ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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08. सप्तम चूलिका अधिकार ( जघन्य स्थितिबंध )

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सप्तम चूलिका अधिकार(जघन्य स्थितिबंध)

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जघन्यस्थितिबंध:

सप्तम चूलिकाधिकार:
मंगलाचरणं
जघन्यस्थितिबंधान् ये, कृत्वा कर्माणि सर्वत:।
नाशयन्ति स्म तान् भक्त्या, प्रणुम: कर्महानये।।१।।
यै: सूक्ष्मसांपराये ज्ञानावरणादिकर्मणां जघन्यस्थितिं कृत्वा क्षीणकषायान्त्यसमये घातिकर्माणि भस्मीकृतानि, तेभ्यो नित्यं नमोऽस्तु मे।
अथ षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे अष्टभि: स्थलै: त्रिचत्वािंरशत्सूत्रै: जघन्यस्थितिबंधनामा सप्तमश्चूलिकाधिकार: कथ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले प्रतिज्ञाकथनरूपेण जघन्यस्थितिबंधस्य ‘‘एत्तो’’ इत्यादि सूत्रद्वयं। तदनु द्वितीयस्थले ज्ञानावरणादीनां जघन्यस्थितिबंधकथनमुख्यत्वेन ‘‘पंचण्हं णाणावरणीयाणं’’ इत्यादिनवसूत्राणि। तत: परं तृतीयस्थले मिथ्यात्वादिमोहनीयकर्मणां जघन्यस्थितिबंधप्रतिपादनत्वेन ‘‘मिच्छत्तस्स’’ इत्यादिना द्वादश सूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले स्त्रीवेदादिप्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंधकथनत्वेन ‘‘इत्थिवेद’’ इत्यादिना सूत्रत्रयं। तदनंतरं पंचमस्थले आयुषां जघन्यस्थितिबंधप्ररूपणत्वेन ‘‘णिरयाउअ’’ इत्यादिसूत्राष्टकं। तदनु षष्ठस्थले नरकगत्यादि-प्रकृतिजघन्यस्थितिबंधनिरूपणत्वेन ‘‘णिरयगदि’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततश्च सप्तमस्थले आहारद्विक-तीर्थकरप्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंधप्रतिपादनत्वेन ‘‘आहारसरीर’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। पुनश्चाष्टमस्थले यश:कीर्ति-उच्चगोत्रप्रकृतिजघन्यस्थितिबंधनिरूपणपरत्वेन ‘‘जसकित्ति’’ इत्यादिसूत्रत्रयं, इति समुदायपातनिका सूचिता भवति।
अधुना कर्मणां जघन्यस्थितिबंधकथनप्रतिज्ञापनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-एत्तो जहण्णियट्ठिदिं वण्णइस्सामो।।१।।
तं जहा।।२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतस्मात् उत्कृष्टस्थितिबंधकथनादग्रे कर्मणां जघन्यस्थितिबंधं वर्णयिष्याम: इति श्रीमद्भूतबलिसूरिवर्येण प्रतिज्ञाप्यते। तद्यथा-इति प्रकारेण।
उत्कृष्टविशुद्ध्या या स्थिति: बध्यते सा जघन्या भवति, सर्वासां स्थितीनां प्रशस्तभावाभावात्। किच-संक्लेशवृद्धे: सर्वप्रकृतीनां स्थितीनां वृद्धिर्भवति, विशुद्धिवृद्धे: तासां चैव हानिर्भवति।
क: संक्लेशो नाम ?
असाताप्रकृतिबंधयोग्यपरिणाम: संक्लेश: कथ्यते।
का विशुद्धि: नाम ?
साताप्रकृतिबंधयोग्यपरिणाम: विशुद्धिरुच्यते।
केऽपि आचार्या: भणन्ति-उत्कृष्टस्थिते: अधस्तनस्थिती: बघ्नत: जीवस्य परिणाम: विशुद्धि: इति उच्यते, जघन्यस्थिते: उपरिमद्वितीयादिस्थिती: बध्नत: जीवस्य परिणाम: संक्लेश: इति, तन्न घटते। जघन्योत्कृष्टस्थितिपरिणामान् मुक्त्वा शेषमध्यमस्थितीनां सर्वपरिणामानां अपि संक्लेशविशुद्धित्वप्रसंगात्। न चैवं, एकस्य परिणामस्य लक्षणभेदेन विना द्विभावविरोधात्। अतएव एतन्निर्णेतव्यं-साताबंध-योग्यपरिणामा विशुद्धिरिति।
एवं प्रथमस्थले जघन्यस्थितिबंधसूचकप्रतिज्ञापरत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
संप्रति ज्ञानावरणीयादीनां जघन्यस्थितिबंध-आबाधा-निषेकप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-पंचण्हं णाणावरणीयाणं चदुण्हं दंसणावरणीयाणं लोभसंजलणस्स पंचण्हमंतराइयाणं जहण्णओ ट्ठिदिबंधो अंतोमुहुत्तं।।३।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।४।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।५।।
पंचदंसणावरणीय-असादावेदणीयाणं जहण्णगो ट्ठिदिबंधो सागरोवमस्स तिण्णि सत्तभागा पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेण ऊणया।।६।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।७।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। पंचज्ञानावरण-चतुर्दर्शनावरण-लोभसंज्वलन-पंचान्तरायाणां पंचदशप्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंध: अंतर्मुहूर्तमात्रमेव, किंच इमा: प्रकृतय: कषायक्षपकाणां चरमसमयपर्यन्तमेव बध्नन्ति, शेषं सुगमं।
संप्रति सातावेदनीयजघन्यस्थितिबंधादिनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-सादावेदणीयस्स जहण्णओ ट्ठिदिबंधो वारस मुहुत्ताणि।।९।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।१०।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।११।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानवर्तिक्षपकसंयतस्य अन्तिमसमये अयं जघन्यस्थितिबंधो भवति। दर्शनावरणीयप्रकृति: पापरूपास्ति, अत: विशुद्धिपरिणामेन तस्या:स्थितिघातमधिकं भवति। किन्तु सातावेदनीयप्रकृति: शुभरूपास्ति, अत: विशुद्धिपरिणामेन तस्या: स्थितिबंधस्याधिकापवर्तना नास्ति। शेषं सुगमं।
एवं द्वितीयस्थले ज्ञानावरणादिविंशतिप्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंधादिप्रतिपादनत्वेन नव सूत्राणि गतानि।

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जघन्य स्थितिबंध चूलिका(सातवाँ चूलिका अधिकार)

मंगलाचरण

जो कर्मों की जघन्य स्थिति को बांधकर सब प्रकार से कर्मों का नाश कर देते हैं, अपने कर्मों का नाश करने के लिये हम भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार करते हैं।

जिन्होंने-जिन महामुनियों ने सूक्ष्मसांपराय नाम के दसवें गुणस्थान में ज्ञानावरण आदि कर्मों की जघन्य स्थिति करके क्षीणकषाय नाम के ग्यारहवें गुणस्थान में न जाकर बारहवें गुणस्थान में पहुँचकर घातिया कर्मों को भस्मसात् कर दिया है, उन सब केवली भगवन्तों को मेरा नित्य ही नमस्कार होवे।

अब इस षट्खण्डागम ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में छठी पुस्तक में आठ स्थलों द्वारा तेतालीस सूत्रों से जघन्यस्थिति बंध नाम की सातवीं चूलिका कहते हैं। उसमें प्रथम स्थल में जघन्य स्थितिबंध की प्रतिज्ञा के कथनरूप से ‘एतो’ इत्यादि दो सूत्र कहेंगे। इसके बाद द्वितीय स्थल में ज्ञानावरण आदि कर्मों की जघन्य स्थितिबंध के कथनरूप से ‘पंचण्हं णाणावरणीयाणं’ इत्यादि नव सूत्र कहेंगे। इसके बाद तीसरे स्थल में मिथ्यात्वादि मोहनीय कर्मों की जघन्य स्थितिबंध के प्रतिपादन रूप से ‘मिच्छत्तस्स’ इत्यादि बारह सूत्र कहेंगे। इसके पश्चात् चौथे स्थल में स्त्रीवेद आदि प्रकृतियों की जघन्य स्थितिबंध के कहने रूप से ‘इत्थिवेद’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। पुन: पाँचवें स्थल में आयु की जघन्य स्थितिबंध की प्ररूपणा करते हुये ‘णिरयाउअ’ इत्यादि आठ सूत्र कहेंगे। इसके अनंतर छठे स्थल में नरकगति आदि प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध निरूपण करने वाले ‘णिरयगदि’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। पुन: सातवें स्थल में आहारकद्विक और तीर्थंकर प्रकृति की जघन्य स्थितिबंध का प्रतिपादन करने वाले ‘आहारसरीर’-आदि तीन सूत्र कहेंगे। इसके बाद आठवें स्थल में यशकीर्ति और उच्चगोत्र कर्मों की जघन्य स्थितिबंध का निरूपण करते हुये ‘जसकित्ति’-इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इस प्रकार यह समुदायपातनिका कही गई है।

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अब कर्मों के जघन्य स्थितिबंध को कहने की प्रतिज्ञा करते हुये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

अब इससे आगे जघन्य स्थिति का वर्णन करेंगे।।१।।

वह किस प्रकार है ?।।२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-अब कर्मों की उत्कृष्ट स्थितिबंध के कथन के बाद यहाँ कर्मों की जघन्य स्थितिबंध को कहेंगे। इस प्रकार श्रीमान् भूतबलि आचार्यवर्य ने प्रतिज्ञासूत्र कहा है। वह इस प्रकार है-

उत्कृष्ट विशुद्धि के द्वारा जो स्थिति बंधती है, वह जघन्य होती है क्योंकि सर्व स्थितियों के प्रशस्त भाव का अभाव है। संक्लेश की वृद्धि से सर्व प्रकृतिसम्बन्धी स्थिति की वृद्धि होती है और विशुद्धि की वृद्धि से उन्हीं स्थितियों की हानि होती है।

शंका-संक्लेश नाम किसका है ?

समाधान-असाता प्रकृति के बंध योग्य परिणाम को संक्लेश कहते हैं।

शंका-विशुद्धि नाम किसका है ?

समाधान-साता प्रकृति के बंध योग्य परिणाम को विशुद्धि कहते हैं।

कितने ही आचार्य ऐसा कहते हैं कि उत्कृष्ट स्थिति से अधस्तन स्थितियों को बाँधने वाले जीव का परिणाम ‘विशुद्धि’ इस नाम से कहा जाता है और जघन्य स्थिति से उपरिम द्वितीय, तृतीय आदि स्थितियों को बांधने वाले जीव का परिणाम ‘संक्लेश’ कहलाता है। किन्तु उनका यह कथन घटित नहीं होता है क्योंकि जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति के बाँधने के योग्य परिणामों को छोड़कर शेष मध्यम स्थितियों के बाँधने योग्य सर्व परिणामों में भी संक्लेश और विशुद्धिता का प्रसंग आता है किन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि एक परिणाम के लक्षणभेद के बिना द्विभाव अर्थात् दो प्रकार के होने का विरोध है। इसलिये यह निर्णय करना चाहिये कि-साता प्रकृति के बंध योग्य परिणामों का नाम ही विशुद्धि है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में जघन्य स्थितिबंधसूचक प्रतिज्ञारूप से दो सूत्र पूर्ण हुये।

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अब ज्ञानावरणीय आदि प्रकृतियों के जघन्य स्थितिबंध, आबाधा और निषेकों का प्रतिपादन करने के लिये छह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

पाँचों ज्ञानावरणीय, चक्षु दर्शनावरणादि चारों दर्शनावरणीय, लोभसंज्वलन और पाँचों अन्तराय, इन कर्मों का जघन्य स्थितिबंध अन्तर्मुहूर्त है।।३।।

'पूर्व सूत्रोक्त ज्ञानावरणीयादि पन्द्रह कर्मों का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।४।।

पूर्व सूत्रोक्त ज्ञानावरणीयादि पन्द्रह कर्मों के आबाधाकाल से हीन जघन्य कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।५।।

निद्रानिद्रादि पाँच दर्शनावरणीय और असातावेदनीय, इन कर्मप्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध पल्योपम के असंख्यातवें भाग से हीन सागरोपम के तीन बटे सात भाग प्रमाण है।।६।।

पूर्व सूत्रोक्त निद्रानिद्रादि छह कर्म प्रकृतियों का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।७।।

पूर्व सूत्रोक्त निद्रानिद्रादि छह कर्मों के आबाधाकाल से हीन जघन्य कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।८।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, लोभ संज्वलन और पाँच अन्तराय इन पन्द्रह प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध अन्तर्मुहूर्त मात्र ही है, क्योंकि ये प्रकृतियाँ कषायों का क्षपण करने वाले क्षपक श्रेणी में आरोहक महामुनियों के अंतिम समय पर्यन्त ही बंधती हैं। शेष अर्थ सुगम है।

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अब सातावेदनीय की जघन्य स्थितिबंध आदि का निरूपण करने के तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

