ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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08. मलयाली विवाह

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मलयाली विवाह

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मुहूर्तम — एक पारंपरिक दक्षिण भारतीय विवाह, जन्म कुण्डलियाँ मिलाने से प्रारम्भ होता है। ज्योतिषी द्वारा मुहूर्तम अर्थात् विवाह की तिथि तय की जाती है। शादी के एक दिन पूर्व, वधू को पारंपरिक भोजन कराया जाता है, जिसमें वह पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठती है और पांच क्रम में शाकाहारी भोजन, अपने परिवारजनों के साथ ग्रहण करती है।

वेली — विवाहोत्सव प्रारंभ होने पर वर, वधू के घर, धोती और अंगवस्त्रम् धारण कर आता है; उसे उत्तम—पश्चिमी दिशा वाले कमरे में बैठाया जाता है, जहाँ वधू के पिता द्वारा, वर के चरणों का प्रक्षालन किया जाता है। वर, वधू के पिता को सुनहरी जरी वाली हल्के रंग की साड़ी देता है। जिसे वधू विवाह समारोह में पहनती है। ‘वेली’ गठबंधन और अग्नि के चारों ओर फेरे लेने की विधि है। दक्षिण भारतीय मलयाली विवाह में सामान्यत: तीन फेरे लिए जाते हैं।

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कन्यादान — कन्यादान में वधू के पिता, वर के हाथों में अपनी बेटी का हाथ सौंपते हैं।

स्पर्शम् — यह अपने आप में एक अनूठी रस्म है, जिसमें वर—वधू के आगे बैठता है अपने सर को पीछे की ओर झुकाते हुए वधू के माथे पर स्पर्श करता है।

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लाजा — स्पर्शम् के बाद वधू अग्नि में लाजा (परमल) समर्पित करती है और मंत्रोच्चारण संपन्न होता है।

अमी — इस विधि में वर—वधू का पैर उठाकर ‘अमी’ (घट्टी) पर रखता है, इस संकेत के साथ कि जितने पुराने बंधन थे, सब टूट गए। फिर सात बार उसके पैर को अपने हाथों से उठाते हुए आगे करता है, जिसका अर्थ है नए परिवार में उसका आगमन।

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गृह प्रवेश — नई वधू का पति के घर में स्वागत किया जाता है और दोनों के मंगल जीवन की कामना की जाती है।

दक्षिण भारतीय विवाहों को नाद — स्वरम् के मधुर स्वर स्पूर्त करते हैं; बिल्कुल उसी तरह जिस तरह उत्तर भारत में शहनाई।

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