ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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09.संयममार्गणा अधिकार

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संयममार्गणा अधिकार

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अथ संयममार्गणाधिकार:

संप्रति संयममार्गणायां सामायिक-छेदोपस्थापनासंयमकारणज्ञापनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते-
संजमाणुवादेण संजदो सामाइय-च्छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदो णाम कधं भवदि ?।।४८।।
उवसमियाए खइयाए खओवसमियाए लद्धीए।।४९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-नामसंयमः स्थापनासंयमः द्रव्यसंयमः भावसंयमश्चेति चतुर्विधः संयमः। नामस्थापनासंयमौ ज्ञातौ। द्रव्यसंयमो द्विविधः-आगम-नोआगमभेदेन। आगमः गतः। नोआगमस्त्रिविधः-ज्ञायकशरीरनोआगमद्रव्यसंयम-भाविनोआगमद्रव्यसंयम-तद्व्यतिरिक्तनोआगमद्रव्यसंयमभेदेन । ज्ञायकशरीर-भाविनोआगमद्रव्यसंयमौ ज्ञायेते। तद्व्यतिरिक्तद्रव्यसंयमः—संयमसाधन-पिच्छिका-आहार-कमंडलु-पुस्तकादीनि। भावसंयमो द्विविधः-आगम-नोआगमभेदेन। आगमः ज्ञातः। नोआगमस्त्रिविधः-क्षायिकः क्षायोपशमिकः औपशमिकश्चेति। एतेषु संयमप्रकारेषु केन प्रकारेण संयमः भवतीति पृच्छासूत्रमागतं।
एवं सामायिक-च्छेदोपस्थापन शुद्धिसंयतयोरपि निक्षेपः कर्तव्यः।
औपशमिक-क्षायिक-क्षायोपशमिकलब्धिभिः जीवः सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयतो भवति।
अत्र तावत् औपशमिकस्य लक्षणं कथ्यते-
चारित्रावरणस्य सर्वोपशमेन उपशांतकषाये संयमो भवति, तस्य संयमस्योत्पत्तिः उपशमिकालब्धेरुक्ता। चारित्रावरणस्य क्षयेण यस्य संयमस्योत्पत्तिः, तस्य संयमस्य क्षायिका लब्धिः। चतुःसंज्वलन-नवनोकषायाणां देशघातिस्पर्धकानामुदयेन यः संयमः उत्पद्यते तस्य क्षायोपशमिका लब्धिः कथ्यते।
चतुःसंज्वलन-नवनोकषायाणां स्पर्धकानां उदयस्य कथं क्षयोपशमव्यपदेशः क्रियते ?
सर्वघातिस्पर्धकानि अनंतगुणहीनानि भूत्वा देशघातिस्पर्धकत्वेन परिणम्य उदयमागच्छन्ति, तेषामनन्त-गुणहीनत्वं क्षयो नाम। देशघातिस्पर्धकस्वरूपेणावस्थानमुपशमः। ताभ्यां क्षयोपशमाभ्यां संयुक्तोदयः क्षयोपशमो नाम। ततः समुत्पन्नः संयमोऽपि तेन क्षायोपशमिकः।
एवं सामायिकस्य छेदोपस्थापनासंयमस्य चापि लक्षणं द्वयोरपि संयमयोः त्रिविधा लब्धयः कथिताः।
भवतु नाम एतयोः संयमयोः क्षायोपशमिका लब्धिः, नौपशमिका क्षायिका च, अनिवृत्तिकरणगुण-स्थानादुपरि एतयोरभावात्। न चाधस्तनापूर्वकरणानिवृत्तिकरणगुणस्थानयोः क्षपकोपशामकयोः चारित्रमोहनी-यस्य क्षपणा उपशामना वा अस्ति येन एतयोः क्षायिका उपशामिका वा लब्धिर्भवेत् ?
नैतद् वक्तव्यं, क्षपकोपशामकानिवृत्तिगुणस्थानेऽपि लोभसंज्वलनव्यतिरिक्ताशेषचारित्रमोहनीयस्य क्षपणोपशामनदर्शनेन तत्र क्षायिकोपशामिकालब्ध्योः संभवोपलंभात्। अथवा क्षपकोपशामकापूर्वकरणगुणस्थान- प्रथमसमयप्रभृति उपरि सर्वत्र क्षायिकौपशमिकसंयमलब्धयः संति एव।
कुतः ?
प्रारब्धप्रथमसमयप्रभृति स्तोकस्तोकक्षपणोपशामनकार्यनिष्पत्तिदर्शनात्। प्रतिसमयं कार्यनिष्पत्तेः विना चरमसमये चैव निष्पद्यमानकार्यानुपलंभाच्च।
कथमेकस्य चारित्रस्य त्रयो भावाः भवन्ति ?
नैतद् वक्तव्यं, एकस्यापि चित्रपतंगस्य बहुवर्णदर्शनात्।
तात्पर्यमेतत्-उपशमश्रेण्यारोहकानां उपशमचारित्रं, क्षपकश्रेण्यारोहकानां क्षपकचारित्रं इति मन्यमाने सामायिक-च्छेदोपस्थापनयोः त्रिविधा अपि लब्धयः संभवन्ति इति ज्ञातव्यं।
परिहारशुद्धिसंयमिनां संयतासंयतानां च क्षायोपशमिकलब्धिप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते-
परिहारसुद्धिसंजदो संजदासंजदो णाम कधं भवदि ?।।५०।।
खओवसमियाए लद्धीए।।५१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्रापि नयनिक्षेपानाश्रित्य पूर्ववत् चालना कर्तव्या। चतुःसंज्वलन-नवनोकषायाणां सर्वघातिस्पर्धकानामनन्तगुणहान्या क्षयं गत्वा देशघातित्वेन उपशांतस्पर्धकानामुदयेन परिहारशुद्धिसंयमोत्पत्तेः क्षायोपशमिकालब्धेः परिहारशुद्धिसंयमो भवति। चतुःसंज्वलननवनोकषायाणां क्षयोपशमसंज्ञित- देशघातिस्पर्धकानामुदयेन संयमासंयमोत्पत्तेः क्षयोपशमलब्धेः संयमासंयमः।
कश्चिदाह-त्रयोदशानां प्रकृतीनां देशघातिस्पर्धकानामुदयः संयमलब्धिनिमित्तः कथं संयमासंयमत्वं प्रतिपद्यते ?
तस्य समाधानं-प्रत्याख्यानावरण सर्वघातिस्पर्धकानामुदयेन प्रतिहतचतुःसंज्वलनादिदेशघातिस्पर्धका-नामुदयस्य संयमासंयमं मुक्त्वा संयमोत्पादने असमर्थत्वात्।

