ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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080.भगवान आदिनाथ की प्रतिमा हस्तिनापुर में

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भगवान् आदिनाथ की प्रतिमा-

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यहाँ त्रिमूर्ति मंदिर के शिलान्यास के समय सन् १९७९ में प्रतिष्ठित भगवान् बाहुबली की मूर्ति को विराजमान करने का ही निर्णय था। इसी समय से मेरे मन में यह बात चल रही थी कि भगवान् आदिनाथ की एक खड्गासन प्रतिमा भी इसी मंदिर में विराजमान की जावे तथा आजू-बाजू में भरत-बाहुबली की प्रतिमा विराजमान करके इसे तीन मूर्ति मंदिर नाम दे दिया जावे। जब मैंने यह मन की बात कही, तब सभी को जंच गई और तभी से चर्चा चली कि भगवान् आदिनाथ की मूर्ति बनाने के लिए आदेश (आर्डर) दिया जावे।

जम्बूद्वीप में सुमेरु पर्वत के सिवाय जिनमंदिरों की ६२ प्रतिमाएँ एवं देवभवन में विराजमान करने के लिए १२३ जिन प्रतिमाएँ यहाँ प्रतिष्ठा के लिए लानी थीं। उनके आदेश के लिए मैं बार-बार कहा करती थी। मगसिर सुदी १०, दिनाँक ७ दिसम्बर १९८१ के दिन मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार ने ७ फुट की भगवान् आदिनाथ की खड्गासन प्रतिमा के लिए भी आदेश दिया। विमलकिशोर दिल्ली वाले, जिन्होंने इस मंदिर का शिलान्यास १० मई १९८१ को किया था, वे बोले- ‘‘यह मंदिर पूरा मैं बनवाऊँगा। भगवान् आदिनाथ की प्रतिमाजी मेरी तरफ से रहें, तो अच्छा है।’’ मैंने कहा-‘‘ठीक है।’’

इस निमित्त से उस अवसर पर प्रतिमा के आदेश के समय मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार इन्हें भी साथ लेते गये थे। फिर भी भगवान् आदिनाथ की प्रतिमा का आदेश तो मेरी आज्ञा से मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार ने ही किया था। हाँ, ये इस मूर्ति का न्यौछावर देना चाहते थे, अतः इन्हें भी साथ में ले लिया था। आगे देखिये क्या होता है?

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इन्द्रध्वज विधान-

५ जुलाई से १४ जुलाई १९८४ तक इन्द्रध्वज विधान का आयोजन यहाँ हस्तिनापुर में रखा गया। निर्मलकुमार जी सेठी, सुमेरचंद जी पाटनी और मांगीलाल जी हैदराबाद, इन तीनों महानुभावों ने मिलकर सपरिवार यह विधान कराया। १२ जुलाई गुरुवार, आषाढ़ शु. १४ को मैंने अपने संघ सहित यहाँ वर्षायोग की स्थापना की। इस मध्य अनेक बैठके होती रहीं और अनेक कार्यक्रम सम्पन्न हुए।

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निर्माणकार्य में रुकावट-

सन् १९७९ में जम्बूद्वीप के प्रथम चरण निर्माण में सुदर्शनमेरु पर्वत बनकर तैयार हो चुका था और उसकी प्रतिष्ठा भी हो चुकी थी पुनः जम्बूद्वीप निर्माण के लिए शिलान्यास हो चुका था, हिमवान्-महाहिमवान् आदि पर्वत बनाये जा रहे थे। पुनः ४ जून १९८२ को जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति का प्रवर्तन हुआ, जिसका भ्रमण सारे भारत में चल रहा था। यह निर्णय लिया गया था कि १-२ वर्ष ज्ञानजयोति भ्रमण कराकर यहाँ जम्बूद्वीप का निर्माण पूरा करके जम्बूद्वीप की प्रतिष्ठा करानी है। उधर ज्ञानज्योति भ्रमण का कार्य मोतीचन्द जी (महामंत्री)एवं पं. बाबूलाल जी जमादार (संचालक) संभाल रहे थे। इधर मुझे कभी-कभी यह चिंता हो जाया करती थी कि-