सातावेदनीय का जघन्य स्थितिबंध बारह मुहूर्त है।।९।।

सातावेदनीय कर्म का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।१०।।

सातावेदनीय कर्म के आबाधाकाल से हीन जघन्य कर्मस्थितिप्रमाण उसका कर्म-निषेक होता है।।११।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानवर्ती क्षपक महामुनि के अंतिम समय में यह जघन्य स्थितिबंध होता है। दर्शनावरण प्रकृति पापरूप है, इसलिये विशुद्ध परिणामों से उसका स्थितिघात अधिक होता है, किन्तु सातावेदनीय प्रकृति शुभरूप है, इसलिये विशुद्ध परिणामों से उसके स्थितिबंध का अधिक घात नहीं होता है। शेष अर्थ सुगम है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में ज्ञानावरण आदि बीस प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंधादि का प्रतिपादन करने वाले नव सूत्र पूर्ण हुये।

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अधुना मिथ्यात्वादिप्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंध-आबाधा-निषेकप्रतिपादनाय द्वादशसूत्राण्यवतार्यन्ते-

मिच्छत्तस्स जहण्णगा ट्ठिदिबंधो सागरोवमस्स सत्त सत्तभागा पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेण ऊणिया।।१२।।

अंतोमुहुत्तमाबाधा।।१३।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।१४।।
वारसण्हं कसायाणं जहण्णओ ट्ठिदिबंधो सागरोवमस्स चत्तारि सत्तभागा पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेण ऊणया।।१५।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।१६।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।१७।।
कोधसंजलण-माणसंजलण-मायासंजलणाणं जहण्णओ ट्ठिदिबंधो वे मासा मासं पक्खं।।१८।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।१९।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।२०।।
पुरिसवेदस्स जहण्णओ ट्ठिदिबंधो अट्ठ वस्साणि।२१।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।२२।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।२३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति।
बादरैकेन्द्रियापर्याप्तेषु सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्तापर्याप्तेषु वा मिथ्यात्वस्य जघन्य स्थितिबंधो न भवति, एतेषु वीचारस्थानानां बहुत्वाभावात्।
एवं तृतीयस्थले मिथ्यात्वादिप्रकृतीनां जघन्यस्थित्यादि कथनत्वेन द्वादशसूत्राणि गतानि।
अधुना स्त्रीवेदादिप्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंधादिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-इत्थिवेद-णउंसयवेद-हस्स-रदि-अरदि-सोग-भय-दुगुंछा-तिरिक्खगइ-मणुसगइ-एइंदिय-बीइंदिय-तीइंदिय-चउिंरfिदय-पंचिंदियजादि-ओरालिय-तेजा-कम्मइयसरीरं छण्हं संट्ठाणाणं ओरालियसरीरअंगोवंगं छण्हं संघडणाणं वण्णगंधरसफासं तिरिक्खगइ-मणुसगइपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सास-आदाउज्जोव-पसत्थविहायगदि-अप्पसत्थ-विहायगदि-तस-थावर-बादर-सुहुम-पज्जत्तापज्जत्त-पत्तेय-साहारणसरीर-थिराथिर-सुभासुभ-सुभग-दुभग-सुस्सर-दुस्सर-आदेज्ज-अणादेज्ज-अजसकित्ति-णिमिण-णीचागोदाणं जहण्णगो ट्ठिदिबंधो सागरोवमस्स वे-सत्तभागा पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेण ऊणया।।२४।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।२५।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।२६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नपुंसकवेद-अरतिशोकभयजुगुप्सा-पंचेन्द्रियजात्यादीनां जघन्यस्थितिबंध: पल्योपमस्य असंख्यातभागोनं सागरोपमस्य द्वि-सप्तभागमात्रं अस्ति, िंकच एतासां विंशतिकोटा-कोटिसागरमात्रमुत्कृष्टस्थितिबंध: कथित:। किन्तु स्त्रीवेदहास्यरतिस्थिरशुभसुभगसुस्वरादीनां एषा जघन्यस्थिति: न घटते, एतासां विंशतिकोटाकोटिसागरोत्कृष्टस्थितिर्नास्तीति ?
नैष दोष:, यद्यपि एतासामात्मन: उत्कृष्टास्थिति: विंशतिकोटाकोटिसागरप्रमाणं नास्ति तथापि मूलप्रकृति-उत्कृष्टस्थित्यनुसारेण ह्रासं प्राप्नुवन्तीनां पल्योपमस्य असंख्यातभागोनं सागरोपम द्वि-सप्तभागमात्रजघन्य-स्थितिबंधस्य विरोधो नास्ति। न च स्त्रीवेद-हास्य-रतय: कषायबन्धानुसारिण्य:, नोकषायस्य तदनुसरण-विरोधात्। एषा जघन्यस्थिति: बादरैकेन्द्रियपर्याप्तकेषु सर्वविशुद्धेषु मन्तव्या; अन्यत्र सर्वजघन्यस्थितिबंधस्य अनुपलंभात्। जातिविशुद्धी: अपेक्ष्य स्थितिबंधस्य जघन्यत्वसंभवात्। शेषं सुगममस्ति।
एवं चतुर्थस्थले स्त्रीवेदादिजघन्यस्थितिबंधादिनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
अधुना आयुषां जघन्यस्थित्यादिनिरूपणाय सूत्राष्टकमवतार्यते-णिरयाउअ-देवाउअस्स जहण्णओ ट्ठिदिबंधो दसवाससहस्साणि।।२७।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।२८।।
आबाधा।।२९।।
कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।३०।।
तिरिक्खाउअ-मणुसाउअस्स जहण्णओ ट्ठिदिबंधो खुद्दाभवग्गहणं।।३१।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।३२।।
आबाधा।।३३।।
कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।३४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति।
अन्यत्रापि कथितं- भिण्णमुहुत्तो णरतिरियाऊणं वासदससहस्साणि।
सुरणिरयआउगाणं जहण्णओ होदि ट्ठिदिबंधो।।१४२।।
वर्तमानकाले या: काश्चित् स्त्रिय: गर्भे पुत्र: पुत्री वा इति ज्ञातुकामा: गर्भपरीक्षणं कारयित्वा यदि कदाचित् गर्भे पुत्री अस्तीति श्रुत्वा गर्भपातं-भ्रूणहत्यां कुर्वन्ति कारयन्ति वा, अथवा ये केचित् अपघातेन म्रियन्ते शोकेन इष्टवियोगानिष्टसंयोगजनितदु:खेन येन केनापि कारेण, तेऽपि मृत्वा मनुष्याणां तिरश्चां च योनिं संप्राप्य जघन्यस्थितिप्रमाणमायु: गृहीत्वा पुन: पुन: म्रियन्ते, अत: एतानि कारणाणि त्यक्तव्यानि भव्यजीवै: इति।
एवं पंचमस्थले आयुषां स्थितिबंधादिनिरूपणत्वेन सूत्राष्टकं गतम्।
अधुना नरकगत्यादिषट्प्रकृतीनां स्थितिबंधादिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-णिरयगदि-देवगदि-वेउव्वियसरीर-वेउव्वियसरीरअंगोवंग-णिरयगदि-देवगदिपा-ओग्गाणुपुव्वीणामाणं जहण्णगो ट्ठिदिबंधो सागरोवमसहस्सस्स वेसत्तभागा पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागेण ऊणया।।३५।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।३६।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।३७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतेषां वैक्रियिकषट्कानां जघन्यस्थितिबंधम् सर्वविशुद्धा: असंज्ञिपंचेन्द्रियतिर्यञ्च एव कुर्वन्ति।
अस्य जघन्यस्थितिबंधस्य अत्र उपयोगि-अर्थस्य किंचित् प्ररूपणं क्रियते-एकेन्द्रियेषु मिथ्यात्वस्योत्कृष्टस्थितिबंध: एक: सागर:। कषायाणां सागरोपमस्य चत्वार: सप्तभागा:। ज्ञानदर्शना-वरणान्तरायवेदनीयानां सागरोपमस्य त्रय: सप्तभागा:। नामगोत्रनोकषायाणां सागरोपमस्य द्वौ सप्तभागा:।
द्वीन्द्रियाणां एतेषां कर्मणामेव क्रमश:-
त्रीन्द्रियाणां क्रमश:-
चतुरिन्द्रियाणां-
असंज्ञिपंचेन्द्रियाणां-
एवं द्वीन्द्रियादीनामसंज्ञिपंचेन्द्रियान्तानामुत्कृष्टस्थितिबंधा ज्ञातव्या:।
स्वोत्कृष्टस्थितिषु पल्यस्यासंख्यातभागे हीने कृते यत्प्रमाणमवशेषं ता जघन्यस्थिती: एकेन्द्रिया बध्नंति। द्वीन्द्रियादसंज्ञिपंचेन्द्रियपर्यंता जीवा: स्वस्वोत्कृष्टस्थितिषु पल्यस्य संख्यातभागे हीने यत्प्रमाणमवशिष्टं, ता: जघन्यस्थिती: बध्नन्ति। संज्ञिपंचेन्द्रियाणाम् उत्कृष्टजघन्यस्थितिबंधा: सूत्रेषु पृथक्-पृथक् दर्शिता:। तेषां कोष्ठकानि-
एकेन्द्रियेषु वीचारस्थानानि पल्योपमस्य असंख्यातभाग:, आबाधास्थानानि आवलिकाया: असंख्यातभाग:। द्वीन्द्रियादिषु वीचारस्थानानि पल्योपमस्य संख्यातभाग:, आबाधास्थानानि आवलिकाया: संख्यातभाग:। वैक्रियिकषट्कं च नामकर्म, तेन पल्योपमस्य संख्यातभागेन न्यूना सागरोपमसहस्रस्य द्वौ सप्तभागा जघन्यस्थितिर्भवति ।
एवं षष्ठस्थले वैक्रियिकषट्कप्रकृतीनां जघन्यस्थितिनिरूपणमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।

[सम्पादन]
अब मिथ्यात्वादि प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध, आबाधा और निषेकों का प्रतिपादन करने के लिये बारह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मिथ्यात्वकर्म का जघन्य स्थितिबंध पल्योपम के असंख्यातवें भाग से हीन सागरोपम के सात बटे सात भाग प्रमाण है।।१२।।

मिथ्यात्वकर्म का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।१३।।

मिथ्यात्वकर्म के आबाधाकाल से हीन जघन्य कर्म-स्थितिप्रमाण उसका कर्म-निषेक होता है।।१४।।

अनन्तानुबंधी आदि बारह कषायों का जघन्य स्थितिबंध पल्योपम के असंख्यातवें भाग से हीन सागरोपम के चार बटे सात भाग प्रमाण है।।१५।।

अनन्तानुबंधी आदि बारह कषायों का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।१६।।

उक्त बारह कषायों के आबाधाकाल से हीन जघन्य कर्म स्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।१७।।

क्रोधसंज्वलन, मानसंज्वलन और मायासंज्वलन, इन तीनों का जघन्य स्थितिबंध क्रमश: दो मास, एक मास और एक पक्ष है।।१८।।

क्रोधादि तीनों संज्वलन कषायों का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।१९।।

क्रोधादि तीनों संज्वलन कषायों के आबाधाकाल से हीन जघन्य कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।२०।।

पुरुषवेद का जघन्य स्थितिबंध आठ वर्ष है।।२१।।

आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।२२।।

आबाधाकाल से हीन जघन्य-कर्मस्थितिप्रमाण उसका कर्म-निषेक होता है।।२३।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है।

बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों में और सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त-अपर्याप्त जीवों में मिथ्यात्व का जघन्य स्थितिबंध नहीं है, क्योंकि, इनमें वीचारस्थानों की बहुलता का अभाव है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में मिथ्यात्व आदि प्रकृतियों की जघन्य स्थिति आदि के कथन करने वाले बारह सूत्र पूर्ण हुये।

[सम्पादन]
अब स्त्रीवेद आदि प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध आदि प्रतिपादित करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, तिर्यग्गति, मनुष्यगति, एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, छहों संस्थान, औदारिकशरीर-अंगोपांग, छहों संहनन, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत, प्रशस्तविहायोगति, अप्रशस्तविहायोगति, त्रस, स्थावर, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर, साधारणशरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, दुर्भग, सुस्वर, दु:स्वर, आदेय, अनादेय, अयश:कीर्ति, निर्माण और नीचगोत्र, इन प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध पल्योपम के असंख्यातवें भाग से कम सागरोपम के दो बटे सात भाग है।।२४।।

पूर्व सूत्रोक्त स्त्रीवेदादि प्रकृतियों का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।२५।।

उक्त प्रकृतियों के आबाधाकाल से हीन जघन्य कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।२६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-

