ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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084.इंद्रध्वज विधान, हस्तिनापुर में माताजी द्वारा वर्षायोग

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इंद्रध्वज विधान, हस्तिनापुर में माताजी द्वारा वर्षायोग

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त्रिमूर्ति स्थापना- प्रतिष्ठा के बाद त्रिमूर्ति मंदिर में मुख्य वेदी में कमल बनवाया गया पुनः तीनों प्रतिमाजी खड़ी करने के लिए कमल रखे गये। २० जून १९८५, आषाढ़ शु. २ गुरुवार को बीचोंबीच के कमल पर भगवान ऋषभदेव की मूर्ति खड़ी की गयी। ११ बजकर ५५ मिनट पर भगवान ऋषभदेव विराजमान हुए, अनंतर दायीं ओर के कमल पर १ बजकर ७ मिनट पर भगवान भरत की मूर्ति खड़ी की गई पुनः तृतीय कमल का काम पूरा न हो सकने से आगे पुनः २२ अगस्त १९८५, द्वितीय श्रावण शु. ७ को प्रातः ७ बजकर ४५ मिनट पर भगवान बाहुबली की मूर्ति खड़ी की गई है। अब तो इस वेदी का तोरण द्वार बनकर आजू-बाजू में सीढ़ियां भी बन चुकी हैं।

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इन्द्रध्वज विधान-

२४ जून से ३ जुलाई तक यहाँ त्रिमूर्ति मंदिर में इन्द्रध्वज विधान के तीन मंडल बनाये गये। तीन जगह के लोगों ने विधान किया। अमरचन्द जैन, होमब्रेड मेरठ, प्रद्युम्नकुमार छोटी शाह, टिकैतनगर और सुखानंद जैन, बहराइच तीनों ये प्रमुख विधानकर्ता थे। इसी मध्य मुझे एक फुड़िया हो गई। पक गई तो बैठने में बहुत दर्द हो गया। तब मैं यहाँ रत्नत्रय निलय में लेटे-लेटे इन्द्रध्वज की पूजन और जयमालाएँ सुनती रहती थी। उपयोग में बहुत ही शांति होती थी। वेदनाजन्य आर्तध्यान से मन हटकर उन पूजा के छंदों में इतना अधिक रम जाता था कि चित्त में शांति आ जाती थी। यह विधान पं. शिखरचंद प्रतिष्ठाचार्य (भिंड वालों) ने कराया था। संगीत की मधुर ध्वनि और जगह-जगह अर्थ को समझाने की शैली में बहुत ही अच्छा लगता था, किन्तु मैं मंदिर में जाकर बैठ नहीं पाती थी अतः सभी श्रावकों का मन उदास रहता था।

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वर्षायोग स्थापना-

१ जुलाई १९८५ आषाढ़ शु. १४ को वर्षायोग स्थापना के समय मैं लेटी रही थी, तब प्रार्थना करने वाले श्रावकों की आँखों में आँसू आ गये थे। लेटे ही लेटे मैंने सारी क्रियायें सम्पन्न की थी। पुनः अलसी की पुल्टिस से यह फुड़िया आषाढ़ शु. १५ को प्रातः अपने आप फूट गई, जिससे शांति हो गई थी।

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जम्बूद्वीप विधान-

भादों कृष्णा दूज, १ अगस्त से मैंने जंबूद्वीप विधान बनाना शुरू किया। कुछ ही पूजाएँ शेष रह गई थीं कि भादों शु. १२ से मुझे ज्वर आना शुरू हो गया। पूजा बनाते समय के संस्कार अस्वस्थता में भी चलते रहते थे।