‘‘पहले इन पर्वतों पर विराजमान होने वाली जिन प्रतिमाओं के लिए आदेश होना चाहिए।’’ अतः प्रतिदिन मेरे मस्तिष्क में यह विषय आता रहता था। मैं मोतीचन्द और रवीन्द्र कुमार को बार-बार कहा करती थी। ये दोनों भी मेरे पास बैठकर जिन प्रतिमाओं के साइज-माप आदि लिखा करते थे। इनके चैत्यालयों के लिए भी आर्डर देना जरूरी था। उनके प्रमाण आदि निर्धारित करके मोतीचन्द और रवीन्द्र कुमार दोनों मिलकर जयपुर गये और १७ मार्च १९८३ के दिन निकेतन मूर्ति आर्ट वाले जगदीश मूर्तिकार को अट्ठावन (५८)चैत्यालयों के लिए आर्डर देकर आ गये पुनः यहीं हस्तिनापुर में अब्दुल जब्बार (जुम्मा जी) मकराना वाले को १२४ देवभवन बनाने का आर्डर दिया। यह आर्डर १६ नवम्बर १९८३ को किया गया था।

इन दोनों ठेकेदारों के काम की बहुत ही मंदगति थी, जिससे मोतीचन्द और रवीन्द्र कुमार को संतोष नहीं हो रहा था। देवभवनों का काम तो बहुत ही असंतोषप्रद रहा, मुश्किल से एक वर्ष में ४५ के करीब देवभवन बन पाये थे। इन दोनों की आकुलता बढ़ती जाती थी। मैं केवल मोतीचन्द और रवीन्द्र कुमार को माप-प्रमाण आदि लिखा देती थी, बाकी आर्डर वगैरह के काम इन्हीं के थे अतः समय पर ये सब बनकर कैसे मिल पाएंगे? दोनों चिंतित हो जाया करते थे।

इन दोनों ने जुम्मा जी से बहुत प्रयास किया किन्तु सफलता नहीं दिखी, तब उनका ठेका निरस्त करके इन्होंने दूसरा कारीगर बुलाया और १० मई १९८४ के दिन इन देवभवनों को बनाने का उसे ठेका दिया। अब कुछ संतोष हुआ कि हाँ, प्रतिष्ठा तक ये रचनाएँ सम्पन्न हो जावेंगी। इसका नाम मंशाराम (मंच्छाराम) था। इसके काम की दुु्रतगति देखकर इसे ही इन दोनों ने छोटे-छोटे तोरणद्वार बनाने के लिए ३०-७-१९८४ को आर्डर दिया पुनः इसे ही जम्बूद्वीप में पत्थर लगाने का काम भी १३-८-१९८४ को दिया पुनः इसे ही २०-८-१९८४ के दिन देव-देवियाँ बनाने के लिए आर्डर दे दिया।

अब जगदीश प्रसाद मूर्तिकार की भी गति देखकर सभी चैत्यालय कब कहाँ आ पावेंगे? यह चिंता बन गई। इधर जंबूद्वीप प्रतिष्ठापना की तैयारियाँ चलने लगीं और सन् १९८५ में करने का निर्णय हो गया। तब यहाँ के जंबूद्वीप के गजदन्त आदि के १० चैत्यालय बनाने का ठेका भी यहीं पर मंशाराम कारीगर को ६ जनवरी १९८५ के दिन गया। इस मंशाराम कारीगर ने समय पर सारे ही देवभवनों का काम बहुत ही सुन्दर सम्पन्न कर दिया और जगदीश मूर्तिकार से बचे शेष चैत्यालय भी बनाकर तैयार कर दिये। इन्हीं देवभवन और चैत्यालय में भगवान् विराजमान करने थे अतः अब इधर की चिंता कम हुई थी। अब तो वे सभी जिन प्रतिमाएँ आ जावें जिनकी प्रतिष्ठा होनी है, यह चिंता हो जाती थी।

