ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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08.संयममार्गणाधिकार

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विषय सूची

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संयममार्गणाधिकार

अथ संयममार्गणाधिकार:

अथ स्थलत्रयेण दशभिः सूत्रैः संयममार्गणाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्यसंयत-सामायिकच्छेदोपस्थापन-परिहारशुद्धिसंयत-संयतासंयतानामन्तरप्रतिपादनार्थं ‘‘संजमाणुवादेण’’ इत्यादि-सूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले सूक्ष्मसांपराय-यथाख्यातशुद्धिसंयतानामन्तरप्ररूपणत्वेन ‘‘सुहुम-’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनु तृतीयस्थले असंयतजीवानामंतरप्रतिपादनपरत्वेन ‘‘असंजदाणं’’ इत्यादिसूत्रत्रयमिति समुदायपातनिका।
इदानीं सामान्यसंयत-सामायिकच्छेदोपस्थापन-परिहारशुद्धिसंयत-संयतासंयतानामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
संजमाणुवादेण संजद-सामाइय-छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजद-परिहारसुद्धि-संजद-संजदासंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१०८।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१०९।।
उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणं।।११०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमो वर्तते। विवक्षितसंयमे स्थितः कश्चिद् जीवः असंयमं गत्वा पुनः विवक्षितसंयमे जघन्यकालेनान्तर्मुहूर्तेन आगतः, तस्य जघन्यान्तरं । सामायिक-छेदोपस्थापनसंयतः उपशमश्रेणिं चटित्वा सूक्ष्मसांपराय-यथाख्यातसंयमेषु गत्वान्तरं प्राप्य पुनोऽधः अवतीर्य सामायिक-छेदोपस्थापनसंयमेषु प्रविष्टस्तस्य जघन्यांतरं। परिहारश्ुाद्धिसंयमात् सामायिक-छेदोपस्थापनशुद्धिसंयमं गृहीत्वा जघन्येनान्तर्मुहूर्तेण पुनः परिहारशुद्धिसंयममागतस्य जघन्यान्तरं ज्ञातव्यं।
उत्कर्षेण-अनादिमिथ्यादृष्टिः कश्चिद् जीवः अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्यादिसमये प्रथमसम्यक्त्वं संयमं च युगपद् गृहीत्वान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा मिथ्यात्वं गत्वान्तरं प्राप्य उपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनं भ्रमित्वा पुनोऽन्तर्मुहूर्तावशेषे संसारे संयमं प्रतिपद्य अंतरं समानीयान्तर्मुहूर्तं स्थित्वाऽबंधकत्वं गतस्तस्योपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनमात्रान्तर-मुपलभ्यते। परिहारशुद्धिसंयमे तु वर्षपृथक्त्वेन विना एतत्संयमग्रहणाभावात् अंतरेऽपि एष नियमो ज्ञातव्यः१।
संयतासंयतस्यापि अवसाने त्रीण्यपि करणानि कृत्वोपशमसम्यक्त्वं संयमासंयमं च गृहीतप्रथमसमयेऽन्तरं समानीयान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा संयमं गृहीत्वा अबंधकत्वं गतः इति वक्तव्यं ।
एवं प्रथमस्थले सामान्यसंयमादीनामन्तरकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
अधुना सूक्ष्मसांपराय-यथाख्यातसंयतानामन्तरप्रतिपादनार्थं सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
सुहुमसांपराइसुद्धिसंजद-जहाक्खादविहारसुद्धिसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१११।।
उवसमं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।११२।।
उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणं।।११३।।
खवगं पडुच्च णत्थि अंतरं णिरंतरं।।११४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिन्महामुनिः उपशमश्रेण्यामारोहमाणः सूक्ष्मसांपरायिकसंयतः उपशान्तकषायो भूत्वा यथाख्यातसंयमेन अंतरं प्राप्य पुनः सूक्ष्मसांपरायिकसंयते पतितस्तस्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तकालं लभ्यते। तथैव यथाख्यातसंयमात् अधोऽवतीर्य कश्चित् साधुः तत्र जघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा पुनः क्रमेणोपरि चटित्वा उपशांतकषायो वीतरागछद्मस्थो भूत्वा यथाख्यातसंयमं गतस्तस्यैतत्काल उपलभ्यते।