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अस्वस्थता-

इस ज्वर को वैद्यों ने ‘वायरस’ नाम से बताया। यह ज्वर मुझे एक माह से अधिक समय तक रह गया। बाद में पथ्य देने के अनंतर ‘लीवर’ इतना कमजोर हो चुका था कि पन्द्रह दिन तक आहार के तत्क्षण बाद ही उल्टी हो जाती थी। पेट में एक बूंद पानी नहीं टिकता था। इसी बीच कई दिन तक पेट में भयंकर दर्द उठकर अतिसार (दस्त) भी हो गये थे। उसमें ‘तारपीन’ के तेल को पानी में डालकर पेट पर सेंक लिया करते थे। कुल मिलाकर हालत सीरियस हो गई। बचने की उम्मीद समाप्त हो चुकी थी। यहाँ बराबर चौबीस घंटे अखंड रूप से णमोकार मंत्र, इन्द्रध्वज की जयमाला, भक्तामरस्तोत्र, शान्तिभक्ति, बारहभावना, शान्तिमंत्र आदि पाठ चल रहे थे।

वैयावृत्ति में आर्यिका शिवमती, ब्र. माधुरी, कु. बीना, मोतीचन्द, रवीन्द्र कुमार प्रमुख थे। वैसे पं. सुधर्मचंद, नरेश कुमार, ब्र. सुभाषचंद, कुमुदनी, ब्र. श्यामाबाई आदि ने भी खूब सेवा की। बहन मालती ने आकर ३-४ महीने रहकर बहुत ही सेवा की। मैं समझती हूँ कि इन सबकी वैयावृत्ति, अनुकूल परिचर्या, अनवरत मंत्र पाठ और स्वाध्याय का सुनाना, इसी से मुझे असाता के तीव्रोदय को झेलने में बहुत बड़ा बल मिला। यहाँ इंदौर, कटनी, मेरठ और दिल्ली के पाँच वैद्य उपस्थित थे। ऊहापोह चल रहा था किन्तु कोई न तो रोग को समझ पाये थे, न प्रकृति संभाल पा रहे थे। १९ नवम्बर, कार्तिक शु ८ को सहसा रवीन्द्र ने मोतीचन्द से निर्णय किया कि- ‘‘किसी विशेष डाक्टर को बुलाकर एक बार दिखाकर रोग का निर्णय कर लेना चाहिए।’’ मेरठ से डाक्टर अग्रवाल को लाये। उन्होंने पहले देखते ही कह दिया कि-‘‘पीलिया है।’’ अनंतर मूत्र का परीक्षण करवाया। मैंने तथा सभी ने यह कहा कि-

‘‘पीलिया नहीं होना चाहिए क्योंकि नाखून पीले नहीं हैं।’’ किन्तु डाक्टर ने विधिवत् मूत्र परीक्षण कराकर ‘पीलिया’ घोषित कर दिया। तब माधुरी ने कहा-‘‘अब आप सभी डाक्टर-वैद्य चुपचाप बैठो, मैं दवाई चलाऊँगी।’ चूूँकि इससे तीन वर्ष पूर्व आर्यिका रत्नमती जी को दिल्ली में पीलिया होने पर वैद्य अतरसेन जैन, जो कि ९५ वर्ष की उम्र के थे, उन्होंने उनके लिए एक यूनानी नुस्खा बताया था, जिससे मात्र ‘कासनी’ के बीज, ‘सौंफ’ आदि की ठंडाई दिलायी थी। उससे उन्हें खूब लाभ हुआ था पश्चात् अंत तक यही ठंडाई उन्हें दी जाती रही थी। इतना सुनकर दवाई को सही कहकर भी डाक्टर अग्रवाल ने दृढ़तापूर्वक कहा कि-

‘‘आप इन माताजी को दो दिन के बाद बचा नहीं सकते। इनकी जितनी कमजोर स्थिति हो चुकी है, उससे आप हमें यह केस दे दीजिये। मैं मात्र ऊपर से ‘ग्लूकोस’ चढ़ाकर इन्हें ठीक कर दूँगा। इनके पेट में औषधि टिकना, मुख से कोई चीज जाकर हजम होना कठिन है। झट उल्टी हो जायेगी।’’ डाक्टर के अत्यधिक रूप से कहने पर मोतीचन्द और रवीन्द्र कुमार ने कहा- ‘‘ग्लूकोस चढ़ाने की बात कहना सर्वथा बेकार है। आप कुछ और उपाय बताओ।’’ डाक्टर ने बार-बार कहा कि-