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अथ संयममार्गणा अधिकार

अब संयममार्गणा में सामायिक-छेदोपस्थापना संयम के कारणों को बतलाने हेतु प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

संयममार्गणानुसार जीव संयत तथा सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धि संयत किस कारण से होते हैं ?।।४८।।

औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक लब्धि से जीव संयत व सामायिक- छेदोपस्थापनाशुद्धि संयत होते हैं।।४९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नामसंयम, स्थापनासंयम, द्रव्यसंयम और भावसंयम इस प्रकार संयम चार प्रकार का है। नाम और स्थापना संयम ज्ञात हैं। द्रव्यसंयम आगम और नोआगम के भेद से दो प्रकार का है। आगमद्रव्यसंयम ज्ञात है और नोआगमद्रव्य के तीन भेद हैं-ज्ञायकशरीर नोआगमद्रव्यसंयम, भव्य नोआगमद्रव्यसंयम और तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यसंयम। ज्ञायकशरीर और भव्य ज्ञात हैं। तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यसंयम, ज्ञायकशरीर और भव्य ज्ञात हैं। तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यसंयम संयम के साधनभूत पिच्छिका, आहार, कमण्डलु पुस्तक आदि को कहते हैं। भावसंयम आगम और नोआगम के भेद से दो प्रकार का है। आगमभावसंयम ज्ञात है। नोआगमभावसंयम तीन प्रकार का है-क्षायिक, क्षायोपशमिक और औपशमिक। इन संयमों के प्रकारों में से किस प्रकार से संयम होता है यह पृच्छासूत्र आया है।