उत्कर्षेण-कश्चिदनादिमिथ्यादृष्टिः त्रीण्यपि करणानि कृत्वा अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्यादिसमये प्रथमसम्यक्त्वं संयमं च युगपद् गृहीत्वान्तर्मुहूर्तेण सर्वजघन्येनोपशमश्रेणिं चटित्वा सूक्ष्मसांपरायिको जातः तत्र जघन्यान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा उपशान्तकषायो भूत्वा पुनः सूक्ष्मसांपरायिकशुद्धिसंयतो बभूव, स एव मुनिः तस्य प्रथमसमये यथाख्यातशुद्धिसंयमस्यान्तरं आदिं कृत्वा पुनरन्तर्मुहूर्तेण अनिवृत्तिकरणगुणस्थाने निपत्य सामायिकच्छेदोप-स्थापनसंयमयोः पतितप्रथमसमये सूक्ष्मसांपरायिकशुद्धिसंयमान्तरस्यादिं कृत्वा क्रमेणाधोऽवतीर्य उपाद्र्धपुद्गल-परिवर्तनं भ्रमित्वावसाने सम्यक्त्वं संयमं च गृहीत्वोपशमश्रेणिं चटित्वा सूक्ष्मसांपरायिकः उपशान्तकषायश्च भूत्वा सूक्ष्मसांपरायिकशुद्धिसंयतः पुनः भूत्वा क्रमेण द्वे अंतरे समानीयाधोऽवतीर्य पुनः क्षपकश्रेणिं चटित्वाबंधकत्वं गतस्योपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्यान्तरमुपलभ्यते।
क्षपकश्रेण्यां जघन्योत्कृष्टयोद्र्वयोरन्तरालयोः परिसमाप्तिः किन्न कृता ?
न, अत्रोपशामकानामधिकारोऽस्ति।
क्षपकं प्रतीत्य नास्त्यन्तरं, निरन्तरंं। किच-क्षपकाणां पुनः आगमनाभावात्।
एवं तृतीयस्थले सूक्ष्मसांपरायिक-यथाख्यातशुद्धिसंयतानामन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
संप्रति असंयतानामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
असंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।११५।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।११६।।
उक्कस्सेण पुव्वकोडी देसूणं।।११७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिदसंयतः संयमं संप्राप्य जघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा पुनः असंयमं गतस्तस्य जघन्यकाल उपलभ्यते। उत्कर्षेण-कश्चित् संज्ञी पंचेन्द्रियः सम्मूचछमः पर्याप्तजीवः षड्भिः पर्याप्तिभिः पर्याप्तको भूत्वा विश्रम्य विशुद्धो भूत्वा संयमासंयमं गृहीत्वान्तरं कृत्वा देशोनपूर्वकोटिप्रमाणं जीवितः सन् अनंतरं कालं कृत्वा देवेषूत्पन्नप्रथमसमये असंयतो भूत्वान्तरं समानीतं, तस्यान्तर्मुहूर्तोनपूर्वकोटिमात्रान्तरं उपलभ्यते।
अस्या मार्गणायाः अयमभिप्रायः ज्ञातव्यः-यदयं संयमो महान् दुर्लभोऽस्ति अतएव-
मानुष्यं प्राप्य पुण्यात्प्रशममुपगता रोगवद्भोगजालं ।
मत्वा गत्वा वनान्तं दृशि विदि चरणे ये स्थिताः संगमुक्ताः।।
कःस्तोता वाक्पथातिक्रमणपटुगुणैराश्रितानां मुनीनां।
स्तोतव्यास्ते महद्भिर्भुवि य इह तदंघ्रिद्वये भक्तिभाजः।।७१।।
संप्रति अस्मिन् दुःषमे काले एतादृशो मुनयो न सन्ति, ये केचित् संति न ते भावलिंगिनः इति ये कथयन्ति तेषां कृते आचार्याः श्रीपद्मनन्दिदेवाः बु्रवन्ति-
संप्रत्यस्ति न केवली किल कलौ त्रैलोक्यचूडामणिः।
तद्वाचः परमासतेऽत्र भरतक्षेत्रे जगद्द्योतिकाः।।
सद्रत्नत्रयधारिणो यतिवरास्तेषां समालंबनं ।
तत्पूजा जिनवाचि पूजनमतः साक्षाज्जिनः पूजितः।।६८।।
एतज्ज्ञात्वा अद्य कालेऽपि भावलिंगिदिगंबरा विचरन्ति तेषां उपासना कर्तव्या तथैव जिनागमानामपि भक्तिः पूजा आराधना स्वाध्यायादयश्च विधातव्या निरन्तरमिति। यावदसंयतावस्था वर्तेत पुनश्च स्वयमपि जैनेश्वरीं दीक्षां समादाय मोक्षपुरूषार्थे प्रयत्नः कर्तव्यः।
एवं चतुर्थस्थले असंयतानामन्तरनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया अन्तरानुगमे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां संयममार्गणानामाष्टमोऽधिकारः समाप्तः।


