ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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09.नियमसार : अनुपम बोधामृत

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नियमसार : अनुपम बोधामृत

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प्रातः स्मरणीय आ० कुन्दकुन्द देव की 187 गाथाओं में रचित यह अनुपम कृति है। बारह अधिकारों में, जीव, अजीव, शुद्धभाव, व्यवहार चारित्र, परमार्थ प्रतिक्रमण, निष्चय परमावष्यक, शाद्धोपयोग आदि में अपने विशय का निरवषेश वर्णन करने वाला यह बोधामृत है। प्रस्तुत शाध प्रबन्ध की केन्द्र बिन्दु स्याद्वाद चन्द्रिका टीका में आर्यिका ज्ञानमती जी ने इस नियमसार ग्रन्थ राज को ”नियम कुमुदचन्द्रोदय” एवं ”यति कैरवचन्द्रोदय“ नामों से विषेशित किया है, जो सार्थक है। टीका का प्रस्तुत अंष निम्न प्रकार है

”अयं ग्रन्थो नियमकुमुदं विकासयितुं चन्द्रोदयस्ततो नियमकुमुदचन्द्रोदयोऽथवा यतिकैरवाणि प्रफुल्लीकत्र्तुं राकानिषीथिनीनाथत्वाद् ‘यतिकैरव चन्द्रोदयोऽस्ति।“

वस्तुतः यह ग्रन्थ श्रमणों के लिए मोक्षमार्ग (नियम) हेतु अनुपम पाथेय है। बोध ओर बोधि का भडार है। शुद्ध ध्यान मूलक अध्यात्म विशयक समयसार आदि ग्रन्थों के अध्ययन से पूर्व यह ग्रन्थ अवष्य पाठनीय है, मननीय है, अनुकरणीय है, परिपालनीय है। इस ग्रन्थ में आ० कुन्दकुन्द की विशय प्रतिपादन की प्रौढ़ शैली के दर्षन होते हैं। इसका अधिकार क्रम से यहाँ संक्षिप्त स्वरूप वर्णित किया जाता है।

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जीवाधिकार :-

19 गाथाओं में निबद्ध यह अधिकार ज्ञेय विषेश जीव के स्वरूप पर सम्यक् प्रकाष डालता है। मंगलाचरण में भगवान महावीर को प्रणाम कर गाथा उत्तराद्र्ध या प्रतिज्ञा सूत्र में नियमसार को केवली श्रुतकेवली प्रणीत कहा है। समयसार प्राभृत को आ० कुन्दकुन्द ने श्रुतकेवली भणितनिरूपित किया है। इसका रहस्य खोज का विशय है। नियमसार के विशय को उठाते हुए आ० प्रवर ने मार्ग और मार्ग के फल के रूप में रत्नत्रय और मोक्ष को निरूपित किया है। साथ ही मोक्ष के उपाय नियम से कर्तव्य रूप रत्नत्रय को नियम शाब्द से व्याख्यायित किया है। इसके अनन्तर व्यवहार सम्यक् दर्षन का स्वरूप उसके विशयभूत आप्त परमात्मा, आगम एवं गुरु का वर्णन है। तत्वार्थों का नाम निर्देष करने के पष्चात् जीव का लक्षण उपयोग, स्वभावज्ञान, स्वभाव दर्षन, विभाव ज्ञान, विभाव दर्षन, स्वभाव पर्यायों का विवरण तथा जीव की मनुश्यादि विभाव पर्यायों, आत्मा के कत्र्तृत्व और भोक्तृत्व का वर्णन किया है। अन्त में द्रव्यार्थिक- पर्यायार्थिक नयों से जीव का सविषेश उल्लेख हैं।

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अजीवाकार :-

नामानुसार ही अधिकार में 18 गाथा सूत्रों के द्वारा द्रव्य के भेदों पुद्गल धर्म, अधर्म, आकाष एवं काल का विवेचन है। पुद्गल द्रव्य के भेद, स्कन्ध के छः भेद, कारण और कार्य परमाणु का लक्षण, स्वभाव-विभाव पर्यायों का सम्यक् निरूपण है। इसके अनन्तर, धर्म, अधर्म, आकाष, द्रव्यों की परिभाशा, व्यवहार एवं निष्चय काल का स्वरूप, धर्मादि चार द्रव्यों की “ाुद्ध लक्षण रूपता का उल्लेख है। अस्तिकाय का लक्षण, द्रव्यों की प्रदेष संख्या, तथा द्रव्यों के मूर्तिक-अमूर्तिक, चेतन-अचेतन, विभाग निरूपित है।

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शाद्धभावाधिकार :-

(सम्यज्ञानाधिकार) इस अधिकार में भी 18 गाथायें हैं। इसमें आ० कुन्दकुन्द ने शाद्धभाव का मूल कारण, हेयोपादेय तत्वों का वर्णन करने के पष्चात् निर्विकल्प आत्मकत्व का स्वरूप छः गाथाओं में विस्तार से किया है। जीव का शाद्ध स्वरूप, परद्रव्य की हेयता, स्वद्रव्य की उपादेयता, सम्यक् दर्षन-ज्ञान के लक्षण तथा उनकी उत्पत्ति के कारणों का उल्लेख किया है। गाथा संख्या 52 दृश्टव्य है।

