ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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09.संयम मार्गणा अधिकार

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संयम मार्गणा अधिकार

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अथ संयममार्गणाधिकार:

अथ पंचभिःस्थलैः द्वाविंशतिसूत्रैः संयममार्गणानाम अष्टमोऽधिकारः प्रारम्भ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले सामान्येन संयतस्य परिहारविशुद्धिसंयतस्य संयतासंयतस्य च स्थितिनिरूपणत्वेन ‘‘संजमाणुवादेण’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले सामायिकच्छेदोपस्थापनसंयतयोः कालप्ररूपणत्वेन ‘‘सामाइय’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं तृतीयस्थले सूक्ष्मसांपरायिकसंयमिनः कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘सुहुमसांपराइय’’ इत्यादिना पंच सूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले यथाख्यातशुद्धिसंयतानां कालप्रतिपादनत्वेन ‘‘जहाक्खाद’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। तदनंतरं पंचमस्थले असंयतानां कालकथनत्वेन ‘‘असंजदा’’ इत्यादिसूत्रषट्कं इति समुदायपातनिका।
इदानीं सामान्येन संयमिनां परिहारशुद्धिसंयतानां संयतासंयतानां च कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
संजमाणुवादेण संजदा परिहारसुद्धिसंजदा संजदासंजदा केवचिरं कालादो होंति ?।।१४७।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१४८।।
उक्कस्सेण पुव्वकोडी देसूणा।।१४९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिद् मनुष्यः संयमं परिहारशुद्धिसंयमं संयमासंयमं वा गृहीत्वा जघन्यकालमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वान्यगुणस्थानं गतः, तस्य जघन्यकालमुपलभ्यते। उत्कर्षेण-कश्चिन्मनुष्यः गर्भाद्यष्ट-वर्षेषु सत्सु संयमं प्रतिपद्य देशोनपूर्वकोटिं संयममनुपाल्य कालं कृत्वा देवेषूत्पन्नः तस्य देशोनपूर्वकोटिमात्रसंयम-कालः उपलभ्यते।
कश्चिन्मानवः सर्वसुखी भूत्वा त्रिंशद्वर्षाणि गमयित्वा संयमं प्रतिपद्य ततो वर्षपृथक्त्वेन तीर्थकरपादमूले प्रत्याख्याननामधेयं पूर्वं पठित्वा पुनः परिहारविशुद्धिसंयमं संप्राप्य देशोनपूर्वकोटिकालं स्थित्वा देवेषूत्पन्नः। अस्य मुनेः अष्टत्रिंशद्वर्षैः ऊनं पूर्वकोटिप्रमाणं परिहारशुद्धिसंयमस्य काल उक्तः। केऽपि आचार्याः षोडशवर्षैरूनं, केऽपि द्वाविंशतिवर्षैरूनं पूर्वकोटिकालमिति भणन्ति।
संयतासंयतस्य तिरश्चां अंतर्मुहूर्तपृथक्त्वेन ऊनं पूर्वकोटिप्रमाणमिति ज्ञातव्यं।
एवं प्रथमस्थले सामान्यसंयमिनां परिहारशुद्धिसंयतानां संयतासंयतानां चापि स्थितिनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति सामायिक-च्छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयतयोः कालनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
सामाइय-छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदा केवचिरं कालादो होंति ?।।१५०।।
जहण्णेण एगसमओ।।१५१।।
उक्कस्सेण पुव्वकोडी देसूणा।।१५२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चित् महामुनिः उपशमश्रेणीतोऽवतीर्यमाणः सूक्ष्मसांपरायिकसंयमात् सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयमं प्रतिपद्य तत्र एकसमयं स्थित्वा द्वितीयसमये मृतस्तस्यैकसमय उपलभ्यते जघन्येन।
उत्कर्षेण-पूर्वकोट्यायुष्कमनुष्यस्य गर्भाद्यष्टवर्षेषु सामायिकं-च्छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयमं चावाप्य अष्टवर्षोनपूर्वकोटिकालं विहृत्य देवेषूत्पन्नस्य तदुपलंभात्।
एवं द्वितीयस्थले सामायिकच्छेदोपस्थानासंयमकालप्ररूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
अधुना सूक्ष्मसांपरायिकमहासाधूनां कालप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-
सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजदा केवचिरं कालादो होंति ?।।१५३।।
उवसमं पडुच्च जहण्णेण एगसमओ।।१५४।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१५५।।
खवगं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१५६।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१५७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चित् महामुनिः उपशमश्रेण्यामारोहन् अनिवृत्तिकरण उपशमकः सूक्ष्मसांपरा-यिकशुद्धिसंयतो जातः, एकसमयं स्थित्वा द्वितीयसमये मृत्वा देवो जातः। अथवा कश्चिदुपशांतकषायो महासाधुः ततोऽवतीर्य दशमगुणस्थाने आगत्य एकसमयानन्तरं मृतः। अनयोरेव मुन्योः एकसमयो लभ्यते जघन्यकालापेक्षया। उत्कर्षेण सूक्ष्मसांपरायिकगुणस्थाने अंतर्मुहूर्तादधिककालमवस्थानाभावात्।
क्षपकश्रेण्यामारोहकस्य सूक्ष्मसांपरायिकक्षपकस्य महासाधोः मरणाभावात् जघन्येनोत्कर्षेण वा अंतर्मुहूर्तमेव कालो भवति।
एवं तृतीयस्थले सूक्ष्मसांपरायनामदशमगुणस्थानवर्तिनां उपशामकानां क्षपकाणां च स्थितिकथनमुख्यत्वेन पंच सूत्राणि गतानि।

