ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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08.ज्ञान मार्गणा अधिकार

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ज्ञान मार्गणा अधिकार

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अथ ज्ञानमार्गणाधिकार:

अथ चतुर्भिरन्तरस्थलैः पंचदशसूत्रैः ज्ञानमार्गणानाम सप्तमोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले मत्यज्ञानि-श्रुताज्ञानिनोः जघन्योत्कृष्टकालकथनत्वेन ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रषट्कं ।ततः परं द्वितीयस्थले विभंगज्ञानिनां कालनिरूपणत्वेन ‘‘विभंगणाणी’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् तृतीयस्थले मतिश्रुतावधिज्ञानिनां कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘आभिणि’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। पुनः चतुर्थस्थले मनःपर्ययकेवलज्ञानिनोः स्थिति-निरूपणत्वेन ‘‘मणपज्जव’’ इत्यादिसूत्रत्रयं इति समुदायपातनिका भवति।
इदानीं कुमतिकुश्रुतज्ञानिजीवानां कालप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
णाणाणुवादेण मदिअण्णाणी सुदअण्णाणी केवचिरं कालादो होदि ?।।१३२।।
अणादिओ अपज्जवसिदो।।१३३।।
अणादिओ सपज्जवसिदो।।१३४।।
सादिओ सपज्जवसिदो।।१३५।।
जो सो सादिओ सपज्जवसिदो तस्स इमो णिद्देसो जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१३६।।'
उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणं।।१३७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अनादिकालात् सर्वे जीवाः कुमतिकुश्रुतज्ञानिनः एव। अभव्यजीवापेक्षया अभव्यसमानभव्यापेक्षया वा इमे जीवा अनाद्यनन्तकालपर्यन्ताः संति। भव्यजीवापेक्षया केचिदनादयः सपर्यवसानाः केचित् सादयः सपर्यवसानाश्च। ज्ञानात् अज्ञानं गतभव्यजीवानाश्रित्य इमे सादयःसान्ताः भवन्ति।
यः कश्चिद् जीवः सादि: सान्तः सः सम्यक्त्वात् मिथ्यात्वं गत्वा मतिश्रुताज्ञाने प्रतिपद्य सर्वजघन्यकालमं-तर्मुहूर्तं स्थित्वा सम्यक्त्वं प्राप्य प्रतिपन्ने मतिश्रुतज्ञाने, तस्यैतत् जघन्यकालमन्तर्मुहूर्तं लभ्यते।
उत्कर्षेण देशोनं अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाणं-कश्चिदनादिमिथ्यादृष्टिः अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्य बहिः त्रीण्यपि करणानि कृत्वा पुद्गलपरिवर्तनस्यादिसमये उपशमसम्यक्त्वं गृहीत्वा आभिनिबोधिक-श्रुतज्ञाने प्रतिपद्य सर्वजघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा उपशमसम्यक्त्वे षडावलिकाः शेषाः संतीति सासादनं गत्वा मतिश्रुताज्ञानं आदिं कृत्वा मिथ्यात्वं गतः, पुनश्च पुद्गलपरिवर्तनस्याद्र्धं देशोनं परिभ्रम्य पश्चात् अन्तिमे भवे मतिश्रुतज्ञाने उत्पाद्य अन्तर्मुहूर्तेनाबंधकत्वं गतस्तस्य देशोनं अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनकालमुपलभ्यते।
एवं प्रथमस्थले कुमतिकुश्रुतज्ञानकालप्रतिपादनपरत्वेन सूत्रषट्कं गतं।
विभंगज्ञानिनां स्थितिनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
विभंगणाणी केवचिरं कालादो होदि ?।।१३८।।
जहण्णेण एगसमओ।।१३९।।
उक्कस्सेण तेत्तीस सागरोवमाणि देसूणाणि।।१४०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-जघन्येन-देवो नारको वा उपशमसम्यग्दृष्टिः उपशमसम्यक्त्वकाले एकसमया-वशेषे सासादनं गत्वा विभंगज्ञानेन सह एकसमयं स्थित्वा द्वितीयसमये मृतस्तस्य एकसमयो लभ्यते। उत्कर्षेण-कश्चित् तिर्यङ् मनुष्यो वा त्रयस्त्रिंशत्सागरायुःस्थितिकेषु सप्तमपृथिव्याः नारकेषु उत्पद्य षट्पर्याप्तीः समाप्य विभंगज्ञानी भूत्वा अंतर्मुहूर्तोनत्रयस्त्रिंशत्सागरायुःस्थितिपर्यंतं स्थित्वा निर्गतस्तस्य तदुत्कृष्टकालः उपलभ्यते ।
एवं द्वितीयस्थले विभंगज्ञानिनां कालनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।