शंका-नपुंसकवेद, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा और पंचेन्द्रियजाति आदि प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध पल्योपम के असंख्यातवें भाग से कम सागरोपम के दो बटे सात भागमात्र भले ही रहा आवे, क्योंकि इन प्रकृतियों की बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण उत्कृष्ट स्थिति देखी जाती है। किन्तु स्त्रीवेद, हास्य, रति, स्थिर, शुभ, सुभग और सुस्वर आदि प्रकृतियों का पल्योपम के असंख्यातवें भाग से कम सागरोपम के दो बटे सात भागमात्र जघन्य स्थितिबंध नहीं घटित होता है क्योंकि इन स्त्रीवेदादि प्रकृतियों की बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण उत्कृष्ट स्थिति का अभाव है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, यद्यपि इन स्त्रीवेद आदि की अपनी उत्कृष्ट स्थिति बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण नहीं है, तो भी मूल प्रकृति की उत्कृष्ट स्थिति के अनुसार ह्रास को प्राप्त होती हुई इन प्रकृतियों का पल्योपम के असंख्यातवें भाग से कम सागरोपम के दो बटे सात भागमात्र जघन्य स्थिति के बंधने में कोई विरोध नहीं है तथा स्त्रीवेद, हास्य और रति ये प्रकृतियाँ कषायों के बंध का अनुसरण करने वाली नहीं हैं क्योंकि नो-कषाय के कषायबंध के अनुसरण का विरोध है।

यह जघन्यस्थिति बादरएकेन्द्रियपर्याप्तक सर्वविशुद्ध जीवों में मानना चाहिये, क्योंकि अन्यत्र-अन्य जीवों में सर्वजघन्यस्थिति की उपलब्धि नहीं होती है। विशिष्ट जातियों की विशुद्धि को देखकर स्थितिबंध के जघन्यता संभव है। शेष प्रकरण सरल है।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में स्त्रीवेद आदि के जघन्य स्थितिबंध आदि का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुये।

[सम्पादन]
अब आयु कर्मों की जघन्य स्थिति आदि का निरूपण करने के लिये आठ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

नारकायु और देवायु का जघन्य स्थितिबंध दस हजार वर्ष है।।२७।।

नारकायु और देवायु का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।२८।।

आबाधाकाल में नारकायु और देवायु की कर्मस्थिति बाधारहित है।।२९।।

नारकायु और देवायु की कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।३०।।

तिर्यगायु और मनुष्यायु का जघन्य स्थितिबंध क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण है।।३१।।

तिर्यगायु और मनुष्यायु का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।३२।।

आबाधाकाल में तिर्यगायु और मनुष्यायु की कर्मस्थिति बाधारहित है।।३३।।

तिर्यगायु और मनुष्यायु की कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।३४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। अन्य ग्रन्थों में भी कहा है-मनुष्य और तिर्यंचों की जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त है। देव तथा नारकियों की जघन्य आयु का स्थितिबंध दस हजार वर्ष है।

वर्तमान काल में कोई - कोई स्त्रियाँ गर्भ में बालक है या बालिका ऐसा जानने की इच्छा से गर्भ का परीक्षण कराकर यदि कदाचित् गर्भ में बालिका है तो गर्भपात - भ्रूणहत्या कर देती हैं या करा देती हैं। अथवा जो कोई भी मनुष्य अपघात से मरते हैं, शोक से या इष्टवियोग, अनिष्टसंयोग से उत्पन्न हुये दु:ख से दुखित होकर जिस किसी भी कारण से अपघात से मरण करते हैं वे भी मनुष्य या तिर्यंच योनि को प्राप्त करके जघन्य आयु प्रमाण आयु को प्राप्त कर पुन:-पुन: मरण को प्राप्त होते रहते हैं, इसलिये भव्यजीवों को इन कारणों का त्याग कर देना चाहिये।

इस प्रकार पाँचवें स्थल में आयु के स्थितिबंध आदि का निरूपण करने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुये।

[सम्पादन]
अब नरकगति आदि छह प्रकृतियों के स्थितिबंध आदि का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नरकगति, देवगति, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकशरीर-अंगोपांग, नरकगति-प्रायोग्यानुपूर्वी और देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मों का जघन्य स्थितिबंध पल्योपम के संख्यातवें भाग से हीन सागरोपमसहस्र के दो बटे सात भाग है।।३५।।

पूर्व सूत्रोक्त नरकगति आदि छहों प्रकृतियों का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।३६।।

उक्त प्रकृतियों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।३७।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यह जघन्य स्थिति सर्वविशुद्ध असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव के द्वारा बांधी जाती है। इसी जघन्य स्थितिबंध के प्ररूपण के लिये यहाँ पर उपयोगी कुछ अर्थ की प्ररूपणा करते हैं। वह इस प्रकार है-एकेन्द्रिय जीवों में मिथ्यात्व कर्म का उत्कृष्ट स्थितिबंध एक सागरोपम (१) है। कषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध एक सागरोपम के चार बटे सात भाग (४/७) है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और वेदनीय, इन कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध एक सागरोपम के तीन बटे सात भाग (३/७) है। नामकर्म, गोत्रकर्म और नोकषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध एक सागरोपम के दो बटे सात भाग (२/७) है। इसी प्रकार द्वीन्द्रिय जीवों से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक के जीवों का उत्कृष्ट स्थितिबंध कहना चाहिये। द्वीन्द्रिय जीवों में मिथ्यात्व कर्म का उत्कृष्ट स्थितिबंध पच्चीस (२५) सागरोपम है। कषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध सौ बटे सात (१००/७) सागरोपम है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और वेदनीय, इन कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध पचहत्तर बटे सात (७५/७) सागरोपम है। नामकर्म, गोत्रकर्म और नोकषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध पचास बटे सात (५०/७) सागरोपम है। ये द्वीन्द्रिय जीवों के उत्कृष्ट स्थितिबंध हैं। त्रीन्द्रिय जीवों में मिथ्यात्व कर्म का उत्कृष्ट स्थितिबंध पचास (५०) सागरोपम है। कषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध दो सौ बटे सात (२००/७) सागरोपम है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और वेदनीय, इन कर्मों का डेढ़ सौ बटे सात (१५०/७) सागरोपम है। नामकर्म, गोत्रकर्म और नोकषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध सौ बटे सात (१००/७) सागरोपम है। ये त्रीन्द्रिय जीवों के उत्कृष्ट स्थितिबंध हैं। चतुरिन्द्रिय जीवों में मिथ्यात्वकर्म का उत्कृष्ट स्थितिबंध सौ (१००) सागरोपम है। कषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध चार सौ बटे सात (४००/७) सागरोपम है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और वेदनीय, इन कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध तीन सौ बटे सात (३००/७) सागरोपम है। नामकर्म, गोत्रकर्म और नोकषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध दो सौ बटे सात (२००/७) सागरोपम है। ये चतुरिन्द्रिय जीवों के उत्कृष्ट स्थितिबंध हैं। असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों में मिथ्यात्वकर्म का उत्कृष्ट स्थितिबंध एक हजार (१०००) सागरोपम है। कषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध चार हजार बटे सात (४०००/७) सागरोपम है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और वेदनीय, इन कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध तीन हजार बटे सात (३०००/७) सागरोपम है। नामकर्म, गोत्रकर्म और नोकषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध दो हजार बटे सात (२०००/७) सागरोपम है। ये असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के उत्कृष्ट स्थितिबंध हैं।

इस प्रकार द्वीन्द्रिय आदि से असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यंत जीवों का उत्कृष्ट स्थितिबंध जानना चाहिए।

स्थितिबंध उत्कृष्ट कर्मों के नाम मिथ्यात्व एकेन्द्रिय १ सागरोपम द्वीन्द्रिय २५ सागरोपम त्रीन्द्रिय ५० सागरोपम चतुरिन्द्रिय १०० सागरोपम असंज्ञी पंचेन्द्रिय १००० सागरोपम
स्थितिबंध उत्कृष्ट सोलह कषाय ४/७ सा. १००/७ सा. २००/७ सा. ४००/७ सा. ४०००/७ सा.
स्थितिबंध उत्कृष्ट ज्ञानावरण
दर्शनावरण ३/७ सा. ७५/७ सा. १५०/७ सा. ३००/७ सा. ३०००/७ सा.
वेदनीय
अन्तराय
स्थितिबंध उत्कृष्ट नामकर्म
गोत्रकर्म
नोकषाय २/७ सा. ५०/७ सा. १००/७ सा. २००/७ सा. २०००/७ सा.

अपनी उत्कृष्ट स्थिति में से पल्य का असंख्यातवाँ भाग कम करने पर जो प्रमाण शेष रहे, उतनी जघन्य स्थिति को एकेन्द्रिय जीव बाँधते हैं। द्वीन्द्रिय से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक के जीव अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थिति में से पल्य का संख्यातवाँ भाग कम करने पर जो प्रमाण शेष रहे, उतनी जघन्य स्थिति को बाँधते हैं। संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों का उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिबंध सूत्रों में पृथक्-पृथक् दिखाया गया है। उसका कोष्ठक इस प्रकार है-

संज्ञी पंचेन्द्रिय मिथ्यात्व कर्म दर्शनमोहनीय चारित्र मोहनीय ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनीय अन्तराय नामकर्म गोत्रकर्म आयुकर्म
उत्कृष्ट ७० कोड़ाकोड़ी सागरोपम ४० कोड़ाकोड़ी सागरोपम ३० कोड़ाकोड़ी सागरोपम २० कोड़ाकोड़ी सागरोपम ३३ कोड़ाकोड़ी सागरोपम
जघन्य अन्त:कोड़ाकोड़ी अन्तर्मुहूर्त १२ मुहूर्त वेदनीय का १ मुहूर्त शेष कर्मों का अन्तर्मुहूर्त ८ मुहूर्त अन्तर्मुहूर्त

एकेन्द्रिय जीवों में वीचारस्थान पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं और आबाधास्थान आवली के असंख्यातवें भाग हैं। द्वीन्द्रियादि जीवों में वीचारस्थान पल्योपम के संख्यातवें भाग हैं और आबाधास्थान आवली के संख्यातवें भाग हैं। वैक्रियिकषट्क अर्थात् नरकगति आदि सूत्रोक्त छहों प्रकृतियाँ नामकर्म की हैं इसलिये पल्योपम के संख्यातवें भाग से हीन सागरोपम सहस्र के दो बटे सात भाग (२०००/७) उस वैक्रियिकषट्क का जघन्य स्थितिबंध होता है।

इस प्रकार छठे स्थल में वैक्रियिक षट्क प्रकृतियों की जघन्य स्थिति का निरूपण करते हुये तीन सूत्र पूर्ण हुये।

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अधुना आहारकद्वयतीर्थकरप्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंधनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