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अथ संयममार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब पाँच स्थलों में बाईस सूत्रों के द्वारा संयम मार्गणा नाम का आठवाँ अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य से संयत मुनि के और परिहारविशुद्धि संयत तथा संयतासंयत की स्थिति का निरूपण करने हेतु ‘‘संजमाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में सामायिक और छेदोपस्थापना संयमधारी मुनियों का काल प्ररूपण करने वाले ‘‘सामाइय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद तृतीय स्थल में सूक्ष्मसांपराय संयमियों का काल कथन करने वाले ‘‘सुहुमसांपराइय’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ स्थल में यथाख्यातशुद्धि संयतों का काल प्रतिपादन करने वाले ‘‘जहाक्खाद’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। तदनंतर पंचम स्थल में असंयतों का काल कथन करने हेतु ‘‘असंजदा’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। इस प्रकार अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब सामान्यरूप से संयमियों का, परिहारविशुद्धि संयतों का और संयतासंयत जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

संयममार्गणा के अनुसार संयत, परिहारविशुद्धिसंयत और संयतासंयत मनुष्य कितने काल तक रहते हैं ?।।१४७।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव संयत रहते हैं।।१४८।।

उत्कृष्ट से कुछ कम पूर्वकोटि काल तक जीव संयत अवस्था में रहते हैं।।१४९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई मनुष्य संयम को या परिहारविशुद्धिसंयम को अथवा संयमासंयम को ग्रहण करके वहाँ जघन्यरूप से अन्तर्मुहूर्त काल तक स्थित रहकर अन्य गुणस्थान को प्राप्त हुआ, इस प्रकार उनका जघन्य काल पाया जाता है। उत्कृष्टरूप से-कोई मनुष्य गर्भ से लेकर आठ वर्षों में संयम को प्राप्त करके कुछ कम पूर्वकोटि वर्ष तक संयम का अनुपालन कर वहाँ से मरकर देवों में उत्पन्न हुए मनुष्य के कुछ कम पूर्वकोटिप्रमाण संयमकाल पाया जाता है।

कोई मनुष्य सर्वसुखी होकर वहाँ तीस वर्ष व्यतीत करके संयम को प्राप्त करके वहाँ वर्षपृथक्त्व से तीर्थंकर के पादमूल में प्रत्याख्यान नामक पूर्व को पढ़कर पुन: परिहारविशुद्धिसंयम को प्राप्त करके वहाँ कुछ कम पूर्वकोटि काल तक रहकर पुन: देवों में जन्म धारण कर लिया। उन मुनि के अड़तीस वर्षों से कम पूर्वकोटिप्रमाण परिहारविशुद्धिसंयम का काल कहा गया है। कोई आचार्य सोलह वर्षों से और कोई बाईस वर्षों से कम पूर्वकोटि वर्ष प्रमाण उसका काल कहते हैं।

संयतासंयत गुणस्थानवर्ती तिर्यंचों का अन्तर्मुहूर्त पृथक्त्व से कम पूर्वकोटि वर्ष प्रमाण काल जानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य संयमियों का, परिहारविशुद्धिसंयतों का एवं संयतासंयत जीवों की स्थिति का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयतों का काल निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सामायिक और छेदोपस्थापनाशुद्धि संयत कितने काल तक रहते हैं ?।।१५०।।

