ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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09.मुनिराज गुरुदत्त

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मुनिराज गुरुदत्त

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राजा गुरुदत्त हस्तिनापुर का स्वामी था जो न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करता था। एक दिन प्रजा से यह सुनकर कि एक व्याघ्र प्रतिदिन नगर में आता है और जीवों का विध्वंस कर बड़ा दुख देता है, राजा गुरुदत्त को बड़ा क्रोध आया। वह शीघ्र सेना लेकर द्रोणीमान पर्वत पर, जहाँ कि वह व्याघ्र रहता था, पहुँचा और जीवों के विध्वंसक व्याघ्र को चारों ओर से घेर लिया। जब व्याघ्र ने यह दृश्य देखा तो मारे भय के वह गुफा में घुस गया। राजा को और भी उस पर क्रोध आया और उसने शीघ्र ही गुफा के भीतर लकड़ियाँ भरवा दीं और आग लगवा दी जिससे अग्नि की प्रचंड ज्वाला से व्याघ्र गुफा के भीतर ही भीतर जल गया और अकाम निर्जरा के बल से चन्द्रपुरी नगरी में कपिल नामक ब्राह्मण हुआ। किसी समय गुरुदत्त राजा को संसार से वैराग्य हो गया। उसने पुत्र को राज्य देकर मुनिव्रत धारण कर लिये। वे मुनिराज विहार करते हुए किसी समय चन्द्रपुरी नगरी में आ गये और कपिल ब्राह्मण के खेत के समीप कायोत्सर्ग मुद्रा धारण कर विराजमान हो गये। कपिल ब्राह्मण अपनी स्त्री को यह आज्ञा देकर कि तू भोजन लेकर जल्दी आना, खेत पर चल दिया। वह खेत उस दिन जोतने के अयोग्य था, इसलिए कपिल दूसरे खेत पर चला गया।

आराधना कथाकोष में लिखा है कि वहाँ मुनि को ध्यान करते हुए देखकर कपिल ने उस खेत को जोतना उचित न समझा और दूसरे खेत पर चला गया। जाते समय उसने मुनि से यह कह दिया कि ‘‘थोड़ी देर बाद मेरी पत्नी भोजन लेकर आएगी उससे आप कह देना कि कपिल दूसरे खेत पर चला गया है।’’ कपिल जिस खेत पर आने को अपनी स्त्री से कह आया था वह उसी पर आई और वहाँ अपने पति को न पाकर पास में विराजमान मुनि से उसने पूछा- मुने! इस खेत पर से ब्राह्मण कहाँ गया? मुनिराज को भला ऐसी बातों के उत्तर प्रत्युत्तर से क्या प्रयोजन था? उन्होंने ब्राह्मणी के प्रश्न का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। उत्तर न पाकर वह ब्राह्मणी घर वापस लौट आई।

जब दिन बहुत चढ़ गया और ब्राह्मणी भोजन लेकर खेत पर न पहुँची, तब कपिल को बहुत क्रोध आया। वह जोतना बंद कर शीघ्र ही घर वापस आकर पत्नी को फटकारने लगा। अरी मूर्खा! यदि तुझे मेरा पता नहीं मालूम हुआ तो तू उस मुनि को पूछकर क्यों नहीं आई? उत्तर में ब्राह्मणी ने कहा-मैंने तो मुनि को पूछा था किन्तु उन्होंने तो कुछ भी जवाब नहीं दिया था इसलिए मैं आपके पास न पहुँच पाई। बस! दुष्ट ब्राह्मण स्त्री से तो कुछ न कह सका, बिना कारण मुनिराज पर कुपित हो वह शीघ्र ही उनके पास पहुँचा और सेमर की रुई से मुनि का सारा शरीर वेष्ठित कर उसमें आग लगा दी। मुनिराज गुरुदत्त परम उपशमी थे उन्होंने अग्निवेदना की ओर जरा भी विचार न करके शुक्लध्यान में उपयोग लगाया जिससे उन्हें शीघ्र ही केवलज्ञान प्राप्त हो गया। उसी समय केवली मुनिराज गुरुदत्त की पूजा के लिए सुर-असुर शीघ्र ही वहाँ आ गये। जब ब्राह्मण ने देवों को मुनिराज की पूजा करते हुए ऐसा अतिशय देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ। आराधना कथाकोश में बताया है कि-

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‘‘उसने सोचा कि बड़ी निर्दयता के साथ मैंने साधु को जलाया, उसे बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उसने भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर भगवान से अपने अपराध की क्षमा मांगी। भगवान के उपदेश को आतुरता से सुना और पूर्व जन्म की कथा भी सुनी। प्रभाव भी गहरा पड़ा और अपने पापों के प्रायश्चित्त के लिए वह कपिल ब्राह्मण मुनि हो गया। सत्पुरुषों का संग सदा ही सुखदायी होता है।’ यह कथानक आराधना कथा-कोश के आधार से लिया गया है।