‘‘या तो आप इन्हें एक-एक चम्मच गन्ने का रस आधा-आधा घंटे पर देते रहें, तो शायद कुछ लाभ होगा या ग्लूकोस, इसके सिवाय आप इन्हें अब बचा नहीं सकते हैं।’’ बहुत कुछ चर्चा होने के बाद रवीन्द्र के मस्तिष्क में एक बात आई कि- ‘‘जब माताजी को एक बार ही देना है और तत्काल ही वमन होकर निकल जाता है। डाक्टर बार-बार देने को कहते हैं और जब मूलाचार में आहार का काल अधिकतम सवा दो घंटे का है, तो उतनी देर तक माताजी को चौके में बिठाया जाये और धीरे-धीरे कुछ दवा और रस एक-एक चम्मच ही क्यों न दिया जाये?’’

यह बात डाक्टर को भी जंच गई। तब रवीन्द्र कुमार और मोतीचन्द ने सभी वैद्यों से भी परामर्श लेकर यही निर्णय बनाया। फिर क्या था, अगले दिन ऐसी ही व्यवस्था बनाई। मुझे पाटे पर लिटाकर पड़गाहन कर चौके में ले गये, बिठाया गया। नवधाभक्ति के बाद रवीन्द्र, मोतीचन्द, माधुरी ने एक स्वर से बड़ा शांतिमंत्र शुरू किया। तीन बार शान्तिमंत्र बोलकर एक छोटी सी कटोरी में जल लेकर मेरी अंजुलि में दिया पुनः तीन बार शांतिमंत्र बोलने के बाद उस छोटी सी कटोरी में जरा सी ठंडाई लेकर अंजुलि में दिया। ऐसे ही तीन-तीन बार शांतिमंत्र बोल-बोलकर धीरे-धीरे वह आधा-पाव ठंडाई मेरे पेट में पहुँचाई और ऐसे ही मंत्र बोल-बोलकर आधा-पाव गन्ने का रस भी मेरे पेट में पहुँचाया गया। इतने से आहार में लगभग ३५ मिनट लगा दिये। बाद में कुल्ला करते समय प्रतिदिन के अनुसार आज भी वमन हो गया किन्तु हर दिन की अपेक्षा कम हुआ, कुछ पेट में रुक गया। तब सभी ने संतोष की सांस ली और ऐसा माना कि-

‘‘अब इस प्रयोग से यह दवा फायदा कर जायेगी।’’ यह दिवस कार्तिक शुक्ला एकादशी का था। अब इसी तरह से एक-एक चम्मच रस बढ़ाते हुए एक सप्ताह तक यह क्रम चला। दूसरे दिन पुनः वमन हुआ था किन्तु बहुत जरा सा हुआ था। शायद तीसरे दिन से वमन होना रुक गया और स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। इन डाक्टर अग्रवाल को ७ दिन बाद पुनः बुलाया गया। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वे बोले- ‘‘अरे! आप लोगों ने क्या जादू कर दिया? मात्र कासनी के बीज की ठंडाई से आपने माताजी को कैसे बचा लिया? पुनः वे बोले- ‘‘वास्तव में यह माताजी की तपश्चर्या और साधना का ही प्रभाव है कि जिससे इन्हें पुनः जीवन प्राप्त हुआ है।’’ यहाँ समझने का महत्वपूर्ण विषय यह है कि-

आजकल श्रावक मुनियों के ग्रंथ मूलाचार आदि को पढ़कर मुनियों के अवगुणों को देखने में, उनकी टीका-टिप्पणी करने में ही उस स्वाध्याय का उपयोग करके शास्त्रों को शस्त्र बना लेते हैं किन्तु यहाँ गुरुमुख से-मेरे द्वारा इन शिष्यों ने मूलाचार को पढ़ा था। दो-तीन बार मैंने इन शिष्यों को मूलाचार पढ़ाया था, स्वाध्याय कराया था। इसमें मुनियों के मूलगुणों में ‘एकभक्त’ नाम का एक मूलगुण है। उसका लक्षण इस प्रकार है-