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अथ संयममार्गणा अधिकार

अब तीन स्थलों में दश सूत्रों के द्वारा संयम मार्गणा नाम का आठवाँ अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य संयत, सामायिक-छेदोपस्थापना-परिहारविशुद्धिसंयत-संयतासंयत और असंयत जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले ‘‘संजमाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में सूक्ष्मसांपराय और यथाख्यातशुद्धि संयतों का अन्तर प्ररूपण करने हेतु ‘‘सुहुम’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। पुन: तृतीय स्थल में असंयत जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने के लिए ‘‘असंजदाणं’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्र की समुदायपातनिका हुई।

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अब यहाँ पर सामान्य संयत, सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धिसंयत एवं संयतासंयतों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

संयममार्गणानुसार संयत, सामायिक व छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयत, परिहारविशुद्धि-संयत और संयतासंयत जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१०८।।

संयत आदि उक्त संयमी जीवोेंं का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होता है।।१०९।।

संयत आदि उक्त संयमी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण होता है।।११०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। विवक्षित संयम में स्थित किसी जीव को असंयम में ले जाकर जघन्य काल में पुन: विवक्षित संयम में लाने पर उस संयम का उक्त जघन्य अन्तर प्राप्त होता है, केवल विशेषता यह है कि सामायिक व छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयत जीव के उपशम श्रेणी पर चढ़कर सूक्ष्मसाम्पराय व यथाख्यात संयमों के द्वारा अन्तर देकर पुन: श्रेणी से नीचे उतरने पर सामायिक व छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयमों में आने पर उन दोनों संयमों का जघन्य अन्तर होता है तथा परिहारशुद्धिसंयम से सामायिक व छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयम में ले जाकर अन्तर्मुहूर्त काल से पुन: परिहारशुद्धिसंयम में आये हुए जीव के परिहारशुद्धिसंयम का जघन्य अन्तर जानना चाहिए।