सम्मतस्स णिमित्तं जिणसुत्तं तस्स जाणया पुरिसा ।

अंतरहेऊ भणिदा दंसणमोहस्स खयपहुदी ।।52।।

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व्यवहार चारित्राधिकार :-

21 गाथाओं में निबद्ध यह अधिकार श्रमण के व्यवहार चारित्र का कथन करता है। इसमें पाँच महाव्रतों, पाँच समितियों एवं तीन गुप्तियों का स्वरूप विषद रूप से विवेचित किया गया है। गुप्तियों का वर्णन निष्चय नय की दृश्टि से, परमेश्ठियोंका स्वरूप सम्यक् रीत्या - वर्णित है अन्त में व्यवहार चारित्र का समारोप एवं उससे साध्य निष्चय चारित्र कथन करने की प्रतिज्ञा है।

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परमार्थ प्रतिक्रमण:-

इस अधिकार ने 18 गाथायें हैं। शुद्धनयाश्रित, स्वालम्बित निष्चय प्रतिक्रमण का इसमें वर्णन हैं। यहाँ यह उल्लेख है कि आत्मध्यानस्थ मुनि को परमार्थ प्रतिक्रमण होता है। निशेध परक दृश्टि को प्रधान कर साधु को स्वयं को निरंतर नर-नारकादि विभाव पर्यायों से रहित स्वीकार करना चाहिए निष्चय प्रतिक्रमण ध्यान स्वरूप होने से शाब्द जाल से परे है। व्यवहार प्रतिक्रमण का स्वरूप जिनवाणी से जानकर उसका पालन भी साधन रूप से अवष्य करणीय है, उसी के निष्चय प्रतिक्रमण की पात्रता आती है।

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निष्चय प्रत्याख्यान अधिकार :-

12 गाथाओं में ग्रन्थित यह अध्याय प्रत्याख्यान के पात्र, आत्म ध्यान की विधि, ज्ञानी जीव की भावना (एकत्व आदि रूप), आत्मगत दोशों से मुक्ति का उपाय, निष्चय प्रत्याख्यान का नियामक अधिकारी श्रमण, आदि विशयों का सांगोपांग वर्णन करता है।

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परमालोचना अधिकार:-

छः गाथाओं के द्वारा इस अधिकार में एलाचार्य ने यह स्पश्ट किया है कि आत्मध्यान ही निष्चय परमालोचना है, यह महामुनियों के ही संभव हैं। इसमें आलोचना के चार रूप, आलोचना, आलुंछन, अविकृतिकरण तथा भावषुद्धि का स्वरूप वर्णित किया गया है।

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शुद्ध निष्चय प्रायष्चित्ताधिकार :-

इस अध्याय का विस्तार मात्र 9 गाथाओं में है। इसमें निर्दिश्ट किया गया है कि ध्यानी महामुनि ही निष्चय प्रायष्चित्त का पात्र है। निष्चय प्रायष्चित्त स्वरूप, कशायों पर विजय प्राप्ति का उपाय, पात्रता, तपष्चरण से ही कर्मक्षय-कारणत्व का निरूपण प्रस्तुत अधिकार में है। साथ ही तप और प्रायष्चित की एकार्थता का कारण एवं ध्यान की सर्वस्वता का निरूपण है। कायोत्सर्ग का अधिकरण भी इसमें वर्णित है।

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परम समाधि अधिकार :-

इसमें 12 गाथाओं में महामुनि की ध्यान स्वरूप परम समाधि रूपता का निरूपण है। इसमें अनेक सूत्रों द्वारा स्थायी समाधि का वर्णन किया है। पूर्ण समता, ध्यान तथा स्थाई सामायिक एकार्थवाची रूप में वर्णित हैं। इसमें गाथा नं० 125 से 133 तक अनुश्टप् छन्द हैं।

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परम भक्ति अधिकार :-

6 गाथा सूत्रों में आ कुन्दकुन्द ने इस अधिकार में यह स्पश्ट किया है कि भक्ति के बिना श्रावक या श्रमण किसी को भी सिद्धि नहीं है। निष्चय भक्ति मुनि को ही होती है। इसमें योग भक्ति और योग का लक्षण प्रकट किया है।

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निष्चय परमावष्यक अधिकार :-

इस अधिकार के अन्तर्गत 18 गाथायें विषिश्ट पद्धति से आवष्यक पर प्रकाष डालती है। आवष्यक शब्द की निरुक्ति, आवष्यक का पात्र कौन नहीं, आत्मवषता का पात्र, “ाुद्ध निष्चय आवष्यक प्राप्ति का उपाय, आवष्यक करने की प्रेरणा आदि विशय इसमें समाविश्ट हैं। बहिरात्मा, अन्तरात्मा के लक्षण, प्रतिक्रमादि क्रियाओं की सार्थकता, विवाद की वर्जनीयता, सहज तत्त्वाराधना की विधि आदि का भी इसमें प्रकटीकरण किया गया है। यह भी स्पश्ट किया है कि समता, वन्दना, स्तुति प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और कायोत्सर्ग का यथार्थ पालन करने वाला ही यथार्थ श्रमण है।