जघन्य से एक समय तक जीव सामायिक और छेदोपस्थापनाशुद्धि संयत रहते हैं।।१५१।।

उत्कृष्ट से कुछ कम पूर्वकोटि वर्ष काल तक रहते हैं।।१५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई उपशमश्रेणी से उतरने वाले महामुनि के सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धि संयम से सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयम को प्राप्तकर और उसमें एक समय तक रहकर द्वितीय समय में मरने पर एक समय काल पाया जाता है। उत्कृष्टरूप से-पूर्वकोटि वर्ष प्रमाण आयु वाले मनुष्यों के गर्भ से लेकर आठ वर्षों में सामायिक-छेदोपस्थानिशुद्धिसंयम को प्राप्त कर और आठ वर्ष कम पूर्वकोटि वर्ष तक विहार करके देवों में उत्पन्न होने पर वह सूत्रोक्त उत्कृष्टकाल पाया जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में सामायिक और छेदोपस्थापना संयम का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सूक्ष्मसाम्परायिक महासाधुओं का काल प्रतिपादन करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत कितने काल तक रहते हैं ?।।१५३।।

उपशम की अपेक्षा जघन्य से एक समय तक जीव सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत रहते हैं।।१५४।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्तकाल तक जीव सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत रहते हैं।।१५५।।

क्षपक की अपेक्षा जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धि संयत रहते हैं।।१५६।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत रहते हैं।।१५७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई उपशम श्रेणी पर आरोहण करते हुए महामुनि अनिवृत्तिकरण, उपशमक, सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धि संयत हुए, वहाँ एक समय तक रहकर द्वितीय समय में मरकर देवगति में उत्पन्न हो गए। अथवा कोई उपशान्तकषाय गुणस्थानवर्ती महासाधु वहाँ से उतरकर दशवें गुणस्थान में आकर वहाँ एक समय के बाद ही मरण को प्राप्त हो गये। काल की अपेक्षा इन दोनों ही मुनियों का जघन्य से एक समय काल होता है। उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल है, क्योंकि इससे अधिक काल के रहने का अभाव पाया जाता है।

क्षपक श्रेणी में आरोहण करने वाले सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती महासाधु के मरण का अभाव होता है, उनका जघन्य अथवा उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त ही होता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में सूक्ष्मसाम्पराय नामक दशम गुणस्थानवर्ती उपशामक और क्षपक मुनियों की स्थिति का कथन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।


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संप्रति यथाख्यातविहारशुद्धिसंयतानां कालकथनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-

