ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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09.दर्शनमार्गणाधिकार

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विषय सूची

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दर्शनमार्गणाधिकार

अथ दर्शनमार्गणाधिकार:

अथ द्बाभ्यां स्थलाभ्यां सप्तभिः सूत्रैः दर्शनमार्गणाधिकारः प्रारभ्यते-तत्र प्रथमस्थले चक्षुर्दर्शनि-नामन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले अचक्षुर्दर्शनि-अवधि-केवलिदर्शनिनामंतर कथनत्वेन ‘‘अचक्खु-’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयमिति समुदायपातनिका।
इदानीं चक्षुर्दर्शनिनामंतरनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
दंसणाणुवादेण चक्खुदंसणीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।११८।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।११९।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।१२०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-यः कश्चित् चक्षुर्दर्शनी जीवः एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-लब्ध्यपर्याप्तकेषु क्षुद्रभवग्रहणमात्रायुःस्थितिकेषु अन्यतरेषु अचक्षुर्दर्शनी भूत्वोत्पद्य क्षुद्रभवग्रहणमात्रमन्तरं कृत्वा पुनः चतुरिन्द्रियादिषु चक्षुर्दर्शनी भूत्वोत्पन्नः, तस्य क्षुद्रभवग्रहणमात्रान्तरमुपलभ्यते।
उत्कर्षेण-कश्चिद् जीवः चक्षुर्दर्शनिजीवेभ्यो निर्गत्य अचक्षुर्दर्शनिषु उत्पद्य अंतरं प्राप्य आवलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनानि गमयित्वा पुनः चक्षुर्दर्शनिषु उत्पन्नस्तस्योपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले चक्षुर्दर्शनिनामन्तरनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
अधुना अचक्षुर्दर्शनि-अवधिदर्शनि-केवलदर्शनिनामन्तरप्रतिपादनार्थं सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
अचक्खुदंसणीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१२१।।
णत्थि अंतरं णिरंतरं।।१२२।।
ओधिदंसणी ओधिणाणिभंगो।।१२३।।
केवलदंसणी केवलणाणिभंगो।।१२४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अचक्षुर्दर्शनमन्तरं केवलदर्शनानन्तरमेव, ततः पुनः अचक्षुर्दर्शनोत्पत्तेरभावात् नास्त्यन्तरं। अवधिदर्शनस्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तं, उत्कर्षेणोपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनमात्रमिति। केवलदर्शनस्य नास्त्यन्तरं।
एवं द्वितीयस्थले अचक्षुरादिदर्शनिनामन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधकनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया अन्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां दर्शनमार्गणानाम नवमोऽधिकारः समाप्तः।


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अथ दर्शनमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में सात सूत्रों के द्वारा दर्शनमार्गणा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में चक्षुदर्शनी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में अचक्षुदर्शनी जीवों का, अवधिदर्शनी और केवलदर्शनी जीवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘अचक्खु’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब चक्षुदर्शनी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

दर्शनमार्गणानुसार चक्षुदर्शनी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।११८।।

चक्षुदर्शनी जीवों का अन्तरकाल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण होता है।।११९।।

चक्षुदर्शनी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल होता है, जो असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन के बराबर होता है।।१२०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जो कोई चक्षुदर्शनी जीव क्षुद्रभवग्रहणमात्र आयु स्थिति वाले किसी भी एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय व त्रीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकों में अचक्षुदर्शनी होकर उत्पन्न होता है पुन: अचक्षुदर्शनी होकर और क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल चक्षुदर्शन का अन्तर कर पुन: चतुरिन्द्रियादिक जीवों में चक्षुदर्शनी होकर उत्पन्न होता है, उस जीव के चक्षुदर्शन का क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण अन्तरकाल पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-कोई जीव चक्षुदर्शनी जीव में से निकलकर अचक्षुदर्शनी जीवों में उत्पन्न हो अन्तर को प्राप्त कर आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण पुद्गलपरिवर्तनों को बिताकर पुन: चक्षुदर्शनी जीवों में उत्पन्न हुआ, उस जीव के चक्षुदर्शन का सूत्रोक्त उत्कृष्ट अन्तर पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में चक्षुदर्शनी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब अचक्षुदर्शनी-अवधिदर्शनी और केवलदर्शनी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अचक्षुदर्शनी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१२१।।

अचक्षुदर्शनी जीवों का अन्तर नहीं होता, वे निरन्तर होते हैं।।१२२।।

अवधिदर्शनी जीवों के अन्तर की प्ररूपणा अवधिज्ञानी जीवों के समान है।।१२३।।

केवलदर्शनी जीवों के अन्तर की प्ररूपणा केवलज्ञानी जीवों के समान है।।१२४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अचक्षुदर्शन का अन्तर केवलदर्शन उत्पन्न होने के पहले-पहले ही हो सकता है, उसके केवलदर्शन होने के बाद पुन: अचक्षुदर्शन की उत्पत्ति नहीं होती है।

अवधिदर्शनी जीवों का जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर उपार्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण है। केवलदर्शन का अन्तर नहीं है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में अचक्षु आदि दर्शन वाले जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में दर्शनमार्गणा नाम का नवमाँ अधिकार समाप्त हुआ।