इस मंशाराम कारीगर से भी जितने तोरणद्वार और जितने देव-देवियों को बनवाना था, वे पूरे नहीं बन पाये किन्तु जितने बन गये ठीक है, उन्हीं से संतोष हो गया। मैंने कहा- शेष जो तोरणद्वार बचे हैं और देव-देवियाँ बनना हैं वे सब प्रतिष्ठा के बाद बनते रहेंगे।

इस प्रकार निर्माण कराने में कितनी कठिनाइयाँ आती हैं और फिर जो बिल्कुल नये निर्माण। इसमें गंगा, सिंधु आदि नब्बे नदियाँ निकाली गई हैं। हिमवान् आदि आठ पर्वत बनाये गये हैं। इन सबके निर्माण कराने में जितना ऊहापोह हुआ है, जितना मस्तिष्क लगा है और जितनी कठिनाइयों को पार किया गया है, वह सब लिखना क्या सोच पाना भी संभव नहीं है। मैं यहाँ पर उपस्थित रही हूँ इसलिए जो कुछ अनुभव में आया है तो कहना पड़ता है कि निर्माण कार्य में कितना श्रम करना होता है, कितनी विघ्न-बाधाएँ झेलनी पड़ती हैं?

जब जुम्मा का ठेका निरस्त कर दिया गया, तब किन्हीं लोगों ने बताया कि कुछ महानुभावों ने आपके जम्बूद्वीप के कार्य में विघ्न डालने के अभिप्राय से ही उसको भड़का दिया था कि जिससे समय पर काम न हो सके। इन विघ्न संतोषियों में विशिष्ट महानुभावों के नाम सुनने में आये थे। वास्तव में विघ्न संतोषी कितने ही विघ्न डालना चाहें परन्तु शुभ कार्य सम्पन्न होते ही होते हैं, इन्हें कोई रोक नहीं पाते हैं, मैं कहा करती हूँ कि-

‘‘अहो! जिनके पुत्र कदाचित् शराबी आदि बन जायें, अन्य दुर्व्यसनों मेंं लग जायें तब माता-पिता रो-रोकर पागल हो जाते हैं, कितनों ही के तो दिल पर धक्का लगने से बीमार हो जाते हैं और कितने ही अपनी जीवनलीला समाप्त कर देते हैं किन्तु पात्रों को अनुचित कार्य से रोक नहीं पाते हैं। फिर भला यदि कोई अच्छे कार्य कर रहे हों तो उन्हें कौन रोक पायेगा? हाँ, विघ्न-बाधा डालकर अशुभ कर्मों का संचय भले ही कर लें किन्तु कार्यों को रोक पाना संभव नहीं है।’’

यहाँ हस्तिनापुर में पहले बड़े मंदिर के कुछ लोगों ने जम्बूद्वीप के लिए जगह क्रय करने से लेकर प्रारंभ करने तक बहुत कुछ सहयोग दिया है। पश्चात् कुछ वैचारिक भेद-जैसे कि तेरहपंथ, बीस पंथ, कांजी पंथ आदि के निमित्त से सहयोग नहीं भी दिया है। इसी तरह कुछ महानुभाव विरोध में भी लगे रहे हैं और अकारण झूठी-झूठी बातें उठाकर बहुत कुछ विरोध किया है। कई बार मैंने बड़े मंदिर के कार्यकर्ताओं को समझाते हुए प्रेरणा दी है-‘‘भाई! आप लोग बजाए विरोध के यदि सृजनात्मक कार्य करें तो कितना अच्छा होगा....आप लोेगोें के विरोध कराने से जम्बूद्वीप का कार्य तो रुकेगा नहीं.....।’’