आहारसरीर-आहारसरीरअंगोवंग-तित्थयरणामाणं जहण्णगो ट्ठिदिबंधो अंतोकोडा-कोडीओ।।३८।।

अंतोमुहुत्तमाबाधा।।३९।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।४०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतासां तिसृणां प्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंध: अपूर्वकरणगुणस्थानचरमसमयात् सप्तमभागपर्यंतं भवति अवतीर्यमाणस्य अपूर्वकरणक्षपकस्य महासाधोरिति।
उक्तं च-
तित्थाहाराणंतोकोडाकोडी जहण्णठिदिबंधो।
खवगे सगसगबंधच्छेदणकाले हवे णियमा।।१४१।।
एषा तीर्थकरप्रकृति: क्व बध्यते कस्य च इति पृष्टे सति कथ्यते-
पढमुवसमिये सम्मे सेसतिये अविरदादिचत्तारि।
तित्थयरबंधपारंभया णरा केवलिदुगंते।।९३।।
आसां तिस¸णां प्रकृतीनां बंधव्युच्छित्तिश्च अपूर्वकरणक्षपकस्य अष्टमगुणस्थानस्य षष्ठभागस्यान्त्यसमये भवतीति ज्ञातव्यं।
एवं सप्तमस्थले आहारद्वयादिप्रकृतिजघन्यस्थिति-आबाधा-निषेकप्ररूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
अधुना यश:कीर्ति-उच्चगोत्रयोर्जघन्यस्थिति-आबाधा-निषेकप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-जसगित्ति-उच्चागोदाणं जहण्णगो ट्ठिदिबंधो अट्ठ मुहुत्ताणि।।४१।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।४२।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।४३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अनयोद्र्वयो: प्रकृत्यो: जघन्यस्थितिबंध: चरमसमयवर्तिसकषायिणां महासाधूनां भवति। शेषं सुगममस्ति।
इतो विस्तर:-पंचज्ञानावरण-चतु:दर्शनावरण-पंचअन्तराय-यश:कीर्ति-उच्चगोत्र-सातावेदनीयानां आसां सप्तदशप्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंधं सूक्ष्मसांपरायवर्ती महायति: करोति। पुरुषवेदचतु:संज्वलनप्रकृतीनां पंचानां अनिवृत्तिकरणगुणस्थानवर्ती महासाधु: जघन्यस्थितिं बध्नाति। आहारकद्विक-तीर्थकरप्रकृतीनां जघन्यस्थितिं अपूर्वकरण: महामुनि: बध्नाति। वैक्रियकषट्कं असंज्ञी पंचेन्द्रियजीव: चतुर्विधायुषां जघन्यस्थितिं संज्ञी असंज्ञी वा बध्नाति। मिथ्यात्वस्य जघन्यस्थितिस्वामिनां कथितमेव।
आसां व्यतिरिक्तानां चतुरशीतिप्रकृतीनां जघन्यस्थितिबंधं बादर पर्याप्त: यथायोग्यविशुद्धपरिणामी एकेन्द्रियजीव: करोति इति ज्ञातव्यं।
कार्मणशरीरनामकर्मोदयेन योगनिमित्तेन आत्मनि कर्मस्वरूपेण परिणतं यत् पुद्गलद्रव्यं यावत् उदयरूपेण उदीरणारूपेण वा न एति तावत्कालस्य आबाधा इति संज्ञा। उदयस्याबाधा तु सूत्रेषु कथिता एव, उदीरणाया आबाधा तावदुच्यते-
आवलियं आबाहा उदीरणमासिज्ज सत्तकम्माणं।
परभविय-आउगस्स य उदीरणा णत्थि णियमेण।।१५९।।
अत्रायमर्थ:-वर्तमानकाले भुज्यमानायुष: उदीरणा भवितुं शव्नति किंतु बध्यमानागामिभवस्यायुष: उदीरणा नास्ति।
राज्ञ: श्रेणिकस्य बद्ध नरकायुष: अपकर्षणं जातं चतुरशीतिसहस्रवर्षमात्रं इति ज्ञातव्यं।
भुज्यमानायुषां उदीरणाविषये सूत्रं प्ररूपितं श्रीमदुमास्वामिना तत्त्वार्थसूत्रग्रन्थे-औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्षायुषोऽनपवत्त्र्यायुष:।।५३।।
चरमशब्दस्यान्तवाचित्वात्तज्जन्मनि निर्वाणार्हग्रहणं। उत्तमशब्दस्योत्कृष्टवाचित्वाच्चक्रधरादिग्रहणं। बाह्यस्योपघातनिमित्तस्य विषशस्त्रादे: सति सन्निधाने ह्रासोऽपवर्त इत्युच्यते।
उत्तमदेहाश्चक्रधरादयोऽनपवत्र्यायुष: इत्येतल्लक्षणमव्यापि। कुत:? अन्तस्य चक्रधरस्य ब्रह्मदत्तस्य वासुदेवस्य च कृष्णस्य अन्येषां च तादृशानां बाह्यनिमित्तवशादायुरपवर्तदर्शनात् ?
न वैष दोष:। किं कारणं ? चरमशब्दस्योत्तमविशेषणत्वात्।
पुनरपि कश्चिदाशंकते-
अप्राप्तकालस्य मरणानुपलब्धेरपवर्ताभाव: इति चेत्, न; दृष्टत्वादाम्रफलादिवत् ।। यथा अवधारितपाककालात् प्राक् सोपायोपक्रमे सत्याम्रफलादीनां दृष्ट: पाकस्तथा परिच्छिन्नमरणकालात् प्रागुदीरणाप्रत्यय आयुषो भवत्यपवर्त:।
आयुर्वेदसामथ्र्याच्च।। यथा अष्टाङ्गायुर्वेदविद् भिषक् प्रयोगे अतिनिपुणो यथाकालवाताद्युदयात् प्राक् वमनविरेचनादिना अनुदीर्णमेव श्लेष्मादि निराकरोति, अकालमृत्युव्युदासार्थं रसायनं चोपदिशति, अन्यथा रसायनोपदेशस्य वैयथ्र्यं। न चादोऽस्ति ? अत: आयुर्वेदसामथ्र्यादस्त्यकालमृत्यु:।
स्यान्मतं-दु:खप्रतीकारोऽर्थ: आयुर्वेदस्येति ?
तन्न, किं कारणं ? उभयथा दर्शनात्। उत्पन्नानुत्पन्नवेदनयोर्हि चिकित्सादर्शनात्।
स्यान्मतं-यद्यकालमृत्युरस्ति कृतप्रणाश: प्रसज्येत इति ?
तन्न,
किं कारणं ?
दत्वैव फलं निवृत्ते:, नाकृतस्य कर्मण: फलमुपभुज्यते, न च कृतकर्मफलविनाश: अनिर्मोक्षप्रसंगात्, दानादिक्रियारम्भाभावप्रसंगात् च। किंतु कृतं कर्म फलं दत्वैव निवर्तते वितताद्र्रपट शोषवत् अयथाकालनिर्वृत्त: पाक: इत्ययं विशेष:।
अस्यैव तत्त्वार्थसूत्रमहाग्रन्थस्य श्लोकवार्तिकमहाभाष्ये ग्रन्थे श्रीमदाचार्यविद्यानन्दमहोदयेनापि प्रोउक्तं-
‘‘सत्यप्यसद्वेद्योदयेऽन्तरंगे हेतौ दु:खं बहिरंगे वातादिविकारे तत्प्रतिपक्षौषधौपयोगोपनीते दु:खस्यानुत्पत्ते: प्रतिकार: स्यात्’’-
कटुकादिभेषजौपयोगजपीडामात्रं स्वफलं दत्वैवासद्वेद्यस्य निवृत्तेर्न कृतप्रणाश:।’’
अकालमृत्युविषये श्रीकुन्दकुन्ददेवेनापि प्रोउक्तं-
विसवेयणरत्तक्खय-भयसत्थग्गहणसंकिलेसाणं।
आहारुस्सासाणं णिरोहणा खिज्जदे आऊ।।२५।।
पुरा षडशीतिसहस्रपंचशतवर्षपूर्वं महाभारतयुद्धकाले सर्वाधिकाकालमृत्यु: संजात: इति उत्तरपुराणे श्रीगुणभद्रसूरिणा कथितं-
तत्र वाच्यो मनुष्याणां मृत्योरुत्कृष्टसञ्चय:।
कदलीघातजातस्येत्युक्तिमत् तद्रणाङ्गणम्।।१०९।।
वर्तमानकालेऽपि आकस्मिक् दुर्घटना नानाविधा श्रूयते-क्वचित् भूकंपदुर्घटनायां सहस्राणि मनुष्या: पशवश्च सार्धमेव म्रियन्ते, क्वचिद् नदीपूरप्रवाहेण अनेकग्रामा: जलमग्ना: जायन्ते, तत्रापि शतानि सहस्राणि च परिवारा: नश्यन्ति। कुत्रचिद् वायुयानपतनदुर्घटनायां शतानि मनुष्या: उपरितनादधो पतित्वा मृत्युं प्राप्नुवन्ति। कदाचित् एवमेव वाष्पयान-विद्युद्यान-चतुश्चक्रिका-त्रिचक्रिका-द्विचक्रिकादिपतन-परस्पर-संघट्टनादिदुर्घटनासु अनेके मनुष्या: म्रियन्ते, क्वचित् बमविस्फोटकेन वा कालं कुर्वन्ति, एतत्सर्वं प्रत्यक्षेण दृश्यते, अत्रापि नानादुर्घटनाभिर्ये म्रियन्ते तेषामधिकांशत: अकालमृत्युना एव मरणं, न च सर्वेषां युगपदेव मृत्युमागच्छति, अतो जिनवचनस्योपरि श्रद्धानं कर्तव्यम्।
तथा च संप्रत्यपि अकालमृत्युनिवारणं श्रूयते-केषांचित् संघट्टनादिदुर्घटनाभि: अधिकरूपेण रक्तस्रावे संजाते आंग्लवैद्या: परस्य रत्तं तस्य मरणासन्नस्य शरीरे प्रवेश्य जीवनदानं ददति। हृदयरोगस्यापि शल्यचिकित्सां कृत्वा आरोग्यं जीवनं च यच्छन्ति। केषांचित् रुग्णानां नेत्रादीन् अवयवानपि परिवत्र्य स्वस्थं कुर्वन्ति, न चैषामपलापं कर्तुं शक्यते।
जिनभक्त्या महद्जाप्याद्यनुष्ठानेन सिद्धचक्र कल्पद्रुम-इन्द्रध्वजादिमहामण्डलविधानैश्च बहूनि दु:खानि नश्यन्ति अकालमृत्युमपि जित्वा पूर्णायु: भुञ्जन्ति जना:।
एका कथापि श्रीशांतिनाथपुराणे पठ्यते-
एकदा श्रीविजयनरेशस्य सभायामागत्य केनचित् निमित्तज्ञेन कथितं-अस्य पोदनपुरनरेशस्य अद्यप्रभृति सप्तमे दिवसे अशनिपातेन मृत्युर्भविष्यति। राज्ञा तस्यापमृत्योर्निवारणार्थं राज्यं त्यक्त्वा जिनालयं गत्वा महतीं जिनपूजां चकार। तत: तस्याकालमृत्युरभूत्वा राज्यसिंहासनस्थमूत्र्ते: शतखण्डानि बभूव।
उक्तं च-
‘‘एकदागामुक: कश्चिद् दृष्ट्वा श्रीविजयं द्विज:। सिंहासनस्थमित्याह रहसि प्राप्य चासनम्।।५२।।
इत: पौदननाथस्य सप्तमे वासरे दिव:। मूध्र्नि प्रध्वनन्नुच्चैरशनै: पतिताशनि:।।५३।।
इत्युक्त्वा विरते वाणीं तस्मिन् पप्रच्छ स स्वयं। कस्त्वं किमभिधानो वा कियज्ज्ञानं तवेति तम् ।।५४।।
इति पृष्ट: स्वयं राज्ञा ततोऽवादीत्स धीरधी:। बंधुरं सिंधुदेशेऽस्ति पद्मिनीखेटकं पुरम्।।५५।।
तस्मादमोघजिह्वाख्यस्त्वां द्विजातिरिहागमम्। पुत्रो विशारदस्याहं ज्योतिज्र्ञानविशारद:।।५६।।
इत्थमात्मानमावेद्य स्थितिमन्तं विसज्र्य तं। अप्राक्षीत्सचिवान् राजा स्वरक्षामशनेस्तत:।।५७।।
रक्षोपायेषु बहुषु प्रणीतेष्वथ मंत्रिभि:। प्रत्याचिख्यासुरित्याह तां कथां मतिभूषण:।।५८।।
कुंभकारकटं नाम शैलेन्द्रोपत्यकं पुरं। अस्ति तत्रावसद् विप्रो दुर्गतश्चंडकौशिक:।।५९।।
अभूत्प्रणयिनी तस्य सोमश्रीरिति विश्रुता। भूतान्याराध्य सा प्रापदपत्यं मुण्डकौशिकम् ।।६०।।
जिघत्सो रक्षस: कुंभाद्रक्षितुं पुत्रमन्यदा। भूतानामर्पयद् विप्रो गुहायां तैन्र्यधायि स:।।६१।।
तं तत्राप्यघद् भीष्म: शिशुमाकस्मिक: शयु:। को वा त्रातुमलं मृत्योर्धर्मं मुक्त्वा शरीरिणां।।६२।।
तत: शांतिं विधायासो रक्षोपायो न विद्यते। अस्यापि पौदनेशित्वं निरस्यामो महीपते:।।६३।।
इत्युक्त्वा विरते तस्मिन् राज्यं वैश्रवणे प्रजा:। ताम्रीये स्थापयामास राजा चास्थाञ्जिनालये।।६४।।
सप्तमेऽहनि संपूर्णे पपाताशनिरम्बरात्। मुकुटालंकृते मूध्र्नि धनदस्य महीक्षित:।।६५।।
तत: श्रीविजयस्तस्मै तन्मनोरथवाञ्छितं। दिदेशामोघजिह्वाय पद्मिनीखेटमेव स:।।६६।।
अद: कथानकं श्रुत्वा ज्योतिर्विद: शरणं न गन्तव्यं, न च पुरुषार्थविहीनेन भवितव्यं। प्रत्युत जिनभक्ति-पूजा-जाप्यानुष्ठानादिभि: असाताकर्मणां उदय: कृशीकरणीय:। अकालमृत्योरुपरि अपि विजय: प्राप्तव्य: इति सार: गृहीतव्य:।
अत्र स्थितिबंधप्ररूपणायां जघन्योत्कृष्टप्रदेशबंध: अनुभागबंधश्च किन्न प्ररूपित:?
नैष दोष:, प्रकृतिस्थितिबंधयो: अनुभागप्रदेशाविनाभाविनो: प्ररूपितयो: तत्प्ररूपणासिद्धे:। तद्यथा-स्वक-स्वककर्मप्रतिभागिनीं अन्त:कोटाकोटिप्रमाणां संज्ञिपंचेन्द्रियध्रुवस्थितिं स्व-स्वोत्कृष्टस्थितौ शोधिते स्थितिबंधस्थानविशेषो भवति। तत्र एकरूपं प्रक्षिप्ते स्थितिबंधस्थानानि भवन्ति। एवैâकस्य स्थितिबंधस्थानस्य असंख्याता: लोका: स्थितिबंधाध्यवसायस्थानानि यथाक्रमेण विशेषाधिकानि भवन्ति।
कुत: एतेषामस्तित्वं ज्ञायते ?
जघन्योत्कृष्टस्थितिभ्य: सिद्धस्थितिबंधस्थानस्यान्यथानुपपत्ते:। न च कारणमन्तरेण कार्योत्पत्ति: कुत्रापि भवति, अनवस्थानात्।
तानि च स्थितिबंधाध्यवसानस्थानानि जघन्यस्थानाद् यावदात्मात्मन: उत्कृष्टस्थानं तावद् अनन्तभागवृद्धि: असंख्यातभागवृद्धि: संख्यातभागवृद्धि: संख्यातगुणवृद्धि: असंख्यातगुणवृद्धि: अनन्तगुणवृद्धि: इति षड्विधाभि: वृद्धिभि: स्थितानि।
अनन्तभागवृद्धिकाण्डकं गत्वा एका असंख्यातभागवृद्धिर्भवति, अस्यायमर्थ:-सूच्यंगुलस्य असंख्यातभागमात्रवारं अनन्तभागवृद्धौ सत्यां एकवारं असंख्यातभागवृद्धिर्भवति। असंख्यातभागवृद्धिकांडकं गत्वा एका संख्यातभागवृद्धिर्भवति। संख्यातभागवृद्धिकांडकं गत्वा एका संख्यातगुणवृद्धिर्भवति। संख्यातगुणवृद्धिकांडकं गत्वा एका असंख्यातगुणवृद्धिर्भवति। असंख्यातगुणवृद्धिकांडकं गत्वा एका अनन्तगुणवृद्धिर्भवति। इदमेकं षड्वृद्धिरूपं स्थानं। एतादृशानि असंख्यातलोकमात्रषड्वृद्धिरूपस्थानानि तेषां स्थितिबंधाध्यवसायस्थानानां भवन्ति।
सर्वस्थितिबंधस्थानानां एवैकस्थितिबंधाध्यवसानस्थानस्याध: षड्वृद्धिक्रमेण असंख्यातलोकमात्राणि अनुभागबंधाध्यवसानस्थानानि भवन्ति। तानि च जघन्यकषायोदयानुभागबंधाध्यवसानस्थानादारभ्य उपरि यावत् जघन्यस्थितिउत्कृष्टकषायोदयस्थानानुभागबंधाध्यवसानस्थानानि इति विशेषाधिकानि। विशेष: पुन: असंख्याता लोका: तस्य प्रतिभागोऽपि असंख्याता लोका:।
एतेषामस्तित्वं कुतो ज्ञायते ?
कषायोदयस्थानात् अनुभागेन विना अलब्धात्मस्वरूपात् तत: सिद्धा प्रकृतिस्थितिबंधयो: अनुभागबंधसिद्धि:।
कथं प्रदेशबंधस्य तत: सिद्धि: ?
उच्यते-स्थितिबंधे निषेकविरचना प्ररूपिता। न सा प्रदेशै: विना संभवति, विरोधात्। तत: तस्मादेव प्रदेशबंधोऽपि सिद्ध:। प्रदेशबंधात् योगस्थानानि श्रेण्या: असंख्यातभागमात्राणि जघन्यस्थानात् अवस्थितप्रक्षेपेण श्रेण्या: असंख्यातभागप्रतिभागरूपेण विशेषाधिकानि यावत् उत्कृष्टयोगस्थानमिति द्विगुण-द्विगुणगुणहानि-आयामेन सहितानि सिद्धानि भवन्ति। किं च योगेन विना प्रदेश बंधानुपपत्ते:। अथवा अनुभागबंधात् प्रदेशबंध: तत्कारणयोगस्थानानि च सिद्धानि भवन्ति।
कुत एतत् ?
प्रदेशै: विना अनुभागानुपपत्ते:। ते च कर्मप्रदेशा: जघन्यवर्गणाया: बहव: तस्मात् उपरि वर्गणां प्रति विशेषहीना अनंतभागेन। भागहारस्याद्र्धं गत्वा द्विगुणहीना:। एवं नेतव्यं यावत् चरमवर्गणा इति। एवं चत्वारोऽपि बंधा: प्ररूपिता: भवन्ति।
केन परिणामेन कीदृशोऽनुभागो भवतीति चेत् ?
उच्यते- सुहपयडीण विसोही तिव्वो असुहाण संकिलेसेण।
विवरीदेण जहण्णो अणुभागो सव्वपयडीणं।।१६३।।
बादालं तु पसत्था विसोहिगुणमुक्कडस्स तिव्वाओ।
बालीदि अप्पसत्था मिच्छुक्कसंकिलिट्ठस्स।।१६४।।
अनुभागबंधस्य लक्षणं घातिकर्मसु शक्तिरूपेण दश्र्यते-
सत्ती य लतादारूअट्ठीसेलोवमाहु घादीणं।
दारुअणंतिमभागोत्ति देसघादी तदो सव्वं।।१८०।।
देसोत्ति हवे सम्मं तत्तो दारूअणंतिमे मिस्सं।
सेसा अणंतभागा अट्ठिसिलाफड्ढया मिच्छे।।१८१।।
अवसेसा पयडीओ अघादिया घादियाण पडिभागा।
ता एव पुण्णपावा सेसा पावा मुणेयव्वा।।१८३।।
प्रशस्ताप्रशस्ताघातिकर्मणां शक्तय: कथ्यन्ते-
गुडखंडसक्करामियसरिसा सत्था हु णिंबकंजीरा।
विसहालाहलसरिसाऽसत्था हु अघादिपडिभागा२।।१८४।।
अधुना मनाक्प्रदेशबंधो निरूप्यते-
एयक्खेत्तोगाढं सव्वपदेसेहिं कम्मणो जोग्गं।
बंधदि सगहेदूहिं य अणादियं सादियं उभयं१।।१८५।।
अयं जीव: मिथ्यात्वादिनिमित्तेन एकस्मिन् समये कर्मरूपपरिणमनयोग्यपरमाणून् गृहीत्वा कर्मरूपेण परिणामयति तस्य समयप्रबद्धमिति संज्ञा। तस्य समयप्रबद्धस्य प्रमाणं कथ्यते-
सयलरसरूवगंधेहिं परिणदं चरमचदुहिं फासेहिं।
सिद्धादोऽभव्वादोऽणंतिम भागं गुणं दव्वं।।१९१।।
एकस्मिन् समये गृहीतसमयप्रबद्धं अष्टविधमूलप्रकृतिरूपं परिणमति।
उक्तं च- आउगभागो थोवो णामागोदे समो तदो अहियो।
घादितियेवि य तत्तो मोहे तत्तो तदो तदिये।।१९२।।
सुहदुक्खणिमित्तादो बहुणिज्जरगोत्ति वेयणीयस्स।
सव्वेहिंतो बहुगं दव्वं होदित्ति णिद्दिट्ठं।।१९३।।
सेसाणं पयडीणं ठिदिपडिभागेण होदि दव्वं तु।
आवलिअसंखभागो पडिभागो होदि णियमेण।।१९४।।
बहुभागे समभागो अट्ठण्हं होदि एक्कभागम्हि।
उत्तकमो तत्थवि बहुभागो बहुगस्स देओ दु।।१९५।।
जीवतत्त्वप्रदीपिकाटीकायां-
आयु:कर्मणो भाग: स्तोक:। नामगोत्रयो: परस्परं समानोऽपि ततोऽधिक:। अन्तरायदर्शनज्ञानावरणेषु तथा समानोऽपि ततोऽधिक:। ततो मोहनीयेऽधिक:, ततो वेदनीयेऽधिक:। एवं भक्त्वा दत्ते सति मिथ्यादृष्टौ आयुश्चतुर्विधं। सासादने नारकं नेति त्रिविधं। असंयते तैरश्चमपि नेति द्विविधम्। देशसंयतादित्रये एकं देवायुरेव। उपर्यनिवृत्तिकरणान्तेषु सप्तविधमूलप्रकृतीनां प्रदेशबंध: सूक्ष्मसांपराये षष्णां उपशान्तादित्रये एकाया उदयात्मिकाया:।