इसी प्रकार सामायिक और छेदोपस्थापनाशुद्धि संयतों का भी निक्षेप करना चाहिए।

औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक लब्धियों के द्वारा जीव सामायिक, छेदोपस्थापनाशुद्धि संयत होते हैं।

उनमें से यहाँ औपशमिक संयम का लक्षण कहते हैं-चारित्रावरण कर्म के सर्वोपशम से उपशान्त- कषाय गुणस्थान में संयम होता है। इसलिए औपशमिक लब्धि से संयम की उत्पत्ति कही है। चूँकि चारित्रावरण कर्म के क्षय से भी जिसके संयम की उत्पत्ति होती है, उस संयम की क्षायिक लब्धि होती है। चारों संज्वलन कषायों और नौ नोकषायों के देशघाती स्पर्धकों के उदय से जिस संयम की उत्पत्ति होती है, उसकी क्षायोपशमिक लब्धि संज्ञा पाई जाती है।

शंका-चार संज्वलन और नव नोकषायों के स्पर्धकों के उदय को क्षयोपशम नाम क्यों दिया गया है ?

समाधान-सर्वघाती स्पर्धक अनन्तगुणे हीन होकर और देशघाती स्पर्धकों में परिणत होकर उदय में आते हैं। उन सर्वघाती स्पर्धकों का अनन्तगुणहीनपना ही क्षय कहलाता है और उनका देशघाती स्पर्धकों के रूप से अवस्थान होना उपशम है। उन्हीं क्षय और उपशम से संयुक्त उदय क्षयोपशम कहलाता है। उसी क्षयोपशम से उत्पन्न संयम भी इसी कारण क्षायोपशमिक होता है।

इसी प्रकार सामायिक और छेदोपस्थापना संयम का भी लक्षण जानना चाहिए, दोनों संयमों में तीन प्रकार की लब्धियाँ कही गई हैं।

शंका-सामायिक और छेदोपस्थापनाशुद्धि संयतों के क्षयोपशम लब्धि भले ही हो, किन्तु उनके औपशमिक और क्षायिक लब्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि अनिवृत्तिकरण गुणस्थान से ऊपर इन संयमों का अभाव पाया जाता है और नीचे के अर्थात् अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन दो क्षपक व उपशामक गुणस्थानों में चारित्रमोहनीय की क्षपणा व उपशामना होती नहीं है, जिससे उक्त संयतों के क्षायिक व औपशमिक लब्धि संभव हो सके ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि क्षपक व उपशामकसंबंधी अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में भी लोभ संज्वलन से अतिरिक्त अशेष चारित्रमोहनीय का क्षपण व उपशमन के देखे जाने से वहाँ क्षायिक व औपशमिक लब्धियों की उपलब्धि संभव है। अथवा क्षपक और उपशामक संबंधी अपूर्वकरण के प्रथम समय से लेकर ऊपर सर्वत्र क्षायिक और औपशमिक संयमलब्धियाँ हैं ही।

प्रश्न-कैसे हैं ?

उत्तर-क्योंकि, उक्त गुणस्थान के प्रारंभ होने के प्रथम समय से लेकर थोड़े-थोड़े क्षपण और उपशामनरूप कार्य की निष्पत्ति देखी जाती है। यदि प्रत्येक समय कार्य की निष्पत्ति न हो तो अंतिम समय में भी कार्य पूरा होता हुआ नहीं पाया जा सकता है।

शंका-एक ही चारित्र के औपशमिकादि तीन भाव कैसे होते हैं ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि जिस प्रकार एक चित्र में पतंगा अर्थात् बहुवर्ण पक्षी के बहुत से वर्ण देखे जाते हैं, उसी प्रकार एक ही चारित्र नाना भावों से युक्त हो सकता है।