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शाद्धोपयोगाधिकार :-

29 गाथाओं के धारक इस अधिकार में शाद्धोपयोग का लक्षण, उससे साध्य निर्वाण का वर्णन किया गया है। इसमें दार्षनिक पद्धति के दर्षन होते है। प्रथम गाथा बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, दृश्टव्य है,

जाणदि पस्सदि सव्वं ववहारणयेण केवली भगवं।

केवलणाणी जाणदि पस्सदि णियमेण अप्पाणं।।159।।

केवलज्ञानी परमात्मा व्यवहार नय से सर्वज्ञ और सर्वदृश्टा हैं एवं निष्चयनय से वे अपनी आत्मा को ही जानते व देखते हैं। यहाँ यह प्रकट होता है कि सर्वज्ञता ही आत्मज्ञता है और आत्मज्ञता ही सर्वज्ञता है। नय विभाग की युक्ति से आ० कुन्दकुन्द देव ने यह स्पश्ट किया है। यथार्थतः केवली आत्मा से तन्मय होकर जानते हैं। तन्मयता ही निष्चयनय का विशय है। उसी प्रकार यर्थाथतः केवली समस्त विष्व को अतन्मय होकर जानते हैं। अतन्मयता अध्यात्म शैली में व्यवहार नय का विशय है। इसका स्पश्टीकरण यह है कि जब केवली अपनी आत्मा को देखते जानते हैं उस समय उनकी आत्मा में समस्त विष्व प्रतिविम्बित होता है या उनका ज्ञान विष्वाकार परिणत होता है1।

आत्मा ज्ञान प्रमाण है अथवा आत्मा ही ज्ञान है। ऐसी स्थिति में समस्त विष्व बिना ज्ञेय हुए रहता ही नहीं साथ ही ज्ञेयों में प्रमेयत्व गुण है। बिना प्रयत्न के आत्मज्ञ केवली सर्वज्ञ हो जाते हैं। यह यथार्थ वस्तुगत स्वभाव है। उदाहरणार्थ जब दर्पण को देखा जायेगा तो उसमें प्रतिविम्बित पदार्थ भी अवष्य दृश्टिगत होंगे ही। यह वास्तविकता है कोई अवस्तुभूत कल्पना नहीं। कतिपय एकान्त निष्चयाभासी यह कथन करते देखे जाते है कि चूंकि निष्चय नय से वे अपनी आत्मा को जानते हैं अतः वास्तव में वे पर पदार्थ भूत विष्व को जानते ही नहीं। उसमें व्यवहार को सर्वथा असत्य ठहराने की कुटेव पड़ी हुई है। आ० कुन्दकुन्द की उपरोक्त गाथा दोनों दृश्टिकोणों को उचित ठहराती है।

इस अधिकार में केवलज्ञान-केवलदर्षन की युगपत्त्ता, ज्ञानदर्षन के स्वरूप की दार्षनिक समीक्षा, प्रत्यक्ष परोक्ष ज्ञानों का स्वरूप, ज्ञानदर्षन के स्वपरप्रकाषकपने की सिद्धि, केवलीज्ञानी के बन्धाभाव, कर्मक्षय से मोक्ष प्राप्ति, षुद्धोपयोग युक्त कारण परमतत्त्व, निर्वाण स्थान, सिद्धि व सिद्ध का स्वरूप, निर्वाण और सिद्ध की एकता एवं मुक्त जीव के लोकाकाष तक ही गमन का कारण आदि का विवेचन है। अंतिम पाँच गाथाओं में उपसंहार प्रस्तुत किया गया है। ग्रन्थकार ने लघुता प्रदर्षन एवं धर्मद्वेशी जनों से सावधान रहने का संकेत कर ग्रन्थ को सम्पूर्ण किया है।

वस्तुतः यह ग्रन्थ अपने मोक्षमार्गीय या नियम सम्बन्धी विशय का सम्पूर्ण ग्रन्थ है। साधुओं के लिए परमामृत बोधामृत ही है। ज्ञानमती जी ने नियमसार नाम विशयक सार्थकता, अन्वर्थता व्यक्त करते हुए लिखा है “सर्व सारों में सारभूत सम्यग्रत्नत्रय स्वरूप सराग नियम का और वीतराग नियम का ही इसमें कथन है। ग्रन्थकर्ता ने चारित्रप्राभृत और मूलाचार में सरागरत्नत्रय को प्रधानरूप से कहा है और यहाँ वीतराग रत्नत्रय को प्रधान रूप से कहा है। (पृ० 552 स्याद्वाद चन्द्रिका)