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अथ ज्ञानमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब चार अन्तरस्थलों में पन्द्रह सूत्रों के द्वारा ज्ञानमार्गणा नाम का सातवाँ अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में कुमति और कुश्रुत ज्ञानियों के जघन्य और उत्कृष्टकाल का कथन करने वाले ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। उसके आगे द्वितीय स्थल में विभंगावधि ज्ञानियों का कालनिरूपण करने हेतु ‘‘विभंगणाणी’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीयस्थल में मति-श्रुत, अवधिज्ञानी जीवों का काल बतलाने वाले ‘‘आभिणि’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: चतुर्थ स्थल में मन:पर्यय और केवलज्ञानी भगवन्तों की स्थिति निरूपण करने वाले ‘‘मणपज्जव’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब कुमति-कुश्रुतज्ञानी जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

ज्ञानमार्गणानुसार जीव मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी कितने काल तक रहते हैं ?।।१३२।।

मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवों का काल अनादि-अनन्त है।।१३३।।

उक्त दोनों प्रकार के अज्ञानियों का काल अनादि-सान्त है।।१३४।।

उक्त दोनों प्रकार के अज्ञानियों का काल सादि-सान्त है।।१३५।।

जो वह सादि-सान्त काल है उसका निर्देश इस प्रकार है-जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल है।।१३६।।

उक्त जीव उत्कृष्ट से कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल तक मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी रहते हैं।।१३७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अनादिकाल से सभी जीव कुमति-कुश्रुत ज्ञानी ही हैं। अभव्य जीव की अपेक्षा अथवा अभव्य के समान भव्य जीव की अपेक्षा से ये जीव अनादि-अनन्त काल तक पाये जाते हैं। भव्यजीव की अपेक्षा कुछ जीव अनादि-सान्त होते हैं और कुछ सादि-सान्त होते हैं। ज्ञान से अज्ञान को प्राप्त हुए भव्य जीवों की अपेक्षा ये सादि-सान्त होते हैं।

जो कोई सादि-सान्त जीव हैं वह सम्यक्त्व से मिथ्यात्व को प्राप्त करके कुमति-कुश्रुत ज्ञान में जाकर वहाँ सर्व जघन्यकालस्वरूप अन्तर्मुहूर्त तक रहकर पुन: सम्यक्त्व प्राप्त करके मति-श्रुत ज्ञान में आ जाते हैं, उन जीवों के यह अन्तर्मुहूर्त प्रमाण जघन्यकाल पाया जाता है।

उत्कृष्ट से कुछ कम अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाणकाल को कहते हैं-

किसी अनादिमिथ्यादृष्टि जीव के अर्धपुद्गलपरिवर्तन काल के बाहिर तीनों ही करणों को करके पुद्गल परिवर्तन के प्रथम समय में उपशमसम्यक्त्व को ग्रहण कर आभिनिबोधक व श्रुतज्ञान को प्राप्त करके और सबसे जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर उपशमसम्यक्त्व में छह आवलियाँ शेष रहने पर सासादनसम्यक्त्व को प्राप्त होकर मति और श्रुत अज्ञान को आदि करके मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ पुन: कुछ कम अर्धपुद्गल- परिवर्तन काल तक भ्रमण करके पुन: अंतिम भव में मति एवं श्रुत ज्ञान को उत्पन्न कर अन्तर्मुहूर्त काल से अबंधक अवस्था को प्राप्त हुआ, उसके कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण काल पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में कुमति-कुश्रुतज्ञान के काल का प्रतिपादन करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब विभंगज्ञानी जीवों की स्थिति का निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं।-