आज मुझे गौरव से कहना पड़ता है कि कई एक महानुभावों ने उधर मंदिर में निर्माण कार्य को कराना प्रारंभ कर दिया। उसी में अपनी शक्ति लगाने लगे तो आज वहाँ नंदीश्वर द्वीप का निर्माण हो गया। उसकी प्रतिष्ठा भी हो गई और पुनः समवसरण का निर्माण कार्य भी किया है तथा भगवान् पार्श्वनाथ का विशाल मंदिर भी बनवाया जा रहा है अतः जो निर्माण कार्य के विरोधी थे, वे भी निर्माण कार्य में तन-मन-धन लगाकर बहुत बड़ा पुण्य संचय कर रहे हैं। यह बड़े मंदिर वालों का उदाहरण हर क्षेत्र वालों को लेना चाहिए और निर्माण कार्य आदि में तन-मन-धन लगाकर पुण्य और यश को सम्पादित करते रहना चाहिए।

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पं. बाबूलाल जी जमादार-

१४ मार्च १९८३ को पंडित बाबूलाल जी ज्ञानज्योति से बिहार प्रांत से रवीन्द्र कुमार के जाने के बाद वापस आ गये थे। इसके बाद उनकी पत्नी की बीमारी के निमित्त से वे पुनः ज्ञानज्योति में नहीं जा सके। कई बार रेल का रिजर्वेशन भी करा लिया लेकिन धर्मपत्नी के अस्वस्थ होने से जा नहीं पाये। अंत में १७ मई १९८४ को सनावद में ज्ञानज्योति स्वागत के विशेष कार्यक्रम में उपस्थित हुए थे। वहाँ भी उनका उत्साह नवयुवकों जैसा ही दिख रहा था। ९ जून १९८४ को रात्रि में उनके घर पर बड़ौत में ही अचानक पंडित जी का स्वर्गवास हो गया। कुछ समय पूर्व पंडित जी हस्तिनापुर आकर मुझसे बोले थे- ‘‘माताजी! मुझे आपके हाथ की पुरानी पिच्छिका चाहिए, चूूँकि आपके द्वारा इस पिच्छी से अनंत जीवों की रक्षा तो होती ही है, साथ ही आप लाखों जाप करती हैं, सो उसका असर इस पिच्छी में बहुत ही आ जाता है।’’

मैंने उनकी इच्छानुसार उसी समय नई पिच्छी लेकर उन्हें वह अपनी पुरानी पिच्छी दे दी थी। बड़े आदर से वे उसे अपने सिर पर चढ़ाकर पुनः उसे कपड़े में लपेटकर घर ले गये थे। जिसे अपने शयन कक्ष में ऊपर रख दिया था और प्रतिदिन उसे नमस्कार करते थे। यह उनकी संयम, संयमी और संयमोपकरण के प्रति भक्ति ही थी। पंडित जी के स्वर्गवास के १० दिन बाद उनकी पत्नी और पुत्र, पुत्र-वधुएँ सब मिलकर यहाँ जम्बूद्वीप पर आये, रो-रोकर अपना दुःख सुनाया। उनकी पत्नी बहुत रो रही थीं। बोलीं- ‘‘माताजी! नम्बर तो मेरा था, यह क्या हुआ?......लोग घर में आते हैं, उनमें से कोई-कोई कहने लगते हैं-जाना इन्हें था चले गये, पंडित जी......।’’ यह सुनकर मुझे दुःख हुआ कि ‘लोगों को ऐसा नहीं कहना चाहिए।’ मध्यान्ह में सभा रखी गयी। मैंने वैराग्य और अध्यात्म से मिश्रित उपदेश किया, जिससे इन दुःखी परिवार का दुःख बहुत कुछ हल्का हुआ। मैंने कहा-