[सम्पादन]
अब आहारकद्विक और तीर्थंकर प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध निरूपण करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारकशरीर, आहारकशरीर-अगोपांग और तीर्थंकर नामकर्मों का जघन्य स्थितिबंध अन्त:कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।३८।।

आहारकशरीर, आहारक-अंगोपांग और तीर्थंकरनामकर्म का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।३९।।

उक्त कर्मों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।४०।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इन तीनों प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध अपूर्वकरण गुणस्थान के चरम समय से लेकर सप्तम भाग तक उतरते हुये अपूर्वकरण क्षपक के-महामुनि के होता है।

कहा भी है गोम्मटसार कर्मकाण्ड ग्रन्थ में कि-

तीर्थंकर और आहारकद्विक का जघन्य स्थितिबंध अन्त:कोड़ाकोड़ीप्रमाण है। अन्त:कोड़ाकोड़ी के अनेक भेद होते हैं इसलिये जघन्य का भी इतना ही प्रमाण है। यह जघन्य स्थितिबंध क्षपकश्रेणी वालों के अपनी-अपनी बन्धव्युच्छित्ति के समय आठवें गुणस्थान के छठे भाग में नियम से होता है।।१४१।।

यह तीर्थंकर प्रकृति कब और किनके बंधती है ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं-

प्रथमोपशम अथवा द्वितीयोपशम सम्यक्त्व में तथा क्षायोपशमिक या क्षायिक सम्यक्त्व में असंयत से प्रमत्तगुणस्थान पर्यन्त कर्मभूमिज मनुष्य ही तीर्थंकरप्रकृति के बंध का प्रारम्भ केवली अथवा श्रुतकेवली के पादमूल में करते हैं।।९३।।

इन तीनों प्रकृतियों की बंधव्युच्छित्ति अपूर्वकरण नाम के आठवें गुणस्थानवर्ती महामुनि क्षपक के इस आठवें गुणस्थान के छठे भाग के अन्त्य समय में होती है, ऐसा जानना चाहिये।

इस प्रकार सातवें स्थल में आहारक आदि तीन प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध, आबाधा और निषेक का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
अब यशकीर्ति और उच्चगोत्र की जघन्य स्थिति, आबाधा और निषेक का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

यश:कीर्ति और उच्चगोत्र, इन दोनों कर्मों का जघन्य स्थितिबंध आठ मुहूर्त है।।४१।।

यश:कीर्ति और उच्चगोत्र, इन दोनों कर्मों का जघन्य आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है।।४२।।

'उक्त कर्मों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है।।४३।।'

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इन दोनों प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध चरमसमयवर्ती, कषाय सहित महासाधुओं के होता है। शेष अर्थ सुगम है। यहाँ कुछ विस्तार से कहते हैं-

पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण, पाँच अंतराय, यशकीर्ति, उच्चगोत्र और सातावेदनीय इन सत्रह प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध सूक्ष्मसांपरायवर्ती महामुनि करते हैं। पुरुषवेद और चार संज्वलन प्रकृति इन पाँच का जघन्य स्थितिबंध अनिवृत्तिकरणगुणस्थानवर्ती महामुनि करते हैं। आहारकद्विक और तीर्थंकर प्रकृति का जघन्य स्थितिबंध अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती महामुनि करते हैं। वैक्रियिक की छह प्रकृतियों को असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव तथा चार प्रकार की आयु का जघन्य स्थितिबंध संज्ञी अथवा असंज्ञी बांधते हैं। मिथ्यात्व के जघन्यस्थिति के स्वामी पहले बता चुके हैं। इनसे अतिरिक्त चौरासी प्रकृतियों का जघन्य स्थिति बंध बादर, पर्याप्त, एकेन्द्रिय जीव यथायोग्य विशुद्ध परिणामी करते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

कार्मण शरीर नामकर्म के उदय से और योग के निमित्त से आत्मा में कर्मरूप से परिणत हुए जो पुद्गलरूप हैं, वे जब तक उदयरूप से या उदीरणा रूप से नहीं आते हैं उतने काल का नाम ‘आबाधा’ है। उदय की आबाधा तो सूत्र में कही गई है, अब यहाँ उदीरणा की आबाधा कहते हैं-

उदीरणा की अपेक्षा सात कर्मों की आबाधा एक आवलीमात्र है और परभव संबंधी बध्यमान आयु की उदीरणा नियम से नहीं होती है।।१५९।।

इसका अर्थ यह है कि वर्तमानकाल की भुज्यमान आयु की उदीरणा होना शक्य है किन्तु बध्यमान आगामी भव की आयु की उदीरणा नहीं होती है। राजा श्रेणिक के नरकायु का बंध हो गया था ऐसे बंधी आयु का अपकर्षण हुआ है जो कि चौरासी हजार वर्ष मात्र रह गया है, ऐसा समझना। भुज्यमान आयु की उदीरणा के विषय में श्रीमान् उमास्वामी आचार्य ने तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ में कहा है-

उपपाद जन्म वाले देव और नारकी चरमोत्तम देहधारी और असंख्यात वर्ष की आयु वाले जीव परिपूर्ण आयु वाले होते हैं अर्थात् इनकी आयु का घात नहीं होता है।।५३।।

चरम शब्द अन्तवाची है, इसलिए उसी जन्म में निर्वाण के योग्य हो उसका ग्रहण करना चाहिए। उत्तम शब्द उत्कृष्टवाची है, इससे चक्रवर्ती आदि का ग्रहण होता है। बाह्य उपघात के निमित्त विष, शस्त्रादि के कारण आयु का ह्रास होता है, वह अपवत्र्य है-अपवत्र्य आयु जिनके है वे अपवत्र्य आयु वाले कहलाते हैं।

