ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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08.सुभौम चक्रवर्ती

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सुभौम चक्रवर्ती

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हस्तिनापुर नगर में कौरववंशी कार्तवीर्य नाम का राजा था, उसने कामधेनु के लोभ में जमदग्नि नामक तपस्वी को मार डाला। जमदग्नि का लड़का परशुराम था। यह भी बड़ा बलवान था अत: उसने व्रुद्ध होकर पिता को मारने वाले कार्तवीर्य को मार डाला तथा अनेकों क्षत्रियों को भी मार डाला। उस समय कार्तवीर्य राजा की तारा नाम की रानी गर्भवती थी, वह गुप्तरूप से कौशिक ऋषि के आश्रम में जा पहुँची, वहाँ उसने क्षत्रियों के त्रास को नष्ट करने वाले आठवें चक्रवर्ती को जन्म दिया। चूँकि वह पुत्र भूमिगृह-तलघर में उत्पन्न हुआ था इसलिए ‘सुभौम’ इस नाम से पुकारा जाने लगा। इधर वह बालक गुप्तरूप से ऋषि के आश्रम में बढ़ रहा था, उधर परशुराम के यहाँ अशुभ सूचक उत्पात होने से निमित्तज्ञानियों ने बतलाया कि तुम्हारा शत्रु उत्पन्न हो गया है। उसके जानने का उपाय यह है कि ‘‘तुम्हारे द्वारा मारे गये क्षत्रियों की दाढ़ें जिसके भोजन करते समय खीररूप में परिणत हो जायें, वही तुम्हारा शत्रु है।’’

यह सुनकर परशुराम ने शीघ्र ही एक दानशाला खुलवाई और वहीं मध्य में क्षत्रियों की दाढ़ों से भरा हुआ पात्र रखकर वहाँ विद्वान आदमी नियुक्त कर दिया। जब सुभौम को इस बात का पता लगा तब वह शीघ्र ही वहाँ पहुँचकर भोजनशाला में खाने के लिए बैठ गया। ब्राह्मण के अग्रासन पर बैठे हुए कुमार सुभौम के आगे दाढ़ों का पात्र रखा गया और उसके प्रभाव से समस्त दाढ़ें खीररूप परिणत हो गर्इं। यह सूचना शीघ्र ही परशुराम को दी गई और वह अपना फरसा लेकर शीघ्र उसे मारने आ गया। उस समय सुभौम के पुण्य से वह थाली चक्ररत्न बन गई। उसने उसी चक्र से शीघ्र ही परशुराम को मार गिराया। वह सुभौम चक्रवर्ती अष्टम चक्री के रूप में प्रगट हो गया। चौदह रत्न, नव निधियाँ और बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा उसकी सेवा करने लगे। शठ के प्रति शठता दिखाने वाले उस चक्रवर्ती ने क्रोधयुक्त हो चक्ररत्न से इक्कीस बार पृथ्वी को ब्राह्मण रहित कर दिया। चक्रवर्ती सुभौम साठ हजार वर्ष तक जीवित रहा परन्तु तृप्ति को प्राप्त नहीं हुआ इसलिए आयु के अन्त में मरकर नरक गया।

उत्तरपुराण में सुभौम चक्रवर्ती का कथानक कुछ विशेष है यथा-राजा सहस्रबाहु की रानी चित्रमती थी। वह चित्रमती कन्याकुब्ज देश के राजा ‘पारत’ की पुत्री थी। इनके कृतवीर (कार्तवीर्य) नाम का पुत्र हुआ। इसी से संबंधित एक कथा और है-

राजा सहस्रबाहु के काका शतबिन्दु से उनकी श्रीमती स्त्री के जमदग्नि नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। यह श्रीमती (जमदग्नि की माँ) चित्रमती के पिता राजा पारत की बहन थी। कुमारावस्था में माँ के मर जाने से जमदग्नि तापस हो गया और पंचाग्नि तप तपने लगा।