‘‘देखो! ‘संयुक्तानां वियोगश्च भविता हि नियोगतः’ जिनका संयोग हुआ है उनका वियोग नियम से होगा ही होगा और फिर भी एक न एक दिन मरना सभी को है, फिर जो मरण कर चुके, उनके लिए क्या रोना? वे कथमपि वापस तो आयेंगे नहीं, देखो! रोने से असाता कर्म का ही बन्ध होता है। आचार्यश्री उमास्वामी ने कहा है- ‘दुखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यात्मपरोभयस्थान्यसद्वेद्यस्य।’ दुःख करना, शोक करना, पश्चात्ताप करना, रोना, किसी का वध करना और ऐसा रुदन करना-विलाप करना कि जिससे दूसरे भी रो पड़ें। इन सब क्रियाओं को करने-कराने से असातावेदनीय का आस्रव होता है जिससे पुनः अगले भव में रोना पड़ता है और यदि ऐसे प्रसंग में धैर्य धारणकर धर्मध्यान में अपना मन लगाया जाता है तो पुनः ऐसे वियोग के रोने-धोने के दिन ही नहीं आते हैं....।

दूसरी बात यह है कि प्रत्येक जीव के साथ अनादिकालीन इस संसार में सबके संबंध हो चुके हैं। भला इस संसार में कौन किसके माता-पिता नहीं हुए? या पुत्र-पुत्री, पत्नी आदि नहीं हुए? अतः किस-किस के लिए रोना? अरे! जिनका मरण हुआ वे तो दूसरी गति में जाकर वहीं रम गये, वे तो तुम्हें याद भी नहीं करते होंगे, पुनः तुम लोग उनके लिए रो-रोकर अशुभ कर्म क्यों बांधो?’’

इत्यादि उपदेश सुनकर सबको शांति मिली। उनकी पत्नी को मैंने बहुत समझाया कि अब आप कुछ दिन मेरे पास यहीं रहो जिससे परिणामों में शान्ति आयेगी। उन्होंने कहा-‘‘दो-चार दिन बाद वापस आकर रहूँगी।’’

इसके बाद घर जाने पर उनका स्वास्थ्य कमजोर होता गया पुनः १४ जुलाई १९८४ को उनका भी स्वर्गवास हो गया। उनके पुत्रों व पुत्री को एक साथ माता-पिता दोनों का वियोग बहुत ही दुःखद रहा किन्तु होनहार को कौन टाल सकता है?.....और इसी जन्म-मरण के दुःखों का नाम ही तो संसार है!

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इन्द्रध्वज विधान-

यहाँ हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर जयकुमार विनायका भागलपुर वालों ने ३० सितम्बर से ९ अक्टूबर तक इन्द्रध्वज विधान किया पुनः विधान की समाप्ति पर १००८ कलशों से भगवान् शांतिनाथ का महाभिषेक हुआ। मेरा ५०वां जन्मदिवस शरद पूर्णिमा के दिन सादगी से मनाया गया। दूध से मेरे चरणों का अभिषेक कर पूजा की। मध्यान्ह में सरधना के वीर बाल सदन के बच्चों द्वारा ‘ऋषभदेव का वैराग्य’ नाम से एकांकी प्रस्तुत किया गया पुनः मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार, पं. सुधर्मचंद आदि ने विनयांजलि अर्पित की।

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आसाम में धर्म प्रभावना-

ज्ञानज्योति का भ्रमण ९ अगस्त से गुजरात में प्रारंभ हुआ पुनः १४ अक्टूबर १९८४ से आसाम में प्रारंभ हुआ। उस समय वहाँ मोतीचन्द, रवीन्द्रकुमार और माधुरी तथा पंडित सुधर्मचंद जैन तिवरी वाले ये सब ज्ञानज्योति में साथ-साथ थे। बहुत अच्छी प्रभावना हो रही थी।