जहाक्खादविहारसुद्धिसंजदा केवचिरं कालादो होंति ?।।१५८।।

उवसमं पडुच्च जहण्णेण एगसमओ।।१५९।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१६०।।
खवगं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१६१।।
उक्कस्सेण पुव्वकोडी देसूणा।।१६२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-उपशमश्रेण्यपेक्षया कश्चित् साधुः सूक्ष्मसांपरायिकशुद्धसंयतगुणस्थानवर्ती उपशान्तकषायत्वं संप्राप्य एकसमयमात्रकालं तत्र स्थित्वा द्वितीयसमये मृतस्तस्यैकसमयो लभ्यते। उपशांत- कषायस्यान्तर्मुहूर्तादधिककालाभावात् उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तमुच्यते।
क्षपकश्रेण्यपेक्षया कश्चित् यतिः क्षपकश्रेणिमारुह्य क्षीणकषायगुणस्थाने यथाख्यातसंयमं प्रतिपद्य सयोगकेवली भूत्वान्तर्मुहूर्तेणाबंधकत्वं गतस्तस्य जघन्येन एतत्काल उपलभ्यते। उत्कर्षेण-गर्भाद्यष्टवर्षाणि गमयित्वा संयमं गृहीत्वा सर्वलघुकालेन मोहनीयकर्म क्षपयित्वा यथाख्यातसंयमी भूत्वा देशोनपूर्वकोटिं विहृत्याबंधकत्वं गतस्य तदुपलंभात्।
एतद् यथाख्यातसंयमप्राप्त्यर्थमेव भवद्भिः पुरुषार्थो विधेयः।
उक्तं च श्रीपद्मनन्दिसूरिणा-
मानुष्यं किल दुर्लभं भवभृतस्तत्रापि जात्यादयः।
तेष्वेवाप्तवचः श्रुतिः स्थितिरतस्तस्याश्च दृग्बोधने।।
प्राप्ते ते अपि निर्मले अपि परं स्यातां न येनोज्झिते।
स्वर्मोक्षैकफलप्रदे स च कथं न श्लाघ्यते संयमः।।९७।।
अतो प्रत्यहं एषा भावना भावयितव्या-
शार्दूलविक्रीडित:- ग्रीष्मे भूधरमस्तकाश्रितशिलां मूलं तरोः प्रावृषि।
प्रोद्भूते शिशिरे चतुष्पथपदं प्राप्ताः स्थितिं कुर्वते।
ये तेषां यमिनां यथोक्ततपसां ध्यानप्रशान्तात्मनां ।
मार्गे संचरतो मम प्रशमिनः कालः कदा यास्यति।।६।।
अनया भावनयैव शीघ्रंं यथाख्यातचारित्रस्य पूर्णत्वं भविष्यति।
एवं चतुर्थस्थले यथाख्यातसंयमकालकथनमुख्यत्वेन सूत्रपंचकं गतम् ।
संप्रति असंयतानां कालकथनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
असंजदा केवचिरं कालादो होंति ?।।१६३।।
अणादिओ अपज्जवसिदो।।१६४।।
अणादिओ सपज्जवसिदो।।१६५।।
सादिओ सपज्जवसिदो ।।१६६।।
जो सो सादिओ सपज्जवसिदो तस्स इमो णिद्देसो-जहण्णेण अंतो-मुहुत्तं।।१६७।।
उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणं।।१६८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका--सूत्राणामर्थः सुगमो वर्तते। सादिसान्तकालः भव्यजीवस्य जघन्येनान्तर्मुहूर्तं। कश्चित् संयतः परिणामप्रत्ययेनासंयमं गत्वा तत्र सर्वजघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा संयमं गतस्तस्य एतत्कालः।
अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्यादिसमये संयमं संप्राप्य उपशमसम्यक्त्वकाले षडावलिकावशेषेऽसंयमं गत्वा किञ्चिन्नूनं अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनं परिवत्र्य पुनः त्रीणि करणानि कृत्वा संयमं प्रतिपन्नस्य तदुत्कृष्टकालो लभ्यते।
तात्पर्यमेतत्-संयमं प्रतिपद्याप्रमादी भूत्वा तस्य रक्षणं कर्तव्यं। पुनः कदाचिदपि असंयमो मा भवेदिति भावनीयं प्रतिक्षणम् ।
एवं पंचमस्थले असंयतानां कालनिरूपणत्वेन सूत्रषट्कं गतम् ।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृतfिसद्धांतचिंतामणिटीकायां संयममार्गणा-
नामाष्टमोऽधिकारः समाप्तः।

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अब यथाख्यातविहारशुद्धिसंयतों के काल का प्ररूपण करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत कितने काल तक रहते हैं ?।।१५८।।

उपशम की अपेक्षा जघन्य से एक समय तक जीव यथाख्यातविहारशुद्धि संयत रहते हैं।।१५९।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत रहते हैं।।१६०।।

क्षपक की अपेक्षा जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत रहते हैं।।१६१।।

उत्कृष्ट से कुछ कम पूर्व कोटि वर्ष तक जीव यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत रहते हैं।।१६२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशमश्रेणी की अपेक्षा सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानवर्ती कोई मुनिराज उपशान्तकषायपने को प्राप्त करके वहाँ एक समय मात्र काल तक रह करके द्वितीय समय में मरण को प्राप्त हो गये, उनके एक समय का काल प्राप्त होता है। उत्कृष्ट काल उनका अन्तर्मुहूर्त होता है। क्योंकि उपशांतकषाय का अन्तर्मुहूर्त से अधिक काल नहीं होता है।

क्षपक श्रेणी की अपेक्षा कोई महामुनिराज क्षपक श्रेणी पर चढ़कर क्षीणकषाय गुणस्थान में यथाख्यात- संयम को प्राप्त करके सयोगिकेवली बनकर अन्तर्मुहूर्त से अबन्धकपने को प्राप्त हुए मुनिराज के जघन्य से यह अन्तर्मुहूर्त का काल पाया जाता है। उत्कृष्ट से-गर्भ से आठ वर्षों को व्यतीत करके संयम को प्राप्त करके सर्वलघुकाल से मोहनीय कर्म का क्षपण करके यथाख्यात संयमी बनकर कुछ कम पूर्वकोटिप्रमाण वर्ष तक पृथ्वीतल पर विहार करके अबंधक अवस्था को प्राप्त हुए मुनिराज के यह उत्कृष्टकाल-कुछ कम पूर्वकोटि वर्ष प्रमाण काल पाया जाता है।

