ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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08. भ्रान्त पथिक का भाग्य

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भ्रान्त पथिक का भाग्य

(काव्य दस से सम्बन्धित कथा)
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अन्धकूप में पड़े हुए सेठ जी अपने अमूल्य जीवन की अन्तिम घड़ियाँ गिन ही रहे थे कि एकाएक छम...छम...छमा छम की मनोमुग्धकारी सुरीली ध्वनि से वे सिहर उठे।

स्त्री वेद की भावना से नहीं; अपने उद्धार की कल्याणमयी कामना से।प्रश्न है कि एकान्त में स्त्री की कल्पना ही वासित होकर जब पुरूष में सिहरन पैदा कर देती है तो सेठ जी को क्यों उस प्रकार की सिहरन न हुई? इस प्रश्न का हल एक अन्य प्रश्न खड़ा कर देने से सुगमता पूर्वक हो जायेगा!

वह प्रश्न है - क्या वासना की उत्पत्ति मौत के मुँह में जाते समय भी संभाव्य है?...फिर वह स्त्री एक सामान्य मत्र्यलोक की नारी तो थी नहीं-साक्षात् लक्ष्मी रूप धारिणी रोहणी थी। जो महाप्रभावक श्री भक्तामर जी के दशवें काव्य में आहत होकर उस निर्धन श्रीदत्त सेठ को लक्ष्मीपति बनाने आई थी। मानो ‘‘तुल्या भवन्ति भवतो ननु’’—शब्दों की मूर्तिमती श्रद्धा ही सामने समुपस्थित होकर श्री जिनेन्द्रदेव के इस पुरातन साम्यवाद सिद्धान्त पर सेठ जी के हस्ताक्षर लेने आई हो।

आज भी एक साम्यवाद है,जो केवल अपनी अदृश्य रूप रेखाओं से ही हमारे मन को मृग-तृष्णा की छलना के समान मुग्ध करता है। प्रयोगात्मक नाम की कोई वस्तु सचमुच उसमें है ही नहीं।

हाँ, तो देवी को देखते ही सेठ जी तपाक से बोले-‘‘हे देव बाले! मुझे इस अन्ध-कूप से निकालने की महती कृपा कीजिए।’’ देवी आश्चर्य में थी, कि आखिर मामला क्या है? कुछ ही समय पूर्व तो इन्हीं सेठ जी को उसने विकराल सिंह के मुख में जाने से बचाया था और अब पुनः विपत्ति में फस गये।एक से पिण्ड छूटा तो दूसरी बुरी बला सिर पर सवार! ‘छिद्रेष्वनर्था बहुली भवन्ति’-अस्तु-कारण तो पूछना ही पड़ेगा-कि कैसे वह इस भयानक अंध कूप में आ गिरे। जिज्ञासु भाव से बोली- ‘‘क्या आप राह तो नहीं भटक गए थे सेट जी ?’’

‘‘जी हाँ, लोभ के वशीभूत होकर मैं अपनी राह भूल गया। लालच के कारण मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई।परदेश से सामग्री लेकर सीधे घर की ओर जा रहा था कि रास्ते में श्री जिन मन्दिर दिखाई दिया और उसी के समीप पाश्र्व में दिखाई दिया एक वैष्णव जोगी-जराजूट धारी। जोगी एक तुम्बी के रस को निकाल कर जन समूह को बाँट रहा थ। कटोरियाँ-प्याले और कलश लेकर जनता टिड्डी दल सी उमड़ी पड़ रही थी।रस का प्रभाव ही कुद ऐसा था कि जिस धातु में वह लिया जाता वह देखते-देखते स्वर्ण मे ही परिणत हो जाता था। यह आश्चर्य जनक घटना देख जैन चैत्यालय के दर्शन तो दिये मैंने छोड़ और दौड़ उस जोगी के पास। परन्तु रस तब तक सामप्त हो चुका था। मुझे देखकर उसने कहा-तुम दुखी मत होओ; तुम्हें रस ही चाहिये है, तो मेरे साथ चले चलो।

जोगी के आदेशानुसार मैं इस घनघोर अटवी में आ गया। तब उसने मुझे एक चतुष्कोण चौकी पर बैठाया और उसके चारों कोने रस्सी से बाँधकर तथा मेरे हाथ खाली तुम्बी देकर मुझे इस अंधी वीरान बाबड़ी में लटका दिया। मैंने तुम्बी भरी; उसने मुझे खींच लिया। भरी हुई तुम्बियाँ वह जतन से अपने पास रखता जाता था। अंत की तुम्बी भर कर मैं ला ही रहा था कि जोगी की दुर्भावना ने बीच से ही रस्सी पैनी छुरी से काट दी। उसे भय था कि कहीं मैं इस रहस्यपूर्ण बावड़ी का पता किसी दूसरे को बता दूंगा तो मेरे रहस्य की कोई कीमत नहीं रह जायेगी और स्वयं कूप में घुसकर मैं रस ला सकता था... यही मेरी विपत्ति की दुखभरी कहानी है और यहाँ इस अन्धकूप में एक सप्ताह से सड़-सड़ कर मर रहा हूँ।हे देवाङ्गने! कृपाकर मेरा उद्धार कीजिये।’’

दयालु देवी ने कूप से निकाला और अपार सम्पदा प्रदान करती हुई वह बोली-लालच के वशीभूत होकर मानव मात्र आज संसार के अंधकूप में पड़ा हुआ है।उनका उद्धार तुम्हारे द्वारा होना संभाव्य है। तुम्हे एक कार्य करना होगा! ‘‘वह क्या? जिज्ञासु भाव से श्रीदत्त श्रेष्ठि ने पूछा। ‘‘यह कि तुमने जिस मंत्र व ऋद्धि आदि के द्वारा महाप्रभावक श्री भक्तामर जी के दशवें काव्य के आधार पर मुझे इस बियाबान जंगल में आहूत किया है-वैसे ही जन साधारण के सामने उसे तुम्हें प्रकट करना होगा। साथ ही संयमधारी साधु महाराज की सत्कृपा से तुमने यह विद्या पाई है उन्हें भी कभी विस्मृत नहीं करना। इतना कहकर देवी अन्तर्धान हो गई। सेठ जी भी अन्धकूप से ज्यों ही बाहर निकले कि उनकी अट्टालिका भी उन्हें सन्मुख ही दिखाई दी।