इंदिरा जी के करकमलों से ४ जून १९८२ को जो जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति का प्रवर्तन हुआ था, उस ज्ञानज्योति से ३ वर्ष में सारे भारत में जो धर्म, सहिष्णुता, सौहार्द और अहिंसा का प्रचार हुआ था, वह अजर-अमर रहेगा। ३० अक्टूबर को अंगरक्षकों द्वारा इंदिरा गांधी जी की हत्या के समाचार से हम साधु वर्गों को भी दुःख अवश्य हुआ किन्तु होनहार को कौन टाल सकता है? ऐसा चिन्तन करना ही पड़ा।

विशेष ज्ञातव्य यह है कि ३१ अक्टूबर १९८२ के दिन जम्बूद्वीप सेमिनार के उद्घाटन में फिक्की ऑडीटोरियम के हॉल में सर्वप्रथम एक कमरे में श्री राजीव गांधी को मैंने कुछ शिक्षाएं दी थीं और जो विशेष आशीर्वाद दिया था, आज ३१ अक्टूबर १९८४ में जब वे भारत के प्रधानमंत्री बने, तब मेरे कई एक भक्तों ने वह आशीर्वाद दिवस याद दिलाया कि वास्तव में उन्हें वह आशीर्वाद फला है।

इंदिरा जी के अंगरक्षकों ने ही इंदिरा जी को मारा, ‘अंगरक्षक ही भक्षक बन गये।’ यह दुर्घटना अत्यन्त कृतघ्नता को सूचित करते हुए जीवंधर चरित में वर्णित ‘काष्ठांगार’ मंत्री की याद दिला देने वाली हुई। सत्यंधर महाराज ‘काष्ठागांर’ नामक मंत्री को राज्यभार संभलवाकर महल में थे कि उसने दुष्टतापूर्वक युद्ध करके सत्यंधर महाराज को मार डाला और राज्य को हड़प लिया। उसी क्षण शमशान भूमि में महारानी विजया ने पुत्र को जन्म दिया, जिसका ‘जीवंधर’ नाम रखकर सेठ गंधोत्कट ने पाला। कालांतर में जीवंधर ने काष्ठांगार को मार कर अपना राज्य हस्तगत किया।

उसी प्रकार इंदिरा गांधी के अंगरक्षकों द्वारा उनका निधन और उन्हीं के पुत्र राजीव को तत्क्षण प्रधानमंत्री पद पर प्रतिष्ठित होने की घटना जीवंधर चरित्र की याद दिलाती है। दैव की विडम्बना विचित्र है।

‘अलंघ्यशक्तिर्भवितव्यतेयं’ यह श्री समंतभद्र स्वामी की पंक्ति ऐसे प्रसंग पर अवश्य ही याद आ जाती है तथा अंगरक्षकों द्वारा ऐसी निंद्य प्रवृत्ति देखकर ‘कौन किसका है? और किस पर विश्वास करना?’’ तब पूज्यपादस्वामी का यह श्लोक भी याद आ जाता है-

जगद्देहात्मदृष्टीनां विश्वास्यं रम्यमेव च।

स्वात्मन्येवात्मदृष्टीनां क्व विश्वासः क्व वा रतिः।।

शरीर और आत्मा को एक समझने वाले बहिरात्मा के लिए यह संसार विश्वास के योग्य है और रमणीय, सुन्दर भी दिखता है किन्तु जिनकी अपनी आत्मा में ही एक दृष्टि है-आत्मा में ही एक विश्वास है, ऐसे शरीर और आत्मा को भिन्न-भिन्न समझने वाले अन्तरात्मा सम्यग्दृष्टि के लिए संसार में कहाँ पर विश्वास है? अथवा कहाँ पर प्रेम है? अर्थात् सम्यग्दृष्टि को इस संसार में न कहीं विश्वास है और न कहीं प्रेम ही होता है। चूँकि वह समझता है कि कर्मों की गति बड़ी विचित्र है।