प्रश्न-उत्तम देह वाले अंतिम चक्रवर्ती आदि के आयु का अपवर्तन देखा जाता है इसलिए यह लक्षण अव्याप्त है। अंतिम चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त, वासुदेव कृष्ण आदि के आयु का बाह्य के निमित्तवश अपवर्तन देखा गया है अर्थात् इनकी अकालमृत्यु सुनी जाती है और अन्य भी ऐसे लोगों की आयु का बाह्य निमित्तों से ह्रास हुआ है इसलिए यह अव्याप्ति दोष से दूषित है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ चरम शब्द में उत्तम विशेषण दिया गया है।

यहाँ कोई पुन: शंका करता है-

अप्राप्त काल में मरण की अनुपलब्धि होने से अकालमरण नहीं है, ऐसा नहीं कहना क्योंकि फलादि के समान-जैसे-कागज, पयाल आदि उपायों के द्वारा आम्र आदि फल अवधारित (निश्चित) परिपाक काल के पूर्व ही पका दिये जाते हैं या परिपक्व हो जाते हैं, ऐसा देखा जाता है। उसी प्रकार परिच्छिन्न (अवधारित) मरणकाल के पूर्व ही उदीरणा के कारण से आयु की उदीरणा होकर अकालमरण हो जाता है।

आयुर्वेद के सामथ्र्य से अकालमरण सिद्ध होता है। जैसे-आयुर्वेद को जानने वाला अतिनिपुण वैद्य यथाकाल वातादि के उदय के पूर्व ही वमन, विरेचन आदि के द्वारा अनुदीर्ण ही कफ आदि दोषों को बलात् निकाल देता है-दूर कर देता है तथा अकालमृत्यु को दूर करने के लिए रसायन आदि का उपदेश देता है। अन्यथा यदि अकालमरण नहीं है तो रसायन आदि का उपदेश व्यर्थ हो जायेगा, किन्तु रसायन आदि का उपदेश है अत: आयुर्वेद के सामथ्र्य से भी अकालमरण सिद्ध होता है।

शंका-केवल दु:ख के प्रतीकार के लिए ही औषध दी जाती है ?

समाधान-यह बात नहीं है, अपितु उत्पन्न रोग को दूर करने के लिए और अनुत्पन्न को हटाने के लिए भी दी जाती है। जैसे-औषधि से असाता कर्म दूर किया जाता है, उसी प्रकार विष आदि के द्वारा आयु ह्रास और उसके अनुकूल औषधि से आयु का अपवर्तन देखा जाता है।

शंका-यदि अकालमृत्यु है तो कृतप्रणाश दोष आता है अर्थात् किये हुए का फल नहीं भोगा गया, अकाल में आयु नष्ट हो गई ?

समाधान-ऐसी आशंका भी नहीं है। न तो अकृत कर्म का फल भोगना पड़ता है और न कृत कर्म का नाश ही होता है, अन्यथा मोक्ष नहीं हो सकेगा और न दानादि क्रियाओं के करने का उत्साह ही होगा। दानादिक्रिया के आरंभ के अभाव का प्रसंग आयेगा। किन्तु कृत कर्म कत्र्ता को अपना फल देकर के ही नष्ट होता है। जैसे-गीला कपड़ा फैला देने पर जल्दी सूख जाता है और वही कपड़ा इकट्ठा रखा रहे तो सूखने में बहुत समय लगता है, उसी तरह उदीरणा के निमित्तों से समय के पहले ही आयु झड़ जाती है, यही अकालमृत्यु है।

इसी तत्त्वार्थसूत्र महाग्रंथ के श्लोकवार्तिक महाभाष्य ग्रंथ में श्रीमान् आचार्य विद्यानंद महोदय ने भी कहा है-

अंतरंग में असाता वेदनीय का उदय होने पर और बहिरंग में वात, पित्त आदि विकार के होने पर दु:ख-रोग आदि होते हैं, उनके प्रतिपक्षी औषधि के देने पर दु:ख-रोग की अनुत्पत्ति-दूर होना रूप प्रतीकार देखा जाता है।

कडुवी आदि औषधि का उपयोग करने से उतने मात्र से पीड़ारूप फल देकर ही असातावेदनीय का उदय खत्म हो जाता है अत: किये हुए कर्म का फल नहीं भोगा-नष्ट हो गया, ऐसा ‘कृतप्रणाश’ दोष नहीं आता है।

अकाल मृत्यु के विषय में श्री कुन्दकुन्ददेव ने भी कहा है-

विष के भक्षण से, अधिक वेदना से, रक्तक्षय हो जाने से, भय से, शस्त्र लग जाने से-शस्त्रों के घात से, संक्लेश परिणामों से, आहार-भोजन न मिलने से, श्वासोच्छ्वास के रुक जाने से-या रोक लेने से आयु छिद जाती है-अकाल में मरण हो जाता है।।२५।।

पहले छियासी हजार पाँच सौ वर्ष पूर्व महाभारत के युद्ध के समय सबसे अधिक अकालमृत्यु हुई हैं, ऐसा श्री गुणभद्रसूरि ने उत्तरपुराण ग्रंथ में कहा है-

‘‘आगम में जो मनुष्यों का कदलीघात नाम का अकालमरण बतलाया गया है, उसकी अधिक से अधिक संख्या यदि हुई भी तो उस महाभारत के युद्ध में ही हुई थी, ऐसा उस युद्ध के विषय में कहा जाता है।।१०९।।’’

वर्तमानकाल में भी नाना प्रकार की आकस्मिक दुर्घटनाएँ सुनी जाती हैं-कहीं भूकंप की दुर्घटना में हजारों मनुष्य और पशु एक साथ मर जाते हैं। कहीं नदी पूर-नदियों के बाढ़ से अनेक गाँव जल में डूब जाते हैंं, तब सैकड़ों, हजारों परिवार नष्ट हो जाते हैं। कहीं पर हवाई जहाज के गिरने से ऊपर से नीचे गिरकर सैकड़ों मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। कहीं-कहीं इस प्रकार रेलगाड़ी, हवाई जहाज, बसें, स्कूटर, साइकिल आदि के गिरने, परस्पर टकराने (एक्सीडेंट) आदि की दुर्घटनाओं में अनेकों मनुष्य मर जाते हैं, कहीं बम विस्फोट से मरते हैं, यह सब प्रत्यक्ष में देखा जाता है। यहाँ पर भी जो मनुष्य नाना प्रकार की दुर्घटनाओं से मरते हैं, उनमें तो अधिकांश लोगों का मरण अकालमृत्यु से ही होता है, क्योंकि सभी मरने वालों की एक साथ मृत्यु नहीं आती है, अत: जिनेन्द्रदेव के वचनों पर श्रद्धान करना चाहिए।

इसी प्रकार वर्तमान में अकालमृत्यु के निवारण-दूर करने के उपाय भी सुने जाते हैं-किन्हीं लोगों के संघट्टन-एक्सीडेंट आदि दुर्घटनाओं से अधिकरूप से रक्तस्राव हो जाने से डाक्टर दूसरे का खून उस मरणासन्न के शरीर में चढ़ाकर जीवनदान दे देते हैं-बचा लेते हैं।

हृदय रोग की भी शल्य चिकित्सा-आप्रेशन करके स्वस्थता एवं जीवन देते हैं। किन्हीं रोगियों के नेत्र आदि अवयवों का प्रत्यारोपण करके स्वस्थ कर देते हैं, इनका अपलाप करना-झुठलाना भी शक्य नहीं है।

जिनेन्द्र भगवान की भक्ति से, महान् जाप्य आदि के अनुष्ठान से, सिद्धचक्र, कल्पद्रुम, इन्द्रध्वज आदि महामण्डल विधानों से बहुत से दु:ख नष्ट हो जाते हैं, वे लोग अकालमृत्यु को जीतकर पूरी आयु का उपभोग कर लेते हैं।

एक कथा श्री शांतिनाथ पुराण में पढ़ी जाती है-

एक समय श्री विजयनरेश की सभा में आकर किसी निमित्तज्ञानी ने कहा-इस पोदनपुर के राजा की आज से सातवें दिन वङ्कापात से मृत्यु होगी। राजा ने अपमृत्यु के निवारण के लिए राज्य का त्याग करके जिनमंदिर में जाकर विशाल-महती जिनेन्द्रदेव की पूजा की। तब उस पूजानुष्ठान के प्रभाव से राजा की अकालमृत्यु न होकर राज्यसिंहासन पर स्थापित पाषाण मूर्ति के सौ टुकड़े हो गये।

शांतिनाथ पुराण में यह कथा इस प्रकार है-एक दिन किसी आगन्तुक ब्राह्मण ने श्रीविजय को सिंहासन पर स्थित देख एकान्त में आसन प्राप्त कर इस प्रकार कहा। आज से सातवें दिन पोदनपुर नरेश के मस्तक पर जोर से गरजता हुआ वङ्का वेगपूर्वक आकाश से गिरेगा। इतना कहकर जब वह चुप हो गया तब श्रीविजय ने उससे स्वयं पूछा कि तुम कौन हो ? किस नाम के धारक हो और तुम्हें कितना ज्ञान है ?

इस प्रकार राजा के द्वारा स्वयं पूछे गये, धीर बुद्धि वाले उस आगन्तुक ब्राह्मण ने कहा कि सिंधु देश में एक पद्मिनीखेट नाम का सुन्दर नगर है। वहाँ से मैं तुम्हारे पास यहाँ आया हूँ अमोघजिह्व मेरा नाम है, मैं विशारद का पुत्र हूँ तथा ज्योतिष ज्ञान का पण्डित हूँ। इस प्रकार अपना परिचय देकर बैठे हुए उस ब्राह्मण को राजा ने विदा किया। पश्चात् मंत्रियों से वङ्का से अपनी रक्षा का उपाय पूछा। तदनन्तर मंत्रियों ने बहुत सारे रक्षा के उपाय बतलाये, परन्तु उन उपायों का खंडन करने की इच्छा रखते हुए मतिभूषण मंत्री ने इस प्रकार एक कथा कही-गिरिराज के निकट एक कुंभकारकट नाम का नगर है। उसमें चण्डकौशिक नाम वाला एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था। ‘सोमश्री’ इस नाम से प्रसिद्ध उसकी स्त्री थी। उसने भूतों की आराधना कर एक मुण्डकौशिक नाम का पुत्र प्राप्त किया। कुंभ नाम का राक्षस उस पुत्र को खाना चाहता था अत: उससे रक्षा के लिए ब्राह्मण ने वह पुत्र भूतों को दे दिया और भूतों ने उसे गुहा में रख दिया। परन्तु वहाँ भी अकस्मात् आये हुए एक भयंकर अजगर ने उस पुत्र को खा लिया अत: ठीक ही है क्योंकि धर्म को छोड़कर मृत्यु से प्राणियों की रक्षा करने के लिए कौन समर्थ है ? इसलिए शांति को छोड़कर रक्षा का अन्य उपाय नहीं है। फिर भी हम इनके पोदनपुर के स्वामित्व को दूर कर दें अर्थात् इनके स्थान पर किसी अन्य को राजा घोषित कर दें।

इस प्रकार कहकर जब मतिभूषण मंत्री चुप हो गया तब प्रजा ने ताम्बे की प्रतिमा बनाकर उसे राज्य सिंहासन पर स्थापित कर दिया और राजा जिनालय में स्थित हो गया। सातवां दिन पूर्ण होते ही राजा की प्रतिमा के मुकुटविभूषित मस्तक पर आकाश से वङ्का गिरा अर्थात् वह राज्यसिंहासन की प्रतिमा वङ्कापात से नष्ट हो गई। तदनन्तर (मंदिर में अनुष्ठान करते हुए सुरक्षित रहे राजा) श्रीविजय ने उस अमोघजिह्व नामक आगन्तुक ब्राह्मण के लिए उसका मनचाहा पद्मिनीखेट नगर ही दे दिया।

इस कथानक को सुनकर ज्योतिषियों की शरण में नहीं जाना चाहिए और न पुरुषार्थहीन होना चाहिए, प्रत्युत् जिनेन्द्रदेव की भक्ति, पूजा-विधानानुष्ठान, जाप्यानुष्ठान आदि से असाता कर्मों के उदय को कम करना चाहिए और अकालमृत्यु पर भी विजय प्राप्त करना चाहिए, यहाँ यही सार लेना है।

शंका-यहाँ पर जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिबंध कहते समय या उनके पश्चात् जघन्य और उत्कृष्ट प्रदेशबंध तथा अनुभागबंध क्यों नहीं प्ररूपण किया ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्योंकि अनुभागबंध और प्रदेशबंध के अविनाभावी प्रकृतिबंध और स्थितिबंध के प्ररूपण किये जाने पर उनकी प्ररूपणा स्वत: सिद्ध है। वह इस प्रकार है-अपने-अपने कर्म के प्रतिभागीरूप अन्त:कोड़ाकोड़ीप्रमाण संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों की ध्रुवस्थिति को अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थिति में से घटाने पर स्थितिबंध का स्थान विशेष होता है। उसमें एक रूप और मिलाने पर स्थितिबंध के स्थान हो जाते हैं। एक-एक स्थितिबंध के असंख्यात लोकप्रमाण स्थितिबंधाध्यवसायस्थान होते हैं, जो कि यथाक्रम से विशेष-विशेष अधिक हैं। अर्थात् इस विशेष का प्रमाण असंख्यात लोक है। उनका प्रतिभाग पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है।

शंका-इन स्थितिबंधाध्यवसायस्थानों का अस्तित्व कैसे जाना जाता है ?