सूत्रार्थ-

जीव विभंगज्ञानी कितने काल तक रहते हैं ?।।१३८।।

जघन्य से एक समय तक जीव विभंगज्ञानी रहते हैं।।१३९।।

उत्कृष्ट से कुछ कम तेतीस सागरोपम काल तक जीव विभंगज्ञानी रहते हैं।।१४०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जघन्य से-देव अथवा नारकी उपशमसम्यग्दृष्टि के उपशमसम्यक्त्व के काल में एक समय शेष रहने पर सासादनसम्यक्त्व को प्राप्त होकर और विभंगज्ञान के साथ एक समय रहकर द्वितीय समय में मृत्यु को प्राप्त होने पर उसके एक समय पाया जाता है। उत्कृष्ट से-कोई तिर्यंच अथवा मनुष्य तेंतीस सागरप्रमाण आयु वाले सप्तम पृथिवी के नारकियों में उत्पन्न होकर, वहाँ छहों पर्याप्तियों को पूर्णकर विभंगज्ञानी होकर अन्तर्मुहूर्त कम तेतीस सागरोपमप्रमाण आयु स्थिति तक रहकर वहाँ से निकले हुए तिर्यंच अथवा मनुष्य के वह सूत्रोक्त उत्कृष्ट काल पाया जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में विभंगज्ञानियों का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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इदानीं त्रिविधज्ञानिनां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

आभिणिबोहिय-सुद-ओहिणाणी केवचिरं कालादो होदि ?।।१४१।।

जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१४२।।
उक्कस्सेण छावट्ठिसागरोवमाणि सादिरेयाणि।।१४३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-जघन्यकालापेक्षया देवस्य नारकस्य वा मतिश्रुत-विभंगनामाज्ञानैः स्थितस्य सम्यक्त्वं गृहीत्वा उत्पादितस्य मतिश्रुतावधिज्ञानस्य तत्र जघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा मिथ्यात्वं गतस्य तद्दर्शनात्। उत्कर्षेण-देवस्य नारकस्य वा प्रतिपन्नोपशमसम्यक्त्वेन सह समुत्पन्नमतिश्रुतावधिज्ञानस्य वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपद्य अविनष्टत्रिज्ञानैः सह अन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा एतेनान्तर्मुहूर्तेनोनपूर्वकोट्यायुष्कमनुष्येषु उत्पद्य पुनः विंशतिसागरोपमिकेषु देवेषूत्पद्य पुनः पूर्वकोट्यायुष्केषु मनुष्येषूत्पद्य द्वाविंशतिसागरोपमस्थितिकेषु देवेषूत्पद्य पुन: पूर्वकोट्यायुष्केषु मनुष्येषूत्पद्य क्षायिकसम्यक्त्वं प्रारभ्य चतुर्विंशतिसागरोपमायुष्केषु देवेषु जन्म प्राप्य पुनरपि पूर्वकोट्यायुष्केषु मनुष्येषु उत्पन्नो भूत्वा स्तोकावशेषे जीविते केवलज्ञानी भूत्वा अबंधकत्वं गतस्य चतुर्भिः पूर्वकोटिभिः सातिरेकषट्षष्टिसागरोपमाणामुपलंभात्।
कश्चिदाह-वेदकसम्यक्त्वे षट्षष्टिसागरोपमाणि भ्रामयित्वा क्षायिकं प्रस्थाप्य त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमायुः-स्थितिकेषु देवेषूत्पाद्य अबंधकः किन्न कृतः ?
आचार्यः प्राह-नैतत् वक्तव्यं, सम्यक्त्वेन सह यदि संसारे सुष्ठु बहुकं कालं परिभ्रमति तर्हि चतुःपूर्वकोेटिभिः सातिरेकषट्षष्टिसागरोपमाणि चैव परिभ्रमितः इति व्याख्यानान्तरदर्शनार्थमुपदेशात्।
अंतर्मुहूर्ताधिकषट्षष्टिसागरोपमाणि किन्नोक्तानि ?
न, केवलवेदकसम्यक्त्वेन षट्षष्टिसागरोपमाणि संपूर्णानि परिभ्रम्य क्षायिकभावं गतस्य तदुपलंभात्।
एवं तृतीयस्थले त्रिविधज्ञानिनां कालनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम् ।
मनःपर्ययकेवलिनां कालनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
मणपज्जवणाणी केवलणाणी केवचिरं कालादो होंति ?।।१४४।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१४५।।
उक्कस्सेण पुव्वकोडी देसूणा।।१४६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-केनचिद् मुनिना परिणामप्रत्ययेन उत्पादितं मनःपर्ययज्ञानं, तेन सह सर्वजघन्यं कालं स्थित्वा असंयमं अबंधकभावं वा गतः तस्य एतत्काल उपलब्धः। एवमेव केनचित् संयतेन परिणामनिमित्तेन केवलज्ञानमुत्पादितं तत्र सर्व जघन्यकालं स्थित्वा अबंधकभावं गतः तस्यापि एतत्कालं जघन्यं कथ्यते।
उत्कर्षेण-किञ्चिन्न्यूनं पूर्वकोटिप्रमाणं।
कुतः ?
गर्भादारभ्याष्टवर्षैः संयमं प्रतिपद्य आभिनिबोधिक-श्रुतज्ञाने संप्राप्य अंतर्मुहूर्तेन मनःपर्ययज्ञानं उत्पाद्य पूर्वकोटिकालं विहृत्य देवेषूत्पन्नः तस्य देशोनं पूर्वकोटिकालं लभ्यते।
एवमेव कश्चित् जीवः देवेभ्यः नारकेभ्यो वागत्य पूर्वकोट्यायुष्केषु मनुष्येषु क्षायिकसम्यक्त्वेन सह उत्पद्य गर्भाद्यष्टवर्षैः संयमं प्रतिपद्यान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा केवलज्ञानं उत्पाद्य देशोनपूर्वकोटिकालं विहृत्य अबंधकत्वं गतः तस्योत्कृष्टं कालं दृश्यते।
तात्पर्यमेतत्-मिथ्यात्वं त्यक्त्वा सम्यक्त्वमाहात्म्येन सम्यक्चारित्रं परिपाल्य घोरं तपश्चरणं कृत्वा केवलज्ञानमुत्पादनीयं, एतदेव मनुष्यपर्यायस्य सारं, षट्खंडागमगंथस्वाध्यायस्य सारं चेति निश्चित्य प्रत्यहं केवलज्ञानस्य प्राप्त्यर्थमेव भावना भावयितव्या अस्माभिरिति।
एवं चतुर्थस्थले मनःपर्ययकेवलज्ञानिनोः कालप्रतिपादनपरत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धांतचिंतामणिटीकायां ज्ञानमार्गणानाम सप्तमोऽधिकारः समाप्तः।