उत्कृष्ट से-अनादिमिथ्यादृष्टि कोई जीव अर्धपुद्गलपरिवर्तन के आदि समय में प्रथम सम्यक्त्व एवं संयम दोनों को एक साथ ग्रहण करके वहाँ अन्तर्मुहूर्त स्थित रहकर मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त करके उपार्ध पुद्गल परिवर्तन भ्रमण करके पुन: अन्तर्मुहूर्त अवशेष रहे। संसार में संयम को प्राप्त करके अन्तर को प्राप्त करके वहाँ अन्तर्मुहूर्त स्थित रहकर अबन्धकपने को प्राप्त हुआ उसके उपार्ध पुद्गलपरिवर्तन मात्र अन्तर प्राप्त हुआ। परिहारविशुद्धि संयम में तो वर्षपृथक्त्व के बिना इस संयम के ग्रहण का अभाव पाया जाता है इसलिए अन्तर में भी यही नियम जानना चाहिए। संयतासंयत जीव के भी अवसान-अन्त में तीनों ही करणों को करके उपशम सम्यक्त्व व संयमासंयम को ग्रहण करने के प्रथम समय में ही अन्तरकाल समाप्त करके वहाँ अन्तर्मुहूर्त रहकर संयम ग्रहण करके पुन: अबंधकपना प्राप्त होता है, ऐसा जानना चाहिए। इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य संयम आदि का अन्तर बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुूए।

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अब सूक्ष्मसांपराय-यथाख्यात संयतों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयतों और यथाख्यातविहारशुद्धिसंयतों का अन्तर कितने काल प्रमाण होता है ?।।१११।।

उपशम की अपेक्षा सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यातशुद्धिसंयतों के जघन्य अन्तर काल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होता है।।११२।

सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यातशुद्धिसंयतोेंं का उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है।।११३।।

क्षपक की अपेक्षा सूक्ष्मसाम्परायिक और यथाख्यातविहारशुद्धिसंयतों का अन्तर नहीं होता है, वे निरन्तर हैं।।११४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशम श्रेणी चढ़ते हुए कोई महामुनि जो सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान से उपशांतकषाय होकर यथाख्यात संयम को प्राप्त करके अन्तर को प्राप्त हुआ। पुन: सूक्ष्मसाम्परायसंयम में आया, पुन: सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयम में गिरने पर उनके अन्तर्मुहूर्तमात्र अन्तरकाल पाया जाता है इस प्रकार यथाख्यात संयम से नीचे गिरकर जघन्य से अन्तर्मुहूर्तमात्र रहकर पुन: क्रम से ऊपर चढ़कर उपशांतकषाय होकर यथाख्यात संयम ग्रहण करने वाले जीव के यथाख्यात संयम का अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य अन्तर पाया जाता है। उत्कृष्ट से-कोई अनादिमिथ्यादृष्टि जीव तीनों ही करण करके अर्धपुद्गलपरिवर्तन के आदि संयम में प्रथमोपशमसम्यक्त्व और संयम को एक साथ ग्रहण कर सबसे कम अन्तर्मुहूर्त काल से उपशमश्रेणी पर चढ़कर सूक्ष्मसाम्परायिक हुआ और वहाँ जघन्य से अन्तर्मुहूर्तमात्र रहकर उपशांतकषाय हो गया। पश्चात् पुन: सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत हो गया। उसने प्रथम समय में ही यथाख्यात शुद्धिसंयम का अन्तर प्रारंभ किया। पुन: अन्तर्मुहूर्तकाल से अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में गिरकर सामायिक व छेदोपस्थापनाशुद्धि संयमों में गिरने के प्रथम समय में सूक्ष्मसाम्परायिक शुद्धिसंयम का अन्तर प्रारंभ किया। फिर क्रम से नीचे उतरकर उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल तक भ्रमण कर अन्त में सम्यक्त्व और संयम को एक साथ ग्रहण कर उपशमश्रेणी पर चढ़कर तथा सूक्ष्मसाम्परायिक और उपशांत कषाय होकर पुन: सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत होकर क्रम से दोनों अन्तरकालों को समाप्त कर नीचे उतरकर पुन: क्षपकश्रेणी पर चढ़ा और अबंधक भाव को प्राप्त हो गया। ऐसे जीव के सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यातशुद्धिसंयम का उपार्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर पाया जाता है।