तात्पर्य यह है कि-उपशमश्रेणी पर चढ़ने वाले मुनियों के उपशमचारित्र होता है और क्षपकश्रेणी पर चढ़ने वाले महामुनियों के क्षायिकचारित्र होता है, ऐसा मानने पर सामायिक और छेदोपस्थापना दोनों प्रकार के संयम में तीनों प्रकार की लब्धियाँ संभव है, ऐसा जानना चाहिए।

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अब परिहारशुद्धिसंयमियों की एवं संयतासंयत जीवों की क्षायोपशमिक लब्धि का प्रतिपादन करने हेतु प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव परिहारशुद्धिसंयत और संयतासंयत किस कारण से होते हैं ?।।५०।।

क्षायोपशमिक लब्धि से जीव परिहारशुद्धिसंयत व संयतासंयत होते हैं।।५१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ भी नय और निक्षेपों का आश्रय लेकर पूर्ववत् चालना-कथन करना चाहिए। चार संज्वलन और नव नोकषायों के सर्वघाती स्पर्धकों के अनन्तगुणी हानि द्वारा क्षय को प्राप्त होकर देशघातीरूप से उपशान्त हुए स्पर्धकों के उदय से परिहारशुद्धिसंयम की उत्पत्ति होती है, इसीलिए क्षायोपशमिक लब्धि से परिहारशुद्धिसंयम होता है। चार संज्वलन और नव नोकषायों के क्षयोपशम संज्ञा वाले देशघाती स्पर्धकों के उदय से संयमासंयम की उत्पत्ति होती है, इसीलिए क्षयोपशम लब्धि से संयमासंयम होता है।

यहाँ कोई शंका करता है-चार संज्वलन और नवनोकषाय, इन तेरह प्रकृतियों के देशघाती स्पर्धकों का उदय तो संयम की प्राप्ति में निमित्त होता है, वह संयमासंयम के निमित्तपने को कैसे प्राप्त कर सकता है ?

उसका समाधान देते हैं-नहीं, क्योंकि प्रत्याख्यानावरण के सर्वघाती स्पर्धकों के उदय से जिन चार संज्वलनादिक के देशघाती स्पर्धकों का उदय प्रतिहत हो गया है, उस उदय में संयमासंयम को छोड़कर संयम उत्पन्न करने की सामथ्र्य नहीं होती है।

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सूक्ष्मसांपरायिक-यथाख्यातसंयतानां स्वामित्वनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजदो जहाक्खादविहारसुद्धिसंजमो णाम कधं भवदि ?।।५२।।

उवसमियाए खइयाए लद्धीए।।५३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-उपशामक-क्षपकसूक्ष्मसांपरायिकगुणस्थानयोः सूक्ष्मसांपरायिक- शुद्धिसंयमस्योपलंभात् उपशमिकायाः क्षायिकायाः लब्धेः सूक्ष्मसांपरायिकशुद्धिसंयमो भवति। उपशांत-क्षीणकषायादिषु यथाख्यातविहारशुद्धिसंयमोपलंभात् उपशामिकायाः क्षायिकायाः लब्धेः यथाख्यात-विहारशुद्धिसंयमो भवति।
अत्रापि उपशमश्रेण्यारोहकानां औपशमिकालब्धिज्र्ञायते, क्षपकश्रेण्यारोहकानां क्षायिका लब्धिश्च मन्तव्या।
असंयतानां लब्धिप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते-
असंजदो णाम कधं भवदि ?।।५४।।
संजमघादीणं कम्माणमुदयेण।।५५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अप्रत्याख्यानावरणस्य उदयः एव असंयमस्य हेतुः, संयमासंयमप्रतिषेधमुखेन सर्वसंयमघातित्वात् ततः संयमघातिकर्मणामुदयेन कथं घटते ?
इति प्रश्ने सति समाधानं क्रियते-नैतद् वक्तव्यं, इतरेषामपि चारित्रावरणीयानां कर्मणामुदयेन विना अप्रत्याख्यानावरणस्य देशसंयमघातने सामथ्र्याभावात्।
संयमो नाम जीवस्वभावः, ततो न सः अन्यैः विनाश्यते, तद्विनाशे जीवद्रव्यस्यापि विनाशप्रसंगात् ?
न, उपयोगस्येव संयमस्य जीवस्य लक्षणत्वाभावात्।
लक्षणस्य किं लक्षणम् ?
यस्याभावे द्रव्यस्याभावो भवति तत्तस्य लक्षणं, यथा पुद्गलद्रव्यस्य रूपरसगंधस्पर्शाः, जीवस्य उपयोगः। तस्मात् न संयमाभावेन जीवद्रव्यस्याभावो भवति।
प्रथमगुणस्थानादारभ्य चतुर्थगुणस्थानपर्यन्ता जीवा असंयता भवन्ति इति ज्ञातव्यं।
एवं संयममार्गणायां लब्धिप्रतिपादनपरत्वेन अष्टौ सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां संयममार्गणानाम अष्टमोऽधिकार: समाप्त:।