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अब तीन प्रकार के ज्ञानियों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आभिनिबोधिक, श्रुत और अवधिज्ञानी जीव कितने काल तक रहते हैं।।१४१।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी एवं अवधिज्ञानी रहते हैं।।१४२।।

उत्कृष्ट से कुछ अधिक छ्यासठ सागरोपम काल तक जीव आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी एवं अवधिज्ञानी रहते हैं।।१४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जघन्य काल की अपेक्षा मति-श्रुत और विभंग नामक अज्ञानों के साथ स्थित देव अथवा नारकी के सम्यक्त्व को ग्रहण कर और मति, श्रुत एवं अवधिज्ञान को उत्पन्न करके उनमें जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर मिथ्यात्व को प्राप्त होने पर उक्त अन्तर्मुहूर्त काल देखा जाता है।

उत्कृष्ट से-देव अथवा नारकी के प्राप्त हुए उपशमसम्यक्त्व के साथ मति, श्रुत और अवधि ज्ञान को उत्पन्न करके, वेदक सम्यक्त्व को प्राप्तकर अविनष्ट तीनों ज्ञानों के साथ अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर इस अन्तर्मुहूर्त से हीन पूर्वकोटि आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न हुआ पुन: बीस सागरोप्रमाण आयु वाले देवों में उत्पन्न होकर पुन: पूर्वकोटि आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न होकर पुन: बाईस सागरोपम आयु वाले देवों में उत्पन्न होकर पुन: पूर्वकोटि आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न होकर, क्षायिकसम्यक्त्व का प्रारंभ करके, चौबीस सागरोपम आयुस्थिति वाले देवों में उत्पन्न होकर पुन: पूर्वकोटि आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न होकर, जीवन के थोड़ा शेष रहने पर केवलज्ञानी होकर अबंधक अवस्था को प्राप्त होने पर चार पूर्वकोटि अधिक छ्यासठ सागरोपम पाये जाते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि-वेदक सम्यक्त्व के साथ छ्यासठ सागरोपमप्रमाण काल तक घुमाकर और फिर क्षायिकसम्यक्त्व को प्रारंभ कर तेतीस सागरोपमप्रमाण आयु स्थिति वाले देवों में उत्पन्न कराकर अबंधक क्यों नहीं किया ?