इस यथाख्यातसंयम की प्राप्ति हेतु हम सभी को पुरुषार्थ करना चाहिए।

श्री पद्मनंदि आचार्य ने कहा भी है-

श्लोकार्थ-प्रथम तो इस संसाररूपी गहनवन में भ्रमण करते हुए प्राणियों को मनुष्य होना ही अत्यन्त कठिन है किन्तु किसी कारण से मनुष्य जन्म प्राप्त भी हो जावे, तो उत्तमजाति आदि मिलना अति दु:साध्य है। यदि किसी प्रबलदैवयोग से उत्तमजाति भी मिल जावे तो अर्हंत भगवान के वचनों को सुनना बड़ा दुर्लभ है। यदि उनके सुनने का भी सौभाग्य प्राप्त हो जावे, तो संसार में अधिक जीवन नहीं मिलता है। यदि अधिक जीवन भी मिले तो सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होनी अति कठिन है। यदि किसी पुण्य के उदय से अखण्ड तथा निर्मल सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति भी हो जावे, तो उस संयम धर्म के बिना वे स्वर्ग या मोक्षरूपी फल के देने वाले नहीं हो सकते, इसलिए सबकी अपेक्षा संयम अति प्रशंसनीय है अत: ऐसे संयम की अवश्य संयमियों को रक्षा करना चाहिए।

इसलिए प्रतिदिन ऐसी भावना भानी चाहिए-

श्लोकार्थ-जो योगीश्वर ग्रीष्मऋतु में पहाड़ों के अग्रभाग में स्थित शिला के ऊपर ध्यानाभ्यास में लीन होकर रहते हैं तथा वर्षाकाल में वृक्षों के मूल में बैठकर ध्यान करते हैं और शरदऋतु में चौड़े मैदान में बैठकर ध्यान लगाते हैं, उन शास्त्र के अनुसार तप के धारी तथा ध्यान से जिनकी आत्मा शांत हो गई है ऐसे योगीश्वरों के मार्ग में गमन करने के लिए मुझे भी कब वह समय मिलेगा ? अर्थात् मुझे वह समय शीघ्र ही प्राप्त हो, ऐसी भावना भाते रहना चाहिए।

इस भावना से ही शीघ्र यथाख्यातचारित्र की पूर्णता होगी।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में यथाख्यातसंयम के कालकथन की मुख्यता वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

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अब असंयत जीवों का काल बतलाने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव असंयत अवस्था में कितने काल तक रहते हैं ?।।१६३।।

अनादि-अनन्त काल तक जीव असंयत अवस्था में रहते हैं।।१६४।।

अनादि-सान्त काल तक जीव असंयत अवस्था में रहते हैं।।१६५।।

सादि-सान्त काल तक जीव असंयत अवस्था में रहते हैं।।१६६।।

जो वह सादि-सान्त असंयम है, उसका इस प्रकार निर्देश है-जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव असंयत रहते हैं।।१६७।।

उत्कृष्ट से कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल तक जीव असंयत रहते हैं।।१६८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। सादि-सान्त काल भव्यजीव के जघन्य से अन्तर्मुहूर्त होता है। किसी संयत जीव के परिणामों के निमित्त से असंयम को प्राप्त होकर और वहाँ सर्वजघन्य अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर पुन: संयम को प्राप्त करने पर उक्त जघन्य काल पाया जाता है।

अर्धपुद्गलपरिवर्तन के प्रथम समय में संयम को ग्रहणकर उपशम सम्यक्त्व के काल में छह आवलियाँ शेष रहने पर असंयम को प्राप्त होकर कुछ कम अर्ध पुद्गलपरिवर्तनकाल तक भ्रमण कर पुन: तीन करणों को करके संयम को प्राप्त हुए जीव के वह सूत्रोक्त उत्कृष्ट काल पाया जाता है। तात्पर्य यह है कि-संयम को प्राप्त करके हमें अप्रमादी बनकर उसकी रक्षा करना चाहिए। पुन: कभी भी असंयम भाव न प्राप्त होने पावे, ऐसी भावना प्रतिक्षण भानी चाहिए।

इस प्रकार पंचम स्थल में असंयत जीवों का कालनिरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कहे गये कालानुगम प्रकरण में गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में संयममार्गणा नाम का आठवाँ अधिकार समाप्त हुआ।