योति के शुभारंभ में मध्यप्रदेश के शिक्षामंत्री श्री मोतीलाल जी बोरा, वन मंत्री श्री अजयनारायण मुसरान, राज्य पर्यावरण मंत्री श्री चन्द्रकांत भनोट तथा मध्यप्रदेश कांग्रेस (आई) के महामंत्री श्री ललित श्रीवास्तव एवं सांसद श्री सुभाष यादव उपस्थित थे। इनके साथ केन्द्रीय महामंत्री मोतीचंद जैन, देवकुमार सिंह कासलीवाल इंदौर, कैलाशचंद जी चौधरी इंदौर, इन्दरचंद चौधरी सनावद आदि महानुभाव उपस्थित थे। सभा के बाद शोभायात्रा में लगभग दस हजार स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया। इस प्रकार प्रभावना के साथ ज्योति का भ्रमण मध्यप्रदेश में हो रहा था।

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इन्द्रध्वज विधान-

हस्तिनापुर में १० मार्च से १९ मार्च १९८४ के अष्टान्हिक पर्व में टिकैतनगर से पधारे प्रद्युम्न कुमार जैन ने इन्द्रध्वज विधान बहुत बड़े उत्साह के साथ कराया। इस विधान में टिकैतनगर एवँ अवध प्रांत से अनेक नर-नारियों ने भाग लिया।

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अक्षयतृतीया मेला-

हस्तिनापुर में तीर्थ बनाने का प्रथम श्रेय भगवान् ऋषभदेव को है, जिनकी प्रथम पारणा अक्षय तृतीया के दिन राजा श्रेयाँस ने इक्षुरस का आहार देकर करायी थी। उस समय इस उपलक्ष में ४ मई १९८४ को यहाँ जम्बूद्वीप स्थल में रथयात्रा निकाली गई और छोटे-मोटे रूप में मेला उत्सव मनाया गया।

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पंचकल्याणक प्रतिष्ठा की तिथि में परिवर्तन-

११ मार्च १९८४ को दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान की बैठक में ‘जम्बूद्वीप जिनबिम्ब प्रतिष्ठापना महोत्सव’ के लिए एक प्रतिष्ठा समिति का गठन किया गया। इसमें २४ फरवरी से २८ फरवरी १९८५ की तारीख निश्चित की गई। यह तिथि फाल्गुन शुक्ला चतुर्थी से अष्टमी तक थी। निर्णय के अनुसार आचार्यश्री धर्मसागर जी का आशीर्वाद लेकर तिथि की घोषणा कर दी गई पुनः कई बार आचार्यश्री के निकट जाने पर आचार्यश्री ने कुछ विकल्प करते हुए कहा कि-

‘‘यह जो प्रतिष्ठा की अंतिम तिथि फाल्गुन शु. ८ है, वह होलाष्टक में आ गई हैं। पहले होलाष्टक में प्रतिष्ठा करने पर आचार्य कल्पश्री चन्द्रसागरजी की समाधि हो गई थी पुनः महावीर जी शान्तिवीर नगर में होलाष्टक में प्रतिष्ठा होने के समय पहले ही फाल्गुन कृ. ३० (अमावस) को आचार्यश्री शिवसागर जी की समाधि हो चुकी है, अतः प्रतिष्ठा की तिथि आगे बढ़ा देनी चाहिए। इस विकल्प के बाद आचार्यकल्प श्री श्रुतसागर जी से परामर्श कर रवीन्द्र कुमार ने आकर मुझसे सारी बातें बतार्इं, तब मैंने भी आचार्यश्री की आज्ञानुसार तिथि वैशाख में कर दी। रवीन्द्र कुमार पुनः ब्रह्मचारी सूरजमल जी के पास गये और वैशाख की तिथि वैशाख शुक्ला ८ से १२, दिनाँक २८ अप्रैल से २ मई की तारीखें ले आये। मैंने इसे ही घोषित कर दिया। यद्यपि पहले मैंने पं. नाथूलाल जी (इंदौर) आदि कई एक जैन ज्योतिषाचार्य विद्वानों से परामर्श किया था, तब उन लोगों ने यही कहा था कि जैन धर्म में होलाष्टक माना ही नहीं है, अतः ‘वहम’ बेकार है। फिर भी आचार्यश्री के मन में विकल्प होने पर मैंने वह तिथि बदलकर आगे की घोषित कर दी।

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सनावद में ज्ञानज्योति-

सनावद मध्यप्रदेश, ब्र. मोतीचंद जैन की जन्मभूमि है। सन् १९६७ में यहाँ के चातुर्मास में मैंने जम्बूद्वीप रचना की रूपरेखा बनायी थी। यहीं से मोतीचन्द मेरे संघ से जुड़े थे और आज तक वे मेरे अनन्य भक्त हैं। वहाँ जन्मभूमि में मोतीचन्द ने कई बार मीटिंग करके त्रिदिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया था। इन तीनों दिनों में अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्री परिषद का अधिवेशन, दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान एवं मध्य प्रदेशीय दिगम्बर जैन महासभा के अधिवेशन हुए। समारोह में निर्मल कुमार जी सेठी, देवकुमार सिंह (इंदौर), श्री बाबूलाल जी पाटोदी आदि महानुभाव उपस्थित थे। डा. लालबहादुर शास्त्री (दिल्ली), पं. बाबूलाल जी जमादार (बड़ौत) आदि विद्वान् उपस्थित थे। प्रतिदिन प्रातः, मध्यान्ह एवं रात्रि में सभाएँ हुयीं।

१७ मई को प्रातः ८ बजे सनावद नगर में ज्ञानज्योति का स्वागतपूर्वक मंगल प्रवेश हुआ। स्वागत के समय ज्ञानज्योति के साथ १०१ मोटर साइकिलें झण्डे लिए हुए चल रही थीं। उस समारोह में बोलियों से तथा निर्माण हेतु सनावद में ८० हजार की आय हुई। सभी वक्ताओं ने ज्ञानज्योति से होने वाले धर्म-प्रचार एवं विशेष उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।

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ज्ञानज्योति प्रायोजित कार्यक्रम-

‘ज्ञानज्योति’ नाम से प्रायोजित कार्यक्रम ज्ञानज्योति प्रवर्तन से पूर्व ही मोरीगेट (दिल्ली) में जब मैं थी, तभी तैयार कराया गया था। इसका रेडियो से प्रसारण चार सप्ताह तक दिन शुक्रवार को रात्रि ९.४५ पर हुआ। इसमें जो सुमेरु पर्वत और जम्बूद्वीप वंदन के भजन हैं, ज्ञानज्योति के साथ टेपरेकार्डर में जब वे बजते थे, तब बालक क्या बड़े-बूढ़े भी उसे गुन-गुनाने लगते थे। यथा-‘मेरु सुदर्शन, करके दर्शन जन्म सफल हो जाये, जो तव महिमा को गाये.....।’ वैसे ही ‘‘जम्बूद्वीप महान् !!! जम्बूद्वीप महान् !’’