तब आचार्य समाधान देते हैं कि-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि सम्यक्त्व के साथ यदि जीव संसार में बहुत काल तक भ्रमण करे तो चार पूर्वकोटियों से कुछ अधिक छ्यासठ सागरोपमप्रमाण काल तक ही भ्रमण करता है, ऐसा अन्य व्याख्यान दिखलाने के लिए वैसा उपदेश किया है।

शंका-अन्तर्मुहूर्त से अधिक छ्यासठ सागरोपम क्यों नहीं कहा है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि केवल वेदकसम्यक्त्व के साथ सम्पूर्ण छ्यासठ सागरोपम काल तक भ्रमण करके क्षायिकभाव को प्राप्त हुए जीव के अन्तर्मुहूर्त से अधिक छ्यासठ सागरोपम पाये जाते हैं।

इस प्रकार तृतीय स्थल में तीन प्रकार के ज्ञानियों का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब मन:पर्ययज्ञानी एवं केवलज्ञानियों का काल निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

मन: पर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।१४४।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त तक जीव मन:पर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी रहते हैं।।१४५।।

उत्कृष्ट से कुछ कम पूर्वकोटि वर्ष तक जीव मन:पर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी रहते हैं।।१४६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-किन्हीं दिगम्बर मुनिराज के परिणामों के निमित्त से उत्पन्न हुए मन:पर्यय ज्ञान के साथ सर्वजघन्य काल वहाँ स्थित रहकर वे जब असंयम अथवा अबंधक भाव को प्राप्त होते हैं तब उनके यह जघन्य काल पाया जाता है। इसी प्रकार जब कोई संयत मुनिराज परिणामों के निमित्त से केवलज्ञान को उत्पन्न कर लेते हैं और वहाँ सर्वजघन्य काल तक स्थित रहकर अबंधक भाव को प्राप्त हो जाते हैं उनके भी काल यह जघन्य कहा जाता है।

उत्कृष्ट से-यह किञ्चित् कम पूर्वकोटि प्रमाण काल होता है।

कैसे ?

क्योंकि गर्भ से लेकर आठ वर्ष के बाद संयम को प्राप्तकर आभिनिबोधिकज्ञान और श्रुतज्ञान को उत्पन्न कर अन्तर्मुहूर्त से मन:पर्ययज्ञान को उत्पन्न कर और पूर्वकोटि वर्ष तक विहार करके देवों में उत्पन्न हुए जीव के कुछ कम पूर्वकोटि काल पाया जाता है।

इसी प्रकार कोई जीव देवों या नारकियों में से आकर, पूर्वकोटि आयु वाले मनुष्यों में क्षायिक सम्यक्त्व के साथ उत्पन्न होकर गर्भ से लेकर आठ वर्षों में संयम को प्राप्तकर वहाँ अन्तर्मुहूर्त रहकर, केवलज्ञान उत्पन्नकर और कुछ कम पूर्वकोटि तक विहार करके अबंधक अवस्था को प्राप्त हुआ तो उस जीव के कुछ कम पूर्वकोटि काल देखा जाता है।

तात्पर्य यह है कि-मिथ्यात्व का त्याग करके सम्यक्त्व के माहात्म्य से सम्यक् चारित्र का परिपालन करके घोर तपश्चरण के द्वारा केवलज्ञान को उत्पन्न करना चाहिए यही मनुष्य पर्याय का सार है और यही षट्खण्डागम के स्वाध्याय का सार है ऐसा निश्चित करके हम सभी को प्रतिक्षण केवलज्ञान की प्राप्ति करने हेतु ही भावना भानी चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में मन:पर्यय और केवलज्ञानियों का काल प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रक बंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में ज्ञानमार्गणा नामका सप्तम अधिकार समाप्त हुआ।