उदयत्थमणे काले णालीतियवज्जियम्हि मज्झम्हि।

एकम्हि दुअ तिए वा मुहुत्तकालेयभत्तं तु१।।३५।।

सूर्योदय और अस्त के काल में से तीन-तीन घड़ी से रहित मध्यकाल के एक, दो अथवा तीन मुहूर्त काल में एक बार भोजन करना यह ‘एकभक्त’ नाम का मूलगुण है। यहाँ मुहूर्त में अड़तालिस मिनट माने जाते हैं अतः तीन मुहूर्त में ४८±४८±४८·१४४ मिनट हुए। एक घंटे में साठ मिनट होने से १४४´६०·२ घंटे, २४ मिनट होते हैं। मुनियों के आहार का दो घंटे चौबीस मिनट तक अधिकतम काल है।

रवीन्द्र कुमार ने मूलाचार का स्वाध्याय कर उसका सदुपयोग किया और उनका यह स्वाध्याय मेरे जीवनदान में कारण बन गया। धीरे-धीरे इस ठंडाई से ठंड के दिन में कभी-कभी उल्टी हो जाती थी और अतिसार भी कंट्रोल में नहीं आ रहे थे। कई वैद्य-हकीम आये। इसी ठंडाई में कुछ न कुछ हेर-फैर कराते रहे। अंत में २८ जनवरी १९८६ को मेरठ के शेफुद्दीन हकीम को लाया गया। इन्होंने भी इसी ठंडाई में कुछ हेर-फेर किया और संग्रहणी के लिए जो दवा प्रारंभ में चली थी, उस ‘पर्पटी’ को देने की सलाह दी। तब से सन् १९८५ से लेकर आज तक वही ठंडाई चल रही है और मेरा स्वास्थ्य प्रायः सामान्य चल रहा है।

यह ‘पीलिया’ का अंश तथा किंचित् ज्वर का अंश तो मुझे वैशाख तक-अप्रैल १९८६ तक रहा। उसके बाद अब मात्र कमजोरी है। अधिक बोलना, अधिक लिखना, अधिक बैठना और अधिक चलना नहीं होता है। कदाचित् अधिक श्रम हो जाये, तो कई दिन विश्राम करना पड़ता है।

इन्द्रध्वज महामंडल विधान-</font color></center>== इस बीमारी के मध्य में ही १८ अक्टूबर से २७ अक्टूबर १९८५, तिथि आश्विन शु. ५ से पूर्णिमा तक पुनः अमरचंद होमब्रेड मेरठ वालों ने जंबूद्वीप स्थल पर त्रिमूर्ति मंदिर में इन्द्रध्वज विधान का विशाल आयोजन किया। इसमें भी प्रतिष्ठाचार्य पं.श्री शिखरचंद जी भिंड वाले पधारे थे। इस विधान में भी मैं मंदिर में नहीं जा सकी, समापन के समय ज्वर कम होने से रत्नत्रय निलय के हॉल में कुछ देर बैठ गई थी।

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स्वर्णजयंती समारोह-

भक्तों ने भक्ति के वश हो इसी बीमारी के मध्य इस वर्ष मेरा स्वर्ण जन्म जयंती महोत्सव करने का विचार बनाया था अतः २७ अक्टूबर रविवार के दिन रथयात्रा महोत्सव किया पुनः सुमेरु पर्वत के समस्त जिनबिम्बों का १००८ कलशों से अभिषेक कराया। अमरचंद मेरठ ने आगंतुक यात्रियों के लिए ‘प्रीतिभोज’ का आयोजन किया पुनः बनाये गये पांडाल में मेरे ५२वें वर्ष के प्रवेश में स्वर्ण जयंती समारोह का भव्य आयोजन किया। इस मंगल अवसर पर श्री जे.के. जैन (दिल्ली) ने भी पधारकर मेरे प्रति विनयांजलि अर्पण करते हुए जंबूद्वीप प्रतिष्ठा एवं ज्ञानज्योति के कार्य-कलापों का उल्लेख किया। इस अवसर पर टाउन से लेकर नशिया मार्ग तक ५२ गेट बनाये गये थे। ५२ गरीब महिलाओं को मदनलाल जैन, टिकैतनगर वालों ने साड़ियाँ बांटी थींं, समस्त कार्यक्रम पांडाल में सम्पन्न हुए।