किसी समय एक सौधर्म स्वर्ग का देव और एक ज्योतिषी देव दोनों मिले, आपस में सम्यक्त्व-मिथ्यात्व की चर्चा करने लगे। स्वर्ग के देव ने कहा कि मिथ्यात्व के कारण जीव अनंत संसार में परिभ्रमण करता है। दोनों ही चर्चा के अनन्तर एक-दूसरे के धर्म की परीक्षा के लिए वहाँ आये और जहाँ यह जमदग्नि तप कर रहा था, वहाँ चिड़ा-चिड़ी का रूप बनाकर उस साधु की दाड़ी में रहने लगे। एक दिन चिड़ा किसी चिड़ी के विवाह में जाने लगा तब चिड़ी ने कहा कि वापस आने के लिए कुछ शपथ करके जाओ। उत्तर में चिड़ा बोला कि इस तापस की जो गति होगी, उसको छोड़कर तू चाहे जो शपथ करवा ले। बस, यह सुनते ही जमदग्नि एकदम क्रोधित हो इनको मारने लगा, तब वे दोनों उड़कर सामने के पेड़ पर जा बैठे। तब उसने इन्हें कुछ विशेष समझकर पूछा कि ‘मेरे कठिन तप से होने वाली भावी गति को तुमने क्यों नहीं पसंद किया?’’ उत्तर में चिड़ा ने कहा-अरे! ‘अपुत्रस्य कुतो गति:’ पुत्ररहित मनुष्य की कोई गति नहीं होती, ऐसा वेदवाक्य है फिर आप बालब्रह्मचारी रहकर क्यों तप कर रहे हो? ऐसे वचन सुनकर वह अज्ञानी तापसी विषयासक्त हो गया। आचार्य कहते हैं कि जब अनादिकाल से मनुष्य की विषयों में होने वाली बुद्धि बड़ी मुश्किल से गुरु के उपदेश से हटाई जाती है तब यदि गुरु उपदेश ही विषयों का पोषक मिल जाये, फिर क्या पूछना?

वह तापस सीधे अपने मामा राजा पारत के पास आया और कन्या की याचना करने लगा। राजा बहुत ही दु:खी हुए फिर भी साधु के शाप दे देने के डर से उन्होंने कहा-मेरी सौ पुत्रियों में तुम्हें जो चाहे, उसे ले जाओ। उस तापस के अधजले मुरदे जैसे विरूप को देखकर सब कन्याएँ भाग गर्इं। तब उस तापस ने धूलि में खेलती हुई एक कन्या को केला दिखाकर कहा-क्या तू मुझे चाहेगी? उस बालिका ने ‘हाँ’ कहकर केला ले लिया। बस तापस उसे गोद में लेकर गया और उसे बड़ी कर उससे विवाह कर लिया।

उस समय लोग उसकी अज्ञानता को धिक्कारते थे। तभी से ऋषि आश्रम में पत्नी सहित रहने की कुप्रथा चल पड़ी। उन जमदग्नि और रेणुका से इन्द्र (परशुराम) और श्वेतराम ऐसे दो पुत्र उत्पन्न हुए।

कुछ दिन बाद अिंरजय नाम के एक साधु रेणुका के जो बड़े भाई थे, वे वहाँ आये। रेणुका ने उनकी बड़ी भक्ति की। भाई! ‘आपने हमें विवाह में कुछ नहीं दिया, अब कुछ दीजिए’ ऐसी याचना करने में मुनि ने ‘कामधेनु’ नाम की विद्या और मंत्र सहित फरसा ये दो चीजें दे दीं। किसी दिन उस वन में सहस्रबाहु राजा कृतवीर के साथ आये। उनका सत्कार करके रेणुका ने ‘कामधेनु’ से उत्पन्न हुई खीर का भोजन कराया। कृतवीर ने अपनी माँ की छोटी बहन रेणुका से पूछा-ऐसा भोजन राजाओं के यहाँ दुर्लभ है सो यहाँ वन में तुम्हारे यहाँ कैसे आया? उत्तर में रेणुका ने मुनि द्वारा प्रसाद में प्राप्त कामधेनु विद्या बता दी। कृतघ्नी कृतवीर ने उसे मांगा। जमदग्नि के नहीं देने पर उसने उस साधु को मारकर वह कामधेनु ले ली और अपने नगर आ गये।

