ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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08. सीताहरण चन्द्रनखा की माया

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सीताहरण चन्द्रनखा की माया

(४७)

अब सुनें किस तरह हरण हुआ, सीताजी को क्या निमित बना।
लक्ष्मण वन में थे घूम रहे, कोई दिव्यगंध ने खींच लिया।।
चल दिए छोड़कर सभी कार्य, वह गंध जिधर से आई थी ।

जाकर देखा इक दिव्य खड्ग, जिससे आँखें चुंधियाई थी।।
(४८)

जिस पर वह खड्ग था टँगा हुआ, उस पर ही एक प्रहार किया ।
और धार परखने की खातिर, था खेल—खेल में काट दिया।।
उसके रक्षित सब देव प्रकट हो, नमस्कार कर पूजा की ।

अब आप हमारे स्वामी हो , है नहीं आपसा दूजा ही।।
(४९)

होकर आकुलित जटायु को, श्रीरामचंद्र ने आज्ञा दी।
देखो उड़कर तुम जंगल में, लक्ष्मण ने कहां देर कर दी? ।।
पर तभी दिखे आते लक्ष्मण, भूषित माला आभूषण से ।

देदीप्यमान था खड्ग लिए, लग गये गले वह भ्राता से।।
(५०)

इस तरह राम—लक्ष्मण—सीता, तीनों सुखपूर्वक बैठे थे।
किस तरह मिला यह खडग् मुझे, अपने साहस में ऐठे थे।।
पर तभी वहां मिलने आई, रावण की भगिनी चंद्रनखा ।

अपने सुत को वह देख रही, जब इधर उधर वह नहीं दिखा।।
(५१)

हो गया अमंगल कोई क्या, आशंकित हो यह सोच रही।
और तभी उसे सिर कटा दिखा, मूच्र्छित होकर गिर पड़ी वहीं।।
जब आया होश उसे सुत का, गोदी में सिर रख रुदन किया ।

हे दैव! विधाता मेरे संग, इतना भारी अन्याय किया।।
(५२)

बारह वर्षों तक तप करके, मेरे सुत ने यह पाया था ।
उसको ये निधी दिखा करके, न तीन दिवस सह पाया था।।
न रहा पुत्र न खड्ग मिला, देखूँ किसने यह हिम्मत की।

वह भी न जीवित रह पाये, आवेश में आकर खड़ी हुई।।
(५३)

वह चली खोजने शत्रू को, पर नजर पड़ी इन तीनों पर।
स्तब्ध रह गयी देख उन्हें, आसक्त हुई वह रघुवर पर।।
कन्या का रूप बना करके, रोने बैठी इक वृक्ष तले।

सीता ने पास बुला करके, कारण क्या रोने का कन्ये।।
(५४)

मां—पिता मरण को प्राप्त हुए, अब मेरा कोई नहीं जग में ।
वुछ पुण्य उदय से हे स्वामिन् ! अब आप मिले निर्जनवन में।।
जबतक मैं प्राण नहीं छोडूँ अब आप मुझे स्वीकार करो।

उसके ये कुटिलवचन सुनकर, श्रीराम नहीं कुछ भी बोले।।
(५५)

जब चली गयी वह चंद्रनखा, तीनों जन मिलकर खूब हंसे ।
शोकाकुल चंद्रनखा ने फिर, जाकर पति से ये शब्द कहे।।
जंगल में तीन जनों ने मिल, मेरे सुत को है मार दिया ।

अरु छीन लिया है दिव्य खड़ग, और मेरा भी अपमान किया।।
(५६)

यह सब सुनकर उठ खड़ा हुआ, खरदूषण शोकाक्रांत हुआ।
मै महाप्रतापी हूँ फिर भी, मेरे ही सुत का घात हुआ।।
रावण को सूचित करके वह, चल दिए युद्ध करने वन में।

सुख से नही वशीभूत होंगे, अनुमान लगाकर ये मन में।।
(५७)

यह दिव्य खड्ग जिसने पाया, वह भी बलशाली ही होगा।
जिसने यह दुष्कर कार्य किया, वह नही किसी से कम होगा।।
जब सात दिनों के अंदर ही, वह खड्ग ग्रहण के योग्य रहे।

फिर सुत ने क्यों नहिं ग्रहण किया, जब चार दिवस थे बीत गये।।
(५८)

रणभेरी सुनकर समझ गये, यह उस स्त्री की माया है।
या खड़्गरत्न के कारण ही, उसने उत्पात मचाया है।।
जैसे ही रघुवर खड़े हुए, तब लखन तुरत ही बोल पड़े।

मेरे रहते हे देव ! आपके, कदम युद्ध की ओर बढ़े।।
(५९)

यह शोभा देता नहीं नाथ! इसलिए मुझे आज्ञा दीजे।
सबको क्षण में परास्त कर दूँ, यह भी आशीष मुझे दीजे।।
रक्षा करिए वैदेही की, मुझ पर विपत्ति जब आयेगी।

तब सिंहनाद मैं कर दूँगा, आवाज आप तक आयेगी ?।।