मैं इतनी कमजोर हो चुकी थी कि पांडाल में नहीं जा सकी क्योंकि मुझे तो ज्वर ही चल रहा था अतः आगंतुक अतिथि श्री जे.के. जैन, पं. लालबहादुर जैन शास्त्री आदि सभी महानुभाव यहीं ‘रत्नत्रयनिलय’ में आकर दर्शन कर गये। ज्यादा बोलने की भी शक्ति नहीं थी। आगंतुक यात्रियों को दरवाजे के बाहर से ही दर्शन कराया गया। बेचारे यात्री उदास मन रहे, मेरी अस्वस्थता से किसी को भी कार्यक्रम में आनंद नहीं आया।

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युवा परिषद के अध्यक्ष-

१३ अक्टूबर को यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद की केन्द्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई जिसमें सर्वसम्मति से रवीन्द्रकुमार को अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। सभी मेरे पास आशीर्वाद लेने आये। इससे पूर्व अनेक बार युवा परिषद के अनेक युवकों ने प्रार्थना की थी कि ‘माताजी! रवीन्द्र कुमार को युवा परिषद के अध्यक्ष के लिए स्वीकृति दे दो’ किन्तु मैंने हमेशा यही कहा था कि जंबूद्वीप के निर्माण व प्रतिष्ठा तक इनके ऊपर कार्यभार बहुत है किन्तु अब मैंने रवीन्द्र कुमार को अध्यक्ष बनाने की स्वीकृति दे दी। युवकों को बहुत प्रसन्नता हुई। रवीन्द्र कुमार को भी मैंने यही आशीर्वाद दिया कि- ‘‘युवा जगत् में धर्म की सर्वतोमुखी प्रगति करो, सृजनात्मक कार्यों में अधिक शक्ति लगाओ, न कि विरोधात्मक कार्यों में। हाँ! धर्म, धर्मात्मा और धर्मायतन की रक्षा के लिए विरोध से डरना भी नहीं चाहिए।’’ इसके बाद सभी ने मेरे शीघ्र स्वास्थ्यलाभ की मंगल कामना की।

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इन्द्रध्वज विधान-

मेरी अस्वस्थता में ही १७ नवम्बर से २७ नवम्बर १९८५, कार्तिक अष्टान्हिका पर्व में मदनलाल जैन, टिकैतनगर वालों ने यहाँ हस्तिनापुर के त्रिमूर्ति मंदिर में इन्द्रध्वज विधान का आयोजन किया। इन दिनों तो मैं अधिक ही अस्वस्थ थी। मेरे जीवित रह सकने में भी संदेह चल रहा था। मैं बार-बार नियम सल्लेखना ले लेती थी। इन दिनों मैं माधुरी को यह समझाया करती थी कि-‘‘मेरी अधिक अस्वस्थता में मेरे सामने रोना नहीं। देखो! जैसे मैंने आर्यिका रत्नमती जी की बढ़िया समाधि करायी है वैसे ही कराना, धैर्य रखना। ऐसे पाठ सुनाना.....,ऐसी परिचर्या करना आदि।’’ तब माधुरी भी कहती-‘‘माताजी! मुझे धैर्य है, मैं मोह करके आपके प्रतिकूल नहीं बनूँगी।’’ इत्यादि रूप से आश्वासन दिया करती थी। इसी मध्य १९ नवम्बर को ‘पीलिया’ रोग का निर्णय हो जाने से पीलिया की औषधि पहुँचने से आराम होना शुरू हो गया था। मैं इस विधान में भी मंदिर में नहीं जा सकी, यहीं से लेटे-लेटे सारी पूजाएँ सुनती रही थी। ये विधान और इनकी पूजा व जयमालाएँ भी मेरी बीमारी में बहुत बड़ी औषधि का काम कर रही थीं। श्री कुन्दकुन्द देव ने कहा भी है-