समाधान-जघन्य और उत्कृष्ट स्थितियों से प्राप्त या सिद्ध होने वाले स्थितिबंधस्थानों की अन्यथानुपपत्ति से स्थितिबंधाध्यवसायस्थानों का अस्तित्व जाना जाता है। कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति कहीं पर भी होती नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा न माना जाये तो अनवस्था दोष प्राप्त होगा।

वे स्थितिबंधाध्यवसायस्थान जघन्य स्थान से लेकर अपने-अपने उत्कृष्ट स्थान तक अनन्तभागवृद्धि, असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, अनन्तगुणवृद्धि, इस छह प्रकार की वृद्धि से अवस्थित हैं। अनन्तभागवृद्धिकांडक जाकर, अर्थात् सूच्यंगुल के असंख्यातवें भागमात्र जाकर अनंतभागवृद्धि हो जाने पर, एक बार असंख्यातभागवृद्धि होती है। असंख्यातभागवृद्धि कांडक जाकर एक बार संख्यातभागवृद्धि होती है। संख्यातभागवृद्धिकांडक जाकर एक बार संख्यातगुणवृद्धि होती है। संख्यातगुणवृद्धिकांडक जाकर एक बार असंख्यातगुणवृद्धि होती है। असंख्यातगुणवृद्धिकांडक जाकर एक बार अनन्तगुणवृद्धि होती है। (यहाँ सर्वत्र कांडक से अभिप्राय सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग मात्र वारों से है।) यह एक षड्वृद्धिरूप स्थान है। इस प्रकार के असंख्यात लोकमात्र षड्वृद्धिरूप स्थान उन स्थितिबन्धाध्यवसायस्थानों के होते हैं।

सर्व स्थितिबंध स्थानों संबंधी एक-एक स्थितिबंधाध्यवसायस्थान के नीचे उपर्युक्त षड्वृद्धि के क्रम से असंख्यात लोकमात्र अनुभागबंधाध्यवसायस्थान होते हैं। वे अनुभागबंधाध्यवसायस्थान जघन्य कषायोदयसंबंधी अनुभागबंधाध्यवसायस्थान से लेकर ऊपर जघन्य स्थिति के उत्कृष्ट कषायोदयस्थान संबंधी अनुभागबंधाध्यवसायस्थान तक विशेष-विशेष अधिक हैं। यहाँ पर विशेष का प्रमाण असंख्यात लोक है तथा उसका प्रतिभाग भी असंख्यात लोक है।

शंका-इन अनुभागबंधाध्यवसायस्थानों का अस्तित्व कैसे जाना जाता है ?

समाधान-अनुभाग के बिना जिनका आत्मस्वरूप प्राप्त नहीं हो सकता है, ऐसे कषायों के उदय स्थानों से अनुभागबंधाध्यवसायस्थानों का अस्तित्व जाना जाता है।

इसलिए यह बात सिद्ध हुई कि प्रकृतिबंध और स्थितिबंध से अनुभागबंध की सिद्धि होती है।

शंका-प्रकृतिबंध और स्थितिबंध से प्रदेशबंध की सिद्धि कैसे होती है ?

समाधान-कहते हैं-स्थितिबंध में निषेकों की रचना प्ररूपणा की गई है। वह निषेक-रचना प्रदेशों के बिना संभव नहीं है, क्योंकि प्रदेशों के बिना निषेक-रचना होने में विरोध आता है। इसलिए निषेक-रचना से ही प्रदेशबंध भी सिद्ध होता है।

प्रदेशबंध से योगस्थान सिद्ध होते हैं। वे योगस्थान जगश्रेणी के असंख्यातवें भागमात्र हैं और जघन्य योगस्थान से लेकर जगश्रेणी के असंख्यात भाग प्रतिभागरूप अवस्थित प्रक्षेप के द्वारा विशेष अधिक होते हुए उत्कृष्ट योगस्थान तक दुगने-दुगने गुणहानि आयाम से सहित सिद्ध होते हैं, क्योंकि योग के बिना प्रदेशबंध नहीं हो सकता है।

अथवा, अनुभागबंध से प्रदेशबंध और उसके कारणभूत योगस्थान सिद्ध होते हैं। क्यों ? क्योंकि प्रदेशों के बिना अनुभाग बंध नहीं हो सकता है। वे कर्मप्रदेश जघन्य वर्गणा में बहुत होते हैं, उससे ऊपर प्रत्येक वर्गणा के प्रति विशेष हीन, अर्थात् अनन्तवें भाग से हीन होते जाते हैं और भागहार के आधे प्रमाण दूर जाकर दुगने हीन अर्थात् आधे रह जाते हैं। इस प्रकार यह क्रम अंतिम वर्गणा तक ले जाना चाहिए।

इस प्रकार प्रकृतिबंध और स्थितिबंध के द्वारा यहाँ चारों ही बंध प्ररूपित हो जाते हैं।

शंका-किन परिणामों से कैसा अनुभाग होता है ?

समाधान-कहते हैं-

सातावेदनीयादि शुभ प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभागबंध विशुद्ध परिणामों से होता है और असातावेदनीयादि अशुभ (पाप) प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभागबंध संक्लेश परिणामों से होता है तथा इनसे विपरीत परिणामों से जघन्य अनुभागबंध होता है अर्थात् शुभ प्रकृतियों का संक्लेश परिणामों से और अशुभ प्रकृतियों का विशुद्ध परिणामों से जघन्य अनुभागबंध होता है। इस प्रकार सभी प्रकृतियों का अनुभाग बंध जानना। मंदकषायरूप तो विशुद्ध परिणाम तथा तीव्र कषायरूप संक्लेश परिणाम होते हैं।

पूर्वकथित ४२ पुण्य प्रकृतियों का तीव्र अनुभागबंध विशुद्धतारूप उत्कृष्ट परिणाम वाले जीव के होता है और असातादि ८२ अशुभ प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभागबंध तीव्र संक्लेश परिणाम वाले मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।।१६३-१६४।।

अनुभागबंध का लक्षण घातिया कर्मों में शक्तिरूप से दिखाते हैं-

घातियाकर्मों की शक्ति (स्पर्धक) लता, काष्ठ, हड्डी और पाषाण के समान है तथा दारूभाग के अनन्तवें भाग पर्यन्त शक्तिरूप स्पर्धक देशघाति हैं। शेष बहुभाग से शैलभाग पर्यन्त स्पर्धक सर्वघाति हैं।।१८०।।

भावार्थ-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तरायरूप घातियाकर्मों की शक्ति (स्पर्धक) लता, दारु, अस्थि, शैल की उपमा के समान चार प्रकार की है। जिस प्रकार लता आदि में क्रम से अधिक-अधिक कठोरता पाई जाती है, उसी प्रकार इन कर्मस्पर्धक अर्थात् कर्मवर्गणा के समूहों में अपने फल देने की शक्तिरूप अनुभाग क्रम से अधिक-अधिक पाया जाता है।

दर्शनमोहनीय कर्म के लता भाग से दारुभाग के अनन्तभागों में से एक भाग पर्यन्त देशघाति के सभी स्पर्धक सम्यक्त्वप्रकृतिरूप हैं तथा दारुभाग के एकभाग बिना शेष बहुभाग के अनन्तखण्ड करके उनमें से अधस्तन एकखण्ड प्रमाण भिन्न जाति के सर्वघातिस्पर्धक मिश्रप्रकृतिरूप जानना और शेष दारुभाग के बहुभाग में एकभाग बिना बहुभाग से अस्थिभाग-शैल भाग पर्यन्त जो स्पर्धक हैं वे सर्वघातिमिथ्यात्वरूप जानना।

विशेषार्थ-माना कि दर्शनमोहनीय कर्म की अनुभाग शक्ति के स्पर्धक १२० हैं और अनन्त की संख्या ४ मानो, लताभाग की शक्ति के स्पर्धक ८, दारुभाग के स्पर्धक १६, अस्थिभाग के स्पर्धक ३२ तथा शैलभाग के स्पर्धक ६४ हैं। अर्थात् ८±१६±३२±६४·१२० ये दर्शनमोहनीयकर्म की अनुभागशक्ति के स्पर्धक हैं। इनमें से मिथ्यात्वप्रकृति को कितना भाग मिलेगा ? मिश्र को कितना मिलेगा ? सम्यक्त्वप्रकृति को कितना भाग मिलेगा ? लता भाग के ८±दारुभाग का अनन्तवाँ भाग अर्थात् १६´४·४ इस प्रकार ८±४·१२ भाग सम्यक्त्वप्रकृति को मिलेंगे। मिश्रप्रकृति को दारुभाग के १६-४·१२ भाग जो शेष था उसका अनन्तवाँ भाग अर्थात् १२´४·३ भाग। मिथ्यात्वप्रकृति के दारुभाग में से ९ भाग बचे तथा अस्थिभाग की अनुभागशक्ति के स्पर्धक ३२ व शैल भाग के स्पर्धक ६४ मिलाकर ९±३२±६४·१०५ स्पर्धक मिलेंगे।

शेष अघातिया कर्म की प्रकृतियाँ घातिया कर्मों के समान प्रतिभागयुक्त हैं इनके स्पर्धक भी तीन भावरूप ही परिणत होते हैं। इन अघातिया कर्मों की प्रकृतियाँ पुण्य व पापरूप होती हैं। शेष घातिया कर्मों की प्रकृतियाँ पापरूप ही होती हैं।।१८१।।

आगे प्रशस्त और अप्रशस्त अघातिया कर्मों की शक्ति को कहते हैं-

'अघातिया कर्मों की प्रशस्त प्रकृतियों में शक्ति (स्पर्धक) के भेद गुड़, खाण्ड, शर्करा (मिश्री) और अमृत के समान हैं। इनमें क्रम से अधिक-अधिक मिठास है तथा अप्रशस्त प्रकृतियों के निम्ब, काञ्जीर, विष और हलाहल के समान अनुभाग हैं।।१८४।।'

विशेषार्थ-अघातिया कर्मों की प्रशस्त प्रकृतियों के प्रतिभाग अर्थात् शक्ति के भेद गुड़, खाण्ड, शर्करा (मिश्री) और अमृत के समान हैं। जैसे गुड़, खाण्ड, शर्करा (मिश्री) और अमृत एक-दूसरे से अधिक-अधिक सुख के कारण यानि मिष्ट हैं उसी प्रकार गुड़भाग, खाण्डभाग, शर्कराभाग और अमृतभागरूप प्रशस्त प्रकृति के स्पर्धक अधिक-अधिक सांसारिक सुख के कारण हैं तथा अप्रशस्त प्रकृतियों के प्रतिभाग निम्ब, काञ्जीर, विष और हलाहल विष के समान हैं। जिस प्रकार निम्ब, काञ्जीर, विष और हलाहल एक दूसरे की अपेक्षा अधिक-अधिक कटु हैं। उसी प्रकार निम्बभाग, काञ्जीर भाग, विषभाग व हलाहल भागरूप अप्रशस्त प्रकृतियों के स्पर्धक दु:ख के कारण हैं।

यहाँ प्रशस्त प्रकृतियाँ ४२ और अप्रशस्त प्रकृतियाँ ३७ हैं। वर्णादि चार प्रकृतियाँ प्रशस्त और अप्रशस्त दोनों रूप से गिनी गई हैं। प्रशस्त प्रकृति गुड़, खाण्ड, शर्करा व अमृत या गुड़, खाण्ड, शर्करा अथवा गुड़ व अन्य, इन तीन भावरूप तथा अप्रशस्त प्रकृतियाँ निम्ब, काञ्जीर, विष, हलाहल या निम्ब, काञ्जीर, विष अथवा निम्ब, काञ्जीर इन तीन भावरूप परिणत होती हैं।

अब किंचित् प्रदेशबंध का निरूपण करते हैं-

एकक्षेत्र में अवगाहनरूप से स्थित और कर्मरूप परिणमन के योग्य अनादि अथवा सादि या उभयरूप जो पुद्गलद्रव्य हैं उसे यह जीव सर्वप्रदेशों से अपने-अपने निमित्त से बांधता है।।१८५।।

भावार्थ-कर्मरूप पुद्गलों का आत्मप्रदेशों के साथ संश्लेषसंबंध होना प्रदेशबंध कहलाता है। यहाँ सूक्ष्म निगोदिया जीव की घनाङ्गुल के असंख्यातवें भाग जघन्यरूप अवगाहना को एक जघन्य क्षेत्र जानना चाहिए।