शंका-क्षपकश्रेणी में जघन्य और उत्कृष्ट इन दोनों अन्तरों की परिसमाप्ति क्यों नहीं की है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि यहाँ उपशामकों का अधिकार है।

‘क्षपक की अपेक्षा कोई अन्तर नहीं है, निरंतर नहीं है, क्योंकि क्षपक श्रेणी वाले पुन: लौटकर नहीं आते हैं।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सूक्ष्मसाम्परायिक, यथाख्यातशुद्धि संयतों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

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अब असंयत जीवों का अन्तर बतलाने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

असंयतों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।११५।।

असंयतों का जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्तमात्र है।।११६।।

असंयतों का उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम पूर्वकोटि होता है।।११७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई असंयत जीव संयम ग्रहण कर वहाँ जघन्य से अन्तर्मुहूर्तकाल तक रहकर पुन: असंयम को प्राप्त होता है तो उसके अन्तर्मुहूर्त मात्र अन्तर प्राप्त होता है। उत्कृष्टरूप से-किसी संज्ञी पंचेन्द्रिय सम्मूच्र्छिम पर्याप्त जीव ने छहों पर्याप्तियों से पूर्ण होकर विश्राम ले, विशुद्ध हो, संयमासंयम ग्रहणकर असंयत का अन्तर प्रारंभ किया और कुछ कम पूर्वकोटि काल जीकर पुन: मरणकर देवों में उत्पन्न होने के प्रथम समय में असंयत होकर अन्तर समाप्त किया अर्थात् असंयम भाव ग्रहण किया। ऐसे जीव के असंयम का अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि प्रमाण अन्तरकाल पाया जाता है।

इस मार्गणा का अभिप्राय यह जानना चाहिए कि यह संयम महान् दुर्लभ है, इसलिए-

श्लोकार्थ-पुण्ययोग से मनुष्यभव को पाकर तथा शान्ति को प्राप्त होकर और भोगों को रोग तुल्य जानकर तथा वन में जाकर समस्त परिग्रह से रहित होकर जो यतीश्वर सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र में स्थित होते हैं, वचनागोचर गुणों से सहित उन मुनियों की प्रथम तो कोई स्तुति का करने वाला ही नहीं मिलता है, यदि कोई स्तुति कर भी सके तो वे ही पुरुष उनकी स्तुति कर सकते हैं, जो उन मुनियों के चरण कमलों की आराधना करने वाले महात्मा पुरुष हैं।।७१।।

आज इस दु:षमकाल में इस प्रकार के मुनि नहीं है और जो मुनि हैं वे भावलिंगी नहीं हैं, ऐसा जो लोग कहते हैं उनके प्रति आचार्य श्री पद्मनंदिदेव कहते हैं कि-

श्लोकार्थ-यद्यपि इस समय इस कलिकाल में तीन लोक के चूड़ामणि केवली भगवान विराजमान नहीं है, तो भी इस भरतक्षेत्र में समस्त जगत को प्रकाशित करने वाली उन केवली भगवान की वाणी मौजूद है तथा उन वचनों के आधार श्रेष्ठ रत्नत्रय के धारी मुनि हैं इसलिए उन मुनियों की पूजन तो सरस्वती की पूजन है तथा सरस्वती की पूजन साक्षात् केवली भगवान की पूजन है, ऐसा भव्य जीवों को समझना चाहिए।।६८।।

ऐसा जानकर आज इस पंचमकाल में भी भावलिंगी दिगम्बर मुनिराज विचरण करते हैं उनकी उपासना करना चाहिए, इसी प्रकार से जिनागम की भी पूजा-भक्ति-आराधना और स्वाध्याय आदि निरन्तर करना चाहिए। जब तक असंयत अवस्था में रहें तब तक तो भक्ति आदि करें, पुनश्च स्वयं भी जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण करके मोक्षपुरुषार्थ का प्रयत्न करना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में असंयतों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में संयममार्गणा नाम का आठवाँ अधिकार समाप्त हुआ।