वन से कुश लेकर आकर दोनों ऋषियों ने जब माता का रूदन और पिता का निधन देखा तब वे कुपित हो मंत्रित फरसा लेकर गये और राजा सहस्रबाहु तथा कृतवीर को मार दिया। रानी चित्रमती गर्भवती थी। उसके भाई शांडिल्य नामक तापस ने इस घटना को देख बहन को अज्ञातरूप से ले जाकर किन्हीं मुनि के समीप उसे बिठा दिया। उसके पुत्ररत्न का जन्म हुआ, तब वनदेवता ने भावी चक्रवर्ती जानकर उसके पुण्य से उस बालक की रक्षा की। रानी के प्रश्न करने पर मुनि ने कहा-हे अम्ब! यह बालक सोलहवें वर्ष में चक्रवर्ती होगा, तू भय मत कर।

तापस शांडिल्य, चित्रमती को पुत्र सहित अपने स्थान पर ले गया और सुभौम नाम रखा। इधर परशुराम, श्वेतराम दोनों ऋषिपुत्र इक्कीस बार क्षत्रियों का वंश निर्मूल करके सुख से राज्य कर रहे थे। निमित्तज्ञानी द्वारा बताने पर शत्रु का निर्णय करने के लिए दानशाला में मरे हुए क्षत्रियों के दांत (दाढ़ें) पात्र में रखा दीं। ये सुभौम वहाँ दानशाला में पहुँचे। वे दांत शालि चावल बन गये, तब परशुराम आया। उसी समय सुभौम के पुण्य से चक्ररत्न प्रगट हो गया। कुमार ने उससे ब्राह्मण को मार डाला। इस आठवें चक्रवर्ती की हजार वर्ष की आयु थी। अट्ठाईस धनुष (११२ हाथ) ऊँचा शरीर था। यह छह खण्ड का अधिपति हो गया।

किसी दिन रसोईये ने सुभौम को रसायना नाम की ‘कढ़ी’ परौसी, सुभौम राजा ने उसके नाम से चिढ़कर उसे दण्डित किया, जिससे वह मरकर ज्योतिष्क देव हो गया। कुअवधि से यहाँ आकर व्यापारी के वेष में राजा को अच्छे-अच्छे फल देने लगा। रसना इन्द्रिय लंपट राजा भी उसमें आसक्त हो गया, तब एक दिन यह कपट से राजा को समुद्र के मध्य में ले गया और वेष प्रगट कर बदला चुकाने के लिए मारने को उद्यत हुआ। आराधना कथाकोश में बताया है कि जब तक सुभौम वहाँ ‘णमोकार’ मंत्र जपता रहा, तब तक देव उसे मार नहीं सका। तब उसने कपट से कहा-राजन्! यदि आप अपने मंत्र को लिखकर मिटा देंगे (छोड़ देंगे) तब मैं आपको जीवित छोड़ दूँगा अन्यथा मार दूँगा। प्राणों के लोभ से राजा ने मंत्र की अवहेलना कर दी। बस, देव ने उसे मार दिया। वह मिथ्यात्व से मरकर नरक चला गया। देखो! जो मंत्र रक्षक था, राजा ने उसे ही जब छोड़ दिया, तब उसकी रक्षा कैसे होती? इसलिए बुद्धिमानों को संकट में धर्म की ही शरण लेना चाहिए, धर्म को छोड़ना नहीं चाहिए।

अरनाथ तीर्थंकर के बाद दो सौ करोड़ वर्षों के बीत जाने पर उन्हीं के तीर्थ में ये सुभौम चक्रवर्ती हुए हैं।