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अब सूक्ष्मसापंरायिक और यथाख्यातसंयतों का स्वामित्व निरूपण करने हेतु दो सूत्रों का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत और यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत जीव किस कारण से होते हैं।।५२।।

औपशमिक और क्षायिक लब्धि से जीव सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत और यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत होते हैं।।५३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशामक और क्षपक दोनों प्रकार के सूक्ष्मसाम्परायिक गुणस्थानों में सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयम की प्राप्ति होती है, इसीलिए औपशमिक व क्षायिक लब्धि से सूक्ष्मसाम्परायिक शुद्धि संयम होता है। उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय आदि गुणस्थानों में यथाख्यातविहारशुद्धिसंयम की प्राप्ति होने से औपशमिक व क्षायिक लब्धि से यथाख्यातविहारशुद्धिसंयम होता है। यहाँ भी उपशमश्रेणी पर चढ़ने वालों के औपशमिक लब्धि होती है ऐसा जाना जाता है तथा क्षपकश्रेणी पर चढ़ने वालों के क्षायिक लब्धि होती है, ऐसा मानना चाहिए।

[सम्पादन]
अब असंयत जीवों की लब्धि बतलाने हेतु प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव असंयत किस कारण से होते हैं ?।।५४।।

संयम के घाती कर्मों के उदय से जीव असंयत होते हैं।।५५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अप्रत्याख्यानावरण कषाय का उदय ही असंयम का हेतु है, क्योंकि वह संयमासंयम के प्रतिषेध के द्वारा समस्त संयम का घाती है। अत: संयमघाती कर्मों के उदय से जीव असंयत होता है ऐसा कहना कैसे घटित होता है ? ऐसा प्रश्न होने पर उसका समाधान करते हैं-

ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि अन्य भी चारित्रावरण कर्मों के उदय के बिना अकेले अप्रत्याख्यानावरण में देशसंयम को घात करने की सामथ्र्य नहीं होती है।

शंका-संयम जीव का स्वभाव है, इसलिए वह अन्य के द्वारा विनष्ट नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उसका विनाश होने पर जीवद्रव्य के विनाश का भी प्रसंग प्राप्त होता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि जिस प्रकार उपयोग जीव का लक्षण माना गया है, उस प्रकार संयम जीव का लक्षण नहीं होता है।

शंका-लक्षण का क्या लक्षण है ?

समाधान-जिसके अभाव में द्रव्य का भी अभाव हो जाता है, वही उसका लक्षण है। जैसे-पुद्गल द्रव्य का लक्षण रूप, रस, गंध और स्पर्श है और जीव का लक्षण उपयोग है। अतएव संयम के अभाव में जीव द्रव्य का अभाव नहीं होता है।

प्रथम गुणस्थान से लेकर चतुर्थगुणस्थान पर्यन्त जीव असंयत ही होते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार संयममार्गणा में लब्धियों का प्रतिपादन करने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्तचिंतामणिटीका में संयममार्गणा नाम का आठवाँ अधिकार समाप्त हुआ।