‘‘जिनवचनमौषधमिदं विषयसुखविरेचनममृतभूतं।

जन्मजराव्याधिहरणं क्षयकरणं सर्वदुःखानाम् ।।

जिनेन्द्र भगवान् के वचन परम औषधि रूप हैं, ये विषय सुखों का विरेचन-त्याग कराने वाले अमृतस्वरूप हैं, जन्म, जरारूप व्याधि को नष्ट करने वाले हैं और सर्वदुःखों का भी क्षय करने वाले हैं, ऐसा श्रीकुन्दकुन्ददेव का कहना है। वास्तव में असाता कर्म को मंद करने के लिए जिनेन्द्र देव की भक्ति, स्तुति और मंत्र से बढ़कर भला और क्या उत्तम उपाय है? श्री वादिराज महामुनि ने भी तो कहा है-

प्रागेवेह त्रिदिवभवनादेष्यता भव्यपुण्यात् ।

पृथ्वीचक्रंकनकमयतां देव! निन्ये त्वयेदम्।।
ध्यानद्वारं मम रुचिकरं स्वांतगेहं प्रविष्ट-
स्तत्विं चित्रं जिन वपुरिदं यत्सुवर्णीकरोषि।।

हे नाथ! स्वर्ग से इस मत्र्यलोक में आपके आने के छह महिने पहले ही भव्यों के पुण्य से यह पृथ्वी स्वर्णमयी हो गई थी अर्थात् इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने रत्नों की, स्वर्ण की वर्षा करके इस पृथ्वी को स्वर्णमयी मना दिया था। इस ध्यानरूपी द्वार से आप मेरे मनरूपी घर में प्रविष्ट हो चुके हैं पुनः यह मेरा शरीर यदि सुवर्णमय कर दो, तो भला इसमें आश्चर्य ही क्या है? अर्थात् हृदय में आपको विराजमान कर लेने से यह रुग्ण शरीर यदि सुवर्णमय बन जावे, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। इन्हीं पवित्र भावनाओं को भाते रहने से मैंने इतने उग्र असाता कर्मोदय को झेल लिया था। इस प्रसंग में मुझे आध्यात्मिक समयसार की गाथायें भी स्मरण में आती रहती थीं। यथा-

अहमिक्को खलु सुद्धो दंसणणाणमइओ सदारूवी।

णवि अत्थि मज्झ किंचिवि अण्णं परमाणुमित्तं पि।।

मैं अकेला हूँ, निश्चय से शुद्ध हूँ, दर्शन ज्ञानमयी हूँ और सदा अमूर्तिक हूँ। अन्य परमाणुमात्र भी मेरा नहीं है। इसी प्रकार श्री पूज्यपाद स्वामी के श्लोक भी स्मृतिपथ पर आते रहते थे। यथा-

न मे मृत्युः कुतो भीतिः न मे व्याधिः कुतो व्यथा।

नाहं बालो न वृद्धोहं न युवैतानि पुद्गले।।

मुझे मृत्यु नहीं है तो भय किससे? मुझे रोग नहीं है तो पीड़ा किससे? न मैं बालक हूँ, न वृद्ध हूँ और न युवा ही हूँ, ये तो सब पुद्गल की पर्यायें हैं। इसी प्रकार से- ‘परमानन्दसंयुत्तं निर्विकारं निरामयं’ आदि पंक्तियाँ भी असाता को झेलने में शक्ति प्रदान करती रहती थीं और बाह्य में ‘कासनी के बीज की ठंडाई’ मात्र पीलिया रोग को नष्ट करने में समर्थ हुई थी, जैसा पहले लिखा जा चुका है।