यह जीव मिथ्यात्वादि के निमित्त से एक समय में कर्मरूप से परिणमन योग्य परमाणुओं को ग्रहण करके कर्मरूप से परिणमन कराता है उसकी ‘समयप्रबद्ध’ यह संज्ञा है। उस समयप्रबद्ध का प्रमाण कहते हैं-

वह समयप्रबद्ध पाँच प्रकार रस, पाँच प्रकार वर्ण, दो प्रकार गंध तथा स्पर्श के आठ भेदों में से चार गुणों से सहित परिणमता हुआ सिद्धराशि के अनन्तवें भाग अथवा अभव्यराशि से अनन्तगुणा कर्मरूप पुद्गलरूप जानना अर्थात् इतने परमाणुओं के समूहरूप वर्गणा को ग्रहण कर प्रतिसमय कर्मरूप करता है।।१९१।।

एक समय में ग्रहण किया गया ‘समयप्रबद्ध’ आठ प्रकार के मूल प्रकृतिरूप से परिणमन करता है।

गोम्मटसार कर्मकांड में कहा भी है-

सभी मूलप्रकृतियों में आयुकर्म का भाग स्तोक है, नाम व गोत्रकर्म का भाग आपस में समान है तो भी आयुकर्म के भाग से अधिक है। अन्तराय, ज्ञानावरण और दर्शनावरण इन तीन घातिया कर्मों का भाग आपस में समान है तो भी नाम व गोत्र कर्म से अधिक है इससे अधिक मोहनीयकर्म का है तथा मोहनीय कर्म से भी अधिक वेदनीय कर्म का है।

वेदनीयकर्म संसारी जीवों को सुख-दु:ख का कारण है अत: इसकी निर्जरा अधिक होती है। इसी कारण अन्य मूलकर्मों से अधिक भागरूपद्रव्य वेदनीयकर्म को मिलता है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है।।१९३।।

वेदनीयकर्म के बिना सर्व मूलप्रकृतियों के द्रव्य का स्थिति के अनुसार विभाग होता है। जिनकी स्थिति अधिक है उनको अधिक तथा जिनकी स्थिति कम है, उनको कम हिस्सा मिलता है। समान स्थिति वाले कर्म में समानरूप से द्रव्य का बंटवारा होता है तथा इसके विभाग करने में प्रतिभागहार नियम से आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण समझना चाहिए।।१९४।।

बहुभाग के समान भाग करके आठ प्रकृतियों को देना और शेष एक भाग में पहले कहे हुए क्रम से आवली के असंख्यातवें भाग का भाग देते जाना। उसमें भी जो बहुत द्रव्य वाला हो उसको बहुत देना इस प्रकार अन्तपर्यन्त प्रतिभाग करते जाना।।१९५।।

‘जीवतत्त्वप्रदीपिका’ टीका में कहा है-

आयु कर्म का भाग सबसे कम है। नाम और गोत्र का परस्पर में समान है और आयु से अधिक है। अंतराय, दर्शनावरण, ज्ञानावरण परस्पर में समान हैं तथा इनका भाग (हिस्सा) नाम, गोत्र से अधिक है। इससे अधिक मोहनीय का है और इससे अधिक वेदनीय का है। इस प्रकार भाग करने पर मिथ्यादृष्टियों में चारों आयु हैं। सासादन में नरकायु के बिना तीन आयु हैं। असंयत में तिर्यंच के बिना दो आयु हैं। देशसंयत आदि तीन गुणस्थानों में एक देवायु ही है। ऊपर अनिवृत्तिकरण पर्यंत गुणस्थानों में सात प्रकार की मूल प्रकृतियों का प्रदेशबंध है। सूक्ष्मसाम्पराय में छह प्रकृतियों का, उपशांत आदि तीन गुणस्थानों में उदयात्मक एक प्रकृति का प्रदेश बंध है।

[सम्पादन]
अथ वेदनीयस्य सर्वत: आधिक्ये कारणमाह-

वेदनीयस्य सुख-दु:खनिमित्तत्वात् बहुकं निर्जरयति इति हेतो:, सर्वप्रकृतिभागद्रव्यात् बहुकं द्रव्यं भवतीति निर्दिष्टम्।

अथ शेषाणां स्थित्यनुसारिद्रव्यविभञ्जनमित्याह-
शेष सर्वमूलप्रकृतीनां स्थितिप्रतिभागेन द्रव्यं भवति। तु-पुन: तत्राधिकागमननिमित्तं प्रतिभागहार: आवल्यसंख्येयभागो नियमेन। भागहारान्तरनिवृत्त्यर्थं नियमवचनम्। अत्रापि विशेषो जीवतत्त्वप्रदीपिका-टीकायां द्रष्टव्योऽस्ति।
कश्चिदाह-अस्मिन् सूत्रग्रन्थे सत्त्वोदयोदीरणा: किं न प्ररुपिता: ?
उच्यते-नैष दोष:, बंधप्ररूपणात: तासामपि प्ररूपणासिद्धे:। बंधश्चैव बंधद्वितीयसमयप्रभृति सत्त्वकर्म उच्यते यावत् क्षपणस्यान्तिमसमय इति। स एव बंध: बंधावलिकातिक्रान्त: अपकर्षणं कृत्वा उदये संक्षुभ्यमान: उदीरणा भवति। स एव द्विसमयाधिकबंधावलिकायां व्यतीतायां निषेकस्थितिक्षयेण उदये पतमान: उदयसंज्ञित: भवति इति।
एवैकस्या: प्रकृते: प्रकृतिबंध: स्थितिबंध: अनुभागबंध: प्रदेशबंधश्चेति चतुर्विधो बंध:। तत्र एवैक: चतुर्विध:-उत्कृष्ट: अनुत्कृष्ट: जघन्योऽजघन्यश्चेति। एतै: षोडशभि: सर्वबंधप्रकृतीनां गुणिते अशीत्या ऊना द्विसहस्रबंधविकल्पा: भवन्ति (१९२०)। एवमुदयोदीरणसत्त्वानामपि भेदा: प्ररूपयितव्या:। तेषां प्रमाणमिदं २३६८।२३६८।२३६८। त्रिवारं द्विसहस्रत्रिशत-अष्टषष्टि: भवन्ति।
तेषां सर्वसमास: चतुर्विंशत्यधिकनवसहस्राणि (९०२४) भवन्ति।
संक्षेपेण एता: कथिता:।
कर्मणां सत्त्वविषये मनाक्विशेष: कथ्यते-
तित्थाहारा जुगवं सव्वं तित्थं ण मिच्छगादितिए।
तस्सत्तकम्मियाणं तग्गुणठाणं ण संभवदि।।३३३।।
चत्तारि वि खेत्ताइं आउगबंधेण होइ सम्मत्तं।
अणुवदमहव्वदाइं ण लहइ देवाउगं मोत्तुं।।३३४।।
णिरयतिरिक्खसुराउगसत्ते ण हि देससयलवदखवगा।
येषां आहारद्विकतीर्थकरप्रकृतीनां सत्त्वं युगपदस्ति ते मिथ्यादृष्टयो न भवन्ति। तिसृणां प्रकृतीनां कस्याश्चित् सत्त्वे सति सासादनं न भवति। तीर्थकरप्रकृतिसत्त्वे सति मिश्रगुणस्थानं न संभवति। चतुर्गतिषु कस्यचिदपि आयुष: बंधे सति सम्यक्त्वं संभवति। विंâतु देवायुर्बंधव्यतिरेकेण त्रयाणामायुषां कस्यचिदपि बंधकस्य अणुव्रतमहाव्रतानि न भवितुं शक्नुवन्ति, किंच तत्र व्रतानां कारणभूतविशुद्धपरिणामाभावात्।
नरकायु:सत्त्वे देशव्रतानि, तिर्यगायु:सत्त्वे महाव्रतानि, देवायु:सत्त्वे च क्षपकश्रेणी न भवन्ति।
संप्रति कर्मणां उदयविषये कश्चित् विशेष: उच्यते-
आहारकद्वयस्य प्रमत्तगुणस्थाने उदयो भवति, तीर्थकरप्रकृतेरुदयोऽर्हद्भगवतो:सयोगिअयोगिकेवलिनो: भवति, मिश्रप्रकृतेरुदय: तृतीयगुणस्थाने, सम्यक्त्वप्रकृतेरुदय: असंयताद्यप्रमत्तगुणस्थानेषु चतु:षु, आनुपूर्विकर्मणां उदय: मिथ्यात्व-सासादन-असंयतगुणस्थानेषु भवति। सासादन: नरकगतिं न गच्छति अत: तस्य नरकानुपूर्विकर्मण: उदयो नास्ति, शेषसर्वप्रकृतीनां उदय: मिथ्यात्वादिगुणस्थानेषु स्व-स्वगुणस्थानेषु उदयस्थानान्तसमय इति ज्ञातव्यं भवति।
अत्र मनाग् विशेष उच्यते-अयोगिकेवलिनामन्तसमये वेदनीयस्य काचिदेका प्रकृति:, मनुष्यगति-पंचेन्द्रियजाति-सुभग-त्रस-बादर-पर्याप्त-आदेय-यश:कीर्ति-मनुष्यायु:-उच्चगोत्रतीर्थकरनामप्रकृतयश्च उदयेन व्युच्छिन्ना भवन्ति।
एतच्छ्रुत्वा कश्चिदाह-यथा अन्यगुणस्थानेषु सातासातयो: उदयेन इन्द्रियजन्यसुखदु:खे भवत:, तथैव केवलिभगवतामपि सातासातयोरुदयेन सुखं दु:खं परीषहोपसर्गादिकं च भवेत् ?
आचार्य: प्राह-नैतत् संभवति।
उक्तं च-श्रीनेमिचंद्रसिद्धान्तचक्रवर्तिदेवेन-
णट्ठा य रायदोसा इंदियणाणं च केवलिम्हि जदो।
तेण दु सादासादज-सुहदुक्खं णत्थि इंदियजं।।२७३।।
समयट्ठिदिगो बंधो सादस्सुदयप्पिगो जदो तस्स।
तेण असादस्सुदओ सादसरूवेण परिणमदि।।२७४।।
एदेण कारणेण दु सादस्सेव दु णिरंतरो उदओ।
तेणासादणिमित्ता परीसहा जिणवरे णत्थि।।२७५।।
अतएव केवलिनां भगवतां अतीन्द्रियसुखत्वेन सांसारिकसुखं दु:खं वा रोगशोकपरीषहोपसर्गादीन् वा न संभवति तेषामव्याबाधमनन्तसुखमेवेति ज्ञातव्यं।
षष्ठ्यां चूलिकायां उत्कृष्टस्थितिबंधप्ररूपणा कृता, अस्यां सप्तम्यां चूलिकायां जघन्यस्थितिबंधप्ररूपणा कृता। जघन्यस्थितिबंधादुपरितनादारभ्य उत्कृष्टादधस्तनेषु मध्ये ये केचिदपि भेदा: ते सर्वे मध्यमस्थितिबंधानामेव ज्ञातव्या:।
एनं जघन्यस्थितिबंधं पठित्वा एतादृशी भावना भावयितव्या यत् अपूर्वकरणादारभ्य सूक्ष्मसांपरायपर्यंतानां महायतीनां तीर्थकरप्रकृत्यादीनां जघन्यस्थितिबंध: कथित: स कदा मे भवेदिति अस्मिन् श्रीवरदत्तवरांगसागर-दत्तादिसार्धत्रयकोटिमहामुनीनां सिद्धक्षेत्रे तारंगानामधेये मया चिन्त्यते, किंच सिद्धभूमिं वंदित्वा सिद्धपदस्यैव याचना विधातव्या अस्माभिर्भव्यपुंगवैरिति।
वरदत्तो य वरंगो, सागरदत्तो य तारवरणयरे।
आउट्ठयकोडीओ, णिव्वाणगया णमो तेसिं।।
श्रीवरदत्तवरांगसागरदत्तादय: सार्धत्रयकोटिमुनिवरा: तारवरनगरे वर्तमानकाले तारंगानामधेये पर्वते शुक्लध्यानाग्निना अघातिकर्माणि निर्मूल्य निर्वाणं गता:। अद्य त्रयोविंशत्यधिकपंचविंशतिशततमे वीराब्दे पौषशुक्लासप्तम्यां तिथौ अत्र पावननिर्वाणक्षेत्रे आगत्य तान् सिद्धपदप्राप्तान् सिद्धपरमेष्ठिन: पुन: पुन: नमस्कृत्य एषा सप्तमी चूलिका मया पूर्यते ज्ञानावरणकर्मणां जघन्यस्थितिकरणार्थं क्षपणार्थं चेति।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे श्रीमद्भूतबलि-सूरिविरचितजीवस्थानचूलिकायां श्रीवीरसेनाचार्यकृतधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्थाधारेण विरचितायां विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्तिश्रीशांतिसागर:
तस्य प्रथमपट्टाधीश: श्रीवीरसागराचार्य: तस्य शिष्या जंबूद्वीप रचना प्रेरिका गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां जघन्य-स्थितिबंध-चूलिकानाम सप्तमोऽधिकार: समाप्त:।